हैपी बर्थडे टू यू – – गंगा राम राजी

मुझे जानकर यह बहुत बड़ा आश्चर्य हुआ कि सात सैक्टर में अधिकांश बड़ी बड़ी कोठियों में केवल बुजुर्ग जोड़े ही रहते हैं सबके बच्चे बाहर हैं। अपनी देख भाल वे स्वयं ही करते हैं जैसे सरकारी बस पर सामने लिखा होता है ‘यात्री अपने सामान के खुद जिम्मेदार हैं ’ बच्चे अपने-अपने परिवार के साथ घर से बाहर देश विदेश में व्यस्त और मस्त। – प्रस्तुत है कहानी गंगाराम राजी की

यहां पंचकुला में एस. एस. पी. के पद पर प्रमोशन के साथ मेरी पोस्टिंग जनवरी 2020 में हो गई थी अर्थात् करोना वायरस के फैलने से पहले ही। अपनी आदत के अनुसार मैंने सब जगह का ठीक ढंग से जानकारी अपने पास जुटा कर रखी थी। यह हमारी नौकरी का एक पार्ट होता है, कौन सी जगह कैसी है … कहां कैसे लोग रहते हैं आदि आदि …। मुझे जानकर यह बहुत बड़ा आश्चर्य हुआ कि सात सैक्टर में अधिकांश बड़ी बड़ी कोठियों में केवल बुजुर्ग जोड़े ही रहते हैं सबके बच्चे बाहर हैं। अपनी देख भाल वे स्वयं ही करते हैं जैसे सरकारी बस पर सामने लिखा होता है ‘यात्री अपने सामान के खुद जिम्मेदार हैं ’ बच्चे अपने-अपने परिवार के साथ घर से बाहर देश विदेश में व्यस्त और मस्त। 

खूब पढ़ाए बच्चे, अच्छी नौकरी मिली किसी को अमेरिका, किसी को इंगलैंड, कोई अपने ही देश में तो कोई संसार के दूसरे देशों में। पेरेंटस अपने अपने बच्चों कि चर्चा अपने मित्रों में ,अपने रिश्तेदारों में बढ़ चढ़ कर करते रहे होंगे और इठलाते भी रहे होंगे।

जाहिर है सब मध्यमवर्गीय परिवार, मेरे पेरेंटस की तरह ही अपनी सारी सहूलतों को काट काट कर बच्चों की देख रेख पढ़ाई उनकी ट्रेनिंग उनका भविष्य संवारने में सब खर्चा किया होगा ताकि बच्चे बेहतर जिंदगी जी सके। और फिर मध्यमवर्गीय परिवार को कभी अपने काम में सफलता मिलती तो उसका वह उल्लेख सबसे रिश्तेदारों से मित्रों से आस पास पड़ौस में व्याख्यान करने में कोई गुरेज भी तो नहीं करते, पेरेंटस खुश होते।

अब करोना का कहर जब बरसने लगा तो मेरा यह सर्वे काम आया। जो परिवार अकेले या इस समय अकेले पड़ गए हैं अपने पेरेंटस का ख्याल आते, उन्हें मैं कुछ ढाढस बधाने की सोचने लगा था। ख्याल आया कि किसी न किसी ढंग से इनसे मिलते रहें, इन्हें भी महसूस हो क्यों पुलिस वाले उनके पीछे पड़े रहते हैं, पुलिस का दूसरा रूप पुलिस वाले सहायक भी होते हैं और इस समय इन्हें एक मनावैज्ञानिक स्पोर्ट हमारी ओर से भी हो। कोठियों के बाहर नेम प्लेट से नाम का सहारा लेकर मैं नैट से इनके बारे जानने लगा कि इनके बच्चे कहां रहते हैं कौन क्या करता है इसी खोज में कोठी नम्बर सात में कर्नल कटोच की बर्थ डेट सामने आई। मैं खुश हो गया क्योंकि उनका जन्मदिन कल ही पड़ रहा है। 

