ऐसे में बालमुकुंद गुप्त को याद करना अच्छा लगता है – सुभाष चंद्र

टोरी जावें लिबरल आवें। 

भारतवासी खैर मनावें

नहिं कोई लिबरल नहिं कोई टोरी। 

जो परनाला सो ही मोरी।

ये शब्द हैं  – पत्रकार, संपादक, कवि, बाल-साहित्यकार, भाषाविद्, निबंधकार के रूप में ख्याति अर्जित करने वाले – बालमुकुंद गुप्त के । अंग्रेजी शासन के दौरान भी जनता आशाएं लगाती थी कि इंग्लैंड में ‘टोरी’ पार्टी के बाद ‘लिबरल पार्टी’ का शासन आएगा तो कुछ राहत मिलेगी। लेकिन भारतीय जनता के लिए कोई परिवर्तन नहीं होता था। दोनों राजनीतिक पार्टियों का मूल चरित्र एक सा ही था। इस कविता की उम्र 100 साल से अधिक की हो गई है। इस दौरान भारत स्वतंत्र भी हो गया, लेकिन इस कविता की विषयवस्तु अप्रासंगिक नहीं हुई। अंग्रेजी शासन ने बंगभंग अथवा अन्य कार्यों के माध्यम से भारतीयों में धर्म, क्षेत्र, जाति, भाषा आदि के नाम पर फूट के बीज बिखरने का जो काम शुरु किया था अभी वह थमा नहीं है। राजद्रोह के माध्यम से शासन का विरोध करने वालों के दमन का वह सिलसिला भी नहीं थमा है जिससे आहत होकर बालमुकुंद गुप्त ने कहा था कि ‘वर्तमान युग सिडिसन का युग है।’  

कबीर की तरह की तबीयत के फक्कड़, हंसोड़, व्यंग्यकार और देहाती मुहावरों व उक्तियों की सुगंधमयी भाषा में बेबाक बात कहने वाले ‘भारतमित्र’ अखबार के संपादक बालमुकुंद गुप्त अंग्रेजी सरकार के दमन के खिलाफ आग उगलते थे। उनमें यह शक्ति व साहस आता था इस मान्यता से कि वे पत्रकार को जनता की आवाज मानते थे। इसी तरह के अनेक प्रयासों, संघर्षों और कुरबानियों की बदौलत लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथे स्तंभ के तौर पर मान्यता मिली थी। जो आज अपने कर्तव्य से भटककर पूंजी और सत्ता की दासी हो गई है। नीरा राडिया प्रकरण ने मीडिया की पोल खोल दी थी।  

मीडिया आकार में तो पहले सो हजारों गुणा बढ़ा है, लेकिन इस पेशे में भारी गिरावट भी उतनी ही आई है और इसने अपनी विश्वसनीयता और साख गंवाई है। प्राकृतिक अथवा व्यवस्थागत संकटों में घिरी जनता बेशक त्राहिमाम त्राहिमाम करती रहे, लेकिन मीडिया को उसकी खबर नहीं है। ऐसे में बालमुकुंद को याद करना अच्छा लगता है।

बालमुकुंद के जन्म को 150 साल से अधिक हो गए हैं और 100 साल से अधिक उनके देहांत को। उनको याद करना उस पूरे भारतीय नवजागरण की टकसाल की यात्रा करना है, जिसमें आधुनिक भारत का नक्शा ढल रहा था। नवजागरण युग में भविष्य के भारत की शासन सत्ता के कर्तव्यों से लेकर उसकी भाषा-संस्कृति के सवालों पर गंभीर मंथन हो रहा था। मूल्यों, सरोकारों और विचारों रूपी उन रत्नों पर नजर डालना है, जो नवजागरण के क्षीर-मंथन से प्राप्त हुए थे। उसके परिप्रेक्ष्य में आज के समाज, व्यवस्था और सत्ता को देखना है कि हमारी राजनीति और सत्ता का चरित्र किस तरह का बन रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाने की प्रक्रिया में जिन संस्थाओं का निर्माण किया गया उनका स्वरूप किस तरह का बनता जा रहा है। इस प्रक्रिया में साहित्य और पत्रकारिता अपनी भूमिका किस तरह से अदा कर रहे हैं। 

‘शिवशंभु के चिट्ठे’ लिखने वाले जब ‘स्वर्ग में विचार सभा के अधिवेशन’ में अपने नवजागरण कालीन मित्रों-सहयोगियों के साथ विचार करते होंगे तो जरूर अपना माथा पीटते होंगे कि जिस स्वाभिमान और स्वतंत्र बौद्धिक विवेक अर्जित करने के लिए वे तत्कालीन शासन सत्ताओं से संघर्ष कर रहे थे। उसके पत्रकार-वंशजों ने अपनी रोटी के साथ मलाई मारने की होड़ में उसे गंगा में विसर्जित कर दिया है।  

पत्रकारिता व मीडिया से संपादक नाम की संस्था  समाप्तप्राय है। सरकारें और पूंजीशाह मीडिया का एजेंडा तय कर रही हैं। उसमें कार्यरत पत्तलकारों ने मीडिया की हैसियत ‘सत्ता वचनम्’ छापने तक सीमित कर दी है।  पत्रकार के लिए जरूरी स्वतंत्र विवेक के अभाव में वे ‘कंटेट राईटर’ बनकर रह गए हैं।

