बाज़ारवाद का नीतिगत विरोध नाकाफी, निजी जीवन में भी ज़रूरी-राजेन्द्र चौधरी

लेखक महर्षि दयानंद विश्विद्यालय, रोहतक के पूर्व प्रोफेसर तथा कुदरती खेती अभियान, हरियाणा के सलाहकार हैं.

पिछले 30-40 सालों से जहाँ एक ओर बाज़ारवाद का बोलबाला रहा है और इकोविन (इसका कोई विकल्प नहीं) का प्रचार प्रबल हुआ है, वहीं दूसरी ओर बाज़ारवाद का विरोध भी लगातार बना रहा है भले ही यह मत अल्पसंख्यक रहा है।  क्रय-विक्रय या बाज़ार दुनिया में सदियों से रहा है पर बाज़ारवाद का इतिहास इतना लम्बा नहीं है। संक्षेप में कहें तो बाज़ारवाद की यह मान्यता है कि बाज़ार भाव/कीमतें किसी भी वस्तु या सेवा की सही लागत और गुणवत्ता का सर्वश्रेष्ट पैमाना हैं। बाज़ारवाद के विरोधी इस बुनियादी मान्यता को नकारते हैं। उन का यह मानना है कि कई कारणों के चलते बहुत बार बाज़ार भाव वस्तु की लागत या उपयोग का सही आंकलन नहीं होता। जहाँ एक ओर बाज़ार पर नियंत्रण या एकाधिकार के चलते बाज़ार भाव वस्तु की वास्तविक लागत से बहुत अधिक हो सकता है तो कई अन्य मामलों में बाज़ार भाव वास्तविक लागत के कहीं कम होता है। बात केवल पलास्टिक की पन्नी की नहीं है जो मिलती तो लगभग मुफ्त में है पर पर्यावरण पर इस के प्रभाव विकराल हैं। उदाहरण के लिए अगर किसी उद्योग की स्थापना में बड़े पैमाने पर विस्थापन होता है और विस्थापितों का समुचित पुनर्वास नहीं होता तो उद्योग द्वारा निर्मित वस्तु का बाज़ार भाव, विस्थापन को नज़रंदाज़ करता है और इस लिए वस्तु की सही लागत का पैमाना नहीं हो सकता। इसी तरह बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से हो सकता है कि उत्पादन लागत कम आए पर इस के साथ ही ऐसा उत्पादन हज़ारों लाखों लोगों का रोज़गार छीन कर उन्हें भुखमरी की ओर धकेल सकता है। इस के चलते ही देश में खुदरा बिक्री में विदेशी या स्थानीय बड़ी कम्पनियों की आमद का विरोध किया गया था। इस के अलावा केंद्रीकृत उत्पादन के चलते, विशेष तौर पर खाद्य उत्पादों में उन्हें खराब होने से बचाने के लिए जिन रसायनों का प्रयोग किया जाता है वो स्वास्थ्य के लिए आम तौर पर हानिकारक होते हैं (चाहे फिर वो नमक, तेल या चीनी ही हों)। छोटे स्तर पर विकेंद्रीकृत उत्पादन, भले ही वह थोड़ा महँगा हो, में ऐसे रसायनों का प्रयोग कम आवश्यक होता है। ऐसे अनेक कारण हैं जिन के चलते बाज़ार भाव वस्तु की सही लागत या लाभ को प्रतिबिंबित नहीं करते, और इस लिए बाज़ारवाद का विरोध ज़रूरी हो जाता है।  

परन्तु कई बाज़ारवाद विरोधी लोग सस्ते के चलते धड़ल्ले से बड़ी बड़ी कम्पनियों से और, कोरोना के पहले से ही, आन लाइन खरीदी करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि यह कम कीमत आमतौर पर कर्मचारियों या उत्पादकों को निचोड़ कर ही मिलती है न कि मुनाफों को कम कर के या उत्पादकता बढ़ा कर। दुनिया की बड़ी खुदरा विक्रेताओं में शामिल वाल्मार्ट, जिस का भारत में फ्लिपकार्ट में निवेश है, अपने कर्मचारियों के शोषण/कम वेतन के लिए बदनाम है। इस के दुष्प्रभावों के चलते अपने देश अमरीका में ही कई स्थानों पर इस के स्टोर खोले जाने पर रोक लगी हुई है। दूर क्यों जाएँ। भारत में ही अमेज़न, फ्लिपकार्ट जैसी कम्पनियां लाखों करोड़ों (केवल 2019 में 11 हज़ार करोड़ से अधिक) के नुकसान सह कर भी फल फूल रही हैं।  साल दर साल इतने घाटे के बावज़ूद उन में नया निवेश भी हो रहा है। क्या ये कम्पनियां परोपकार की भावना के चलते घाटा सहन कर के भी आप को सस्ता दे रही हैं? नहीं, ये आज इस लिए सस्ता दे रही हैं कि एक बार बाज़ार पर कब्ज़ा कर लें, छोटे दुकानदार को ख़त्म/सीमित कर दें फिर मुनाफा वसूली कर लेंगी। पर हम हैं कि आज के सस्ते को देख कर इन की ओर खिंचे चले जा रहे हैं। सिद्धांत रूप में बाज़ारवाद का विरोध करने वालों के अपने निजी जीवन में भी बाज़ारवाद का विरोध परिलक्षित नहीं होता। कम्पनियों द्वारा कर्मचारियों के शोषण का विरोध करते हैं पर जब अपने घर में काम वाली बाई को भुगतान की बात आती है तो बाज़ार भाव हमारा एक मात्र पैमाना रह जाता है। हम यह विचार भी नहीं करते कि क्या हमारे द्वारा किया गया भुगतान उस कामगार को मानवीय गरिमा के साथ जीने के लिए पर्याप्त है भी या नहीं?

