मनीमाजरा: कहानी एक रियासत की- सुरेन्द्र पाल सिंह

सुरेन्द्र पाल सिंह

अभी पिछले दिनों एक हॉलीवुड फ़िल्म ज़ीरो डार्क थर्टी को ऑस्कर अवार्ड मिला है जिसकी कहानी 9/11 के बाद ओसामा बिन लादेन की तलाश पर आधारित है। इस फ़िल्म की शूटिंग मनीमाजरा के किले में हुई थी। मनीमाजरा एक रियासत थी जो वर्तमान में चंडीगढ़ यूटी का हिस्सा है और पंचकूला से सटा हुआ है।

एक बड़े मोटर मार्केट और पुराने शहर की भीड़भाड़ वाले बाज़ार के लिए मशहूर मनीमाजरा का एक रोचक इतिहास है। अभी क़रीब दो वर्ष पहले कोर्ट का एक फ़ैसला समाचारों की सुर्खियों में छाया रहा जिसके अनुसार फ़रीदकोट रियासत की लगभग दो हज़ार करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी फ़रीदकोट की राजकुमारी अमृत कौर और दीपिन्द्र कौर के के हक़ में हो गई है। इन प्रॉपर्टी की लंबी सूची में मनीमाजरा का क़रीब 350 वर्ष पुराना किला भी शामिल है जो फ़िलहाल चार एकड़ में फैले हुए खंडहर के रूप में मौजूद है।

तो आइए एक बार इतिहास की पगडंडियों पर कुछ दूर तक मुड़ कर चलें।

गुरुद्वारा मंजी साहब (माता राजकौर जी)

किले के नज़दीक एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा मंजी साहब है। मंजी साहब की परंपरा तीसरे गुरु अमरदास जी के वक़्त शुरू हो कर पांचवे गुरु अर्जनदेव जी के समय तक एक सुचारू रूप ले चुकी थी जिसके अनुसार तत्कालीन गुरु के नाम से एक चारपाई बिछाकर उसके बगल में गुरबाणी का पाठ किया जाता था और श्रद्धालुओं से उनकी कमाई का दसवां हिस्सा दान के रूप में लिया जाता था।

सातवें गुरु हरराय जी (1645-61) के औरंगजेब के भाई दारा शिकोह से दोस्ताना संबंध थे। उत्तराधिकार की लड़ाई में  दारा शिकोह का क़त्ल करवा करवाके औरंगजेब जब सन 1658 में बादशाह बना तो उसने गुरु हरराय को दरबार में पेश होने का फ़रमान जारी कर दिया था जिसके एवज़ में गुरु जी ने अपने बेटे श्री रामराय को दरबार में भेजा था। श्री रामराय के व्यवहार और व्यक्तित्व से औरंगजेब संतुष्ट था और नतीज़न बादशाह के आशीर्वाद और गढ़वाल के राजा की सहायता से दून घाटी के खैराबाद इलाके में श्री रामराय ने अपने डेरे की स्थापना कर ली थी जो कालांतर में देहरादून के नाम से फला फूला।

सन 1664 में आठवें गुरु हरीकिशन जी की दिल्ली में सवाई राजा जयसिंह की हवेली में रहते हुए 9 वर्ष की आयु में चेचक से मृत्यु हो गई थी जहां आजकल गुरुद्वारा बांगला साहब है। आठवें गुरु के बाद नौवें गुरु तेगबहादुरजी हुए। इस दौरान श्री रामराय ने अपने आप को पहले आठवें और बाद में नौवें गुरु के तौर पर घोषित करवाने का असफल प्रयास किया था।

मनीमाजरा के ऐतिहासिक गुरुद्वारा में परिचय  बोर्ड पर जो इबारत लिखी है उसके अनुसार देहरादून से श्री रामराय की धर्मपत्नी माता राजकौर श्री रामराय जी से नाराज होकर मनीमाजरा आकर बस गई थी। उनका मकान जब बारिश में टपकने लगा था तो उन्होंने अपने सेवक को भारमल के पास  शहतीर को संभालने के लिए लकड़ी का लट्ठा लाने को भेजा जिसकी भारमल ने कोई परवाह नहीं की। लेकिन ग़रीबू जट्ट नाम के एक व्यक्ति ने श्रध्दापूर्वक रात के समय में भी इसका इंतजाम कर दिया जिससे प्रसन्न होकर माता राजकौर ने गरीबू को राजा होने का आशीर्वाद दिया और माता जी के आशीष के अनुसार गरीबू एक दिन राजा गरीब दास हो गया। इस घटना का हवाला भाई संतोख सिंह द्वारा सन 1843 में प्रकाशित ग्रंथ ‘गुरप्रताप सूरज प्रकाश’ से लिया गया है। इसी बोर्ड पर एक और घटना का जिक्र है कि विक्रमी संवत 1745 (सन 1688) में गुरु गोविंद सिंह ने पहाड़ी राजाओं से भंगानी की लड़ाई जीतकर आनंदपुर साहब के लिए वापस लौटते हुए कपाल मोचन से चल कर  रायपुर रानी होते हुए माता राज कौर के पास निवास किया था। इसी बोर्ड पर यह भी लिखा है कि माता राजकौर का अंगीठा (अंतिम संस्कार स्थल) बगल में ही गुरुद्वारा देहरा साहब में है।

ऐतिहासिक संदर्भ क्या कहते हैं ?

