दिल्ली से कलकत्ता – बालमुकुंद गुप्त

(16 जनवरी 1899 को भारत मित्र अखबार बालमुकुंद गुप्त के संपादन में प्रकाशित हुआ। इस अंक में दिल्ली से कलकत्ता तक लेख में अपनी यात्रा का वर्णन किया है। इस वृतांत में बालमुकुंद गुप्त की विलक्षण वर्णन क्षमता, संवेदनशीलता और संवेदनशील दृष्टि के दर्शन होते हैं। )

‘10 जनवरी की रात को मैं दिल्ली से कलकत्ता के लिए मेल ट्रेन में सवार हुआ। टिकट इण्टर का लिया। ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर लगी तो देखा कि इंटरमिडियट की गाड़ी केवल एक ही है। उसमें भी एक कमरा युरोपियन साहबों के लिए और एक युरोपियन लेडियों के लिए। शेष तीन कमरों में हिन्दुस्तानी स्त्री-पुरुष सब। कड़कड़ाती सर्दी के मारे असबाब के गटुड भी लोगों के पास कम न थे। इससे उनकी वह बुरी नौबत हुई कि कुछ न पूछिये। बहुत लोग घबराकर तीसरे दरजे की गाड़ी में चले गये और जो भिच-भिचाकर रह सके, वह इंटर में पड़े रहे। ट्रेन को देखा तो उसमें दूसरे और पहले दरजे की गाड़ियां केवल चार ही नहीं थी, पांच थी, तीसरे दर्जे की भी दो थी। परन्तु इंटरमिडियट की जिसकी मेल में बड़ी जरूरत रहती है, केवल एक ही गाड़ी थी। भले मानुस हिन्दुस्तानी इसी दरजे में सिर छिपाया करते हैं। उनके भाग्य से रेल में उसकी एक ही गाड़ी रह गई। दूसरे और पहले दरजे की गाड़ियां मजे से खाली चली जा रही थी। उनमें कभी कोई एक-दो साहब-बीबी दिखाई देते थे।’

‘इंटर का टिकट लिया था। इससे जी न हुआ कि तीसरे दरजे में बैठें। दबते-दबाते इंटरमिडियट ही मे पड़े चले आये। जैसी दुर्दशा भोगी वह जी ही जानता है। जहां रेल ठहरती, वहां यदि एक आदमी उतरता था, दस घुसने को दौड़ते थे। धक्कम-धक्का होकर कम से कम दो आदमी तो घुस ही जाते थे। इस प्रकार भीख बढ़ती ही जाती थी। रात जिस प्रकार कटी उसे शरीर का जोड़-जोड़ जानता है।

दिल्ली से उस तरफ इस साल खेती कम है। चने की फसल तो है ही नहीं। फसल हो तो कहां से? कानपुर से बक्सर तक दिन था, खेती दिखाई देती थी। इतनी दूर में अबके चने की फसल अच्छी है और भी खेती अच्छी है। बिहार का जो अंश जलमग्न हुआ था, उसमें फसल खूब लहलहाती दिखाई दी। पंजाब का जंगल, दिल्ली का प्रांत, हरियाणा और शेखावटी में अबके खेती नहीं है। इस तरफ फसल अच्छी है। इतना भी भला।’

सवेरा हुआ। सूर्य चमका। सरद हवा सनसनाती थी, तो भी सूर्य की चमक से जरा मुंह निकालने का साहस हुआ। खिड़की खोलकर देखा तो गाड़ी के दोनों ओर हरी खेती लहलहाती थी। गाड़ी उस समय कानपुर के पास थी। दिल्ली से उस तरफ इस साल खेती कम है। चने की फसल तो है ही नहीं। फसल हो तो कहां से? कानपुर से बक्सर तक दिन था, खेती दिखाई देती थी। इतनी दूर में अबके चने की फसल अच्छी है और भी खेती अच्छी है। बिहार का जो अंश जलमग्न हुआ था, उसमें फसल खूब लहलहाती दिखाई दी। पंजाब का जंगल, दिल्ली का प्रांत, हरियाणा और शेखावटी में अबके खेती नहीं है। इस तरफ फसल अच्छी है। इतना भी भला।’

प्रयाग में मकर के स्नान के लिए यात्री जा रहे थे। दोनों ओर से ट्रेनें भरी आ रही थी। स्टेशन पर बड़ी भीड़भाड़ थी। कुछ कालेजों के विद्यार्थी परीक्षा देकर प्रयाग से लौट रहे थे। इनका भी एक रेला मेल ट्रेन पर अच्छा पड़ा। दो-चार को जगह मिली। कुछ मित्र लोग इनको पहुंचाने प्लेटफार्म तक आए थे। एक गोरे साहब ने उनको वक्फे लीगाकर बाहर निकाल दिया और उनका उजर कुछ भी न सुना। बेचारे पढ़े-लिखे लड़कों की यह खराबी देखकर अनपढ़ों को भी दुख हुआ।

