किसान आंदोलन: लीक से हटकर एक विमर्श- सुरेन्द्र पाल सिंह

सुरेन्द्र पाल सिंह

वर्तमान किसान आंदोलन प्रकट रूप से तीन नए कानूनों के विरोध में हैं। लेकिन कोई भी मुहिम या आन्दोलन का सिलसिला तभी तक ऊर्जापूर्ण रह सकता है जब तक उसके पीछे अव्यक्त कारक सक्रिय हों। समाजशास्त्रीय भाषा में इसे लेटेंट फंक्शन कहा जाता है। यह लेटेंट फंक्शन ही है जो किसी सामाजिक संस्था या परंपरा को कायम रखते हैं।

ये आंदोलन एक ऐतिहासिक आंदोलन है क्योंकि यह केवलमात्र तीन कानूनों को रद्द करवाने के मुद्दे से ही ऊर्जा ग्रहण नहीं कर रहा है बल्कि दर्जनों आयाम इसको मज़बूती प्रदान कर रहे हैं।

ये आंदोलन एक ऐतिहासिक आंदोलन है क्योंकि यह केवलमात्र तीन कानूनों को रद्द करवाने के मुद्दे से ही ऊर्जा ग्रहण नहीं कर रहा है बल्कि दर्जनों आयाम इसको मज़बूती प्रदान कर रहे हैं।
सन 2014 के बाद से हमारा देश एक नई राजनीतिक-सामाजिक संस्कृति का न केवल साक्षी है बल्कि भुक्तभोगी भी है। हरेक प्रकरण की एक नए सिरे से व्याख्या की जा रही है जिसका केंद्रबिंदु किसी ना किसी प्रकार से हिन्दू बनाम मुसलमान रहा है। ये कार्ड लगातार जिंदा रहे उसके लिए मेनस्ट्रीम मीडिया और एक सुनियोजित सोशल मीडिया को हथियार की तरह इस तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहा है कि सौ फ़ीसदी झूठ भी सच लगने लग जाए। फ़ेक इतिहास, फ़ेक कहानियां, ट्रोल आर्मी द्वारा टारगेट बना कर किसी का भी चरित्रहनन, मॉब लिंचिंग का समर्थन, कोरोना जिहाद जैसी मनगढ़ंत कहानी को आम व्यक्ति के मन में सच्चाई के रूप में बैठा देना ऐसे कुछ एक उदाहरण हैं जिनकी एक लंबी सूची है।

ऐसे वातावरण में शांतिप्रिय और सेक्यूलर किस्म के लोगों में एक हताशा का एहसास होना स्वाभाविक है। गाहे बगाहे उनकी आवाज़ को भी दबाने के लिए एक नई शब्दावली गढ़ ली गई। उन्हें टुकड़े टुकड़े गैंग, राष्ट्रविरोधी, अर्बन नक्सल आदि ख़िताब देकर ट्रॉल आर्मी के हवाले कर दिया जाना आम बात रही है ताकि उनके दिलों में खौफ़ भर दिया जाए और बाक़ी लोग भी डर कर रहे। यूएपीए का खुल कर प्रयोग किया जाने के कितने ही उदाहरण हमारे सामने हैं।

स्त्रोत-इंटरनेट

यह आंदोलन ऐतिहासिक क्यों है? मौजूदा निज़ाम को पहली बार अपने आईटी सेल के घुड़सवारों को अस्तबल में वापस भेजना पड़ा और ट्रॉल आर्मी के सिपहसालारों को निठल्ला बैठना पड़ा है।

बहरहाल, उपरोक्त प्रकरण को लंबा ना खींचते हुए संक्षेप में यूँ कहा जा सकता है राष्ट्रीय आंदोलन और संवैधानिक मूल्यों को दरबदर करना मौजूदा निज़ाम की आवश्यकता भी है और मज़बूरी भी। क्योंकि हिन्दू बनाम मुसलमान की धुरी पर कायम रहना ही इन्हें सत्ता में रहने की गारण्टी देता है। और, इसके लिए अन्य सभी मुद्दे सहज़ ही दोयम दर्जे पर खिसक जाते हैं। अब पूरे तामझाम को बनाया रखना है तो थैलीशाहों के साथ गुप्त समझौता भी आवश्यक है जो ना केवल चुनाव जीतने के लिए धन बल्कि जनमत बनाने के लिए मीडिया हाउस भी उपलब्ध कराता है। यह काम फोकट में तो नहीं होता है तो बदले में उन्हें अपने हिस्से का मांस का पाउंड भी चाहिए। नए कृषि कानूनों की गहराई में जाने की बजाए इतना कहना पर्याप्त होगा कि निजीकरण के लंबे सिलसिले का एक मुक़ाम इन कानूनों में स्पष्ट है। हमारे देश में कृषि उपज का बाज़ार अपरम्पार है और न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडी व्यवस्था और आवश्यक वस्तुओं का नियमन सबसे बड़े अवरोध हैं जो बड़े कॉरपोरेट को इस बाज़ार को मुट्ठी में लेने को फ्री हैंड नहीं देता है। कोई हैरानी की बात नहीं होगी अगर आने वाले समय में बैंकों का स्वामित्व भी इन्हें सौंप दिया जाए।

