किसानी चेतना की एक रागनी और एक ग़ज़ल- मनजीत भोला

मनजीत भोला का जन्म सन 1976 में रोहतक जिला के बलम्भा गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ. इनके पिता जी का नाम श्री रामकुमार एवं माता जी का नाम श्रीमती जगपति देवी है. इनका बचपन से लेकर युवावस्था तक का सफर इनकी नानी जी श्रीमती अनारो देवी के साथ गाँव धामड़ में बीता. नानी जी की छत्रछाया में इनके व्यक्तित्व, इनकी सोच का निर्माण हुआ. इन्होने हरियाणवी बोली में रागनी लेखन से शुरुआत की मगर बाद में ग़ज़ल विधा की और मुड़ गए. इनकी ग़ज़लों में किसान, मजदूर, दलित, स्त्री या हाशिये पर खड़े हर वर्ग का चित्रण बड़ी संजीदगी के साथ चित्रित होता है. वर्तमान में कुरुक्षेत्र में स्वास्थ्य निरीक्षक के पद पर कार्यरत हैं.

MANJEET BHOLA
मनजीत भोला

रागनी

 चीख-चीखकै गळे सूखगे कोए सुणता ना आवाज़ रै
कती भूखे प्यासे फिरैं भटकते जो पैदा करते नाज रै

आच्छे समय के सपन्यां नै कर दिए ब्योन्त कुढाळे रै
सांझ धूंधळी हो थी पर इब दिन भी सैं म्हारे काळे रै
खेतां म्ह हाड़ गळावणिए ना चढ़ावा खावण आळे रै
हाम जाणां ज्यब दर्द किसा हो पायां के फूटैं छाळे रै
हक नहीं म्हारा दे सकता तै छोडकै कुरसी भाज रै
कती भूखे प्यासे फिरैं भटकते जो पैदा करते नाज रै

कदे मंडी कदे फंडी लूटते के लुटणा ए तकदीरां म्हं
वैं भी तै म्हारे रहते कोन्या जो बिठा दिए वज़ीरां म्हं
गरमी सरदी चौमासा गुजरै कपड़े झीरम झीरां म्हं
रोम रोम म्हारा जकड़या सै रै कर्जे की जंजीरां म्हं
भा ठीक जै मिलै फसल का कुण माफ करावै ब्याज रै
कती भूखे प्यासे फिरैं भटकते जो पैदा करते नाज रै

मेहुल माल्या कोठारी ना हाम नीरव मोदी बरगे रै
खज़ाना खाली करकै देस का विदेसां में डिगरगे रै
कित जावां हाम कड़ै ठिकाणा सोच सोच कै डरगे रै
मेहनतकश कई इस्सै चिन्ता में आत्म हत्या करगे रै
जिसमें जीणा मुश्किल होज्या चाहिए ना इसा राज रै
कती भूखे प्यासे फिरैं भटकते जो पैदा करते नाज रै

खुद नै खेवैया वो समझै सै जिसनै देखी नैया ना
गऊ रक्षक इसे बणे फिरैं सैं जिनके घर में गैया ना
हम सीधी सादी बात करणीए जाणां छंद सवैया ना
म्हारी वेदना गाण की हिम्मत रखता कोए गवैया ना
मनजीत भोळा साजबाज की कलम नहीं मोहताज़ रै
कती भूखे प्यासे फिरैं भटकते जो पैदा करते नाज रै
स्त्रोत- इन्टरनेट

ग़ज़ल

क्यों परेशां कर रहा है बोल  हिन्दोस्तान को
फैसला फसलों का जालिम करने दे दहकान को

दौर है बेदारियों का हम हुए बेदार गर
क्यों नहीं तू दे रहा है रास्ता इमकान को

होश हैं बाकी अभी हाँ पढ़ लिया कानून भी
कौन करता है पसँद तू ही बता नुकसान को

कौन कहता है यहाँ पर बोलती लाशें नहीं
दे रहीं कब्रें समर्थन देख ले शमशान को

ये सुना बनवा रहा है इक इमारत तू नई
दाख़िला तेरा न होगा याद रख संविधान को

हैं हवाएं तेज लेकिन डरने वाला कौन है
हम बुझे तो क्या मिलेगा सोच आतिशदान को

क्या सियासत का यही दस्तूर 'भोला' ठीक है
आदमी समझा गया ना आज तक इंसान को

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