वर्ष 2020 के लिए नोबेल पुरस्कार हेतु घोषित अमेरिकी कवियत्री लुईस ग्लूक की कविता- अवेर्नो, (अनुवाद-विनोद दास)

लुईस ग्लूक बेहद सम्मानित साहित्यकार हैं. वो सामाजिक मुद्दों पर भी काफी सक्रिय रहती हैं. लुईस येल यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफेसर हैं. उनका जन्म 1943 में न्यूयॉर्क में हुआ था. उनके नोबेल प्रशस्ति पत्र में कहा गया कि उनके लेखन में बाद की पुनरावृत्ति के लिए इन तीन विशेषताओं में एकजुट होना दिखाई देता ह्रै. लुईस ग्लुक के कविता के बारह संग्रह और कुछ संस्करणों को प्रकाशित हुए हैं. उनकी कविताओं में खुद के सपनों और भ्रमों के बारे में जो कुछ बचा है, उसे कहा गया है. स्वीडिश एकेडमी ने कहा कि कवयित्री लुईस को उनकी बेमिसाल काव्यात्मक आवाज के लिए यह सम्मान दिया गया, जो खूबसूरती के साथ व्यक्तिगत अस्तित्व को सार्वभौमिक बनाता है. (स्त्रोत-इंटरनेट)

लुईस ग्लूक
 तुम मर जाते हो
जब मर जाता है तुम्हारा ज़ज़्बा
तुम कर नहीं पाते हो इसका कोई उम्दा इस्तेमाल
तुम करते रहते हो कुछ न कुछ ऐसा
जिसके लिए नहीं है और कोई विकल्प
जब यह मैंने अपने बच्चों से कहा
उन्होंने नहीं दिया ध्यान
बूढ़े खूसट हैं-उन्होंने सोचा
ऐसा वे करते रहते हैं हमेशा
करते रहते हैं ऐसी चीज़ों पर बात
जिनको कोई देख नहीं सकता
जिनको छिपाने के लिए
ग़ायब हो रही हैं उनकी दिमाग़ की कोशिकाएं
पुरनियों को सुनते हुए
वे मारते हैं एक दूसरे को आँख
उनके ज़ज़्बे को लेकर करते हैं बात
चूँकि अब कुर्सी के लिए याद नहीं आता उन्हें कोई लफ्ज़
अकेला होना भयावह है
मेरा मतलब अकेले रहने से नहीं है
अकेले का मतलब है जहाँ कोई तुमको नहीं सुनता
मैं कहना चाहता हूँ
मुझे कुर्सी के लिए लफ्ज़ याद है -लेकिन अब मुझे
इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है
यह सोचते हुए मैं जग गया
तुमको तैयार होना है
जल्द ही तुम्हारा ज़ज़्बा हार मान लेगा
फिर दुनिया की सभी कुर्सियां
तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाएंगी

नोट- इटली में नेपल्स से दस किलोमीटर दूर एक झील जिसे पुराने रोमवासी भूमिगत द्वार समझते थे.

फेसबुक से साभार

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