5 लघुकथाएँ- हरभगवान चावला

हरभगवान चावला सिरसा में रहते हैं। हरियाणा सरकार के विभिन्न महाविद्यालयों में कई दशकों तक हिंदी साहित्य का अध्यापन किया। प्राचार्य पद से सेवानिवृत हुए। तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए और एक कहानी संग्रह। हरभगवान चावला की रचनाएं अपने समय के राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ का जीवंत दस्तावेज हैं। सत्ता चाहे राजनीतिक हो या सामाजिक-सांस्कृतिक उसके चरित्र का उद्घाटन करते हुए पाठक का आलोचनात्मक विवेक जगाकर प्रतिरोध का नैतिक साहस पैदा करना इनकी रचनाओं की खूबी है। हाल ही में हरभगवान चावला को मैथिलीशरण गुप्त श्रेष्ठ कृति पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा हुई है। हरभगवान चावला जी का एक लघुकथा संग्रह ‘बीसवाँ कोड़ा’ शीर्षक से शीघ्र ही प्रकाशित हो रहा है उसके लिए उन्हें शुभकामनाएं। प्रस्तुत है उनकी पांच लघुकथाएँ-

हरभगवान चावला

बीसवाँ कोड़ा

अपने पालतू सफ़ेद कबूतर का पीछा करते हुए राजकुमार कब छोटी रानी के महल में दाख़िल हो गया, उसे पता ही नहीं चला। रानी के महल में राजा के अलावा किसी परिंदे को भी घुसने की इजाज़त नहीं थी, पर यहाँ तो परिंदा ही नहीं, परिंदे का मालिक राजकुमार भी महल में घुस आया था।उस समय रानी वस्त्र बदल रही थी। राजकुमार को रानी के महल में घुसने का दोषी पाया गया। अब वह दोषी था तो सज़ा मिलना भी तय था; लेकिन एक तो राजकुमार, ऊपर से नाबालिग! सो तय किया गया कि राजकुमार को प्रतीकात्मक सज़ा दी जाएगी। हूबहू राजकुमार जैसा रुई का एक पुतला बनाया गया और उस पुतले को बीस कोड़ों की सज़ा सुनाई गई। दरबार में सज़ा देने का सिलसिला आरम्भ हुआ। एक सिपाही जाता, एक कोड़ा मारता, फिर दूसरा जाता, दूसरा कोड़ा मारता। इस तरह उन्नीस कोड़े पूरे हो गए। इस बीच सारे तमाशे को देखता हुआ राजकुमार ख़ामोश बना रहा। कभी उसकी आँखों से कोई आँसू टपक जाता, तो कभी किसी को बहुत धीरे से कूड़ा मारने की रस्म पूरी करते देख उसे हँसी आ जाती। अब बीसवाँ कोड़ा बचा था ।एक सिपाही ने पुतले को कोड़ा मारा। पर यह क्या?पुतले पर कोड़ा पड़ते ही राजकुमार की चीख निकल गई और वह दर्द से बिलबिलाकर दोहरा हो गया। सारे दरबारी हैरान होकर देख रहे थे। राजकुमार की पीठ पर एक धारी थी, जिसमें से लहू रिस रहा था। वज़ीर कुछ देर ध्यान से देखता रहा। उसे सारा माज़रा समझ में आ चुका था । उसने उस सैनिक को बुलाया और गरज कर कहा, ” सज़ा के तौर पर कोड़ा मारना तुम्हारा कर्त्तव्य था, पर तुम्हारे मन में गहरा द्वेष भरा था । इसीलिये कोड़ा सीधे राजकुमार की पीठ पर पड़ा और उनकी पीठ पर इतना गहरा घाव हो गया । बताओ, राजकुमार से तुम्हारी क्या व्यक्तिगत शत्रुता है?जल्दी बोलो, वरना सर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। सिपाही ने इधर-उधर देखा । सारे सिपाही सर झुकाए खड़े थे। उसने इत्मीनान से वज़ीर की आँखों में आँखें डालकर कहा,” मेरी राजधानी में युवाओं को बैल की जगह कोल्हू में जोता जाता है और जब कोई युवा कोल्हू को खींचते हुए बेदम होकर साँस लेने के लिए रुकता है तो उस पर कोड़े बरसाए जाते हैं। कोल्हू में जुतने वाले युवाओं में एक मेरा भी बेटा है। वह रोज़ शाम को जब घर आता है तो उसकी पीठ पर मैं धारियाँ देखता हूँ जिनमें से लहू रिस रहा होता है ।आज जब मैंने राजकुमार के पुतले पर कोड़ा बरसाया तो बरबस मुझे अपने बेटे की पीठ याद आ गई थी।”

