बेहतर समाज: अब नहीं तो कब? – राजेंद्र चौधरी

इस अवसर पर परिवर्तन के प्रति आशावान होने के कुछ विशेष कारण भी हैं. वर्तमान व्यवस्था कि कई कमज़ोरियाँ जो दबी ढकी थी, वो उघड कर सामने आ गई हैं, सब से बड़ी बात तो यह है कि बहुत बड़े पैमाने पर देश की जनता के पास कोई आर्थिक सुरक्षा और बचत नहीं है, उन की कमाई बमुश्किल इतनी है कि रोज़ कमाते हैं और खाते हैं. और जिन के पास चंद दिनों की तालाबंदी सहन करने की ताकत नहीं है, बुढ़ापा और बीमारी तो उन को भी आती होगी, तब क्या होता होगा इनका, यह सोच कर भी डर लगता है.

इस में कोई दो राय नहीं हैं कि करोना के बाद की दुनिया, करोना से पहले की दुनिया से काफी अलग होगी, बल्कि अलग हो गयी है. समाज बदला है एवं और भी बदलेगा तो ज़रूर. बदलाव कि दिशा न तो पूर्वनिर्धारित या निश्चित है और न ही यह पूरी तरह से हमारी इच्छा से तय हो सकती.  पर हम इस की दिशा को प्रभावित करने की कोशिश तो ज़रूर कर सकते हैं.  और अगर अब भी प्रभावित नहीं कर सकेंगे तो समाज को कब प्रभावित कर सकेंगे? आपदा काल में पहले के ढांचे टूट जाते हैं या कमज़ोर पड़ जाते हैं.  इस लिये पुनर्निर्माण तो होता ही है और निर्माण का समय नई दिशा, नया स्वरूप लेने का मौका हमेशा देता है. 

इन सर्वकालीन कारणों के अलावा इस अवसर पर परिवर्तन के प्रति आशावान होने के कुछ विशेष कारण भी हैं. वर्तमान व्यवस्था कि कई कमज़ोरियाँ जो दबी ढकी थी, वो उघड कर सामने आ गई हैं, अब इन को लोगों को दिखाने में कुछ कम मेहनत लगेगी. उघड़ कर सामने आ गई सब से बड़ी बात तो यह है कि बहुत बड़े पैमाने पर देश की जनता के पास कोई आर्थिक सुरक्षा और बचत नहीं है, उन की कमाई बमुश्किल इतनी है कि रोज़ कमाते हैं और खाते हैं. और जिन के पास चंद दिनों की तालाबंदी सहन करने की ताकत नहीं है, बुढ़ापा और बीमारी तो उन को भी आती होगी, तब क्या होता होगा इनका, यह सोच कर भी डर लगता है. 

जितनी स्पष्ट यह बात हुई है कि देश की बड़ी आबादी आर्थिक रूप से इतनी विकलांग है, और यह विकलांगता इस के बावज़ूद है कि इन का बड़ा हिस्सा कामकाजी है, काम करने के लिए अपना घर-द्वार छोड़ कर वहाँ रह रहा है, जहाँ न इन की भाषा है न भोजन और न सम्मान, उतना ही स्पष्ट यह हुआ है कि हमारी व्यवस्था इस बड़ी आबादी के प्रति बिलकुल लापरवाह है, ये आँखों के सामने हैं पर फिर भी अदृश्य हैं.  अगर ऐसा न होता, तो क्या बिना किसी व्यवस्था के, एकायक तालाबंदी होती जैसे कि उसी दिन करोना का पता चला हो? क्या प्रधान मंत्री/मुख्य मंत्री मात्र इतना कह कर काम चला लेते कि इन को नौकरी से न निकालना? क्या इन के खाने-पीने-रहने की व्यवस्था दानियों के भरोसे छोड़ी जाती?  इस के साथ तीसरी बात यह स्पष्ट हुई है कि इस बड़ी आबादी का सरकार और व्यवस्था में कोई विश्वास नहीं है. अगर विश्वास होता तो इतने बड़े पैमाने पर छोटे बच्चों और बूढों को लेकर सैंकड़ों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल न निकल पड़ते लोग. 