बस फिर क्या था हमें तो बहाना मिल गया उनसे मिलने का, हमें और क्या चाहिए था ? कल की तैयारी करने लग गए। केक का इंतजाम … और हम ठीक दस बजे पहुंच गए मैं दो लेडी कांस्टेबल और एक डाॅक्टर को लेकर सैक्टर सात पंचकुला के कर्नल कटोच की कोठी के सामने। हमारे पास एक केक था। आज कर्नल का जन्म दिन है। उन्हें हैपी बर्थ डे करना था। 

यह मेरा इस तरह का लोगों से जुड़ने का पहला प्रयास था। मेरे साथ सभी के मन में बहुत उत्साह था, सबको अच्छा लग रहा था। घर पहुंच कर बाहर बोर्ड पढ़ा, कर्नल … कटोच …. साथ ही बैल का स्विच था मैंने काॅल बैल बजाई …… अंदर से आवाज आई,
‘‘ जरा रूकिए आ रहा हूं … ’’
हो सकता है कर्नल ने हमें बाहर खड़ा देख लिया हो क्योंकि वे कमीज डालते हुए अगले ही मिनट में बाहर हमारे सामने पहुंच गए,
‘‘ मैं कर्नल कटोच … अकेला रहता हूं … ठीक ठाक हूं ’’ कह कर वे कुछ ही दूरी पर हमारे सामने खड़े हो गए। शायद वे हमें ड्यूटी की एक औपचारिकता समझ रहे थे।
जब उन्होंने अपना परिचय अकेला का दिया तो मेरा माथा ठनका … यह मुझे नहीं मालूम था कि वे अकेले ही रहते हें यह तो और भी अच्छा हुआ। मैंने क्या हम सबने उन्हें नमस्ते कही ….उन्होंने भी नमस्ते का उत्तर नमस्ते से ही दिया …… 

अब हमने बड़ी देर नहीं की उन्हें जो सरप्राईज़ देना था वह दे दिया,
‘‘ हैपी बर्थ डे टू यू ….. हैपी बर्थ डे टू यू … ’’ तालियां बजाते हुए हम उन्हें मुबारक दे रहे थे।
कनर्ल कटेच पता नहीं क्या सोच कर आए थे … बस फिर क्या था … वे सामने से जोर से हंसे  ..  और हंसते हंसते …. उनकी आंखें भर आई …. 
‘‘ सर …. आप यह केक काटिए …… ’’
केक पर एक नजर डाल वे अपने को संभाल नहीं सके, फूट फूट कर रोने लग गए और वहीं पर बैठ गए। 
‘‘ सर आप उठे और केक काटें …. सर … ’’ 
फिर हम सब एक साथ बोलने लगे …
‘‘ हैपी बर्थ डे … टू यू ….. हैपी बर्थ डे टू यू …..  ’’
आस पास हमारी आवज पहुंची। इतनी देर पड़ौसी शायद अंदर से देख रहे होंगे कि पुलिस वाले यहां क्या करने आए हैं। जब उन्हें पता चला तो वे सब अपने घरों के बाहर बाॅलकोनी में तालियां बजाते हुए कहने लगे …
‘‘ हैपी बर्थ डे टू यू … हैपी बर्थ डे टू यू … ’’

कर्नल ने केक तो काटना शुरू किया परन्तु आखों से उनके गंगा जमुना जो बहने लगी … हम सबको भी अंदर तक भिगो दिया और हम ‘हैपी बर्थ डे टू यू ’’ कहते रहे कर्नल केक काटते रहे, सिंसकियों के साथ लम्बा सांस भरते भी रहे। पहले मैंने उन्हें कहा कि एक पीस पहले आप अपने मुंह में डालें फिर हम खा लेंगे …. 