यहां उतरकर मैंने फौजी ढंग का-सा स्नान किया परन्तु कुछ खा लेने को कहीं जगह न मिली। गाड़ी के भीतर की दशा तो सुना ही चुका हूं। बाहर भी स्थान न था। यात्री फिरते थे, साहब-मेम फिरते थे। कबाब रोटी वाले फिरते थे, असबाब वाले कुली फिरते थे और गोरे-काले पुलिस वाले फिरते थे। हिन्दू बेचारा कहां भोजन करे। खैर, खड़े-खड़े ही दो पेड़े मुंह में डाल पानी पी गाड़ी में बैठना पड़ा। गाड़ी चलीं सड़क के सहारे से नगर का जो भाग दिखता था, वह रमणीक मालूम होता था। पुल पर से देखा यमुनाजी की धारा बहुत ही क्षीण दशा में है। रेती चमकती थी। शायद इस मास से और सूख जायंगी। दिल्ली में यमुना की ऐसी दशा है, मानों वह दिल्ली से उठ जाने को है।’

‘शाम होते-होते गाड़ी चौसा स्टेशन पर पहुंची, यह प्लेग की बीमारी की देखभाल का अड्डा है। यहां आकर ट्रेन ठहर गई। खिड़कियां पहले ही से बंद थी। पुलिस के दूत दौड़े आए और दरवाजे रोककर खड़े हो गए। ठीक इस प्रकार जैसे कैदियों को। मानो यात्री लोग भी गाड़ी से उतर कर भाग जाएंगे। इसके बाद खिड़की खुली और हमारे कमरे वाले को नीचे उतरने की आज्ञा हुई। हम लोग नीचे प्लेटफार्म पर उतरे। आज्ञा हुई कि कतार बांधो। हमने कतार लगाई। इसके बाद गाड़ी की खिड़की में रस्से दोनों और डाले गए और उनमें हमलोग रोके गये। पशु रस्से से रोके जाते हैं, परन्तु चैसे पर हम मनुष्य कहलाने वाले रस्से के घेर में थे। दो गोरे साहब हमें देखने आये और दूर ही से देखकर चल दिये, परन्तु कई आदमियों की जो हमारे पास ही थे, खूब नाड टटोली गई। पीछे जान पड़ा कि हम लोगों को मोटा ताजा जानकर साहब ने दूर ही से बता दिया था।’

‘ट्रेन चली तो देखा कि तीन-चार आदमी उतार लिए गये। इनमें एक स्त्री थी और एक पुरुष कुछ दुर्बल। बेचारे कुछ बीमार भी न थे, कहा-सुनी भी उन्होंने बहुत की, परन्तु कुछ सुनाई न हुई। इनके चेहरे फीके पड़ गये थे। बेचारे हैरान थे कि क्या करें? प्लेटफार्म से नीचे उतारकर यह प्लेगी कान की ओर किये गये। वहां दो प्लेगी ठेले थे, उन पर डालकर घसीटे गये, मानो वह सचमुच ही बीमार थे, मानो सचमुच प्लेगग्रस्त थे। जब कलकत्ता में प्लेग कहा जाता था, तो कलकत्ता से जाने वाली ट्रेनें भी चैसे में रोकी जाती थी और उनमें से हकनाहक दस-बीस यात्रियों को उतारकर प्लेग-कैंप में सड़ाया जाता था। वही दशा अब कलकत्ता की ओर जाने वाली ट्रेनों की होती है।’

हमारी वाली गाड़ी के एक कमरे में दो गोरी मेम थी। उनको गाड़ी से उतरने का कष्ट न हुआ। गोरी डाक्टरनी ने उनकी गाड़ी के पास आकर कुछ पूछा और अलग हुई। परन्तु दो बंगालिन स्त्रियां भी उसी गाड़ी में थी। उनको डाक्टरनी जी ने उतारा और देर तक उनकी नाड़ी पर हाथ धरे रहीं। उसी गाड़ी में दो साहब थे, वह भी नीचे उतरने के लिए कष्ट से बचे। ट्रेन  से किसी दरजे के किसी साहब को नीचे न उतरना पड़ा और हिन्दुस्तानी कोई भी रेल के भीतर न रहने पाया।

‘जहां साहब लोगों का भोजन वही ट्रेन का मुकाम। पहले मेल ट्रेन मुकामा में ठहरती थी। परन्तु अब रात जल्दी होती है, इसी से दानापुर में तीस मिनट ठहरने लगी। आश्चर्य कुछ नहीं, रेल साहबों ही के लिए है। रेल में सुख पाना हो तो विलायत में पैदा होने की प्रार्थना करो।’

‘हुगली से हावड़ा तक प्रभात समय था। रेल के दोनों ओर जल भरा था। उसमें से इतनी भाप उठ रही थी कि पेड़-पत्ते और भूमि आदि कुछ दिखाई न देते

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