सात जणी का हे माँ मेरी झूमका – धनपत सिंह

सात जणी का हे माँ मेरी झूमका, हेरी कोए रळ मिल झूलण जा,
झूल घली सै हे मां बाग म्हं

कोए-कोए किसे की बाट म्हं ठहर रही री
कोए तीळ सिंधारे आळी पहर रही री
जो कोए राक्खी ब्याह

छोरे हांगा लारे पींघ पै री
दो छोरी झट बैट्ठी पींघ पै री
दो रही लंगर ठा

झूंटा चड्ढ्या गगन अटाक था री
झट सासु का तोड़ा नाक था री
हेरी लंबा हाथ लफा

आम के पेड़ कै नीच्चै खड़्या री
सब की नजरां एकदम आ पड़्या री
उडै़ धनपत सिंह भी था

जिला रोहतक के गांव निंदाणा में सन् 1912 में जन्म। जमुआ मीर के शिष्य। तीस से अधिक सांगों की रचना व हरियाणा व अन्य प्रदेशों में प्रस्तुति। जानी चोर, हीर रांझा, हीरामल जमाल, लीलो चमन, बादल बागी, अमर सिंह राठौर, जंगल की राणी,रूप बसंत, गोपीचन्द, नल-दमयन्ती, विशेष तौर पर चर्चित। 29जनवरी,1979 को देहावसान।

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