कर्नल ने वैसा ही किया आस पास के पड़ौसियों को हाथ हिला कर नम आंखों से सबका धन्यावाद करने लगे …. पडौसी अपनी अपनी बालकोनी में खुश नजर आ रहे थे परन्तु इधर कर्नल मुस्कुरा तो रहे थे अंदर तक पिघले हुए हमें भिगो रहे थे।

और जब हम जाने लगे तो उन्होंने हमें रोक लिया।
हम रूक गए,
और हमें उनके आग्रह का मान रखते हुए रूकना पड़ा।
‘‘ अब आपको मैं बिना लड्डू के नहीं जाने दूंगा …. ’’
‘‘ नो नो थैंक्यू मि. कटोच …. ’’
‘‘ नो आपको रूकना ही पड़ेगा ओनली फाइव मिनटस ’’

हम लोग गेट के बाहर ही खड़े थे उन्होंने अपने लान की कुर्सियों को कुछ डिसटैंस पर कर दिया और गेट खोल कर हमें अंदर जाना ही पड़ा।
वे अंदर चले गए कुछ किशमश, बादाम, काजू ले आए, ‘‘ लो चाय तो नहीें यह तो आपको लेना ही पड़ेगा।’’
और हमने एक एक दाना सबने लिया तो उनकी पत्नी बच्चों के बारे जब मैंने पूछा तो उन्होंने भीगी आंखों से बात बात में अपनी कहानी सुनानी शुरू की –

‘कर्नल कटोच ने पत्नी के कहने पर घर बनाने के लिए पंचकुला हरियाणा ही चुना। पत्नी भी अपने स्थान पर सही ही थी क्योंकि पत्नी के रिश्तेदार यहीं आस पास ही थे कोई चंडीगढ़ में ,कोई मोहाली में, कोई अंम्बाला या कहा जाए ट्राई सिटी में ही रहते थे। कर्नल को भी था कि अपनी सारी सुविधा के साथ बच्चों की शिक्षा आदि के लिए भी यह उपयुक्त शहर था अतः दोनों ने यह ही निर्णय लिया कि पंचकुला ही उपयुक्त शहर है और उन दिनों पलाॅट फौजी कोटे में मिल ही रहा था ले लिया गया। 

फौजी कोटे का लालच भी हो जाता है न ! मैं समझता हूं कि यह कोटा एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ जाता है और आदमी फंस जाता है। इसी को ध्यान में रख कर बड़ी कंपनियां अपनी सेल को बढ़ाने के लिए ‘एक के साथ एक फ्री’ या ‘50 प्रतिशत की भारी भरकम छूट’ आदि आदि पोस्टर से ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। 

अब एक बात आपसे शेयर कर रहा हूं जब मैंने आर्मी ज्वाइन की थी तो उस समय मैं पीता नहीं था। परन्तु इस मुफ्त के कोटे ने , ‘ मुफत की शराब ने तो काजी को भी शराबी बना दिया था तो मैं कंहा किस खेत की मूली थी। शराब पीना अंडे खाना आदि सब इसी मनोविज्ञान की देन है। 

और फिर धीरे धीरे मकान बना लिया गया। 
आदमी को क्या चाहिए रोटी कपड़ा मकान बस सब पूरा हुआ। कर्नल को वैसे भी इधर उधर किसी चीज के पीछे भागने की आदत कहें या इच्छा ही नहीं थी। 
पत्नी का तर्क अपनी जगह ठीक ही था, ‘‘आप ऐसी नौकरी करते हो कभी भी आप बार्डर पर जा सकते हो और मुझे तो पीछे रहना ही पड़ेगा। फिर मेरे मम्मा पापा के साथ मेरे भाई भी तो यहीं, सब यहीं आस पास ही तो सैटल हुए हैं … ’’

मिंया बीबी राजी तो क्या करेगा काजी, बड़े तर्क वितर्क में पड़े ही नहीं थे। वैसे भी यहां पर अधिकतर लोग बाहर से ही बसे हैं। शहर नया है सब नए होंगे सब झंझट से छूट और वैसे भी हम पंजाब की अपेक्षा हरियाणा में या चंडीगढ़ में रहना पसंद करते हैं यहीं पर ही रहने लग गए थे।

