बाबा नानक – संतोख सिंह धीर


पंजाबी से अनुवाद: हरभगवान चावला



मेहरबानी करो
मेरी सूरत न बिगाड़ो
मैं जैसा हूँ
वैसा ही रहने दो

मुझे
किसी साँप ने
कोई छाया नहीं की थी
साँप को क्या पता था
मैं कौन हूँ?
तुम तो समझ नहीं सके मुझे
साँप कैसे समझ गया?
यूँ ही कुछ अंट-संट मत कहो
मैं जैसा हूँ
वैसा ही रहने दो मुझे

मैंने पहाड़ भी नहीं रोका था
न ही किसी ने फेंका था पहाड़
वली साहब से
थोड़ी बातचीत हुई थी
विचार विमर्श,
थोड़ा वाद विवाद भी
उन्होंने सवाल किए
मैंने जवाब दिए
सवालों का पहाड़ था
औ तर्कों का पंजा
ऐसे ही तर्कों के पंजे से
रोका था पहाड़ मैंने

पानी पीने भी नहीं गया था
मरदाना
वली साहब के पास
पानी पीने तीन मील ऊपर
पहाड़ पर ही जाना था?
नीचे गाँव में
पानी कोई कम था
हसन अबदाल?
गाँव वाले
पानी पीने
क्या पहाड़ पर ही जाते थे?

वो वली था
फ़कीर था
किसी को पानी पीने से
फ़कीर वैसे भी नहीं रोकते

मैंने मक्का को भी नहीं घुमाया था मेरे तर्कों से
मक्के के मौलवियों की
सोच बदल गई थी
मेरे तर्कों से ही
उन्होंने हर तरफ़ ख़ुदा देखा
दरअसल ऐसे घूमा था मक्का

न दूध था
न लहू
ये तो मेरी आँख थी
जो देख रही थी
दूध और लहू

मेरे लिए
मेहनतकश के हाथ महान थे
मेहनतकश के हाथों में
चाँद-सूरज चमकते हैं
इनकी चमक के सामने
ताजों और कलगियों के
हीरे बेआब हो गए
बादशाहतें छोटी पड़ गईं
और ये हाथ बड़े
इसीलिये मैंने कोधरे का
महागीत गाया
सुच्चा दूध पिया

ये हिन्दू-मुसलमान
ये झूठे बयान
शूद्रों और ब्राह्मणों के
ये अमानुषिक ब्यौरे !!
कहाँ मध्यकाल था
और कहाँ इक्कीसवीं सदी
पर तुम्हारी जीर्ण-शीर्ण
सनातन सोच नहीं बदली

काबुल से धूल उड़ाता
हिंद में आया था हमलावर
हिंदुस्तान की गलियों में
बाबर की धूम थी
क़त्लेआम था
लूटपाट थी
कोहराम था
हिंदुस्तान की इज़्ज़त
गली-गली में धक्के खाती थी

बादलों की घटा से उमड़ते
फिर आ रहे हैं
कितने ही बाबर
पूँजी की फ़ौजों के साथ
वे हमें फिर घेर रहे हैं
घिर गए हैं
हमारे पहाड़
हमारे मैदान
हमारा भविष्य
हमारा वर्तमान
दैत्य सोने-चाँदी का
चीख़ता-चिंघाड़ता
हमारी महान धरा को
रौंदता-लताड़ता

सुन लो आवाज़ मेरी
मेरे प्यारे शिष्यो!
लालो के साथियो!
मेहनतकशो और योद्धाओ !
ख़तरे की आहट सुनो
सुनो कि घंटियाँ बज रही हैं
तुम्हारी आज की अकर्मण्यता को
सुनो कि सदियाँ भुगत रही हैं

मालपुआ कोधरे को
मात देता जा रहा है
हमलावर लुटेरा चढ़ रहा है
यम की मानिंद
सुनो!
बहुत ऊँची है कोधरे की शान
और मालपुए बेईमान
महानीच मालपुए
शैतानों के भी शैतान
इनके ग़लीज़ मुँह
लहू में लिथड़े हैं
मैंने ऐसे ही नहीं कहा था-
‘राजे शींह
मुकद्दम कुत्ते’

मुझे मेरे समय ने
कभी प्रेत कहा, कभी बेताल
भुलक्कड़ और भटका राही
ये सब तमग़े थे मेरे लिए
और मेरी शान थे
मेरे लिए ये वक्त के बख़्शे
बहुत बड़े सम्मान थे

लीक पर चलते चले जाना
आशिक़ों का काम नहीं
योद्धाओं का काम नहीं
नानकों का काम नहीं
लीक पर चलते रहने से
समय नहीं जागता
रोग नहीं भागता
लीक पर चलने से
युगांतर नहीं होता

कोधरे की संतानो !
युग के शहज़ादो !
हथेली पर शीश धरो
प्रेम गली में आओ
ख़ुद लड़ो, ख़ुद मरो
लगाम अपने हाथ में थामो
इन रक्तपिपासुओं से छीन लो
अपना प्यारा हिंदुस्तान
छीन लो इन यमों के कब्ज़े से
अपना जहान-
अपना अतीत
अपना भविष्य
अपना वर्तमान।

1 thought on “बाबा नानक – संतोख सिंह धीर

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    बजरंग बिहारी says:

    अच्छी कविता है।
    संतोख धीर को सलाम।
    हर भगवान चावला को धन्यवाद।
    हिंंदोस्तान को बचाने के लिए सावधान रहने की जरूरत है।

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