किसानी चेतना के हरियाणवी गीत और रागनियाँ – मंगत राम शास्त्री

मंगत राम शास्त्री- जिला जींद के ढ़ाटरथ गांव में सन् 1963 में जन्म। शास्त्री (शिक्षा शास्त्री), हिंदी तथा संस्कृत में स्नातकोत्तर। साक्षरता अभियान में सक्रिय हिस्सेदारी तथा समाज-सुधार के कार्यों में रुचि। ज्ञान विज्ञान आंदोलन में सक्रिय भूमिका। “अध्यापक समाज” पत्रिका का संपादन। कहानी, व्यंग्य, गीत, रागनी एंव गजल विधा में निरंतर लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। “अपणी बोली अपणी बात” नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित।

मंगत राम शास्त्री

छोड़ कै खेती किसानी कित जाऊँ

छोड़ कै खेत्ती किसान्नी, कित जाऊँ.
तज विरासत खानदान्नी, कित जाऊँ..

बाप मेरा न्यूंए मर ग्या टोट्टे म्हं
मेरी भी टपगी जवान्नी, कित जाऊँ.

हो लिया सौदा किसान्नी घाटे का
सै चुगरदै बेइमान्नी,कित जाऊँ.

मांग जो ठाऊं हकां की,लठ लाग्गैं
बोझ हो ग्यी जिन्दगान्नी,कित जाऊँ.

कर्ज म्हं खपगी बडेर्यां की पीढ़ी
ना मिली साब्बत पिराह्न्नी,कित जाऊँ.

खेत म्हं बन्दूक बोऊंगा इब तो
भोत हो ली छेड़खान्नी,कित जाऊँ.

ले मुबाइल सब खड़े न्यारे “खड़तल”
गाम म्हं छाई विरान्नी कित जाऊँ..

स्त्रोत- इन्टरनेट

किसान्नी खोटी कार सै (रागनी)

ओ हो ओ किसान्नी खोटी कार सै…..
कुछ मारैं कुदरत, कुछ मण्डी, कुछ सरकार सै.

मंहगे भा का बीज पड़ै सै वो भी मुश्किल तै थ्यावै
कई बै तो इसी बणै कसुत्ती लाम्बी लैन लगी पावै
कई कई कट्टे पड़ैं खाद के कई कई सप्रे करवावै
कदे सूखज्या बिन पाणी और कदे डूबज्या पाणी म्हं
कदे पकी पै औल़े पड़ज्यां बिजल़ी पड़ज्या लाणी म्हं
कदे चाटज्या टिड्डी दल ना धांस बचै खलिहाणी म्हं
ओ हो ओ करज की करड़ी मार सै…..
सदा बैंक चै आढती कै रहै हाथ पसार सै.

छोट्टे- बडे कई नेता उनै रोज भकावण नै आवैं
कोए जात की,कोए धर्म की बात करैं और भरमावैं
कुछ तो देश- धरम पै मरणे मिटणे की शिक्षा लावैं
उसतै बडी देशभगती भई और बता दयो के होगी
देही झोड़ा करली खुद कमजोर बता दयो के होगी
सारे मुंह मारैं उस म्हं इसी खोर बता दयो के होगी
ओ हो ओ चुगरदै उसकी हार सै…..
सबका पेट भरणिया क्यों इतना लाचार सै.

डाक्टर चाह्वै उसके बाल़क पढ़कै डाक्टर बण ज्यावैं
मास्टर चाह्वै उसके बाल़क पढ़कै मास्टर बण ज्यावैं
अफसर चाह्वै उसके बाल़क पढ़कै अफसर बणज्यावैं
हर नेता न्यूं चाह्वै उसके बाल़क नेता बणैं महान
हर बुद्धि जीवी न्यूं चाह्वै उसके बाल़क हों विद्वान
पर किरषाण कदे ना चाह्वै उसके बाल़क हों किरषाण
ओ हो ओ घटत का कारोबार सै….
सारी जिन्दगी टोट्टे म्हं खपता परिवार सै.

असली रोल़ सुणो सिस्टम नै भा-भोई म्हं उल़झाया
कौण भाव तय करता है वो नहीं रास्ता दिखलाया
“बणती भवी होण की खात्तर”भरम सदा यू फैलाया
इब लागत मजदूरी का सब जोड़ लगाणा होगा रै
जित हों तय कीमत्त फसलां की ओड़ै जाणा होगा रै
भवी के पीच्छै की सांईस का बेरा लाणा होगा रै
ओ हो ओ समय की यही पुकार सै…..
कहै मंगतराम लड़ाई म्हं एक्का हथियार सै.

