वर्तमान किसान आंदोलन: एक नज़र- सुरेन्द्र पाल सिंह

हिंदू- मुस्लिम- सिक्ख ने अपनी अपनी नकारात्मक विरासतों को पीछे छोड़ते हुए सकारात्मक विरासत को आगे बढ़ाने का जिम्मा लिया है और यही है इस आंदोलन की रीढ़ की हड्डी। (लेख से )

करीब 31 दिनों तक शाहजहांपुर खेड़ा बॉर्डर पर रहने के बाद 27 जनवरी से एक ब्रेक लिया है। इससे पहले टिकरी बॉर्डर, सिंघु बॉर्डर पर वहाँ की हलचल और सिलसिले को अनुभव करने के लिए जाना हुआ था। पूरे एहसास को यदि एक पंक्ति में कहना हो तो मैं इसे ऐतिहासिक आंदोलन कहना चाहूंगा। अपनी बात को विस्तार देने से पहले एक उदाहरण देना जरूरी लगता है। साम्प्रदायिक राजनीति  का पहला काम होता है संगठित जन आंदोलन की इस प्रकार से कमर तोड़ देना ताकि लंबे अरसे तक वे उभर ही ना पाए। इसके लिए उनके पास अचूक हथियार है सांप्रदायिक दंगों को हवा देकर उकसाना। सन 2013 में  मुजफ्फरनगर के दंगे इसका एक बड़ा उदाहरण है, जिसने स्थानीय किसान आंदोलन की बुनियाद को इतना कमजोर कर दिया कि मिलकर अल्लाह-हू-अकबर और हर-हर महादेव के नारों की आवाजें महज़ एक याददाश्त ही बन कर रह गई। इसी सिलसिले में किसानों के दो अगुआ नेता महेंद्र टिकैत और चौधरी गुलाम मोहम्मद के बीच की दूरियां बढ़ती गई लेकिन आज वक्त के तकाज़े ने फिर से पुराने भाईचारे को जिंदा कर दिया। कितना सकून मिला होगा जब लाखों लोगों की भीड़ के बीच चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी उनके पांव छू रहे हैं और चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे और वारिस राकेश टिकैत उनसे गले मिल रहे हैं। यह वाक्या भी मायने रखता है जब भारी भीड़ के सामने राकेश टिकैत द्वारा सत्तासीन पार्टी के कारकूनों द्वारा गाजीपुर बॉर्डर पर सिक्खों को टारगेट करके खून खराबे की साजिश का पर्दाफाश किया गया।

साम्प्रदायिकता का  विरोध और आपसी भाईचारे को बढ़ाने वाला है यह आंदोलन: 

किसी ना किसी रूप में लगातार हिंदू -मुसलमान की धुरी पर राजनीति को केंद्रित करते हुए नफ़रत के ज़हर की बुआई करते हुए  सफलतापूर्वक वोटों की फसल काटी गई और इस प्रक्रिया में एक बीमार संस्कृति को पैदा करने का प्रयास किया गया है।  लेकिन इतिहासचक्र को लंबे दौर तक उल्टी दिशा में नहीं चलाया जा सकता है। इस बार इतिहासचक्र को आगे की ओर ले जाने का श्रेय किसान आंदोलन को जाता है। हिंदू- मुस्लिम- सिक्ख ने अपनी अपनी नकारात्मक विरासतों को पीछे छोड़ते हुए सकारात्मक विरासत को आगे बढ़ाने का जिम्मा लिया है और यही है इस आंदोलन की रीढ़ की हड्डी।

प्रत्येक समाज में नकारात्मक और सकारात्मक विरासतें मौजूद होती जो समाज को तोड़ने या जोड़ने का काम करती हैं। सौभाग्य से सिक्खों में लंगर की 500 साल पुरानी विरासत ने पूरे आंदोलन को  रोटी और सेवा की समृद्ध परम्परा के सहारे ना केवल कायम रखा है बल्कि हरियाणा,  राजस्थान और उत्तर प्रदेश के आंदोलनकारियों को बहुत कुछ सिखाया है कि आंदोलन के लिए सफेदपोश चौधरी होने की बजाए सेवा भाव कितना जरूरी है