एक चौथी बात भी स्पष्ट हुई है; आँखों के सामने होते हुए भी इन सच्चाइयों को झुठलाने की कोशिश, इन्हें फिर से अदृश्य बनाने की कोशिश बड़े पैमाने पर जारी रहेंगी; अफवाह या झूठी खबर केवल झूठी खबर नहीं है, यह एक सचेत कोशिश है बरगलाने की. यह केवल गलतफहमी नहीं है (कुछ लोगों द्वारा पड़ोसी स्वधर्मी डाक्टर नर्स को निकल जाने की बात कहना अज्ञानता के कारण हो सकता है पर यह अपवाद ही रहा है), अपितु जानबूझ कर की गई कोशिश है क्योंकि वीडियो अपने आप नहीं बदलते, ये बदले जाते हैं.  इस लिए अफवाहें फैलती नहीं है, फैलाई जाती हैं. यह और बात है कि ज़्यादातर लोग अनचाहे इस के वाहक बन जाते हैं पर कोई तो होता है जो जानबूझ कर इन को फैलाता है. और बड़े पैमाने पर झूठी खबर फ़ैलाने वाला कोई छोटा मोटा आम आदमी नहीं होता; न आम आदमी को इतनी फुरसत और न उस की वायरल करने की क्षमता; आम तौर पर ये बड़े लोगों के या संगठित प्रयास ही होते हैं. .  

पांचवी  बात जो स्पष्ट हुई है वह यह है कि समाज की, सामूहिक व्यवस्था की, सरकार की हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है; केवल चोर-उच्चकों से बचाने के लिए ही नहीं अपितु सुख-दुःख में भी.  बिना उच्च स्तरीय सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं, शोध संस्थाओं, आर्थिक एवं अन्य संसाधनों के, समायोजित प्रयासों के और भरोसे मंद सूचना के, करोना का मुकाबला करने का सोचा भी नहीं जा सकता. जो आर्थिक रूप से संपन्न परिवार अपने आप में मस्त थे उन्हें भी शायद उच्च गुणवत्ता की, जवाबदेह, पारदर्शी राजनैतिक/प्रशासनिक/सामाजिक व्यवस्था की ज़रूरत एवं इस की कमी दोनों का अहसास अब हुआ होगा. 

ये पाँचों बातें, नई नहीं हैं, कम से कम जो लोग सामाजिक परिवर्तन-कामी हैं, उन के लिए तो बिल्कुल नहीं.  आम तौर पर ये छुपी रहती हैं पर आज ये उघड़ गई हैं. इन्हें फिर से ढकने की कोशिश ज़रूर होगी.  फिर भी दोबारा ढकने से पहले, जो इस से अनजान थे, उन के एक हिस्से ने तो ये हकीकत देख ही ली होगी एवं कुछ समय तक तो उस के मन-मस्तिष्क पर इस उघड़ी सच्चाई का असर रहेगा. इस के साथ ही जो सब से निचले पायदान का तबका, जो भुगत-भोगी है, उस को भी दोबारा से, बहुत बड़ी कीमत चुका कर, यह पता चल गया होगा कि इस व्यवस्था में उन की औकात क्या है, कितनी परवाह है यहाँ कि सरकारों को, यहाँ कि व्यवस्था को इन के सुख दुःख की. 

ये वर्तमान व्यवस्था की हकीकत का भुगत-भोगी एवं दूसरे दोनों के सामने उघड़ कर सामने आना मुख्य कारण है जो वर्तमान समय को बेहतर समाज बनाने के लिए थोडा, पर थोडा ही, आसान बनाते हैं. इस के आलावा भी कुछ और कारण हैं जो इस समय को सामाजिक परिवर्तन के लिए थोड़ा उपयुक्त बनाते हैं. एक तो, इस निम्न, पूरी तरह से आर्थिक रूप से असुरक्षित, तबके से ऊपर का जो तबका है (जिसे हम आम तौर पर मध्यवर्ग कह देते हैं पर जो अपने आप में बहुत विवधता और फैलाव लिए हुए है जिस की सूक्ष्म पड़ताल ज़रूरी है) जिस के सामने रोज़मर्रा की रोटी का संकट नहीं है, असुरक्षित तो उस ने भी महसूस किया है. उस के मन में भी वर्तमान व्यवस्था के प्रति संशय तो उठा ही होगा, चिंतित तो वो हुआ होगा. उस भी यह अहसास तो हुआ होगा कि केवल पैसा ही सब कुछ नहीं है; जीवन की ज़रूरी और गैर-ज़रूरी चीज़ों का फर्क तो उसे भी महसूस हुआ होगा.  खास तौर से जो युवा है, जिस के विचार अभी परिपक्कव/रूढ़ नहीं हुए हैं, उन का एक हिस्सा ज़रूर अपनी जीवन शैली के बारे में पुनर्विचार तो ज़रूर करेगा. यह हो सकता है, बल्कि ज़रूर होगा, कि समाज का एक हिस्सा संक्रमण से इतना डर जाए कि हमेशा के लिए सामजिक दूरी बनाए, लोगों से ही बचने लग जाए, घर से काम और आन लाइन पढाई पर केन्द्रित हो जाये, मेट्रो, ओला और उबर को भी छोड़ कर अपनी कार तक सीमित हो जाए लेकिन सारे तो ऐसे नहीं करेंगे. मानव नामक जानवर के विवेक पर कुछ भरोसा रखिये कुछ लोग तो ज़रूर होंगे जो जीवन को नई दृष्टि से देखेंगे. ये मौका है इन को साथ लेने का, इन को प्रभावित करने का. 