बाबत हरियाणा

हम हरियाणा के बाशिंदे सां बेट्टी- पूत किसान के.
मजदूर और जवान के, हम गौरव हिन्दस्तान के..

कड़ी मेहनत करकै नै हम खेत म्हं रोज कमावां सां
दब कै बाहवां रज कै खावां आनंद घरां मनावां सां
माँ बरगी या धरती म्हारी मात्थै तिलक लगावां सां
सोन्ना- चांदी- हीरे- मोत्ती माट्टी म्हं उपजावां सां
म्हारे बीच म्हं फर्क नहीं घणे निर्धन और धनवान के.

मर्दां की गेल्यां खेत्तां म्हं करती काम लुगाई रै
गैरे ला, तांसल़े ठावैं, भारां की करैं ढुवाई रै
छाज गेल बरसा कै नै जिन्नस की करैं सफाई रै
गृह लक्ष्मी बण कै नै वें करती सफल कमाई रै
कार बुहार गृहस्थी के सब जाणैं विधि विधान के.

गाड्डी की ऐड्डर बेठ्ठण नै बाल़क रयाड़ करैं म्हारे
नहीं बिठावै,छो म्हं आकै कति बिगाड़ करैं म्हारे
स्कूल तै आकै चलैं खेत म्हं नहीं उजाड़ करैं म्हारे
खाण पीण तै रोक्कणिये के गण्डे पाड़ धरैं म्हारे
आप्पे के म्हं मस्त रहैं जणूं मालिक सकल जहान के.

हरियाणा के नर नारी सब मिलजुल कै नै कार करैं
ईद बिशाखी तीज दशैहरा होल़ी का त्यौहार करैं
घर आए मेहमान्नां की हम इज्जत बेसुमार करैं
मंगतराम कहै आपस म्हं सब खड़तल व्यवहार करैं
नेम धरम कायदे कानुन म्हारे सीधे सादे ज्ञान के.

 मंगतराम शास्त्री (2-10-1987 को लिखी रागनी का पुनर्लेखन) 8-7-2020.

बित्तै सै जिंदगी सारी…

टेक…………बीत्तै सै जिंदगी सारी दुख चिंता म्हं उस भोल़े से किरसाण की….. रै

गात निचोड़ वो फसल उगावै,सारे जग की भूख मिटावै
फेर भी ना थ्यावै उसनै टेम पै पाई नौबत आज्या फांसी खाण की….. रै.

हर दम डूब्या रहै करज म्हं, रोगी होज्या हर्ज मरज म्हं
आपणे फरज म्हं फेर भी कसर ना छोड्डै सारी रीत पुगावै बेट्टी-ब्हाण की…. रै.

एक तरफ टोटा करड़ाई, दूज्जै कमर तोड़ मंहगाई
सुख के तो ढाई सांस भी कोन्या मिलते देक्खें जा बाट उसाण की….

वो बांट दिया गन्दी स्यासत नै,भूल रहा सै अपणी पत नै
उस ताकत नै मंगतराम पिछाणै आज लोड़ सै हाथ मिलाण की…. रै

जितने मेहनतकश किरसाण कमेरे सैं

जितने मेहनतकश किरसाण-कमेरे सैं।
उनपै दुख-बिफता के बिज्जल़ खे रे सैं।।

सारा जीवन बीत गया इस आशा म्हं
सुख के तो बस ढाई सांस भतेरे सैं।

रोज तलाश करो अपणै बरगे मन की
बिन साथी तो हारे भले-भलेरे सैं।

“भाई दूर पड़ौसी नेड़ै “कैह्बत या
धुर तै कैंह्दे आवैं बडे-बडेरे सैं।

सिस्टम नै उल़झाए लोग कड़ै जावैं
आग्गै दिक्खै खाई पाच्छै झेरे सैं।

जांच-परख माणस की क्यूकर हो “खड़तल”
इक चेहरे म्हं छुप रे लाख्खां चेहरे सैं।

हाली की दुआली

आज भी कात्तक बदी अमावस दिन सै खास दिवाल़ी का।
सत्तर साल बीत गे फेर भी ढंग बदल्या ना हाल़ी का।।

