सै दरकार सियासत की इब फैंको गरम गरम – मंगतराम शास्त्री

सै दरकार सियासत की इब फैंको गरम गरम।
चौपड़ सार बिछा दी आज्यो खेल्लां धरम धरम।।

लोग दिखावा हाम्बी भरियो आंख मिलाइयो ना
बेशक लोग मचाओ रौल़ा कहकै शरम शरम।

पतनाल़ा पड़र्या जित पड़ना चहिये उसे जगां
पंचां की सिरमात्थै कहकै बोल्लो नरम नरम।

जो चलदी म्हं नहीं चलावै वो पछतावैगा
सारे सपने पूरे कर ल्यो मौका परम परम।

अम्बर -सूरज ,चाँद -सतारे, धरती और हवा
सब म्हारे सैं चोगरदै फैलाद्य़ो भरम भरम।

लोड़ नहीं सै खोट छुपावण की बस ध्यान रहै
खड़तल बोल्लै, न्यूं कहियो सब नंगे हरम हरम।।

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Author: मंगत राम शास्त्री

जिला जीन्द के टाडरथ गांव में सन् 1963 में जन्म। शास्त्री, हिन्दी तथा संस्कृत में स्नातकोतर। साक्षरता अभियान में सक्रिय हिस्सेदारी तथा समाज-सुधार के कार्यों में रुचि। अध्यापक समाज पत्रिका का संपादन। कहानी, व्यंग्य, गीत विधा में निरन्तर लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। बोली अपणी बात नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित।

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