इंसान का दर्द

लोग काले क़ानून के विरुद्ध सड़कों पर उतर आए थे। शहर में निकलने वाले हर जुलूस में शामलाल शामिल रहते। बेटा उनसे कहता, “हम दूर-दूर तक इस क़ानून की ज़द में नहीं आते, आपको क्या ज़रूरत है दूसरों के फट्टे में टाँग अड़ाने की?” शामलाल का एक ही जवाब होता, “सत्ता एक-एक करके समूहों का शिकार करती है। इन्सान वो जो दूसरे इन्सान का दर्द समझे।” बेटा वरुण वितृष्णा से मुँह बिचका देता।

एक दिन शामलाल को कुछ अन्य लोगों के साथ गिरफ़्तार कर लिया गया। जेल में भी उन लोगों का शांतिपूर्ण विरोध जारी था। पुलिस वालों को उन सबसे कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि वे जैसे ही थोड़ा ख़ाली होते, उनके विद्वत्ता से भरे वक्तव्य सुनते, चमत्कृत होते, सहमत होते। एक दिन शामलाल को मालूम हुआ कि थोड़ी देर बाद कुछ और आंदोलनकारी जेल में लाए जा रहे हैं। क़रीब घण्टे भर बाद आंदोलनकारियों ने जेल में प्रवेश किया तो शामलाल को यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि इन लोगों में उसका बेटा भी था।

वह चीखा, “अरे तू भी…?”

“हाँ, मैं भी। इन्सान वो जो दूसरे इन्सान का दर्द समझे! याद तो है न यह बात, कि भूल गए?

“दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया और एक दूसरे की तरफ़ अँगूठे का विजय चिह्न लहरा दिया।

लड़ाई

बिल्ली को देखा तो हमेशा की तरह कबूतरों के जोड़े ने आँखें बंद कर लीं। बिल्ली दबे पाँव उनकी ओर बढ़ रही थी कि एक तोते ने उसकी पीठ पर अपनी चोंच से वार कर दिया। बिल्ली इस अप्रत्याशित हमलावर को जब तक देख पाती, वह उड़ गया। बौखलाई बिल्ली थोड़ी देर दिशाहीन सी दौड़ी और फिर से घात लगाकर बैठ गई। तोते ने फिर उस पर हमला किया, बिल्ली ने फिर बौखलाकर उसका पीछा करने की नाकाम कोशिश की। तीसरी बार फिर यही सब हुआ तो बिल्ली उस जगह को छोड़कर पता नहीं कहाँ चली गई। कबूतर बीच बीच में आँखों को थोड़ा खोलकर यह तमाशा देखते रहे थे।

अन्ततः कबूतरों ने पूरी आँखें खोलीं और अपने आप को ज़िन्दा पाकर बहुत ख़ुश हुए और आश्चर्यचकित भी। एक कबूतर ने तोते से कहा- तोता भाई धन्यवाद। बहुत बहादुर हैं आप, बिल्ली से टक्कर ले ली!

– मैं कोई बहादुर-वहादुर नहीं हूँ। तुम्हारी जान पर संकट देखा तो स्वयं को रोक नहीं पाया। तुम मुझे बताओ, तुमने बिल्ली का कोई विरोध क्यों नहीं किया?

– बिल्ली बहुत खूँखार है और हम ठहरे प्रेमी जीव। हम भला क्या कर सकते हैं?

– क्या दुनिया में सिर्फ़ तुम्हीं प्रेम करते हो? हम भी प्रेम करते हैं। प्रेम कायर तो नहीं बनाता।

– पर प्रकृति ने हमें शांत ही बनाया है, हम लड़ नहीं सकते।

– कमाल है! तुम मर सकते हो, लड़ नहीं सकते! मौत सामने खड़ी हो और कोई बिना हाथ पाँव हिलाए आँखें बंद करके उसका इन्तज़ार करे तो थू है उस पर! जीना है तो लड़ना पड़ेगा।

अरे तुम उड़ सकते हो, बिल्ली की पीठ पर मेरी तरह वार कर सकते हो। बिल्ली सामने आए तो आँखों को बंद करने की बजाय उसकी आँखों में आँखें तो डाल सकते हो। यक़ीन मानो, शिकारी कितना भी खूँखार हो, निडर आँखों से बहुत डरता है।

तोता उड़ गया है। कबूतर एक दूसरे को देख रहे हैं, दोनों की आंखो में सवाल उग आए हैं।

पात्रता परीक्षा

“तुम पर इल्ज़ाम है कि तुमने भड़काऊ भाषण देकर दो सम्प्रदायों के बीच विद्वेष पैदा किया है। तुम्हारा क्या कहना है?”

