गुणाकर मुले : विज्ञान को हिन्दी में सुलभ कराने वाले अप्रतिम योद्धा – प्रो. अमरनाथ

गुणाकर मुले

सरल हिन्दी में विज्ञान को जन -जन तक पहुँचाने में मराठी भाषी गुणाकर मुले ( 3.1.1935) का योगदान अप्रतिम है. महाराष्ट्र के अमरावती जिले में जन्म लेने वाले गुणाकर मुले ने इलाहाबाद से गणित में एम.ए. किया और बाकी जीवन दिल्ली में गुजारा. मुले जी महापंडित राहुल सांकृत्यायन के शिष्य थे और वर्षों तक वे दार्जीलिंग स्थित राहुल संग्रहालय से भी संबद्ध रहे. 

उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी दोनो भाषाओं में लिखा है. हिन्दी में उनकी लगभग पैंतीस पुस्तकें प्रकाशित हैं. इनमें ‘आकाश दर्शन’, ‘अंक कथा’, ‘अल्बर्ट आइंस्टाइन’, ‘संसार के महान वैज्ञानिक’, ‘भारतीय विज्ञान की कहानी’, ‘भारतीय अंकपद्धति की कहानी’, ‘ज्यामिति की कहानी’, ‘प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक’, ‘आधुनिक भारत के महान वैज्ञानिक’, ‘एशिया के महान वैज्ञानिक’, ‘काल की वैज्ञानिक अवधारणा’, ‘कृषि-कथा’, ‘गणित की पहेलियाँ’, ‘गणित से झलकती संस्कृति’, ‘ज्यामिति की कहानी’, ‘आपेक्षिकता का सिद्धांत क्या है ?’, ‘आर्किमिडीज’, ‘आर्यभट’, ‘ऊर्जा संकट और हमारा भविष्य’, ‘अंतरिक्ष यात्रा’, ‘नक्षत्र लोक’, ‘ब्रह्माण्ड परिचय’, ‘भारत के संकटग्रस्त वन्यप्राणी’, ‘भारत के प्रसिद्ध किले’, ‘‘सौर मंडल’, ‘सूर्य’, ‘भास्कराचार्य’, ‘भारतीय सिक्कों का इतिहास’, ‘भारतीय लिपियों की कहानी’, ‘महान वैज्ञानिक महिलाएं,’ ‘सूरज चाँद सितारे’, ‘राकेट की कहानी’, ‘राहुल चिन्तन’ आदि प्रमुख है. 

हिन्दी के पाठकों में वैज्ञानिक चेतना पैदा करने तथा वैज्ञानिक जानकारियाँ उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने जो लेखन किया है वह अद्वितीय है. उन्होंने ऐसे विषयों पर लिखा जिन पर आम तौर पर हिन्दी में कोई लेखक नहीं मिलता. गणित और विज्ञान जैसे कठिन विषयों को सरलतम रूप में प्रस्तुत करने के लिए वे प्रतिबद्ध थे.

कहा जाता है कि उन्होंने सिविल मैरेज किया था और इस दौरान कोर्ट के सम्मुख मुले जी के पिता की भूमिका बाबा नागार्जुन ने निभाई थी.

(लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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