पर अगर हम सोचते हैं कि ये सब हमारे (पुराने) झंडे के नीचे आ जायेंगे,  तो ऐसा नहीं होगा. अगर हम ये सोचे कि हमारे पुराने प्रवचनों और ग्रंथों को पढ़ कर अब इन्हें वो समझ आ जायेंगे, तो बड़े पैमाने पर ऐसा नहीं होने वाला. जो भीड़ के साथ चलता है, उस की बात नहीं है, भीड़ के साथ चलने वाला तो वैसे भी आप के साथ नहीं आएगा, दूसरी कई दुकाने ज्यादा आकर्षक हैं और ये दूसरी दुकाने सर्वशक्तिमान निरंकार भगवान की हो सकती हैं या उन के अपने, अच्छे वाले, भगवान की हो सकती हैं या फिर सीधे सीधे हफ्ते में दुगने पैसे करने वालों सरीखी हो सकती हैं. समाज परिवर्तन के काम में तो वो आयेगा (और जो आ कर टिका रहेगा) जो विचारवान होगा; वो रेले के साथ नहीं आयेगा, वो सोच समझ कर, पड़ताल कर के आयेगा.  उस को हमें बिलकुल नए तरीके से समझाना होगा. मूल सिद्धांतों से सिखाना होगा. इस को स्पष्ट करने के लिए हम बीज गणित का एक उदहारण लेंगे. बीज गणित में अ + ब को अ + ब से गुणा करना सिखाने के दो तरीके होते हैं. एक तो अ + ब के वर्ग का सूत्र बता कर और एक होता है गुणा करना सिखा कर फिर सूत्र तक पहुँचाना.  मूल चीज़ है गुणा करना सीखना; सूत्र का विकास उस के बाद होता है. सीखने-सिखाने का यही अंतर सामाजिक क्षेत्र में भी लागू होता है. पर बुनियादी सिद्धांतों से सिखाने में समय और मेहनत ज़रूर ज्यादा लगती है. परन्तु इस से न केवल सीखना दीर्घकालीन हो जाता है अपितु सिखाने वाले को भी एक फ़ायदा होता है.  बुनियादी तरीकों से सिखाने पर खुद को भी नई नई बाते सीखने को मिल सकती हैं.

इस लिए, वर्तमान दौर का फ़ायदा उठा कर सामाजिक परिवर्तन के लिए तेजी से काम करने के लिए, तीन सावधानियां रखनी ज़रूरी हैं. बुनियादी समस्या केवल एक वायरस के संक्रमण की नहीं है; यह तो तात्कालिक समस्या है पर दो चुनौतियां और भी हैं. पहली बात तो यह कि भले ही यह वायरस कुदरती तौर पर फैला हो पर इस घटना ने प्रयोगशाला में विकसित कर के जानबूझ कर छोड़े गए या असावधानीवश छूट गए ऐसे किसी वायरस (या जीव या प्रजनन सक्षम बीज) के खतरों की संभावना को स्पष्ट कर दिया है.  पहले जो खतरा कल्पना लोक या कथा-कहानियों या फिल्मों में दिखता था, वो अब सामने आ खड़ा हुआ है. दूसरा, खतरा केवल कुदरत के साथ ऐसे अपवाद स्वरूप किये गए/हो गए खिलवाड़ का नहीं है, परन्तु कुदरत के साथ रोज़ रोज़ होते बलात्कार का है और उस के चलते पैदा हुए प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि का है. करोना वाइरस तो कुदरत के साथ हो रहे खिलवाड़ और उस के तुरत प्रभाव का एक नमूना भर है. दीर्घकालीन और धीमी गति से होने वाले बदलाव भी उतने ही ख़तरनाक हो सकते हैं. 

