महात्मा गाधी

गाँधी की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी कहाँ गई ? – अमरनाथ

आजादी के बहत्तर साल बीत गए. आज भी हमारे देश के पास न तो कोई राष्ट्रभाषा है और न कोई भाषा नीति. दर्जनों समृद्ध भाषाओं वाले इस देश में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक और न्याय व्यवस्था से लेकरे प्रशासनिक व्यवस्था तक सबकुछ पराई भाषा में होता है फिर भी उम्मीद की जाती है कि वह विश्व गुरु बन जाएगा.

आजादी के बहत्तर साल बीत गए. आज भी हमारे देश के पास न तो कोई राष्ट्रभाषा है और न कोई भाषा नीति. दर्जनों समृद्ध भाषाओं वाले इस देश में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक और न्याय व्यवस्था से लेकरे प्रशासनिक व्यवस्था तक सबकुछ पराई भाषा में होता है फिर भी उम्मीद की जाती है कि वह विश्व गुरु बन जाएगा.

थोड़ी चर्चा हम सन् 1949 में होने वाले संविधान सभा के बहसों को लेकर भी करना चाहते हैं जिसके परिणामस्वरूप धारा 343 वजूद में आया और भारत संघ की राजभाषा ‘देवनागरी लिपि’ में लिखी जाने वाली ‘हिन्दी’ तय की गई. 12 सितंबर से 14 सितंबर 1949 तक लगातार चलने वाली संविधान सभा की यह बहस दो दृष्टियों से अभूतपूर्व थी. एक तो सदस्यों की इतनी बड़ी उपस्थिति अन्य किसी मुद्दे पर होने वाली बहसों में नहीं हुई थी और दूसरी यह कि किसी एक विषय पर इतनी लम्बी बहस भी कभी नहीं चली थी. इस बहस में सबसे अहम मुद्दा था हिन्दुस्तानी और हिन्दी में से किसी एक को राजभाषा बनाने का मुद्दा. हम सभी जानते हैं कि गाँधी जी हिन्दुस्तानी के समर्थक थे. हिन्दी के लिए दशकों पहले से उन्होंने जो प्रयास किया था उसी का परिणाम था कि दक्षिण में ही नहीं, समूचे भारत में हिन्दी के पक्ष में वातावरण तैयार हो गया था. हिन्दी के हित में लगातार काम करते हुए गाँधी जी ने अपनी अवधारणा को अपने अनुभवो से और अधिक पुष्ट किया और निर्णय लिया कि देश की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी होनी चाहिए जिसे हिन्दी और उर्दू ( फारसी) दोनो लिपियों में लिखा जा सकता है. जो जिस लिपि को जानता है वह उसी लिपि में लिखे. गाँधी जी को इस तथ्य की भली भाँति पहचान हो गई थी कि जिस भाषा को उत्तरी भारत में आम लोग बोलते हैं, उसे चाहे उर्दू कहें चाहे हिन्दी, दोनो एक ही भाषा है. यदि उसे फारसी लिपि में लिखें तो वह उर्दू भाषा के नाम से पहचानी जाएगी और नागरी में लिखें तो वह हिन्दी कहलाएगी. इसीलिए उन्होंने ‘हिन्दुस्तानी’ कहकर इन दोनो के समन्वय का उपयुक्त मार्ग ढूंढ लिया था.

इस हिन्दुस्तानी के इतिहास को भी थोड़ा देखें. जिसे हम हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास कहते हैं वह फ्रेंच इतिहासकार गार्सां द तासी का का ‘इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐंदुई ऐंदुस्तानी’ नाम से दो खण्डों में प्रकाशित हुआ था. एक खण्ड 1839 में और दूसरा खण्ड 1846 में प्रकाशित हुआ था. इसे हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास कहा जाता है किन्तु है यह वास्तव में हिन्दुई और हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास. इसमें हिन्दी और उर्दू ( आज के अर्थ में ) का अलग अलग भाषा के अर्थ में भेद नहीं किया गया है.