सातवें गुरु हरराय जी ने अपने बेटे श्री रामराय से संबंध विच्छेद कर लिया था जब उन्हें पता चला कि श्री रामराय ने औरंगजेब की नाराजगी से बचने के लिए नानक की एक बाणी को ‘मुसलमान’ शब्द के बदले ‘बेईमान’ शब्द बोल कर पेश किया था। मनीमाजरा में स्थित गुरुद्वारा मंजी साहब में लगे हुए परिचय बोर्ड के अनुसार इसी आशय से श्री रामराय की धर्मपत्नी माता राजकौर का श्री रामराय से नाराज होकर मनीमाजरा आकर बस जाने और यहीं पर उनकी मृत्यु का होना बताया गया है। लेकिन इन बातों पर आंख मूंद कर यकीन नहीं किया जा सकता।

यह सच है कि श्री रामराय ने अपनी गद्दी को सिक्ख पंथ की मुख्यधारा से दूर रखते हुए उदासीन पंथ का हिस्सा बना लिया था।  यह प्रमाणित तथ्य है कि गुरु गोबिन्द सिंह भंगानी की लड़ाई के बाद सन 1688 में पोंटा साहब से वापस आनंदपुर साहब लौटते हुए रास्ते में पड़ाव करते रहे थे और नाड्डा साहब में उनका एक लंबा पड़ाव था। इसी दौरान  बगल में ही माता राजकौर से उनकी मुलाकात संभव है। लेकिन इस संबंध में कुछ तथ्य संशय पैदा करते हैं।उल्लेखनीय है कि श्री रामराय की मृत्यु सन 1687 में हो गई थी और देहरादून में उनकी गद्दी के स्थान पर एक शानदार प्रांगण में  माता राज कौर सहित उनकी चारों धर्मपत्नियों  के सुंदर समाधिस्थल भी स्थित हैं। गुरु नानक की बाणी को त्रुटि सहित पेश करने का वक़्त तो सातवें गुरु हरराय जी के वक़्त सन 1661 से पहले की घटना है। तो क्या माता राजकौर तभी  मनीमाजरा आ गई थी और सन 1688 में श्री रामराय की मृत्यु के अगले वर्ष भी यहीं पर थी? और, उनका समाधिस्थल देहरादून में  भी है। दूसरी बात, राजा गरीब दास की मृत्यु सन 1783 में हुई थी। ऐसे में  यह संभव प्रतीत नहीं होता है कि करीब सौ वर्ष पहले उसने माता राजकौर की सेवा की हो। अगला तर्क यह है कि मंजी साहब की परंपरा तीसरे गुरु अमरदास जी से शुरू होकर पांचवें गुरु अर्जन देव जी तक सुव्यवस्थित हो गई थी जिसके अनुसार भिन्न-भिन्न केंद्रों में तत्कालीन गुरु के नाम पर एक चारपाई बिछाई जाती थी और वहां पर गुरबाणी का पाठ होता था। यह परंपरा लंबे समय तक चलती रही जब तक गुरु गोबिंद सिंह ने इसको नकार नहीं दिया।  मनीमाजरा का गुरुद्वारा माता राजकौर के निवास स्थान पर बनाया गया है और यह मंजी का केंद्र भी रहा है, ये दोनों दावे अंतर्विरोधी प्रतीत होते हैं।