दूसरी बात यह ध्यान में रखने की है कि कुदरत के साथ यह खिलवाड़ इंसान ने किया है केवल पूंजीवाद ने नहीं. निश्चित तौर पर पूंजीवाद एवं निजी सम्पति हमारे सामूहिक और सांझे संसाधनों के प्रति बहुत ज्यादा गैरजिम्मेदाराना रुख अपनाती है पर ये काम केवल पूंजीवाद ने नहीं किया. दोबारा पैदा न किये जा सकने वाले प्राकृतिक संसाधनों, तेल, कोयला इत्यादि का दोहन केवल पूजीवादी देशों ने नहीं किया, प्रदूषण तथाकथित समाजवादी व्यवस्थाओं में भी हुआ है, होता है. और हर वो व्यक्ति, हर बार करता है, जब वह केवल फैशन, मनबहलाव या दिखावे के लिए उपभोग करता है, एक समय पर 20-20 जोड़ी कपड़े रखता है. इस लिए केवल पूंजीवाद की ही नहीं अपितु पूंजीवाद जनित, पूंजीवाद प्रोत्साहित जीवन शैली, पूंजीवाद द्वारा विकसित उत्पादन तकनीक की भी आलोचना/समालोचना करनी होगी. 

सवाल उठ सकता है कि जलवायु परिवर्तन सरीखे प्रभाव कितने गंभीर हैं? कहीं बढ़ा-चढ़ा कर तो नहीं कहा जा रहा?  गणितीय रूप से देखें तो संभावना तो दोनों तरह की हो सकती हैं; समस्या को बढ़ा चढ़ा कर भी कहा जा सकता है और उस को कम कर के भी आँका जा सकता है.  शुद्ध संभावनाओं के स्तर पर तो दोनों तरह की गलतियां हो सकती हैं और दोनों ओर निहित स्वार्थ हो सकते हैं.  पर करोना ने दिखा दिया है कि गणितीय संभावनाओं की बात और है, वास्तविक जीवन में ऐसे खतरों को कम कर के आंकलन करने की संभावना ज्यादा है क्योंकि इस के साथ ‘वर्तमान’ व्यवस्था की शक्तिशाली ताकतों के हित जुड़े होते हैं. इस लिए वास्तविक चुनौती केवल तत्कालीन करोना की नहीं है, प्रकृति के साथ लगातार होते खिलवाड़ की है. 

तीसरी बात जो यह ध्यान में रखनी होगी वो है दया और दान स्वरूप किसी को सहायता करना, किसी को कुछ देना और किसी के मानवाधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी निभाना, दोनों में बहुत अंतर है. अपना श्रम और समय लगा कर, अपनी कष्ट कमाई से, जिस पर सब तरह के करों और अन्य देनदारियों का पूरा पूरा भुगतान कर दिया गया हो, किसी की सहायता करना कोई छोटी बात नहीं है, सब ऐसा नहीं करते.  इस लिए जो ऐसा करते हैं उन का सम्मान होना चाहिए पर दान स्वरूप की गई ऐसी सहायता व्यक्ति के मानवीय अधिकारों की रक्षा का स्थान नहीं ले सकती, व्यवस्था-जनित सुरक्षा का स्थान नहीं ले सकती; जैसे दहेज़ में आर्थिक सहायता दे कर सहारा लगाना दहेज की प्रथा को ख़त्म करने की ज़रूरत का स्थान नहीं ले सकता. इसे फर्क को करोना के सन्दर्भ में भी देख सकते हैं.  प्रवासी मजदूरों को जिस ने जैसी सहायता उपलब्ध कराई वह स्वागत योग्य है पर क्या यह इन प्रवासी मजदूरों का हक़ नहीं है कि जब उन से काम के अवसर छीन लिए गए हैं, या छिन गए हैं, तो उन्हें जीवनयापन की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ. केवल पेट भरने को भोजन नहीं अपितु मच्छर या गर्मी सर्दी है तो उस का भी इलाज हो, हलवा पूरी न हो पर उन की पसंद का भोजन तो हो (हरियाणा से बाहर जा कर एक दिन भी रोटी के स्थान पर केवल चावल खाने को मिलने पर हरियाणा वालों का बुरा हाल होते कई लोगों ने देखा होगा/बहुतों का हुआ होगा.)  