इससे भी पहले सन् 1800 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासनकाल में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज बना. हमारे देश में वास्तव में आधुनिक काल में खुलने वाला यह पहला शिक्षण संस्थान था. इसके पहले कोई विश्वविद्यालय हमारे देश मे नहीं खुला था. कलकत्ता विश्विद्यालय इस देश का पहला आधुनिक विश्वविद्यालय है जिसकी नींव 1857 में पड़ी थी.  फोर्ट विलियम कॉलेज में जो हिन्दी विभाग खुला था वह वास्तव में हिन्दुस्तानी विभाग था. जॉन गिलक्रिस्ट वास्तव में वहाँ हिन्दुस्तानी के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए थे, हिन्दी के नहीं. जॉन गिलक्रिस्ट की एक व्याकरण की पुस्तक प्रकाशित है जिसका नाम है ‘कवानीन सर्फ़ व नह्व हिन्दी’. पुस्तक में अंग्रेजी में लिखा है ‘रूल्स आफ हिन्दी ग्रामर’. वास्तव में उस समय हिन्दवी, हिन्दुई और हिन्दुस्तानी एक ही भाषा के लिए प्रयुक्त शब्द थे और उनमें केवल शैली भेद ही माना जाता था. एक ओर उर्दू के प्रख्यात आलोचक गोपीचंद नारंग को अमीर खुसरो ( 1255-1325) की कविताओं के संकलन का नाम ‘अमीर खुसरो का हिन्दवी काव्य’ रखना पड़ा तो दूसरी ओर नासिख ( 1757-1838 ), सौदा ( 1713-1780 ) और मीर तकी मीर ( 1725-1810 ) आदि ने अनेक बार अपने शेरों को ‘हिन्दी शेर’ कहा है. मिर्जा गॉलिब ने अपने खतों में उर्दू, हिन्दी तथा रेख्ताँ को  कई स्थलों पर समानार्थी शब्दों के रूप में प्रयुक्त किया है. मीर का एक मशहूर शेर है,

“क्या जानूं लोग कहते हैं किसको सरूरे कल्ब
आया नहीं है लब्ज ये हिन्दी जबाँ के बीच.”

बहरहाल, जॉन गिलक्रिस्ट के अनुसार उस समय हिन्दुस्तानी की तीन शैलियाँ प्रचलित थीं-     1. फारसी या दरबारी शैली 2. हिन्दुस्तानी शैली और 3. हिन्दवी शैली.  गिलक्रिस्ट दरबारी या फारसी शैली को आभिजात्य वर्ग में प्रचलित दुरूह मानते थे और हिन्दवी शैली को वल्गर यानी गँवारू. उनकी दृष्टि में हिन्दुस्तानी ही “द ग्रेंड पापुलर स्पीच ऑफ हिन्दुस्तान” थी.

आगे चलकर इसी हिन्दुस्तानी की लड़ाई राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द ( 1823-1895 ) ने भी लड़ी. वे अत्यंत सूझ-बूझ वाले व्यक्ति थे. कचहरियों में उस समय फारसी लिपि प्रचलित थी. वे हिन्दी और उर्दू मे भेद नही मानते थे और कचहरियों के लिए एक सर्वमान्य भाषा के प्रयोग के पक्षधर थे जिसे उन्होंने “आमफहम और खास पसंद” भाषा कहा है. इसे वे भी ‘हिन्दुस्तानी’ कहते थे. वक्त की नजाकत को परखते हुए उन्होंने संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी तथा ठेठ हिन्दी आदि सभी भाषाओं में प्रचलितत आम बोल- चाल के शब्दों से परहेज न करते हुए एक सर्वमान्य भाषा बनाने की चेष्टा उन्होंने की. ‘वामा मन रंजन’, ‘राजा भोज का सपना’, ‘भूगोल हस्तामलक’, ‘इतिहासतिमिर नाशक’, ‘कुछ बयान अपनी जबान का’, आदि उनकी कृतियों में इसी तरह की भाषा का प्रयोग किया गया है.   निस्संदेह उन्होंने हिन्दी के गंवरपन को भी दूर करने की चेष्टा की. किन्तु उनकी मुख्य लड़ाई देवनागरी लिपि के लिए थी. वे कचहरियों के लिए फारसी लिपि की जगह देवनागरी लिपि के लिए कई मेमोरेंडम दिए, जिनमें माँग की कि अदालतों की भाषा से फारसी लिपि को हटा लिया जाय और उसकी जगह हिन्दी ( लिपि) को लागू किया जाय. 1837 ईं. मे हिन्दी और देवनागरी लिपि को कचहरियों में जो प्रतिष्ठा मिली उसमें राजा शिव प्रसाद की प्रमुख भूमिका थी. किन्तु इतिहास में उन्हें खलनायक की तरह चित्रित किया गया है और उनका ऐसा चरित्र निर्मित करने में भारतेन्दु और उनके मंडल की प्रमुख भूमिका थी. भारतेन्दु मंडल के लेखकों ने आरोप लगाया कि वे “देवनागरी में खालिस उर्दू” लिखते हैं सितारेहिंद का खिताब मिलने पर उन्हें अंग्रेजों का चापलूस कहा गया जबकि भारतेन्दु ने स्वयं लार्ड रिपन की प्रशंसा में ‘रिपनाष्टक’ लिखा.

