प्रधानमंत्री जी से एक शिक्षक की हैसियत से विनती-अमरनाथ

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

स्त्रोत- इन्टरनेट

माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी,लगता है कि वर्षों से ए.सी. में रहने के कारण जाड़े की ठिठुरन का एहसास भी आप भूल चुके हैं. दिल्ली के बार्डर पर खून जमा देने वाली ठंढ में अबतक 32 किसान अपने प्राण दे चुके हैं. ये आन्दोलनकारी नहीं, तपस्वी हैं. बच्चे, बूढ़े, माताएं- ध्रुव, दधीचि और सती अनुसूया की तरह. आप से गुहार लगाते इन्हें आज 26 दिन हो गए. मेरी भी रात की नींद उचट गई है. किन्तु आपका हृदय तनिक भी नहीं पसीज रहा है. पत्थर से भी कठोर है आपका हृदय.

मार्च 2015 में संसद भवन के कैंटीन में पहली बार भोजन करते हुए आपने तब मेरा दिल जीत लिया था जब भोजन का 29 रूपए पेमेंट करते हुए कैंटीन की सुझाव पुस्तिका में आपने ‘अन्नदाता सुखी भव’ लिखा था. उस समय देश के अन्नदाताओं को नतसिर होकर आपने नमन भी किया था. आज आपकी क्या विवशता है कि वही अन्नदाता जब अपना घर-परिवार छोड़कर आपके दरवाजे पर तपस्या कर रहा है, आपने अबतक उससे बात करना भी जरूरी नहीं समझा ?

देखिए न उनकी ओर एक बार! वे आप से कुछ माँग नहीं रहे हैं ? आप उदार होकर अपनी ओर से उन्हें जो दे रहे हैं उसे वे लेने से मना कर रहे हैं क्योंकि उसकी जरूरत उन्हें नहीं है.

देखिए न उनकी ओर एक बार! वे आप से कुछ माँग नहीं रहे हैं ? आप उदार होकर अपनी ओर से उन्हें जो दे रहे हैं उसे वे लेने से मना कर रहे हैं क्योंकि उसकी जरूरत उन्हें नहीं है. बस इतनी सी तो बात है. इससे देश पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी नहीं बढ़ेगा. इसका तो आगे बढ़कर स्वागत करना चाहिए. ऐसी भी जिद क्यों? मोदी जी! आपका भव्य व्यक्तित्व देखता हूँ तो एक संत की छवि मेरे मानस-पटल पर उतर आती है. संतों का बहुत सम्मान भी आप करते हैं. भगवान राम के अनन्य भक्त गोस्वामी तुलसीदास ने संत की परिभाषा देते हुए ‘रामचरितमानस’ में लिखा है,

 “संत हृदय नवनीत समाना 
कहा कबिन्ह पर कहै न जाना
निज परिताप द्रवै नवनीता
पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता”

अर्थात संतों का हृदय नवनीत की तरह होता है- ऐसा कवियों ने कहा है, परंतु उन्होंने (कवियों ने) भी ठीक नहीं कहा है क्योंकि नवनीत तब पिघलता है जब खुद उसे गरम किया जाता है जबकि संत तो दूसरों के ताप (दुख) से ही द्रवित हो जाते हैं. आप देखिए न, संत बाबा राम सिंह को. उन्हें किसानों का दुख सहा नहीं गया और यह कहते हुए कि “मुझसे यह (किसानों का) दुख देखा नहीं जा रहा” खुद को गोली मार ली. वे खुद किसान नहीं थे. वे सच्चे अर्थों में संत थे. 9 दिसंबर को वे किसानों को 5 लाख रूपये देकर आए थे. कंबल भी दिया था उन्हें. गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा दी गई संतों की परिभाषा पर खरे उतरे हैं संत बाबा रामसिंह जी. किन्तु जिस राम- राज्य का आदर्श आप हमारे सामने रखते हैं उसमें क्या राजा भी इतना क्रूर हो सकता है जितना अपने को ‘प्रधान सेवक’ कहते हुए भी आप हैं ?

क्या मजबूरी है आप की? कितने दबाव में हैं आप? ऐसा है तो त्यागपत्र क्यों नहीं दे देते?- यह कहते हुए कि अब अपने अन्नदाताओं का दुख देखा नहीं जाता. अभी कुछ दिन पहले आपने जिस भगवान राम के लिए भव्य मन्दिर का शिलान्यास किया है उस राम को राजगद्दी छोड़ने में क्या तनिक भी हिचक हुई थी?

क्या मजबूरी है आप की? कितने दबाव में हैं आप? ऐसा है तो त्यागपत्र क्यों नहीं दे देते?- यह कहते हुए कि अब अपने अन्नदाताओं का दुख देखा नहीं जाता. अभी कुछ दिन पहले आपने जिस भगवान राम के लिए भव्य मन्दिर का शिलान्यास किया है उस राम को राजगद्दी छोड़ने में क्या तनिक भी हिचक हुई थी? ‘करुणानिधान कहते हैं उन्हें. उनके राजधर्म से क्या ग्रहण किया है आपने? अब भी समय है वर्ना इतिहास में आपकी गणना हत्यारे शासकों में की जाएगी. शिलान्यास के दिन अपने ऐतिहासिक भाषण में जिन एक सौ बीस करोड़ देशवासियों को संबोधित करते हुए आपने आश्वस्त किया था, दिल्ली के बार्डर पर ठंढ से ठिठुर रहे किसान भी उन्हीं में से हैं ?

माननीय मोदी जी, हम सब इस दुनिया में एक मुसाफिर की तरह हैं. स्वामी विवेकानंद ने कहा है, “तुम अपने को इतना महत्व मत दो. यह दुनिया तुम्हारे बगैर भी चलती रहेगी. इस दुनिया में आकर तुमने इसका कोई उपकार नहीं किया है बल्कि इसका लाख- लाख शुक्र मनाओ कि इसने तुम्हें जीने के लिए दो दिन की जिन्दगी और रहने के लिए दो गज जमीन दी है.” आज आपके पास कुर्सी की जो ताकत है वह लाखों निरीह किसानों की आह नहीं झेल पाएगी. कबीर दास जैसे एक संत ने ही कहा है-

 “दुर्बल को न सताइए जाकी मोटी हाय 
मरी खाल की सांस से लोह भसम हो जाय.”

मेरा प्रणाम स्वीकार कीजिए और विनती भी.

निवेदक, प्रो. अमरनाथ, कलकत्ता विश्वविद्यालय

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One comment

  • Dr.pramila says:

    Firstly A very warm greeting to the very one who wrote this . Sir , your words didn’t only moved me but indeed blowed my mind . I’m totally on to your part and your words , I’m greatly inspired by your writing and even glad to see there are people who are filled of so granty feelings towards farmers.

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