सरकार अगर चाहे तो ये सब सुविधाएँ सहजता से उपलब्ध करा भी सकती है (और कई राज्यों में कराई भी हैं; इस लिए केरल से प्रवासी मजदूरों के शिविरों को छोड़ छोड़ कर भागने के समाचार नहीं सुनने को मिले) और सरकार से ये मांग भी की जा सकती है. परन्तु दान करने वाले से तो ये मांग नहीं की जा सकती;  दान की बछिया के दांत न गिनने की तो हमारे यहाँ प्राचीन काल से शिक्षा दी जाती रही है.  मानव अधिकार के नज़रिए से देखें तो अगर विदेश से भारतवासियों को देश में लाया जा सकता है तो देश के अन्दर अपने परिवारों से दूर छुट गए लोगों को क्यों उन के परिवार से नहीं मिलाया जा सकता. शिविरों में, एकांतवास में यहाँ रखा है ये काम उन के गाँव/घर जिले में भी हो सकता था (कैदी को भी आम तौर पर नज़दीक की जेल में रखते हैं!)  और अगर प्यार, सम्मान और सुविधापूर्वक रखते तो शायद अधिकाँश लोग वापिस जाते भी नहीं. और अब घर पहुँचाया जा रहा है तो भी शुरुआत कोटा में पढ़ने वाले बच्चों से हुई है फिर मजदूरों का नंबर आया है. 

इस लिए वंचित तबकों की जितनी तात्कालिक सहायता हम व्यक्तिगत/निजी स्तर पर हम कर सकते हैं, हमें ज़रूर करनी चाहिए पर हमारा मुख्य काम सरकार पर उन के मानव अधिकारों का सम्मान करते हुए जीवनयापन एवं जीवन को पुन: पटरी पर लाने की व्यवस्था करने का दबाव बनाने का होना चाहिए. हमारी निगाह में न केवल किसान-मजदूर शामिल हों पर छोटा दुकानदार या छोटा कारखानेदार भी हो. 

पिछली पंक्तियों में हमने ज़िक्र किया था कि वो तबका जिन के सामने समाज की सच्चाई अभी उघड़ी है, वो सहज तो आप के झंडे के नीचे आयेगा नहीं, इस का एक कारण यह भी है कि झंडे भी तो कई हैं.  न केवल रास्ते कई हैं पर शायद अंतिम लक्ष्य में भी थोड़े बहुत फर्क हैं. इस लिए यह आशा नहीं कर सकते कि सब कुछ भूल कर सभी एक झंडे के नीचे तुरंत आ जायेंगे. आज़ादी की लड़ाई में ये काम नहीं हुआ, तो अब कैसे हो जाएगा. सूक्ष्म लक्ष्य के, समझ के, रणनीति के अंतर रहेंगे, हमारे चाहने मात्र से, एकता की ज़रूरत मात्र से, ये अंतर ख़त्म नहीं हो जायेंगे. पर क्या ऐसा संभव नहीं है कि इन मतभेदों के बावज़ूद हम, सारा तो नहीं, काफी काम मिल कर कर पायें, कुछ समय के लिए ही सही. स्वतंत्रता के पहले की कांग्रेस की तरह जिस में समाजवादी भी थे, वामपंथी भी थे और रूढ़िवादी भी थे या जैसे, पिछले दिनों ही, कुछ समय के लिए, लोकपाल आन्दोलन के दौरान किया था? 