       पता नहीं, गाँधी जी को हिन्दुस्तानी के इस इतिहास की जानकारी थी या नहीं, किन्तु अपने अनुभवों से वे भली- भाँति समझ चुके थे कि इस देश की एकता को कायम रखने में हिन्दुस्तानी बड़ी भूमिका अदा कर सकती है और इसी में निर्विवाद रूप से इस देश की राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता है.

उनके प्रयास से 1925 में संपन्न हुए कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में प्रस्ताव पास हुआ कि उस तिथि से कांग्रेस की सारी कार्यवाहियाँ हिन्दुस्तानी में होंगी और इस प्रस्ताव के साथ वे आजावन सख्ती के साथ जुड़े रहे. गाँधीजी ने हिन्दुस्तान के नेताओं को हिन्दी बोलना सिखाया. हम ऊपर कह चुके हैं कि  गाँधी जी हिन्दी और हिन्दुस्तानी में कोई अन्तर नहीं मानते थे.  हिन्दी भाषा के स्वरूप की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा है, “हिन्दी भाषा मैं उसे कहता हूँ, जिसे उत्तर में हिन्दू और मुसलमान बोलते हैं और देवनागरी या फारसी (उर्दू) लिपि में लिखते हैं. ऐसी दलील दी जाती है कि हिन्दी और उर्दू दो अलग -अलग भाषाएं हैं. यह दलील सही नहीं है. उत्तर भारत में मुसलमान और हिन्दू एक ही भाषा बोलते हैं. भेद पढ़े लिखे लोगों ने डाला है……. मैं उत्तर में रहा हूँ, हिन्दू मुसलमानों के साथ खूब मिला जुला हूँ और मेरा हिन्दी भाषा का ज्ञान बहुत कम होने पर भी मुझे उन लोगों के साथ व्यवहार रखने में जरा भी कठिनाई नहीं हुई है. जिस भाषा को उत्तरी भारत में आम लोग बोलते हैं, उसे चाहे उर्दू कहें चाहे हिन्दी, दोनो एक ही भाषा की सूचक है. यदि उसे फारसी लिपि में लिखें तो वह उर्दू भाषा के नाम से पहचानी जाएगी और नागरी में लिखें तो वह हिन्दी कहलाएगी.” ( सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, खण्ड- 10, पृष्ठ-29 ) . बाद में जब हिन्दी और उर्दू का कृत्रिम भेद गहराया और उसे मजहबी रंग दिया जाने लगा तो उन्होंने हिन्दुस्तानी के पक्ष में दलील देनी शुरू की.

राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन से इसी मुद्दे को लेकर उनका विवाद चला और लम्बे पत्राचार के बाद  हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. इन सारे विवादों के पीछे की राजनीति का विश्लेषण करते हुए काका साहब कालेलकर ने लिखा है, “ हिन्दी का प्रचार करते हम इतना देख सके कि, हिन्दी साहित्य सम्मेलन को उर्दू से लड़कर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना है और गाँधी जी को तो उर्दू से जरूरी समझौता करके हिन्दू-मुस्लिमों की सम्मिलित शक्ति के द्वारा अंग्रेजी को हटाकर उस स्थान पर हिन्दी को बिठाना था. इन दो दृष्टियों के बीच जो खींचातानी चली, वही है गाँधीयुग के राष्ट्रभाषा प्रचार के इतिहास का सार.” ( हिन्दी : मत अभिमत, विमलेशकान्ति वर्मा, पृष्ठ-165)

