पंच परमेश्वर – जय पाल

मेरी बेटी को माफ कर देना परमेश्वर जी
दरअसल वह नहीं समझ पा रही
कि प्रेम करने से पहले जाति कैसे पूछे
गोत्र कहां से पता करे
प्रेम की यह अनोखी विधि उसकी समझ से बाहर है
वह नहीं जानती
कि कुछ जातियां बड़ी होती हैं।
कुछ छोटी होती हैं
और कुछ अछूत होती हैं
उसे नहीं पता
कि प्रेम मां-बाप की मर्जी से हो सकता है
अपनी मर्जी से नहीं हो सकता
प्रेम केवल अपनी जाति में हो सकता है
पर अपने गोत्र में नहीं हो सकता
न छोटी जाति में हो सकता है
दलित जाति में तो बिल्कुल नहीं
वह नहीं जानती
कि प्रेम से गांव की नाक कट जाती है
गांव कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहता
लेकिन प्रेम को फांसी पर लटकाने से
गांव की नाक बच जाती है
और सिर ऊंचा हो जाता है
परमेश्वर जी
उसे तुम्हारे हुक्के से निकली
जात-गोत, प्रेम और विवाह की गुडगुडिया परिभाषाएं समझ नहीं आती
वह नहीं जानती
कि हुक्का सुप्रीम कोर्ट का जज होता है
और उसका फैसला अंतिम होता है
उसे नहीं पता
कि पंच परमेश्वर होता है
और परमेश्वर कुछ भी कर सकता है
उसे तुम्हारी मूछों और पगड़ी के साम्राज्य की जरा भी परवाह नहीं
न ही वह तुम्हारी लाठी की ताकत से डरती है
वह तो तुम्हारी लाठी तोड़ देने की बात करती है
और हुक्का फोड़ देने की बात करती है
परमेश्वर का तो उसे पता ही नहीं कि क्या होता है
मेरी बेटी तो मेरे खिलाफ चली गई परमेश्वर जी
देखना कहीं तुम्हारी बेटी भी तुम्हारे खिलाफ न चली जाए।

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