आज भी लोग बाल़कां खात्तर खील खेलणे ल्यावैं सैं
उसके बाल़क बैठ गल़ी म्ह उनकी ओड़ लखावैं सैं
जल़ी रात की बची खीचड़ी घोल़ सीत म्ह खावैं सैं
आँख मूंद दो कुत्ते धोरै बैठे कान हिलावैं सैं
टोट्टा चौड़े काल्लर घुम्मै ना कोए काम रुखाल़ी का।

घरां अमीरां कै तो हलवे खीर की खुशबू उट्ठै सै
हाल़ी की बहु आज भी न्यूएं खड़ी बाजरा कुट्टै सै
टुट्टी खाट खुराड़ी सै बिन पैंद गात नै चुंट्टै सै
फुट्टी चिलम होकटी की हाल़ी तै रोवै रुट्ठै सै
आज भी उसकै धोरै तो डण्डूक पड़्या सै फाल़ी का।

आज भी उसके बाल़क न्यूंए रोन्दे पिटदे जावैं सैं
माँ कै आग्गै चीज मंगावण की फरमास लगावैं सैं
थारे बाप के जी नै रोल्यो माँ उननै धमकावैं सैं
आशा लेकै फेर बाल़क बाब्बू नै अरज सुणावैं सैं
आज भी न्यूंए लिकड़ै सै ओ पति कमाणे आल़ी का।

ज्ञानीराम नै जो कैहराक्खी आज भी न्यूं की न्यूं दिक्खै
देख बाल़कां की हालत हाल़ी का भीत्तरला चिक्खै
ब्याज रपैये देन्दा भी सहुकार कई कई बै झिन्खै
वाहे रागनी आज बोहड़ कै मंगतराम तेरी लिक्खै
आज तो सारे जाणैं सैं क्यूँ बाग उजड़ रया माल़ी का।
फेर भी कोए जुगाड़ नहीं उस हाल़ी की परणाल़ी का।।

हाल़ी की दिवाल़ी जिसी ज्ञानीराम शास्त्री जी के बख्तां म्हं थी आज भी उसी ए है. उस रागनी को आज के संदर्भ म्हं कहण की कोशिश करी है.

स्त्रोत- इन्टरनेट

ओढ़ चूंदड़ी पील़े रंग की आई दिल्ली म्हं .
असली भारत माँ नै अलख जगाई दिल्ली म्हं..

हाथ म्हं सोट्टा मोट्टा ले रयी मन म्हं भरया यकीन
अस्सी साल उमर म्हं भी वा कती नहीं गमगीन
न्यूं बोल्ली यें किसान विरोधी कानुन बण रे तीन
हात्थां म्हं तै जांदे दिक्खैं साधन और जमीन
खेत बचावण खात्तर आई ताई दिल्ली म्हं.
हक ले कै जावांगे न्यूं गरजाई दिल्ली म्हं..

रजधान्नी की ड्योढ़ी पै चढ़ माई नै ललकारया
सूड़ ठा दिया देश का यू राज किसा आ रया
अन्नदाता डेरा दिल्ली की देहल़ी पै ला रया
उसकी गेल्यां मजदूरां का भी पड़ रया लारा
ऊंच नीच की पाट्टी दिक्खै खाई दिल्ली म्हं.
बीरां नै भी सिर की बाजी लाई दिल्ली म्हं..

न्यूं कह री वा आज के शासक हो रे सैं हड़खाए
पूंजीपती घरान्यां के जबड़यां म्हं लोग फंसाए
नहीं किसे की सलाह लेई ना सारे नेम पुगाए
ले कै आड करोना की काल़े कानून बणाए
देक्खो कितनी खोटी चाल चलाई दिल्ली म्हं.
अगली पीढ़ी दास करण की चाही दिल्ली म्हं..

कहै मंगतराम लड़ाई आरोपार की ठण री
एक तरफ लाट्ठी गोल़ी सरकार की तण री
दूजी ओड़ खड़ी रैयत दीवार सी चिण री
शांतमयी संघर्ष करांगे योजना बण री
साथ बुजुर्गों के आई तरुणाई दिल्ली म्हं.
गाण रागनी पोंहच्या विकरम राही दिल्ली म्हं.

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