 खेद है कि संविधान सभा में होने वाली बहस के पहले ही गाँधी जी की हत्या हो गई.  देश का विभाजन भी हो गया था और पाकिस्तान ने अपने देश की राष्ट्रभाषा उर्दू को घोषित कर दिया था. इन परिस्थितियों का गंभीर प्रभाव संविधान सभा की बहसों और होने वाले निर्णयों पर पड़ा. हिन्दुस्तानी और हिन्दी को लेकर सदन दो हिस्सों मे बंट गया. गाँधी जी के निष्ठावान अनुयायी जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित दक्षिण के डॉ. पी. सुब्बारायन, टी.टी. कृष्णामाचारी, टी.ए. रामलिंगम चेट्टियार, एन. जी. रंगा, एन. गोपालस्वामी आयंगर, एस. बी. कृष्णमूर्ति राव, काजी सैयद करीमुद्दीन, जी. दुर्गाबाई आदि ने हिन्दुस्तानी का समर्थन किया तो दूसरी ओर राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, सेठ गोबिन्द दास, रविशंकर शुक्ल, अलगूराय शास्त्री, सम्पूर्णानंद, के. एम. मुँशी आदि ने हिन्दी का. बहुमत हिन्दी के पक्ष में था और संविधान सभा ने प्रचंड विरोध के बावजूद देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को संघ की राजभाषा तय कर दिया.

आज सत्तर वर्ष बाद जब हम संविधान सभा के उक्त निर्णय के प्रभाव का मूल्यांकन करते हैं तो हमें  लगता है कि हिन्दी को इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. दक्षिण के हिन्दी विरोध का मुख्य कारण यही है. जो लोग पहले गाँधी जी के प्रभाव में आकर हिन्दी का प्रचार कर रहे थे वे ही बाद में हिन्दी के विरोधी हो गए और हिन्दी विरोध का नेतृत्व करने लगे. इतना ही नहीं, हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा न देकर उसे राजभाषा तक सीमित करने के पीछे भी अहिन्दी भाषी सदस्यों की यही नाराजगी काम कर रही थी. संविधान सभा में होने वाली बहसों को पलटकर देखने पर तो यही लगता है. हमें नहीं  भूलना चाहिए कि गाँधी जी के प्रभाव और प्रयास का ही फल था कि दक्षिण में ब्यापक रूप से हिन्दी का प्रचार हुआ. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने मद्रास प्रेसीडेंसी का मुख्यमंत्री रहते हुए 1937 में ही दक्षिण में हिन्दी अनिवार्य कर दिया था. विरोध होने पर विरोधियों के लिए क्रिमिनल लॉ लागू करने में भी संकोच नहीं किया और हजारों विरोधियों को जेल में डाल दिया था. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी गाँधी जी के समधी थे. गाँधी जी के सुपुत्र देवदास गाँधी की शादी सी. राजगोपालाचारी की बेटी से उसी दौर में हुई थी जब देवदास गाँधी हिन्दी का प्रचार करने दक्षिण गए थे.

गाँधी जी के हिन्दी- प्रचार और प्रभाव से संबंधित एक संस्मरण का मैं यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा. यह संस्मरण प्रख्यात हिन्दी लेखक बालशौरि रेड्डी से संबंधित है. मेरे पूछने पर कि उन्होंने हिन्दी कैसे सीखी क्योंकि उनकी शिक्षा तो उत्तर भारत में हुई नहीं है. उन्होंने एक बात- चीत में मुझे बताया कि जब वे बहुत छोटे थे तो गाँधी जी उनके क्षेत्र में आए हे थे और लोगों में चर्चा थी कि वे पाँच रूपए लेकर अपना आटोग्राफ दे रहे हैं. बालक बाल शौरि ने भी कुछ पैसे इकट्ठे किए थे और पाँच रूपए होने पर उसे लेकर गाँधी जी के पास गए. गाँधी जी ने हस्ताक्षर कर दिया. हस्ताक्षर उनकी समक्ष में नहीं आया क्योंकि वह हिन्दी में था. किसी हिन्दी के जानकार को दिखाने पर पता चला कि उन्होंने हस्ताक्षर में मो. क. गाँधी लिख दिया था. उनके उस हिन्दी के हस्ताक्षर का बालक बाल शौरि के मन पर इतना गहरा असर पड़ा कि उन्होंने तय कर लिया कि जिस भाषा में महात्मा गाँधी हस्ताक्षर करते हैं वे उस भाषा को अवश्य सीखेंगे और वही प्रेम उन्हे हिन्दी का रचनाकार बना दिया. बालशौरि रेड्डी का सारा जीवन हिन्दी को समर्पित हो गया. हिन्दी के प्रति गाँधी जी के समर्पण और उनके प्रभाव का यह एक उदाहरण है. ऐसी दशा में गाँधीजी के प्रस्ताव के विपरीत यदि कोई प्रस्ताव आता है तो दक्षिण भारत के गाँधी जी के अनुयायियों से भला समर्थन की उम्मीद कैसे की जा सकती है ?