कर्नल कटोच ने कभी भी अपनी पत्नी से इस पर कोई बहस नहीं की। जब दोनों के बीच बात हो गई तो ठीक है। हां जरा सा तो उन्होंने सोचा ही था उन्होंने पांच मिनट में ही निर्णय ले लिया था। उस समय कर्नल अभी अभी भारतीय सेना में लैफ्टिनैंट के पद पर ही थे। नई नई शादी हो गई थी। और नई नई शादी में पत्नी ही सरकार होती है , पत्नी ही सब कुछ होती है उसके निर्णय को टाला नहीं जा सकता। जल्दी से फार्म भर कर सरकारी फारमैलटी पूरी करा कर जगह अपने नाम करा ली गई थी।

कर्नल कटोच ने अपनी पत्नी का यहां पर रहने का फैंसला सही माना। उन्होंने देश के लिए कार्गिल की लड़ाई लड़ी थी तो उन्हें इस स्थान के महत्व का एहसास हुआ। पत्नी घर पर और उसके आस पास सारे रिश्तेदार और बड़ी बात फौज के उनके बहुत से मित्र भी यहीं थे। घर की चिंता से वे मुक्त रहे। फौजी को युद्ध में जाने से पूर्व ही घर याद आता है और जब वह युद्ध भूमि में आमने सामने होता है तो अर्जुन की तरह उसको मछली की आंख ही नजर आती है।

बच्चे एक लड़का और एक लड़की दोनों ही बहुत होनहार निकले। लड़की कंम्पूटर में सबसे आगे उसका शौक भी कम्प्यूटर में ही था कम्प्यूटर में इन्जिनियरिंग की और तुरन्त ही अमेरिका चली गई। वहां पर ही एक भारतीय लड़का मिला शादी कर ली गई अपना घर बसाने में लग गई। वैसे भी माता पिता से दूर ही तो लड़कियां रहती हैं शादी के बाद दूसरा घर तो बसाती ही हैं इसलिए ही तो पराया धन माना जाता है। मां बाप मनोवैज्ञानिक तौर पर लड़की के पैदा होने पर ही मान लेते हैं कि लड़की ने दूसरे घर जाना ही है। 

कर्नल का बेटा भी अपनी बहन से दो कदम आगे ही निकला। वह भी कम्प्यूटर में मास्टरी करने के बाद यू एस चला गया था। कर्नल साहब बहुत खुश। सबसे, अपने सिनियर, अपने साथ के कुलीगज़, सब छोटे बड़े से अपने बेटे की ही बात करते। जहां भी उन्हें समय मिलता बेटे की तारीफ के पुल बांधते। बेटा भी होनहार अपने माता पिता का सेवक था। मां बाप को अपने बेटे पर नाज़ था। 

‘‘आपकी पत्नी  ?’’

‘‘ साहब क्या कहें मैं हमेशा ही गोलियों के बीच में रहा, बचता रहा, इस शरीर पर कोई गोली नहीं लगी और वह गोलियों से दूर रहने पर भी उस ऊपर वाले को प्यारी हो गई थी। बेटा उस समय भी नहीं आ पाया था, केवल बेटी ही एक दिन आ कर चली गई थी …. एक लंम्बी सांस लेकर बोले … ‘‘ साहब सबको अपनी अपनी सांस ही लेनी पड़ती है, यही सत्य है …. जो मैं अब अकेला ले रहा हूं ….. साहब आपका साथी साथ नहीं तो जीना भी कुछ नहीं ….. ’’
अब कर्नल साहब फिर भर आए थे, नहीं बोला जा रहा था। हम में भी बोलने का हौंसला नहीं रहा था ….. फिर भी हल्के से एक बार सबने ‘हैपी बर्थ डे’ बोला ही … आस पास के पड़ौसी अभी हमें देख ही रहे थे हमें हाथ हिलाने लगे … हमने हल्की मुस्कुराहट में उन्हें भी बाई बाई की और भारी मन से लौट आए ….  कभी कभी पीछे मुड़ कर देखते तो कर्नल साहब हमें देख तो रहे थे, हाथ भी हिला रहे थे परन्तु उनकी आंखें बरस ही रहीं थीं और हमें यहां तक भीगो रही थी।


– गंगा राम राजी
9418001224

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