रोटी और सेवा का रिश्ता:

प्रत्येक समाज में नकारात्मक और सकारात्मक विरासतें मौजूद होती जो समाज को तोड़ने या जोड़ने का काम करती हैं। सौभाग्य से सिक्खों में लंगर की 500 साल पुरानी विरासत ने पूरे आंदोलन को  रोटी और सेवा की समृद्ध परम्परा के सहारे ना केवल कायम रखा है बल्कि हरियाणा,  राजस्थान और उत्तर प्रदेश के आंदोलनकारियों को बहुत कुछ सिखाया है कि आंदोलन के लिए सफेदपोश चौधरी होने की बजाए सेवा भाव कितना जरूरी है। उल्लेखनीय है कि जाति और धर्म के नाम पर आपसी दूरियों की खाई पाटता है रोटी और सेवा का रिश्ता। शाहजहांपुर खेड़ा बॉर्डर पर एक मेवाती ख़ेमा है जहां सुबह- सुबह अंधेरे में ही चाय मिलनी शुरू हो जाती है और ये सिलसिला देर रात तक चलता रहता है। यह इतनी लोकप्रिय है कि यहाँ की चाय के तलबगारों की 100- 200 की संख्या में लाइन अमूमन वहां पर मिल जाएगी। सिक्ख और मुसलमानों के द्वारा मिलकर वहां पर खीर पकाने का दृश्य मन को छू लेने वाला होता है।

साझी संस्कृति को मजबूत करता हुआ किसान आंदोलन:

लोहड़ी के दिन हमने शाहजहांपुर खेड़ा बॉर्डर पर भी उत्सव मनाया। प्रचंड ठण्ड के माहौल में लकड़ियों की आग, मूंगफली- रेवड़ी, मेवाती खेमे से चाय और खीर और पंजाबी बीट वाले ढोल की थाप के साथ उठते हुए महिलाओं और पुरुषों के कदमों का नजारा वहां के अधिकतर आंदोलनकारियों के लिए लोहड़ी की मस्ती वाला पहला अनुभव था। लोकगायकों द्वारा बीच बीच में आकर सौहार्द और एकता को बढ़ावा देने वाले गीतों का गाया जाना आम बात है। एक बानगी आपको पंजाबी लोकगायक बीरसिंह द्वारा निम्न गीत के माध्यम से मिल जाएगी:

‘मैं मंदिर दे विच अल्ला अल्ला अखांगा,
मैं गुरुद्वारे विच नाम राम दा बोलांगा,
मैं घर ख़ुदा दे जाके बालूं मोमबत्तियां,
मैं यीशु दे घर जाके रोज़ा खोलूंगा,
नानक दा पूत हाँ,
तेरा तेरा तोलांगा।’

गुरु गोबिंद सिंह के गुरपर्ब पर उनको याद करते हुए तकरीरें रखी गई और इस मौके पर मैंने भी उनकी हिमाचल प्रदेश में भंगानी नामक स्थान पर पहाड़ी राजाओं के गठजोड़ से लड़ाई और पीर बुद्धू शाह द्वारा गुरु गोबिंद सिंह के पक्ष में लड़ने के वृतान्त को संजोए हुए मेरी रचना ‘पीर बुद्धूशाह’ का वाचन किया गया। इसी प्रकार 26 जनवरी से एक दिन पहले भारतीय संविधान पर चर्चा की गई। शहीद भगत सिंह के भानजे प्रो. जगमोहन सिंह का गदरी बाबाओं  के मेले के दौरान तिरंगे के इतिहास पर बनाए गए मेरे वीडियो क्लिप को माईक से सुनाया गया। 26 जनवरी को जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र, आंध्र-प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य -प्रदेश, उत्तर- प्रदेश, उड़ीसा, गुजरात, आसाम, छत्तीसगढ़ और कुछ अन्य राज्यों की ट्रॉलियों पर झांकियां एक न्यारा समां बांधते हुए तिरंगे लहराते हुए ट्रैक्टर परेड की अगुवाई कर रही थी। अत्यंत अनुशासित तरीके से यह परेड मानेसर में निर्धारित स्थान से लौट कर आयी और पूरे रास्ते में पब्लिक द्वारा फूलों से, पीने के पानी से और खाने के पैकेट से हमारा स्वागत किया गया।