 गाँधी जी की प्रख्यात अनुयायी श्रीमती जी. दुर्गाबाई,  जिनकी कानून की शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हुई थी, मद्रास हाई कोर्ट की वकील थीं, आन्ध्र महिला सभा की सचिव थीं और जिन्होंने कोकानाड़ा में महिला हिन्दी विद्यालय की स्थापना किया था, ने तो सदन में इस ओर स्पष्ट संकेत किया था. मैं उनके वक्तव्य का कुछ अंश यहाँ उद्धृत करना चाहता हूँ, “श्री मान् भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी के अतिरिक्त, जो हिन्दी तथा उर्दू का योग है, कुछ और नहीं होनी चाहिए और कुछ हो भी नहीं सकती. ……. कदाचित टंडन जी, सेठ गोविन्द दास जी आदि नहीं जानते और उन्हें पता नहीं है कि दक्षिण में हिन्दी भाषा का कितना प्रबल विरोध हुआ है. विरोधी यह समझते हैं, शायद ठीक ही समझते है कि यह हिन्दी के पक्ष का आन्दोलन प्रान्तीय भाषाओं की जड़ खोदता है और यह प्रान्तीय भाषाओं और प्रान्तीय संस्कृति के विकास के लिए गंभीर बाधा है. श्रीमान्, दक्षिण में हिन्दी विरोधी आन्दोलन बहुत प्रबल है. मेरे मित्र, डॉ. सुब्बारायन ने इस विषय में कल विस्तृत बातें बताई थीं. किन्तु हमने, हिन्दी के समर्थकों ने क्या किया ? हमने विकट आन्दोलन का सामना किया और दक्षिण में हिन्दी का प्रचार किया. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पंडितों ने भारत की राष्ट्रभाषा बनाने की आवश्यकता समझी, उससे बहुत पहले हम दाक्षिणात्यों ने महात्मा गाँधी के आदेश का पालन किया और दक्षिण में हिन्दी प्रचार आरंभ किया था. हमने पाठशालाएँ चालू कीं और कक्षाएँ आरंभ की. इस प्रकार बहुत असुविधा से हम हिन्दी के प्रचार और शिक्षा में बहुत पहले ही लग गए थे.

श्रीमान्, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के प्रयत्नों के अतिरिक्त, मुझे इस संबंध में दक्षिण की स्त्रियों और बच्चों की भूरि भूरि प्रशंसा करनी चाहिए कि वे हिन्दी सीखने में बहुत लगन से और सच्चे दिल से लगे रहे. श्रीमान्, गाँधी जी के प्रयत्नों और प्रभाव से महाविद्यालयों के विद्यार्थियों में ऐसा जोश था कि दिन भर महाविद्यालयों में कठोर श्रम करने के पश्चात् वे इस भाषा को सीखने के लिए सायंकाल हिन्दी कक्षाओं में आते थे. केवल विद्यार्थी ही नही, वकील, न्यायालय के समय के पश्चात्, पदाधिकारी  अपने कार्यालय के कार्य की समाप्ति के पश्चात, सायंकाल में मनोरंजन के स्थानों कर न जाकर हिन्दी कक्षाओं में आकर हिन्दी सीखते थे. मैं आप को यह बात इसलिए कह रही हूँ कि मैं यह सिद्ध करना चाहती हूँ कि हमने महात्मा गाँधी के आदेश और अनुरोध पर हिन्दी प्रचार का कार्य कितने सच्चे दिल से और ईमानदारी से आरंभ किया था.

मेरे मित्रों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह सब कुछ हमने राष्ट्रीय भावनाओं को पूरा करने के लिए स्वेच्छा से किया था.  इस संबंध में मैं सेठ जमनालाल बजाज द्वारा 1923 में वहाँ जाने का निर्देश करना चाहती हूँ. उस वर्ष जब सेठ जी काँग्रेस सत्र के लिए कोकीनाड़ा गए थे तब वे कुछ महिला संस्थाओं को देखने गए थे और उन्होंने वहाँ सैकड़ों महिलाओं को हिन्दी पढ़ते देखा था. याद रखिए, श्रीमान् यह बात 1923 की है. सेठ जी महिलाओं को हिन्दी सीखते देख कर इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उस संस्था को एक महान राशि दान देनी चाही. पर संस्था ने उस दान को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि “ हम भी यह अनुभव करते हैं कि हमारी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए. अत: हम अपने ही प्रयत्नों से इस पाठशाला को चला रहे हैं. “ हमने इसी भावना से कार्य किया था.

