अधिकारों के लिए जन अभिव्यक्ति है किसान आंदोलन- अरुण कुमार कैहरबा

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लेखक हिंदी विषय के अध्यापक तथा देसहरियाणा पत्रिका के सह-सम्पादक हैं

अरुण कुमार कैहरबा

लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की अभिव्यक्ति बहुत मायने रखती है। किसी मुद्दे पर जितनी अधिक जन भागदीरी होगी और जितनी अधिक लोगों की राय सामने आएगी। लोकतंत्र के लिए यह खुराक से कम नहीं है। सरकार के द्वारा भी उठाए जाने वाले कदमों, बनाई जाने वाली नीतियों व कानूनों पर लोगों की प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं। पिछले कईं दिनों से चल रहे किसान आंदोलन को इसी संदर्भ में सकारात्मक ढ़ंग से देखा जाना चाहिए।

सरकार के द्वारा भी उठाए जाने वाले कदमों, बनाई जाने वाली नीतियों व कानूनों पर लोगों की प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं। पिछले कईं दिनों से चल रहे किसान आंदोलन को इसी संदर्भ में सकारात्मक ढ़ंग से देखा जाना चाहिए।

कोरोना महामारी व लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा जून महीने में कृषि से संबंधित तीन अध्यादेश लाए गए। सितंबर महीने में संसद के सत्र के दौरान इन अध्यादेशों को कानूनी शक्ल दे दी गई। किसानों का आरोप है कि अध्यादेश व कानून बनाते हुए उनकी राय ली ही नहीं गई। राय नहीं ली गई, तो कोई बात नहीं। लेकिन कानून बना दिए गए अध्यादेशों पर किसान तभी से अपना रोष जता रहे हैं, जब से इन्हें लागू किया गया। इस जनाक्रोश को या तो नजरंदाज किया जा रहा है या फिर किसानों के आंदोलन पर तरह-तरह के लांछन सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा लगाए जा रहे हैं, जोकि काफी चिंता की बात है।

कभी कहा जाता है कि किसानों का आंदोलन कांग्रेस या विपक्षियों द्वारा करवाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि विपक्ष ने किसान को भ्रमित कर दिया है। कभी केवल पंजाब के किसानों का आंदोलन बताया गया। कभी इसे खालिस्तानियों की काली करतूत की तरह से पेश किया गया। लोगों की अभिव्यक्ति को तरह-तरह कमतर ठहराने या उसे गलत ठहराने के लिए हो रहे ये सारे प्रयास भी राजनीति का हिस्सा हैं। किसानों की अभिव्यक्ति और आंदोलन को लांछित करने की इस राजनीति की जितनी निंदा की जाए कम है।

कोरोना महामारी में अप्रत्याशित तौर पर जब से कृषि से संबंधित तीन अध्यादेश लाए गए तभी से इनका विरोध हो रहा है। इस विरोध को नजरंदाज करने के लिए इन अध्यादेशों को क्रांतिकारी बताया गया। बाद में बना दिए गए कानूनों को तो यहां तक कह दिया गया कि 70 साल के बाद किसान आजाद हुआ है। सत्ताधारी दल के नेताओं की धूंआधार प्रचारात्मक बयानबाजी ऐसे समय में भी चल रही है, जब दस दिन से लाखों किसान दिल्ली को बॉर्डरों पर बैठे हुए कानूनों को किसान व कृषि विरोधी काला कानून बता रहे हैं।

स्त्रोत-इन्टरनेट

हद तो तब हो गई जब संविधान में दिए गए अधिकारों को धता बताते हुए हरियाणा सरकार ने 26 नवंबर को दिल्ली कूच करने वाले किसानों को रोकने के लिए दो दिन पहले ही किसान नेताओं की गिरफ्तारी शुरू कर दी। इसके बावजूद दिल्ली जा रहे किसानों को रोकने के लिए कडक़ड़ाती ठंड में किसानों पर पानी की बौछारें की गई। आंसू गैस के गोले छोड़े गए। पुलिस व सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। मार्गों पर बैरीकेड लगा दिए गए। बड़े वाहनों को आड़ा-तिरछा कर खड़ा कर दिया गया। सडक़ों पर खाईयां बना दी गई। इस तरह की बाधाओं को पार करने के बाद दिल्ली के बॉर्डरों पर पहुंचे किसान दस दिन से आंदोलन कर रहे हैं। किसानों की मुख्य मांग तीनों कानूनों को रद्द करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी हक बनाने की है।

किसी भी सूरत में दिल्ली नहीं आने देने के लिए पसीना बहा चुकी सरकार आखिर किसानों के साथ बातचीत को राजी हुई। किसान प्रतिनिधियों के साथ दो दौर की बात कर चुकी है। किसानों ने कानूनों के सभी प्रावधानों के किसान व कृषि विरोधी पहलुओं पर अपनी प्रस्तुति दे दी है। अब सरकार संशोधन की बात कर रही है। किसान कानूनों को रद्द करवाने पर अड़ा हुआ है। कडक़ड़ाती ठंड के बावजूद आंदोलनरत किसानों का जोश व जज्बा देखने लायक है। अपनी मांगों के लिए किसानों का इस तरह का पड़ाव ऐतिहासिक है। हालांकि सडक़ पर पड़े किसानों को अनेक प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आंदोलनरत किसानों की मौतें भी दिल दहलाने वाली हैं। इसके बावजूद किसानों का अनुशासन भी देखने लायक है। बातचीत के दौरान किसानों ने सरकारी खाने को ठुकरा कर जता दिया है कि किसान अपनी मांगों के लिए कितना प्रतिबद्ध हैं। विज्ञान भवन में केन्द्रीय मंत्रियों के साथ बातचीत कर रहे किसान नेताओं को आंदोलन के दौरान लंगर का भोजन नीचे बैठकर खाते देखकर आंदोलनरत किसानों को संतोष हुआ होगा।

आंदोलन की सबसे बड़ी बात यह है कि आंदोलन किसी एक व्यक्ति के द्वारा नहीं चला जा रहा है। यह आम किसानों का आंदोलन है। जो पुलिस किसानों पर लाठीचार्ज कर रही थी, आंसू गैस के गोले चला रही थी, उसी पुलिस के जवानों को पानी पिलाते-लंगर खिलाते किसान जीवन का संदेश दे रहे हैं।

आंदोलन की सबसे बड़ी बात यह है कि आंदोलन किसी एक व्यक्ति के द्वारा नहीं चला जा रहा है। यह आम किसानों का आंदोलन है। जो पुलिस किसानों पर लाठीचार्ज कर रही थी, आंसू गैस के गोले चला रही थी, उसी पुलिस के जवानों को पानी पिलाते-लंगर खिलाते किसान जीवन का संदेश दे रहे हैं। मिट्टी के साथ मिट्टी होकर सभी के लिए भोजन पैदा करने वाले किसान आंदोलन की नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं। जिस तरह से खेत में महिलाएं किसान की भूमिका निभाती हैं, उसी तरह से आंदोलन में भी महिला किसानों की नेतृत्वकारी भूमिका लोकतंत्र के प्रति आश्वस्त करती है। आंदोलन में बुजुर्गों व युवाओं को हिस्सा लेते हुए देखना अपने आप में ही कमाल का दृश्य है। सरकार जितना जल्दी उनकी मांगों को माने, उतना बेहतर है।

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