संताप और अवचेतन के कवि :सीताकांत महापात्र- योगेश शर्मा

योगेश शर्मा कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय में हिंदी स्नातकोत्तर के अंतिम वर्ष के छात्र और देस हरियाणा की प्रबन्धन टीम का हिस्सा हैं.

योगेश शर्मा

1993 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित सीताकांत महापात्र मूलतः उड़िया भाषा के कवि हैं। उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हैं। ‘वर्षा की सुबह’ का मूल उड़िया से अनुवाद राजेन्द्र प्रसाद मिश्र द्वारा किया गया है। इस काव्य संग्रह ‘में  56 कविताएँ संकलित की गई हैं। राजेन्द्र प्रसाद मिश्र उड़िया से हिंदी में अनुवाद करने के लिए जाने जाते हैं। इस पुस्तक का अनुवाद भी बहुत सावधानी  से किया गया है। शब्दों के चयन और मूल भाव का ध्यान रखा गया है।

महापात्र की कविताएँ अवचेतन को झकझोरने वाली प्रकृति और संस्कृति से जुडी हुई कविताएँ हैं। उनके द्वारा चुने गए प्रतीक और बिम्ब समन्दर के पास विकसित हुए हैं। समन्दर के पास का माहौल इनकी कविताओं में जीवन और मृत्यु की शाश्वत अनुभूति का संचार करता है। आकाश, अँधेरा, सुबह, साँझ, सूर्यास्त, मृत्यु, समन्दर, यात्रा, तट दिशाएँ आदि शब्द इनकी कविताओं में बार बार आते हैं।

इनकी कविताओं का पाठ करते हुए महसूस होता है कि कविता को समझने के लिए पाठक को कई बार तजुर्बे की आवश्यकता होती है, महज सिद्धान्तों की समझ और भाषा पर अच्छी पकड़ से काम नहीं चलता। जैसे वर्षा ऋतू में घास के पीले फूल उभर आते हैं ठीक वैसे ही इस काव्य संग्रह की इनकी कविताओं में उड़िया संस्कृति से लबालब इनका अपना व्यक्तिगत जीवन उभर आता है। शायद इसी कारण से इनकी कविताएँ कभी कभी पाठक को निहायत व्यक्तिगत कविताएँ महसूस हो सकती हैं। समतल धरती के साहित्य में और समन्दर-रेगिस्तान के साहित्य में जो मोटा मोटा अंतर होता है, वह महापात्र की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक महसूस करता है।

इस काव्य संग्रह की कविताओं में मृत्युबोध की प्रधानता है लेकिन जीवन की मधुर झंकार भी समांतर सुनाई देती है। दुःख जहां एक ओर अँधेरे की शक्ल में सामने आता है, वहीं आशा सुबह की किरणों में नजर आती है।

इस काव्य संग्रह की कविताओं में मृत्युबोध की प्रधानता है लेकिन जीवन की मधुर झंकार भी समानांतर सुनाई देती है। दुःख जहां एक ओर अँधेरे की शक्ल में सामने आता है, वहीं आशा सुबह की किरणों में नजर आती है। महापात्र की कविताओं में चाँद भी है, सूरज भी है। शब्दों की कारीगरी है तो अर्थ की कलाकारी भी है।। अकेलेपन का दुःख है तो जिये गए जीवन का उल्लास भी है। बेहद निजी नजर आती कविताएँ भी अपने भीतर लाक्षणिक अर्थ लिए हुए हैं जो हर पाठक अपनी दृष्टि से खोज सकता है।

इनकी कविताओं में बिम्ब उतने स्पष्ट नहीं हैं, पाठक को जरा सा संदेश भर मिलता है और  वह खुद ब खुद अंदाजा लगाना शुरू कर देता है। यह इनकी कविताओं में दृश्यों के लिए प्रयोग किए गए सांकेतिक बिम्ब विधान की वजह से होता है जिससे गुजरते हुए पाठक अकेलेपन की अपनी दुनिया का ताना- बाना बुनने लगता है। यह ऐसा है, मानो किसी भौतिक सरंचना का परिचायक न होकर किसी स्थिति मात्र का परिचायक हो-