अब इसका परिणाम क्या है ? अब मुझे आश्चर्य है कि हमने इस शताब्दी के आरंभ में जिस जोश के साथ हिन्दी अपनायी थी, उसके विरुद्ध इतना आन्दोलन हो रहा है. श्रीमान्, अहिन्दी भाषी लोगों की भावनाओं में कटुता लाने का कारण आप का यह दृष्टिकोण है कि आप शुद्धत: एक प्रान्तीय भाषा को राष्ट्रीय रूप देना चाहते हैं. मुझे भय है कि इससे निश्चय ही उनके भावों और भावनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ेगा, जिन्होंने पहले ही देवनागरी लिपि में हिन्दी को स्वीकार कर लिया है. संक्षेप में उनके इस अत्यधिक और कुप्रयुक्त प्रचार के कारण मेरे समान लोगों का समर्थन भी अब प्राप्त नहीं रहा जो हिन्दी जानते हैं और हिन्दी के समर्थक हैं.

मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि राष्ट्रीय एकता के हितार्थ हिन्दुस्तानी ही भारत की राष्ट्रभाषा बन सकती है. “ ( उद्धृत, हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक, विमलेश कान्ति वर्मा, पृष्ठ-335)

पंजाब के सरदार हुकुम सिंह ने अपना पक्ष रखते हे कहा, “ विभाजन से पूर्व उर्दू और हिन्दी में राष्ट्रभाषा बनने के लिए द्वंद्व था. यदि मैं यह कह दूँ तो ये दो कट्टरताएं थीं. उर्दू में फारसी और अरबी में से शब्द लिए जाते थे और हिन्दी में संस्कृत से. अत: दोनो में विरोध था. मेरा तो यह विश्वास है कि इसी कारण एक सामान्य भाषा बनाने का प्रयत्न किया गया था और उसका नाम हिन्दुस्तानी रखा गया था. फिर हमारे कुछ सदस्यों तथा बाहर के लोगों के मन में आशंका थी कि हिन्दुस्तानी शायद उर्दू का ही  दूसरा नाम होगा. मेरी तुच्छ सम्मति में यह आशंका अब नहीं रही. विभाजन के पश्चात ऐसी कोई संभावना नहीं है कि हम जो भाषा स्वीकार करेंगे, वह इतनी अबाध रूप से फारसी और अरबी से शब्द लेगी.  हाँ, उनसे शब्द लेने का वर्जन नहीं होगा, किन्तु अब ऐसी कोई आशंका नहीं है कि वे मुख्य स्रोत रहेंगे. किन्तु यह आशंका हट जाए तो दूसरी आशंका है, उस भाषा के फारसीनिष्ठ या अरबीनिष्ठ बनने का भय नहीं है तो दूसरा भय है कि उस भाषा का नाम हिन्दी रख दिया जाय पर वह संस्कृनिष्ठ हो. अत: हम इस भय को भी दूर कर देना चाहते हैं और ऐसा हम तब कर सकते हैं जब हम अपनी भाषा को हिन्दुस्तानी कहें, जिसे हमारे अधिकाँश लोग समझ सकें, और हिन्दी न कहें जिसमें उपर्युक्त भय है. इसी कारण मैने प्रस्ताव किया है कि वह हिन्दुस्तानी हो.” ( उद्धृत, हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक, विमलेश कान्ति वर्मा, पृष्ठ-353)