हिस्सेदारी और सेवा भाव:

सिक्ख परंपरा को श्रेय देते हुए यह नोट करना महत्वपूर्ण है की लंगर की अमूल्य विरासत को गैर-सिक्ख भी उसी भावना से आगे बढ़ाना सीख रहे हैं। उल्लेखनीय है कि गाँवों से आने वाला प्रत्येक समूह अपने साथ कुछ न कुछ ऐसी सामग्री अवश्य लाता है जो सामूहिक आवश्यकताओं को पूरी करता हो। स्टोर की जिम्मेवारी निभाते  हुए कितनी बार भावुकता के आंसू रोक नहीं पाया जब कोई परिवार दूरदराज के इलाके से आया और अपने घर से खाने पीने की चीजें बनाकर लाया। ठंड के मौसम में पिन्नियों की आवक तो सामान्य सिलसिला बनी रही। महाराष्ट्र से रात के समय अधिकतर आदिवासी महिलाओं वाला 700-800 व्यक्तियों के काफिले का एकबारगी इतने ठंडे इलाके में ठहरने, खाने-पीने और गर्म कपड़ों की व्यवस्था करना मुश्किल काम था लेकिन सामूहिकता की भावना से यह संभव हो गया। यह भी हुआ कि क़रीब अढाई सौ व्यक्तियों को दिल्ली में ही रोके रखना पड़ा लेकिन ऐसे कुछ अपवादों को छोड़कर केरल से, प. बंगाल से, उड़ीसा से, जम्मू कश्मीर से, आसाम से, आंध्र प्रदेश से, गुजरात से, राजस्थान और हरियाणा के अलग-अलग जिलों से आने वाले सैकड़ों व्यक्तियों के जत्थों की व्यवस्था तभी हो पा रही है जब खुले दिल से आमजन की हिस्सेदारी और सेवा की भावना मुखर है। खीर, हलवा, जलेबी और पकोड़े की सुविधा करीब करीब हमेशा मिलती रहती है क्योंकि अगल बगल के गॉवों से दूध,लस्सी, घी आदि की सप्लाई बरकरार है।

कठिन परिस्थितियों में लड़ा जा रहा है यह आंदोलन:

आंदोलनकारियों की ठंड और बीमारी से मौतों का सिलसिला रुक नहीं पा रहा है। हमारे बॉर्डर पर कितनी बार सुबह-सुबह अत्याधिक ठण्ड से जमा हुआ कोहरा दिखाई देता रहा। गहरी धुंध का आवरण तो आम बात रही है। अच्छी खासी ठंड हो और रात को सड़क पर लगे तंबुओं में बारिश से गद्दे, रजाईयां और कम्बल गीले हो रहे हो तो उस स्थिति का अंदाजा सहज़ ही लगाया जा सकता है। बारिश रुकने के बाद क़रीब एक हफ़्ता गीले बिस्तरों को सुखाने में लगा। हाँ, रात को रेतीले इलाक़े की इतनी ठंड से बचने के चक्कर में तम्बुओं में चूहों की भागदौड़ अखरती ही नहीं है। नहाने की, कपड़े धोने की, टॉयलेट की कामचलाऊ व्यवस्था मिर्जा गालिब के शे’र को याद दिला देती है- ‘मुश्किलें मुझ पर पड़ी इतनी कि आसां हो गई’। खैर, सच्चाई यह है कि आपसी साझेपन की उर्जा सर्दी और अव्यवस्थित जीवनचर्या की बेआरामी को भुला देती है। यहाँ कोरोना का ज़िक्र करना आवश्यक है। एक पंक्ति में अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर इतना ही कहना चाहूंगा कि ज़ीरो सावधानी है और कोरोना भी ज़ीरो है।

