बहिष्कृत औरत – जयपाल

शहर से बाहर से
एक औरत शहर के अंदर आती है
घरों पर से मिट्टी झाड़ती है
फर्श चमकाती है
गलियों को बुहारती है
पी जाती है नालियों की सारी दुर्गंध
गली-मुहल्लों को सजा देती है अपनी-अपनी जगह
इस तरह –
जब सारा शहर रहने लायक हो जाता है
यह औरत शहर से बाहर चली जाती है

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