संविधान सभा में बहस करते हुए काजी सैयद करीमुद्दीन ने कहा, “ सन् 1947 में इंडियन नेशनल काँग्रेस ने यह कबूल किया था कि हिन्दुस्तान की जबान हिन्दुस्तानी होगी जिसके दोनो उर्दू और देवनागरी रसमुलखत होंगे लेकिन आज यह फरमाया जाता है कि सिर्फ देवनागरी रसमुलखत होगा. उसकी वजह यह है जैसे कि मैं बता चुका हूं सन् 47 के पार्टीशन के बाद पाकिस्तान ने अपनी नेशनल ज़बान  उर्दू होने का ऐलान किया और उसी के रिएक्शन की वजह से आज यहाँ हिन्दुस्तान में हिन्दी और देवनागरी रसमुलखत मुकर्रर किया जा रहा है. “ ( उद्धृत, हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक, विमलेश कान्ति वर्मा, पृष्ठ-231 ) और अगले दिन अर्थात 14 सितंबर को मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा, “ आज से तकरीबन पच्चीस वर्ष पहले जब यह सवाल आल इंडिया काँग्रेस कमेटी के सामने आया था तो मेरी ही तजबीज से उसने हिन्दुस्तानी का नाम इख्तयार किया था. मकसद् यह था कि ज़बान के बारे में तंगख्याली से काम न लें. ज्यादा से ज्यादा वसीह मैदान पैदा कर दें. हिन्दुस्तानी का लफ्ज इख्तयार करके हमने हिन्दी और उर्दू के इख्तेलाफ को भी दूर कर दिया था. क्योंकि जब आसान उर्दू और आसान हिन्दी बोलने और लिखने की कोशिश की जाती है तो दोनो मिलकर एक जबान  हो जाती हैं. तब उर्दू और हिन्दी का फर्क बाकी नहीं रहता. “ ( उद्धृत, हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक, विमलेश कान्ति वर्मा, पृष्ठ-387)  मोहम्मद इस्माईल ने गाँधी जी को उद्धृत करते हुए कहा कि “ भारत के करोड़ो ग्रामीणों को पुस्तकों से कोई मतलब नहीं है. वे हिन्दुस्तानी बोलते हैं जिसे मुस्लिम उर्दू लिपि में लिखते हैं तथा हिन्दू उर्दू लिपि या नागरी लिपि में लिखते हैं. अतएव मेरे और आप जैसे लोगों का कर्तव्य है कि दोनो लिपियों को सीखें.” उद्धृत, उपर्युक्त, ).

कथा सम्राट मुँशी प्रेमचंद तो पहले उर्दू में ही लिखते थे और बाद में हिन्दी में आए. हिन्दी और उर्दू को लेकर उन्होंने ‘साहित्य का उद्देश्य’ नामक अपने मशहूर निबंध मे लिखा है., “ उर्दू वह हिन्दुस्तानी जबान है जिसमें फारसी- अरबी के लब्ज ज्यादा हों, उसी तरह हिन्दी वह हिन्दुस्तानी है  जिसमें संस्कृत के शब्द ज्यादा हों, लेकिन जिस तरह अंग्रेजी में चाहे लैटिन या ग्रीक शब्द अधिक हों या ऐंग्लोसेक्सन, दोनो ही अंग्रेजी है, उसी भाँति हिन्दुस्तानी भी अन्य भाषाओं के शब्दों के मिल जाने से  कोई भिन्न भाषा नहीं हो जाती.” ( साहित्य का उद्देश्य, पृष्ठ- 124)) 

 हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर गाँधी जी और राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन के बीच लम्बे समय तक विवाद चलता रहा और पत्र व्यवहार होता रहा किन्तु राजर्षि टण्डन अपने हिन्दी के एजेन्डे से चिपके रहे और अंतत: गाँधी जी को इसी मुद्दे को लेकर हिन्दी साहित्य सम्मेलन से त्याग पत्र देना पड़ा.

राजर्षि टण्डन ने स्वयं स्वीकार किया है, “ राष्ट्रपिता के निर्देश के अंतर्गत, जिनका नाम हमारे हृदय की भावतंत्री को सदा ध्वनित करता रहेगा, हिन्दी का कार्य दक्षिण भारत में 1918 में आरंभ हुआ था और इस कालावधि में लाखों नर-नारियों ने हिन्दी सीख ली है और जैसा कि मेरे मित्र मोटूरि सत्यनारायण, जो यहाँ बैठे हैं, आप को अच्छी तरह बता सकते हैं, प्रतिवर्ष लगभग पचपन-साठ सहस्र परीक्षार्थी दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की परीक्षाओं में बैठते हैं जिसका नाम हाल ही में हिन्दुस्तानी प्रचार सभा रख दिया गया है.” ( 14 सितंबर को संविधान सभा की बैठक में. )

वैसे भी हिन्दुस्तानी कहने से जिस तरह व्यापक राष्ट्रीयता और सामाजिक समरता का बोध होता है उस तरह हिन्दी कहने से नहीं. जैसे पंजाबियों की पंजाबी, मराठियों की मराठी, बंगालियों की बंगाली, तमिलों की तमिल, गुजरातियों की गुजराती का बोध होता है उसी तरह हिन्दुस्तानी कहने से हिन्दुस्तानियों की हिन्दुस्तानी का बोध होता है. इस शब्द में न तो क्षेत्रीयता की गंध है और न जाति-धर्म की संकीर्णता की. निश्चित रूप से हिन्दुस्तानी की जगह हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल थी और इतिहास की इस भूल का भयंकर दुष्परिणाम आज भी हम झेल रहे है. मुजफ्फर रज्मी ने कहा है,

“ ये जब्र भी देखे हैं तारीख की नजरों ने,
लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई.”