राजा गरीब दास

तत्कालीन अंग्रेज इतिहासकार लेपल एच ग्रिफिन ने अपनी पुस्तक ‘Rajas of Punjab’  में उल्लेख किया है कि गंगादास सरहिंद के गवर्नर के अधीन एक टैक्स  अधिकारी था और सन 1764 में सरहिंद के मुग़ल फौजदार ज़ेन खान की मृत्यु के पश्चात जब पूरा इलाका अराजकता के दौर से गुजर रहा था तो इस दौरान गंगादास ने सूरजगढ़ इलाके के 84 गाँवों पर अधिकार जमा लिया था। गंगादास और उसके पुत्र गरीब दास ने  सन 1768 में पिजौर के किले पर कब्ज़ा कर लिया था जो सिरमौर के राजा के अधीन था। सिरमौर के राजा ने पटियाला की सहायता से पिंजौर का किला छुड़वाया जिसमें गंगादास की मृत्यु हो गई थी। लेकिन इसी दौरान राजा गरीब दास वर्तमान मनीमाजरा में स्थित सूरजगढ़ के इलाके का शासक बन बैठा।  राजा गरीब दास की सन 1783 में मृत्यु के बाद उसका पुत्र गोपाल सिंह राजा बना जिसने सन 1811-15 में मनसा देवी मंदिर की स्थापना की।  कहा जाता है कि किले से मंदिर तक  सुरंग से भी एक रास्ता था और एक बार पटियाला का महाराजा कर्म सिंह ( 1813-45) मंदिर के कपाट खुलने की प्रतीक्षा कर रहा था तो इसी दौरान  सुरंग के रास्ते मनीमाजरा के किले से राजा वहां पहले से ही पहुंच गया। इस घटना के बाद महाराजा कर्म सिंह ने  बगल में ही एक नया मंदिर बनवाया था जिसे पटियाला का मंदिर कहा जाता है। सन 1814 में गुरखा हमले के खिलाफ राजा गोपाल सिंह ने अंग्रेज फौज का साथ दिया और एवज में गोपाल सिंह को अधिकारिक रूप से राजा की पदवी मिल गई। इनकी पीढ़ी से ही राजा गोवर्धन सिंह सन 1845 में मुदकी में हुए एंगलो-सिक्ख युद्ध में अंग्रेजो की तरफ से लड़ा। मनीमाजरा के राजाओं की श्रंखला में अंतिम राजा भगवान सिंह था जिसके बाद सन 1875 में मनीमाजरा का शासन प्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजों ने अपने हाथ में ले लिया।

मनी माजरा का नामकरण

राजा भगवान सिंह ने करीब एक किलोमीटर दूरी पर स्थित मन्ना गांव के लोगों को किले के आसपास बसने को उत्साहित किया और इस प्रकार सूरजगढ़ किले का नाम मन्ना से मनीमाजरा हो गया।

किले की प्रॉपर्टी का झगड़ा

पाठकों के जेहन में एक सवाल बार बार उठता होगा कि कहां फ़रीदकोट और कहां मनीमाजरा। इतना दूर होने के बावजूद फ़रीदकोट रियासत के वारिसों के बीच हजारों करोड़ की  प्रॉपर्टी के झगड़े की सूची में इस वक्त खंडहर बन चुका मनीमाजरा का किला क्यों शामिल है? उल्लेखनीय है कि इस वक़्त किले के खंडहरों में कोई बाहरी व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकता है। किले के एक छोटे से हिस्से को रिहायशी रूप दिया हुआ है जिसमें  कुछ लोग रहते हैं। चंडीगढ़ पुलिस के कुछ सिपाही भी किले की चारदीवारी के गेट पर तैनात हैं। फिलहाल फ़रीदकोट रियासत की तमाम प्रॉपर्टी सन 1981-82 में बने महारावल खिवजी ट्रस्ट की देखरेख में है और मनीमाजरा का किला भी उसमें शामिल है। ट्रस्ट के दावा है कि फ़रीदकोट के अंतिम महाराजा हरिंद्र सिंह बराड़ ने सन 1989 में अपनी मृत्यु से पहले रियासत की तमाम प्रॉपर्टी ट्रस्ट के नाम कर दी थी लेकिन शाही परिवार से बाहर शादी करने के कारण बेदखली की भुगतभोगी राजकुमारी अमृतकौर ट्रस्ट के इस दावे को फर्ज़ी ठहराते हुए लम्बे अर्से से कानूनी लड़ाई लड़ रही है। इस ट्रस्ट को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अवैध ठहरा दिया है लेकिन मुकदमा अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

अंतिम राजा भगवान सिंह की बेटी राजकुमारी सूरज कौर फ़रीदकोट के टिक्का साहब बलबीर सिंह बराड़ के साथ ब्याही गई थी जो बाद में सन 1898 से 1906 तक फ़रीदकोट के महाराजा  थे। राजा भगवान सिंह का कोई पुत्र नहीं था और इस प्रकार उसकी वारिस की प्रॉपर्टी फ़रीदकोट रियासत की प्रॉपर्टी का हिस्सा बन गई।

अंत में, अगर कभी आपको पंचकूला-चंडीगढ़ की सुव्यवस्थित और सुनियोजित जीवन शैली  उबाऊ लगने लगे  तो पुराने शहर की पतली  गलियों और भीड़ भाड़ वाले बाजार में सस्ती से सस्ती खरीददारी और पारंपरिक खानपान का लुत्फ उठाना हो तो चले आइएगा मनीमाजरा और थोड़ा सा झांकियेगा इसके अतीत में भी।

सन्दर्भ:
1. Rajas of Punjab: Lepel H Griffin
2. An empirical study on Guru Ram Rai Darbar, a living heritage: Ar. Ramanjyot Shrivastva, Prof. SYK Kulkarni and Dr. Prabhjot Kaur
3. A Tale of Fort(itude): Pallavi Singhal
4.The Faridkot Saga: Pavan Lall.

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