भारत में ही अमेज़न, फ्लिपकार्ट जैसी कम्पनियां लाखों करोड़ों (केवल 2019 में 11 हज़ार करोड़ से अधिक) के नुकसान सह कर भी फल फूल रही हैं।  साल दर साल इतने घाटे के बावज़ूद उन में नया निवेश भी हो रहा है। क्या ये कम्पनियां परोपकार की भावना के चलते घाटा सहन कर के भी आप को सस्ता दे रही हैं? नहीं, ये आज इस लिए सस्ता दे रही हैं कि एक बार बाज़ार पर कब्ज़ा कर लें, छोटे दुकानदार को ख़त्म/सीमित कर दें फिर मुनाफा वसूली कर लेंगी। पर हम हैं कि आज के सस्ते को देख कर इन की ओर खिंचे चले जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि मैं स्वयं सस्ता छोड़ कर महंगा खरीदता हूँ या कभी भी बड़ी या विदेशी कंपनी का माल नहीं खरीदता, पर निश्चित तौर पर बड़ी कम्पनी के सस्ते को छोड़ कर छोटे/स्थानीय व्यापारी से थोडा महंगा खरीदने को तैयार रहता हूँ, और विज्ञापनों के भंवर जाल से बचने के लिए अन्य स्रोतों से जानकारी जुटाने का प्रयास करता हूँ। अगर अन्य कोई फर्क न हो तो निश्चित तौर पर कीमत ही वस्तु खरीदी का उपयुक्त आधार होती है पर हमें पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव, कामगारों की स्थिति और उन के रोज़गार के अवसर के बारे में भी सोचना चाहिए। आन लाईन खरीदे माल को घर पहुंचाने वालों से कभी उन के काम के घंटों और वेतन के बारे में भी जानने की कोशिश करनी चाहिए। कीमत निश्चित तौर पर किसी वस्तु की लागत का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता। एक उदहारण यह है कि माल इत्यादि बड़ी दुकानों में सभी फल सब्जियां एक कद काठी की होती हैं और यह हमें लुभाता है। परन्तु हम यह कभी नहीं सोचते कि प्रकृति में तो सब फल सब्जियां एक कद काठी की नहीं होती। मूली मोटी और लम्बी भी होती है पर टेढ़ी-मेढ़ी और पतली-छोटी भी होती है। अगर आप एक कदकाठी के फल सब्जी खरीद रहे हैं तो फिर ये बाकी बचा-खुचा कहाँ जाता है? इस का अर्थ है कि या तो बड़े पैमाने पर तैयार उत्पाद फैंका जा रहा है जो पर्यावरणीय नजरिये से उचित नहीं है या कोई है जो हम से कमतर खाने को विवश है, तभी तो हम को छटा हुआ माल खाने को मिलता है।

ऐसे वो लोग करें जिन का समता में विश्वास न हो, जिन का जिस की लाठी उस की भैंस में विश्वास हो तो समझ आता है पर समता समर्थक, बाज़ारवाद विरोधी भी यही करें, यह समझ से परे है। इस सन्दर्भ में 2019 में गुजरात के आलू उत्पादकों पर पेप्सी कम्पनी द्वारा दायर एक एक करोड़ के दावों का स्मरण हो आता है। पेप्सी ने कुछ किसानों से आलू उत्पादन और बिक्री का करार किया पर छोटे, ज़्यादा बड़े या आड़े-टेढ़े आलू नहीं खरीदे। किसानों ने वही बचे खुचे आलू बाज़ार में बेच दिए/बीज के तौर पर प्रयोग कर लिये। इस के चलते किसानों पर कम्पनी ने केस कर दिया था। वो तो भला हो किसान संगठनों द्वारा किये गए हो हल्ले का और आसन्न चुनावों का कि कम्पनी ने केस वापिस ले लिया, वरना वो किसान जेल की हवा खा रहे होते।

अन्य बातें समान रहने पर निश्चित तौर पर सस्ता खरीदें पर यह भी ध्यान रहे कि बहुत बार अन्य बातें समान नहीं होती। विकल्प न होने पर बड़ी कम्पनियों से खरीदना समझ आता है पर विकल्प होने पर भी स्थानीय, छोटे उत्पादकों का माल न खरीद कर बड़ी कम्पनियों का माल खरीदना बाज़ारवाद को ही बढ़ावा देता है। जिन नीतियों का सार्वजानिक जीवन में विरोध करते हैं, उन का विरोध निजी जीवन में भी ज़रूरी है। अगर उपभोक्तावाद का विरोध करते हैं तो इसे अपने जीवन से भी दूर रखें। यह सवाल उठ सकता है कि निजी व्यवहार में परिवर्तन अपर्याप्त है और नीतिगत परिवर्तन अनिवार्य है। निश्चित तौर पर नीतिगत परिवर्तन आवश्यक है और केवल निजी व्यवहार में परिवर्तन अपर्याप्त है।  इस लिए सार्वजनिक विरोध आवश्यक है परन्तु व्यक्तिगत जीवन में बदलाव के बिना, हम में सार्वजनिक जीवन में विरोध के लिए आवश्यक नैतिक बल कहाँ से प्राप्त होगा?  आख़िर, सिगरेट/शराब हाथ में ले कर इन के दुष्प्रभावों की चर्चा करना, कितना प्रभावी हो सकता है? या ये कहना कितना सम्मानजनक है कि जब सरकार सिगरेट/शराब बंद कर देगी, तब हमारा इस को पीना अपने आप बंद हो जाएगा? यह उतना ही सम्मानजनक है जितना कि यह कहना कि हम डंडे से ही सुधरेंगे।

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