“मेरे भाषण को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया है साहब! मुझ पर लगाया गया आरोप सही नहीं है।”

” हूं, लगता है आप सही कह रहे हैं। आपका यह भाषण सोशल मीडिया पर वायरल है। मुझे वो वीडियो डॉक्टर्ड लगा, मैंने देखा है उसे।”

“जी, आप ठीक कहते हैं।” मुल्ज़िम के होंठों पर एक रहस्यमय मक्कार मुस्कुराहट तैर गई। जज साहब ने मुल्ज़िम को निर्दोष क़रार दिया। सब लोग चले गए तो मुल्ज़िम ने धीरे से कहा,”जज साहब, ऊपरी सदन में प्रवेश के लिए पात्रता परीक्षा का पहला सवाल आपने सही तरीक़े से हल कर लिया है, लेकिन अभी कई कठिन सवाल और हल करने होंगे। और हाँ, इस परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों की संख्या काफ़ी है और वेकैंसीज़ बहुत कम। सिलेक्शन तो टॉपर्स का ही होगा। सोच समझ कर सवाल हल करियेगा।”

जज साहब मुस्कुराए। उनकी मुस्कुराहट कह रही थी- मैं जानता हूँ, मैं करूँगा।

बिजूके

सब तरफ़ रेत थी और मैं रास्ता भटक गया था। मुझे बहुत प्यास लगी थी। मैं किसी बस्ती की तलाश में था। अचानक मुझे रेत के टीलों के बीच एक सँकरी गली के इधर और उधर कुछ कच्चे घर दिखाई दिए। मैं उस गली में उत्तर से दक्षिण तक बढ़ता चला गया। आश्चर्य हुआ कि किसी घर में कोई इन्सान नहीं था। गली समाप्त हो गई तो मैंने दाएँ-बाएँ देखा। बाईं ओर पूर्व दिशा में मुझे मंदिर और पश्चिम में मस्जिद दिखाई दी। मैं मंदिर की ओर चल दिया। मंदिर के बाहर मुझे एक बिजूका दिखाई दिया। उसका सिर हाँडी जैसा था, बदन लकड़ी के डंडे जैसा, उसके दोनों हाथ विपरीत दिशाओं में फैले हुए थे। मंदिर में कोई इन्सानी हलचल नहीं थी। मैं निराश वापस मुड़ने को हुआ कि एक आवाज़ सुनाई पड़ी,

“यहाँ क्यों आए हो?” मैंने देखा, बिजूका ही बोल रहा था। मैंने कहा, “माफ़ करना भाई, मैंने आपको बिजूका समझा था।”

“मैं बिजूका ही हूँ, इस बस्ती में इन्सान नहीं रह सकता।” मैं हैरान था और डर भी रहा था। मैंने कहा, “क्यों, यहाँ क्या कभी भी कोई इन्सान नहीं रहता था? इतने सारे घर बने हैं, पर इतनी घुटन है कि जैसे बरसों से गली में से हवा का गुज़र ही नहीं हुआ।”

“होता था, इस सँकरी गली में भी हवा का गुज़र होता था, ढूहों जैसे कच्चे मकानों में भी चिराग़ जलते थे, रेत के असीम विस्तार में भी पौधे साँस लेते थे, मौसम के अनुसार लोगों के चेहरों पर नूर भी आता था। जब से बस्ती में भगवान और अल्लाह आ बसे हैं, तब से यहाँ कोई इन्सान नहीं रहता। तुम्हारे सामने भव्य मंदिर है, उधर देखो, आलीशान मस्जिद। वहाँ भी मेरी तरह एक बिजूका खड़ा नज़र आयेगा।”

“तो तुम यहाँ क्यों हो?”

“मैं भगवान की रक्षा कर रहा हूँ, वो अल्लाह की।” बरबस मेरे चेहरे पर मुस्कान फैल गई। मुझे महसूस हुआ जैसे उसके चेहरे पर भी मुस्कान उभरी है, पर हाँडी पर मुस्कान दिख नहीं रही थी। वह बोला, “तुम यही सोच रहे हो न कि किसी इन्सान की बजाय बिजूके क्यों उनकी रक्षा के लिए तैनात हैं।” मैंने ‘हाँ’ में सर हिलाया तो उसने फिर कहा, “इन्सान सिर्फ़ अपनी रक्षा करता है। जब उसमें असमर्थ हो जाए तो भगवान या अल्लाह से रक्षा की गुहार लगाता है। इन्सान भगवान या अल्लाह की रक्षा नहीं कर सकता, उनकी रक्षा तो बिजूके ही करते हैं।”

मैं बिजूके को देख रहा था। मेरी प्यास गायब हो गई थी।

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