आया है वर्षा काल
घन बरसता लगातार
बज रही है दुदुम्भी बादलों की
कांप उठी है सुबह (‘वर्षा की सुबह’)
 
देखो ना कितना सुंदर और
सुहावना है यह सूर्यास्त
इस दुनिया की यह अन्भुली छवि (साँझ)
 
दोपहर
धान की वजनी बालियाँ
सूर्य की किरणों से बोझिल हो
झुकी जा रही हैं, (कहाँ गए वे लोग)

इन पंक्तियों में किसी दृश्य का आभास तो होता है लेकिन किसी स्थान विशेष का नहीं। ‘वर्षा की सुबह’ की शुरूआती पंक्तियों को पढ़कर वर्षा के मास के सुहावने मौसम को महसूस किया जा सकता है, मगर वह किसी भौतिक सरंचना से नहीं बंधा है। इसी तरह सूर्यास्त का सार्वभौमिक दृश्य भी उकेरा गया है। जाहिर है धान की बालियाँ उड़िया प्रदेश की हैं परन्तु उत्तर भारत का कोई पाठक इन्हें पढ़कर अपने खेतों की कल्पना कर सकता है। इस तरह यह किसी विशेष भौतिक सरंचना से विहीन दृश्यविधान है जिसमें पाठक को एक इंडीगेटर दिया गया है बाकि का काम पाठक का खुद का है।

वस्तुपक्ष को समझने के लिए व्यापक स्तर पर सीताकांत की रचना प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता महसूस होती है। महापात्र की कविताएँ एक साहित्यिक मानस के अवचेतन से प्रभावित कविताएँ नजर आती हैं। कोई ना कोई कोना कवि के हृदय का ऐसा है जिसमें संताप घर किए बैठा है लेकिन कवि की विचार प्रणाली उससे उभरने के लिए जद्दोजहद की स्थिति में नजर आती है।

इनकी कविताओं में जीवन और मृत्यु के लिए बिलकुल विपरीत प्रतीक मिलते हैं जिनका चयन बड़ी सजगता से हुआ लगता है। जिन्दगी के लिए जिन प्रतीकों का इस्तेमाल हुआ है वे आपस में गुंथे हुए तथा एक सकारात्मक उर्जा के परिचायक प्रतीत होते हैं। यह कवि की रचना-प्रक्रिया पर मजबूत पकड़ का शानदार नमूना है। सुबह, फाटक का नीला नाम पट्ट, खलिहान, प्रकाश, सूर्य, समन्दर आदि महापात्र के यहाँ जीवन के प्रतीक हैं वहीँ दूसरी ओर वर्षा, अँधेरा,साँझ, काली रात, नीरवता, तृष्णा आदि संताप के। सीताकांत की कविताओं में प्रतीकों का प्रयोग बड़ी एहतियात के साथ हुआ है।

 किसका रुआंसा चेहरा लगता है उभरने
अँधेरे के परदे पर
जिधर भी देखो। (आधी रात)
 
लग लग कर कोमल उँगलियाँ
बारम्बार वर्षा की
मिट चुके हैं सफ़ेद अक्षर कई
फाटक के नील नाम पट्ट से। (‘वर्षा की सुबह’)
 
घूम रहा है लट्टू
पुराना लट्टू घूम रहा है
घूमते-घूमते घूमते-घूमते रो रहा है
फिर आगे और आगे
अँधेरे घुप्प अँधेरे में
आगे से आगे घूम रहा है
ढूंढ रहा है, कहाँ गया वह बालक
कहाँ गया (लट्टू)