यह आंदोलन ऐतिहासिक क्यों है? मौजूदा निज़ाम को पहली बार अपने आईटी सेल के घुड़सवारों को अस्तबल में वापस भेजना पड़ा और ट्रॉल आर्मी के सिपहसालारों को निठल्ला बैठना पड़ा है। कितनी बेबसी हो गई है कि अवार्ड वापस करने वालों को पिछली बार की तरह अवार्ड वापसी गैंग कह कर ट्रॉल करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।  जो निज़ाम मुख्यतः पूर्वगढंत व्याख्या के आधार पर किसी भी आंदोलन को बदनाम करने और दबा देने में सिध्दहस्त रहा हो उसका शस्त्रविहीन होना एक ऐतिहासिक घटना है। एक लंबे अर्से से भुक्तभोगी नौजवान, छात्र, मज़दूर, छोटा व्यापारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस आंदोलन का सहभागी बन गया है। 8 दिसम्बर को भारत बंद के आह्वान पर हर प्रकार का तबका चाहे वे पेट्रोल पंप वाले हो या ट्रांसपोर्टर या व्यापार संघ वाले, सभी जोशपूर्ण तरीके से समर्थन में उतरने का दावा कर रहे हैं। विपक्षी पार्टियों द्वारा भी किसानों में अपना जनाधार बचाए रखने की मजबूरीवश किसानपरस्त चेहरा रखना आवश्यक हो जाता है।

सवाल उठता है कि आईटी सेल और ट्रॉल आर्मी एक बार थोड़ी सी सक्रिय हुई थी जब खालिस्तानी, पाकिस्तानी, सौ सौ रुपये के दिहाड़ीदार, काँग्रेस के भड़कावे में आदि आदि मसाला सोशल और मेनस्ट्रीम मीडिया में देखने सुनने को मिलने लगा था, लेकिन जल्द ही होंठ सील लिए गए। दो मुख्य कारण हैं जिनकी वज़ह से इस प्रकृति के प्रचार प्रसार पर लगाम लगाई गई है। पहला कारण आंतरिक है जब सत्तापक्ष में टूट और जनता के सवालों का तार्किक जवाब की कंगाली महसूस होने लगी। दूसरा कारण इतने बड़े जनांदोलन से टक्कर लेने के सवाल पर शक्तिहीनता का एहसास है।
इस आंदोलन के अगुवा पंजाब के किसान हैं जिनकी अनेक ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक जड़ें हैं। सिक्ख गुरुओं की कुर्बानी, बंदा बहादुर द्वारा किसानों को जमीन की मल्कियत देना, सिक्ख मिसलों द्वारा नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली की फ़ौज से बार बार मुक़ाबला करते हुए पतनशील मुग़ल साम्राज्य में अपनी ताक़त का इजाफ़ा और गुरुद्वारों को महंतो से मुक्त करवाने के लिए एक लंबा, शांतिपूर्ण और कुर्बानियों भरा सफ़ल अकाली मोर्चों की विरासत वाले किसानों की आत्मा ज़मीन और खेती में रची बसी है। हरित क्रांति को जीवित रखने के लिए मंडी व्यवस्था भी पंजाब में सबसे अधिक मज़बूत रही है। आज़ादी की लड़ाई, जलियांवालाबाग़, से लेकर ख़ालिस्तान आंदोलन जैसे उतार चढ़ाव से गुजरे पंजाबियों को अपनी एक सशक्त अस्मिता की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता उन्हें इस मुक़ाम पर ले आई है कि मज़बूत, बेख़ौफ़, और लंबी लड़ाई के लिए उनकी तैयारी देखते ही बनती है। यही वज़ह है कि देश विदेश के पंजाबियों से इस आंदोलन को भरपूर समर्थन मिल रहा है।

इस आंदोलन के अगुवा पंजाब के किसान हैं जिनकी अनेक ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक जड़ें हैं। सिक्ख गुरुओं की कुर्बानी, बंदा बहादुर द्वारा किसानों को जमीन की मल्कियत देना, सिक्ख मिसलों द्वारा नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली की फ़ौज से बार बार मुक़ाबला करते हुए पतनशील मुग़ल साम्राज्य में अपनी ताक़त का इजाफ़ा और गुरुद्वारों को महंतो से मुक्त करवाने के लिए एक लंबा, शांतिपूर्ण और कुर्बानियों भरा सफ़ल अकाली मोर्चों की विरासत वाले किसानों की आत्मा ज़मीन और खेती में रची बसी है।

इसके अलावा, कृषि का संकट लगातार किसी न किसी रूप में किसानों को बेचैन करता रहा है और तमाम पहलुओं को जोड़ते हुए अब उन्हें लगने लगा है कि इतना तो अवश्य हो कि खेतिहर किसान को एक न्यूनतम आय की गारण्टी होनी ही चाहिए। यही सूत्र प्रत्येक राज्य के किसानों की मानसिकता को जोड़ रहा है। जहां मंडी व्यवस्था नहीं है उन राज्यों के किसानों को भी लगने लगा है कि उन्हें भी न्यूनतम मूल्य तो मिलना ही चाहिए।

इन तमाम तथ्यों के आधार पर एक बार फिर से वर्तमान किसान आंदोलन को ऐतिहासिक आंदोलन करार किया जा रहा है क्योंकि इस हलचल से उठने वाली लहरें अनेक आयामों को छुएगी जिनके दूरगामी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिणामों के  निकट भविष्य में हम साक्षी होंगे। 

1 thought on “किसान आंदोलन: लीक से हटकर एक विमर्श- सुरेन्द्र पाल सिंह

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    विक्रम प्रताप says:

    अभी तक के किसान आन्दोलन को समझने के लिए यह एक सही विश्लेष्ण पर आधारित बहुत सुलझा हुआ लेख है. आप अगर पंजाब और देश के अन्य हिस्सों के किसान संगठनों द्वारा निभाई जा रही भूमिका पर कुछ रौशनी डालते तो हम जैसे पाठक को बहुत मदद मिलती.

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