इस ऐतिहासिक भूल का परिणाम हम आज भी भुगत रहे हैं. हिन्दी आज भी दक्षिण का ही नही, भारत के दूसरे हिस्से के लोगों का भी विरोध झेल रही है. बल्कि आज तो हिन्दी वाले ही हिन्दी का सबसे बड़े दुश्मन बन बैठे हैं.

भाषा के साथ लिपि का प्रश्न भी अनिवार्यत: जुड़ा हुआ है. हिन्दी और उर्दू के स्वरूप को लेकर जितनी लड़ाई लड़ी गई उतनी ही लड़ाई इसकी लिपि को लेकर भी लड़ी गई है. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ही राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद जैसे मनीषियों ने घोषित किया कि हिन्दी और उर्दू दो भाषा नहीं हैं अपितु एक ही भाषा है और लिखी दो लिपियों में जाती है. इसलिए उन्होंने कचहरियों में हिन्दी भाषा के लिए नहीं, बल्कि देवनागरी लिपि को लागू करने के लिए लड़ाई लड़ी और भाषा को हिन्दी या उर्दू की जगह हिन्दुस्तानी कहना मुनासिब समझा. आगे चलकर देवनागरी लिपि की प्रतिष्ठा के लिए हिन्दी भाषियों के अलावा आचार्य बिनोवा भावे, काका साहब कालेलकर, जस्टिस शारदाचरण मित्र और वी. कृष्णस्वामी अय्यर जैसे गुजराती, मराठी, बंगाली और तमिल भाषी विद्वानों ने भी बढ़- चढ़ कर हिस्सा लिया.

जस्टिस शारदा चरण मित्र कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे. उन्होंने 1905 ई. में ‘एक लिपि विस्तार परिषद्’ की स्थापना की थी और उसकी ओर से ‘देवनागर’ नामक पत्र निकाला था. इस पत्र के संपादक थे यशोदानंदन अखौरी. यह मासिक पत्र कुछ व्यवधानों के साथ 1917 ई. तक प्रकाशित होता रहा. यह एक अनोखा प्रयोग था. इसमें सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं की रचनाएँ देवनागरी लिपि में लिप्यन्तरित होकर प्रकाशित होती थीं. ‘देवनागर’ के पहले ही अंक में उसके उद्देश्यों की घोषणा करते हुए कहा गया है, “ इस पत्र का उद्देश्य है भारत में एक लिपि का प्रचार बढ़ाना और वह लिपि है देवनागराक्षर …. देवनागर का व्यवहार चलने में किसी प्रान्त के निवासी का अपनी लिपि वा भाषा के साथ स्नेह कम नहीं पड़ सकता. हाँ, यह अवश्य है कि अपने परिमित मण्डल को बढ़ाना पड़ेगा.” ( उद्धृत, भाषा विमर्श, वर्ष -5, अंक -5, मई 2005, पृष्ठ-7)

इसी तरह आचार्य विनोबा भावे ने लिखा है, “ हिन्दुस्तान की एकता के लिए हिन्दी भाषा जितनी काम देगी, उससे बहुत ज्यादा काम देवनागरी लिपि देगी. इसलिए मैं चाहता हूं कि हिन्दुस्तान  की समस्त भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाएँ. नागरी लिपि सब भाषाओं में चले- इसका मतलब दूसरी लिपियों  का निषेध नहीं है, दोनो लिपियाँ चलेंगी.” ( देवनागरी विश्वनागरी बने, शीर्षक लेख से, भाषा की अस्मिता और हिन्दी का वैश्विक संदर्भ, में उद्धृत, पृष्ठ -429)

नागरी लिपि परिषद् जैसी संस्था आज भी नागरी की प्रतिष्ठा के लिए संघर्षरत है.

-ईई-164 / 402, सेक्टर -2, साल्टलेक, कोलकाता-700091 
ई-मेल: amaranth.cu@gmail.com  Mobile: 09433009898

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