इन पंक्तियों में अँधेरा शब्द संताप का अर्थ लिए हुए है। यह अँधेरा मुक्तिबोध के यहाँ भी ज्यों का त्यों है। ‘आधी रात’ कविता में कवि को अपने किसी प्रिय का चेहरा नजर आता है। वह उसे दुखी होकर याद करता है। अँधेरा दुःख को ओर तीव्र करता है। ‘वर्षा की सुबह’ कविता में वर्षा पुनः संताप का रूप लिए है वर्षा रूपी दुःख जीवन रूपी नीले नामपट्ट के अक्षरों को यानी जीवन को धीरे धीरे खत्म कर रहा है। ‘लट्टू’ कविता में लट्टू दिवंगत बालक की माता पिता या उसके दोस्तों की मनोदशा का  प्रतीक हो सकता है, पुनः वह अँधेरे में घूम रहा है। अँधेरा यहाँ बालक के चले जाने का दुःख है।

एक कवि होने के नाते महापात्र प्रकृति के अधिक निकट हैं। वे प्रकृति में से अपने दुःख को बांटने वाली चीजें खोजते हैं-

  नदी के पानी में साँझ की हवा से उठती
नन्हीं नन्हीं लहरों पर
वह स्वर झुक जाता है
आँसू बहाता है
अंधे चरवाहे युवक की
अंधी बांसुरी का स्वर
अँधेरे को सबसे अधिक पहचानता है (गर्मी की साँझ)
                                                                 
अँधेरे की पट्टियाँ धीरे धीरे
खुलती जा रही थी
नीले आसमान की आँखों से
....सूरजमुखी-से मेरी ओर ताक रहे हो तुम
आसन्न अँधेरे से (सूरजमुखी)

नीरवता से भरी साँझ में शांति से बहती नदी के किनारे अंधे चरवाहे की अंधी बांसुरी का स्वर कवि के हृदय को और भी व्यथित करता है। यहाँ चरवाहा और उसकी बांसुरी अनायास ही अंधी नहीं है- दुःख आदमी को अँधा कर देता है। उसकी सामान्य बातों से भी पीड़ा का अहसास होता है और एक सूनी साँझ का दुःख तो केवल एक विरही हृदय ही महसूस कर सकता है, उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। इससे कई बार महापात्र के दुखवादी कवि होने का अहसास होता है।

प्रकृति कवि के अकेलेपन की पीड़ा को और अधिक तीव्र कर देती है। उनकी कविताओं में प्रकृति इसलिए भी एक सहज वस्तु है। इस सहजता से यह अनुमान लगाना आसान हो जाता है कि कवि पहले प्राकृतिक दृश्यों को महसूस करता है, भीतर हृदय में  गहरे तक उन्हें रमने देता है और फिर कभी एकांत के क्षणों में अपने मुताबिक उसे कविता की शक्ल देता है। कवि का कविता लिखना उतना जरुरी नहीं है जितना कवि का सजगता से अपने परिवेश को, अपने आस पास घटित हो रही घटनाओं को समझना जरूरी है। कवि के लिए सजगता एक तरह की कसौटी है।

कवि का कविता लिखना उतना जरुरी नहीं है जितना कवि का सजगता से अपने परिवेश को, अपने आस पास घटित हो रही घटनाओं को समझना जरूरी है। कवि के लिए सजगता एक तरह की कसौटी है।

सीताकांत की कविताओं के बारे में बातचीत के दौरान अमूमन मृत्यु को एक भौतिक क्रिया ‘फिजिकल एक्ट’ की तरह बरता जाता है। असल में मृत्यु उनके यहाँ हर समय ही कोई फिजिकल एक्ट नहीं है बल्कि कहीं कहीं वह एक किस्म का ‘स्टेट ऑफ़ माइंड’ यानी कि मस्तिष्क की एक दशा भी प्रतीत होती है। कवि मृत्यु के सत्य के प्रति आकर्षित महसूस होता है। शायद कवि ने मृत्यु को नजदीक से देखा हो- वह बार बार उसको याद करता है, शायद सहज बने रहने के लिए या शायद अह्म से बचने के लिए। यह भीतरी अकेलापन भी होता है जब व्यक्ति मृत्यु की अधिक कल्पना करता है। मनोविज्ञान बताता है कि तनाव में व्यक्ति मृत्यु की अधिक कल्पना करता है। जाहिर है सब कारण एक साथ भी हो सकते हैं। यही मिलकर सीताकांत को मृत्युबोध का कवि बनाते हैं।  