मोटे लक्ष्यों/दिशा पर सहमति आसान है, समता, न्याय, विविधता का सम्मान, टिकाऊ विकास, विकेंद्रीकृत शासन, पर्यावरण सुरक्षा एवं जनतंत्र-  सब के लिए, हर धर्म, जाति के लिए, मर्द, औरत, बच्चे के लिए, सब इलाकों के लिए-  ये कुछ शुरुआती लक्ष्य हो सकते हैं जिन पर आम सहमति हो सकती है. बल्कि अगर केवल चुनाव प्रणाली के न्यूनतम अर्थ में न लेकर व्यापकतम अर्थ में लें तो जनतंत्र –सब की भागेदारी से और सब के हित में –  एक ऐसा मूल्य हो सकता है जो हम सब को बाँध सकता है. पर यह तभी हो सकता है जब यह केवल एक नारा न बन कर  जीवन पद्धति बने, हमारी कार्यप्रणाली का बुनियादी आधार बने.

अगर कार्यप्रणाली ऐसी हो जिस में विविधता और विकेंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया का सम्मान हो, तो हम एक बेहतर समाज की ओर मिल कर तेज़ी से कदम बढ़ा सकते हैं.  यह ज़रूरी नहीं की परिवर्तन धीरे धीरे ही आए; परिवर्तन तो बहुत तेज़ी से भी आ सकता है. जैसे करोना के चलते आया है; जिस की कल्पना भी नहीं थी, वो हो गया.  अगर अब, जब करोना महामारी के चलते न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया की व्यवस्था की सिलाई उधडी/खुली हुई है, भले ही हमें दूर बैठे देशों की दिखती न हो, नहीं तो फिर कब होगा सामाजिक बदलाव के तरफ तेजी से पड़ाव?. 

आज के दौर में क्यों तेज़ी से काम करना संभव है, कैसे करना है उस पर कुछ बाते हो गई पर सवाल है करना क्या है? तात्कालिक राहत के काम तो करने ही चाहियें पर ये काम वही कर सकते हैं जो उन लोगों से जुड़े हुए हैं जिन को राहत चाहिए. अगर राहत चाहने वाले तबकों से कोई जुड़ा नहीं है और न ऐसे लोगों से जुड़ा है जो ज़मीन पर ये काम कर रहे हैं, तो तात्कालिक राहत के नाम पर चंदा ही दिया जा सकता है. चेतना निर्माण का काम, सही गलत में फर्क करने के काम की सदैव ज़रुरत रहती है. करोना के दौर में भी पुराने मुद्दे ख़त्म नहीं हुए हैं, सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) लागू है और करोना के दौरान साम्प्रदायिकता ने फिर जोर पकड़ा है.

इस का भी मुकाबला करना होगा पर मूल काम लोगों को उन के अपने खुद के एवं उन के आस-पास के लोगों के मानवीय अधिकारों और ज़रूरतों के लिए संगठित करना है.  अगर आमजन अपने, अपने परिवेश से जुड़ी हुई नीतियों के लिए लड़ने (अपना राशन कार्ड बनवाने के लिए भागदौड़ करना और राशन की व्यवस्था में सुधार के लिए काम करना, इन दोनों में अंतर करना ज़रूरी है) के लिए संगठित नहीं हैं,  तो उन को दूर किसी और के साथ होते अन्याय के खिलाफ़ (या उन के स्वयं के किसी दूरगामी हित के लिए) लड़ने के लिए तैयार करना बहुत मुश्किल होगा.

इसलिए लोगों को अपने स्थानीय (और विशेषतौर पर नीतिगत) मुद्दों पर करवाई करने के लिए संगठित करना होगा. और ये करवाई कई बार सरकार के खिलाफ होगी पर केवल केंद्र या राज्य सरकार के खिलाफ ही नहीं, ये अपने खिलाफ, अपने अन्दर की सफाई के लिए भी हो सकती है.  उदहारण के लिए इस महामारी के समय में, भले ही और अपराध कम हो गए हों, पर घरेलू हिंसा तो बनी रही है.  इस लिए जहां तक ‘शुरुआत कहाँ से’ करने की बात है सामाजिक परिवर्तन का कार्यक्रम एक बिन्दु पर केन्द्रित न हो कर बहुपक्षीय होता है। हम किसी एक बिन्दु पर ऊंगली रखकर यह नहीं कह सकते कि यह है आज का क्रान्ति धर्म.  कौन से काम करने हैं यह स्थानीय परिवेश और पहलकदमी करने वाले लोगों कि अभिरुचि और क्षमताओं से तय होंगे।  पर करोना ने मौका दिया है कि हम तेज़ी से इस ओर बढ़ें. अब नहीं तो कब? 

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