 बालमुकुंद सरीखे भारत के निर्माताओं ने औपनिवेशिक संस्कारों से संघर्ष के दौरान जो भारतीयता अर्जित की थी। उसके सार को त्यागकर शासन सत्ताओं के लिए भारतीयता एक कर्मकांड-निर्वाह का भव्य आयोजन बनकर रह गई है। पौराणिक व मिथकीय चरित्रों के महिमागान और अतीत के अंध मोह को भारतीयता का पर्याय मान लिया गया है। 

शासन सत्ताएं और उसकी मीडिया साम्राज्यवादी पूंजी की चेरी है। उसकी सेवा के उपक्रमों व तर्क से ही इनकी गति है। इसीलिए तो सत्ता व सरकारों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों व रिपोर्टों पर भरोसा है। अपनी आंखों, विवेक व जनजीवन उसका साक्ष्य नहीं है। विकास को आर्थिक आंकड़ों में खोजा जा रहा है। कितना धन किस योजना पर खर्च करने का तय किया जा रहा है यही विकास का पैमाना और पत्रकारिता का मुख्य विषय हो गया है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में लोक की आवाज निरंतर कम होती जा रही है। और धीरे-धीरे शासन सत्ताएं इस कदर जनता पर हावी हो गई हैं कि उनकी भावनाओं और प्रतिक्रियाओं की भी परवाह नहीं कर रही।

बालमुकुंद गुप्त हिंदी भाषा के स्वरूप निर्माण के स्तम्भ हैं। हिंदी भाषा के स्वरूप, भारत की राजकाज की भाषा और लिपि संबंधी समस्याओं पर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान की बहसों के वे भागीदार रहे। वे आम बोलचाल की हिंदी के पक्षधर थे, पंडिताऊ और संस्कृतनिष्ठ आभिजात्य की हिंदी के नहीं। उनकी भाषा में सभी भाषाओं के वे शब्द मिलेंगे जो लोक व्यवहार का हिस्सा हैं। 

बालमुकुंद गुप्त का ताल्लुक हरियाणा (गांव – गुड़ियानी, जिला – रेवाड़ी) से थे। हरियाणा को साहित्य की दृष्टि से उन्नत नहीं माना जाता। लेकिन हाली पानीपती और बालमुकुंद गुप्त जैसे साहित्यकार भी इसी धरती से उपजे हैं। ये युग की विडम्बना ही कही जाएगी कि यहां के साहित्यकारों और पाठकों ने अपने को हाली पानीपती और बालमुकुंद गुप्त के साथ इस तरह संबद्ध नहीं किया कि वे उनके साहित्यिक संस्कार का अनिवार्य हिस्सा बन जाए। अपनी इस समृद्ध जनपक्षीय साहित्यिक विरासत के सच्चे वारिस बनने में जो साहस व बौद्धिक मशक्कत की जरूरत थी उसके प्रति विशेष रुचि नहीं दिखाई। संघर्षों से बनाई गई विरासत के संस्कारों को ग्रहण करने के लिए आवश्यक संघर्ष के बिना यह प्राप्त भी नहीं की जा सकती थी। 

 बेशक उनके जन्म दिन या पुण्य तिथियों पर फूल मालाएं चढ़ाकर रस्म जरूर ही पूरी की जाती होगी। उनके नाम पर सरकारी योजनाओं के तहत कुछ संस्थाओं के नाम भी रखे ही होंगे, लेकिन उनके मूल्यों और सरोकारों को जनजीवन की सोच का हिस्सा बनाने और सार्वजनिक जीवन में उनकी स्थापना करने के लिए उनकी मूर्तियां और चित्र कहीं देखे नहीं गए। विश्वविद्यालयों में मिथकीय चरित्रों पर तो शोध-पीठ शोभायमान हैं, लेकिन हमारे जीते-जागते नायकों की ओर बेरुखी से सरकारों व प्रशासन में बैठे लोगों का अपनी विरासत के प्रति भी रवैया भी उदघाटित हो रहा है। 

हम यहां सरकारों अथवा उसकी एजेंसियों की कार्यप्रणाली की आलोचना नहीं करना चाहते। हां जिस धरती पर ऐसी महान हस्तियों का जन्म हुआ उस पर उनके विचारों और सरोकारों को फलीभूत होते जरूर देखना चाहते हैं। चूंकि समस्त संसाधनों को खर्च करने की योजनाएं सरकारें बनाती हैं इसलिए उनसे अपेक्षा करना अनुचित नहीं लगता।

इस अंक में बालमुकुंद गुप्त के व्यक्तिगत जीवन और लेखन तथा उसके मूल्याकंन को समेटने की कोशिश की है। इसे पठनीय व रोचक बनाए रखने की ओर विशेष ध्यान दिया है। अंक से गुजरते हुए आपको इसका अहसास जरूर होगा।

इसमें हमने बालमुकुंद गुप्त रचनावली (संपादन, के. सी. यादव, हरियाणा इतिहास एवं सस्कृति अकादमी से प्रकाशित) तथा बालमुकुंद स्मारक ग्रंथ (बनारसीदास चतुर्वेदी व झाबरमल शर्मा संपादित) का भरपूर प्रयोग किया है। इसके लिए  हम उनके आभारी हैं।

आशा है कि देस हरियाणा का 23-25 अंक आपको पसंद आयेगा।

सुभाष चंद्र

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