 सोया है घर में कौन?
उदास माँ बाप? निश्चिन्त समय?
गाढ़ी काली मृत्यु का भय?
देख घटा मोर की तरह है अधीर
मृत्यु और बालक के मन।
खत्म हुई छुट्टियाँ बालक की
आ पहुंची घड़ी यह समझने की
चुक जाते हैं सुख सारे कभी न कभी
आई है वर्षा अब
मृत्यु है लम्बी छुट्टी पर।।।। (‘वर्षा की सुबह’)
 
आना हो तो आओ
मोतियबिन्द से घिरी आँखों से
पोंछकर साड़ी, धूल और अंगार
मेरी आत्मा से
क्या तुम्हें नहीं मालूम
मैं हूँ तुम्हारी प्रतीक्षा में
आँखें खुली हैं जिस दिन से?
दबे पाँव चले आओ,
पास बैठो जरा। (मृत्यु)

‘वर्षा की सुबह’ कविता में कवि को वर्षा में भीगा हुआ बालक दिखता है। यह अनायास ही नहीं है। यहाँ कवि अवचेतन को प्रदर्शित करता है। इसमें मनुष्य के अवचेतन में चल रही प्रक्रियाओं की असाधारण अभिव्यक्ति है। गहरे संताप के क्षणों में तथा मृत्यु के निकट व्यक्ति को अपना बचपन स्मरण हो आता है। उसका अवचेतन स्वयं काम करने लगता है। वह अपना बचपन अपनी आँखों के सामने पाता है-

 भीगा हुआ जाता है स्कूल बालक एकाकी
पर बंद हैं किवाड़ खिड़कियाँ सारी
राह किनारे सभी घरों की।(वर्षा की सुबह)

वर्षा में भीगा बालक कवि को आकर्षित करता है। उसको अपना व्यक्तिगत संघर्ष नजर आने लगता है जिसमें किवाड़-खिड़कियाँ रूपी सहायता की कहीं कोई गुंजाइश नहीं। यही इस समाज का कटु सत्य भी है। हर व्यक्ति अपने भीतर एक बालक लिए हुए है। यदि वह बाहर आना भी चाहे तो उसे समझने के लिए इस कामकाजी और बौद्धिक दुनिया में कोई उपलब्ध नहीं। बचपन इसी तरह धीरे धीरे मर जाता है। धीरे धीरे कामकाजी समाज के सब लोग इसी प्रक्रिया में खुद को झोंककर अपना जीवन समाप्त कर देते हैं। मनुष्य काम की व्यस्तता में जीवन का अर्थ ही भूल बैठता है। यहाँ वर्षा रूपी संताप का इतना भय है उसे निरंतर संघर्षरत जिन्दगी वज्र जैसी महसूस होने लगती है और यह संसार एक लौहखाना। लौहखाना शब्द सामने आते ही मस्तिष्क में औजार-मशीन आदि घूमने लगते हैं और उस आदमी की याद दिलाते हैं जो पहले तो औजार की तरह बरता गया है और अब एक मशीन बनकर जीवन के गाँव से बाहर हो गया है। ऐसा ही कुछ ‘ट्रेन में सुबह’ कविता पढ़ते हुए भी स्पष्ट होता है-

 दौड़ी चली जा रही है ट्रेन
अपरिचित गाँव के किनारों से
कौन जाने
कैसा देश है, कैसा युग है वह (ट्रेन में सुबह)

‘ट्रेन’ शब्द शहरी विकास का प्रतीक है। कवि ग्रामीण विकास की शहरी विकास से तुलना करता है। यह कवि के निजी जीवन का अनुभव हो सकता है कि वह गाँव की संस्कृति और शहरी माहौल में बड़ा अंतर महसूस करते हुए ट्रेन को गाँव के किनारों से अपरिचित महसूस करता है। हमारे समाज की यह बड़ी विडम्बना है कि यहाँ गाँव और शहरों में बड़ा अंतर कर दिया गया है। शहरी लोग गाँव की संस्कृति को स्टेज पर देखना तो पसंद करते हैं मगर अपनी नित्य की जीवन शैली में प्रकृति के महत्त्व को दरकिनार कर पल में आगे बढ़ जाते हैं।