ऐतिहासिक क्यों है यह आंदोलन:

कोई भी आंदोलन सामाजिक डायनामिक्स की छलनी से छने बिना नहीं चला है, यह एक सच्चाई है। कुछ जातियों का आंदोलन के लिए अति उत्साह और कुछ जातियों की सामाजिक अंतर्द्वंद्व  के चलते नीरसता एक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन इसके बावजूद एक ऐसा सूत्र है जो एकजुटता की भावना को छिपे हुए रूप से जोड़ने का काम कर रहा है और वह सूत्र है कृषि कानूनों को खत्म करवाने से जुड़े हुए साझा हित जो आपसी टकराव की संभावना को ही नकार देता है।

इतिहास के अध्ययन से हमें एक सीख मिलती है की इतिहास कभी सरल रेखा में नहीं चलता। बड़ा सवाल यह है कि तत्कालीन परिस्थितियों में इसे किस दिशा में मोड़ा जा रहा है। पिछले 6-7 वर्षों से समकालीन निजाम द्वारा इतिहासचक्र को उल्टी दिशा में धकेलने के पुरजोर प्रयास के विपरीत वर्तमान किसान आंदोलन समाज को तोड़ने की बजाए जोड़ने का काम कर रहा है। रोटी के रिश्ते ने अनेक दूरियों को कम किया है। तथाकथित कोरोना जिहाद के वक्त हिंदू- मुस्लिम एकता की बात करते ही देशद्रोही के सर्टिफिकेट के अलावा ट्रॉल आर्मी द्वारा अश्लील गालियों की बौछार तैयार रहती थी। लेकिन अब इस आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, आपस में है भाई भाई का नारा सहज रूप से लगाया जा रहा है। कोई भी आंदोलन सामाजिक डायनामिक्स की छलनी से छने बिना नहीं चला है, यह एक सच्चाई है। कुछ जातियों का आंदोलन के लिए अति उत्साह और कुछ जातियों की सामाजिक अंतर्द्वंद्व  के चलते नीरसता एक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन इसके बावजूद एक ऐसा सूत्र है जो एकजुटता की भावना को छिपे हुए रूप से जोड़ने का काम कर रहा है और वह सूत्र है कृषि कानूनों को खत्म करवाने से जुड़े हुए साझा हित जो आपसी टकराव की संभावना को ही नकार देता है।  शाहजहांपुर खेड़ा बॉर्डर के अगल-बगल में  शुरुआती नीरसता के बाद धीरे धीरे बढ़ते हुए जनसमर्थन का नतीजा है कि बावल चौरासी की पंचायत सक्रिय रुप से सहयोग पर उतर आई है। ऐसे अनेकों उदाहरण हमें भिन्न भिन्न स्थानों से प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे। 

निष्कर्ष:

मैं जानबूझकर यहां कानूनी पक्षों पर, दलगत राजनीति पर, आंदोलन के कमजोर पहलुओं पर नहीं लिख रहा हूं क्योंकि यह लेख उन संकेतों को उजागर करने के लिए लिखा जा रहा है जो समाज को आगे की ओर ले जाते हैं, जो इतिहासचक्र को पीछे की ओर धकेलने वाली ताकतों को मुंहतोड़ टक्कर देते हैं, और साझेपन की उर्जा से  नए मानवीय मूल्यों को स्थापित करते हैं।  

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2 comments

  • Pappalrataway says:

    Good thinking

  • Sanjay kumar says:

    आपने इस आंदोलन को जिया है। यह आंदोलन हमारी, हमारे बच्चों की जिंदगी का एक अविस्मरणीय हिस्सा बन गया है। जीत मिले या हार लेकिन यह आंदोलन अनगिनत उपलब्धियां दे जाएगा।

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