मेज, कुर्सी और आदमी – जयपाल

एक जमाने से
एक मेज रखी है साहित्य अकादमी के दफतर में
दूरदर्शन, आकाशवाणी और अखबार के सम्पादकीय विभाग में
स्कूल-कालेज-विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम समिति में
यह मेज न हिलती है, न डुलती है
न देखती है, न सुनती है
एक जमाने से यह मेज एक जगह स्थिर है
इसके आगे एक कुर्सी रखी है
यह कुर्सी भी बेजान है
बड़ी रहस्यपूर्ण और सुनसान है
इस कुर्सी पर एक आदमी बैठा है
उसके आंख और कान सिरे से गायब हैं
शरीर के बाकी अंगों पर लकवे का असर ���ै
एक जमाने से
इस आदमी की यही पहचान है
सरकारें आती हैं
चली जाती हैं
लेकिन इस बात पर सभी सहमत हैं
कि-
मेज, कुर्सी और आदमी
तीनों अपना काम बड़ी जिम्मेवारी से निभा रहे हैं।

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