सीताकांत महापात्र की कविताओं में जीवन का उन्माद भी है मगर जिये गए जीवन का-

न जाने क्या कुछ ठुंसे रखता था
यहाँ वहां सहेजकर रखता था-
बचपन के समुद किनारे के घोंघों  से लेकर
बड़े दिन की तरह-तरह की दलीलें तक,
प्रेमिका की नीली चिठ्ठी से लेकर
सीने की संदूकची में सपने तक
मन के छोटे छोटे कोटरों में नक्षत्र निहारिका से लेकर
शब्द में जड़े क्षोभ, उन्माद, आंसुओं तक (डरता है मौत से वह आदमी)
 
सूर्य कोहरे की चादर से झांकते हैं
तुम चाय पीने को बुलाती हो

सुन पड़ती है मानो पिछले जन्म से
वही आवाज(ट्रेन में सुबह)
 
यह दुनिया, यह सूर्यास्त
संभव नहीं भूलना
लगता है देखा है इन्हें पहले भी
शायद पिछले जन्म में (साँझ)

कवि जिये गए सुखमय जीवन के मधुर पलों को रह रह कर याद करता है। विषाद से भरे उसके हृदय को उसके जीवंत बचपन, प्रेम, उन्माद, मन मुटावों तथा सुनहरे सपनों से लबालब भरी जवानी की यादें कचोटती हैं। ‘ट्रेन’ कविता में कवि को अपने प्रिय का स्मरण हो आता है। उसे पिछले जन्म से उसकी आवाज सुनाई पड़ती है। यह साधारण मानव स्वभाव है, साधारणतय व्यक्ति कभी ना कभी अपने जीवन में प्रिय की आवाज अपने मस्तिष्क में जरुर महसूस करता है। ‘साँझ’ कविता में भी कवि सूर्यास्त को देखकर ऐसा महसूस करता है कि वह इस दुनिया में और इस सूर्यास्त को पहले महसूस कर चुका है। यहाँ पिछला जन्म और कुछ नहीं बल्कि अरसे पहले जिया गया सुखमय जीवन ही प्रतीत होता है। सुख की लम्बी अवधि भी क्षण में गुजर जाते हैं, दुःख के कुछ पल एक जन्म के बराबर लगते हैं।

सीताकांत महापात्र की कविताओं में समाज के प्रति जो लगाव महसूस होता है व्यापक स्तर पर वह उनके निजी संताप और अवचेतन में चलने वाली गतिविधियों को कविता में अभिव्यक्त करने का सशक्त साधन बन जाता है। इस प्रक्रिया में वे बहुत सजग होते हैं। यह सतर्कता महापात्र को बड़ा कवि बनाती है।

सीताकांत महापात्र कटु राजनीति से दूर मानव हृदय के सूक्ष्म भावों को कविता की शक्ल देते हैं। वे निजी महसूस होती कविताएँ लिखते हैं जिनसे साहित्यिक मानस स्वाभाविक ही अपना जुड़ाव महसूस करने लगता है। ये कविताएँ कवि की जातीयता, निजता और संस्कृति का ताना बाना महसूस होती हैं। समाज किसी कृति में से क्या खोजता है, क्या पाता है यह उसकी जरूरतों, प्रयासों और दृष्टि पर निर्भर करता है। सीताकांत महापात्र की कविताओं में समाज के प्रति जो लगाव महसूस होता है व्यापक स्तर पर वह उनके निजी संताप और अवचेतन में चलने वाली गतिविधियों को कविता में अभिव्यक्त करने का सशक्त साधन बन जाता है। इस प्रक्रिया में वे बहुत सजग होते हैं। यह सतर्कता महापात्र को बड़ा कवि बनाती है।

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