सुरेश बरनवाल की कविताएं

सुरेश बरनवाल
प्रकाशित कृतिः संवेदनाओं संग संवाद- कहानी संग्रह 2010, कविता संग्रह- कतरा-कतरा आसमान 2015
कादम्बिनी, आजकल, देस हरियाणा, हरिगंधा, व अन्य पत्र-पत्रिकाओं में कहानी, लघुकथा, कविता, गजल, लेख, बालकविता। कथादेश, हंस, इतिहास बोध व अन्य पुस्तकों में स्वरचित चित्र प्रकाशित। विशेषः कहानी संग्रह काशी विद्यापीठ के पाठ्यक्रम में शामिल। कहानी सैनिक और बन्दूक को 2005 में भारत सरकार द्वारा आयोजित अखिल भारतीय युवा कहानीकार प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त। कहानी अस्थि विसर्जन को हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता 2014 में तृतीय स्थान प्राप्त। विभिन्न कहानियों पर मंचन व रेडियो नाट्य प्रसारण। आकाशवाणी द्वारा कविता प्रसारण।

सुरेश बरनवाल

प्रेम

 
किसी चट्टान की
खुरदुरी सतह पर उभरी
किसी दरार पर
हौले से अपना हाथ यूं रखो
मानो पूछ रहे हो
उससे उसकी खैरियत।
तुम देखना
कुछ समय बाद
वहां कोई कोंपल फूट गई होगी
अथवा
उस दरार में
पानी के निशान होंगे।

युद्ध पर तीन कविताएं


1
युद्ध एक फैक्ट्री है
यह लाशें बनाता है
इसका कच्चा माल है
हंसता मुस्कराता
एक आम आदमी।

2
युद्ध के बाद
जिन्दा बच गई महिला सैनिकों से कहा गया
वह मारी गई महिला सैनिकों को दफनाएं
दरअसल
वह लाशें नंगी थीं।

3
युद्ध में चली इक गोली की मार
वहां तक होती है
जहां पहुंचती है
किसी के मरने की सूचना
उस सूचना से
कुछ और लोग मर जाते हैं।

सागर

  मैंने जब-जब सागर को देखा
वह विस्तार करता गया
और महासागर बन गया।
मैंने जब-जब सागर से आंखें धोईं
वह खारा होता गया
और नमक हो गया।
मैंने जब-जब सागर को दिखाया
अपने घर की छत पर
चिड़ियों के लिए रखा
कटोरी में थोड़ा सा जल
सागर पानी-पानी हो गया।

विध्वंसक


हां,
हथियार गल चुके हैं।
दुनिया के समस्त हथियारों को
खत्म किया जा चुका है।
कुछ नहीं बचा है विध्वंसक/अब
आदमी के सिवाय।

भीतर के ग्रंथ

 
भीतर एक ग्रन्थ है
मेरे भी
तुम्हारे भी।
ग्रन्थ को छूने मात्र से
इसके कुछ पृष्ठ
अनायास पलट जाते हैं
कुछ पढ़े जाते हैं
कुछ अनछुए रह जाते हैं।
कुछ पृष्ठ
हम दोनों के ग्रन्थ में एक से हैं
संवेदनाओं से भीगे,
स्नेह से सिंचित,
प्रेम से सराबोर।
स्पर्श किए जाने की आस में
यह पृष्ठ खुद फड़फड़ाते हैं।
 
चलो! इन पृष्ठों को पढ़ते हैं
तुम मेरे ग्रन्थ को पढ़ो
मैं तुम्हारे।

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