स्त्री सृजनः अनुभव व उपलब्धियां

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अनुराधा

हरियाणा सृजन उत्सव के दौरान 25 फरवरी 2018 को ‘स्त्री सृजन संकल्पः उपलब्धियाँ और अनुभव’ विषय पर परिचर्चा हुई। युवा कवियत्री विपिन चौधरी, नाटक कलाकार व शिक्षाविद कमला, शोधार्थी अनुराधा, गीता कुंडू और गीता पाल परिचर्चा में शामिल रही । संयोजन किया मोनिका भारद्वाज ने । प्रस्तुत है संक्षिप्त रिपोर्टः सं.-

मोनिका भारद्वाजः सार्वजनिक जीवन के तमाम हल्कों में स्त्री जमात की उपस्थिति हो रही है। तमाम नकारात्मक परिस्थितियों के अलावा हरियाणा की तस्वीर बदल रही हैं हरियाणा में महिलाएं आशा वर्कर के रूप आन्दोलन करती हुई नज़र आती हैं, वह चुनाव लड़ती हैं, सेना में और खेलों में भी हैं और सड़कों पर स्कूटर भी चलाती हुई भी दिखाई देती हैं भले ही छोटे स्तर पर हैं मगर यह तस्वीर महिला सृजन की सम्भावनाएं खोल रही हैं। यह उनके लिए अपने आप में एक उपलब्धि हैं जो उन्हें आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करती हैं। तमाम योगदानों के अलावा महिलाओं को सृजन और हस्तक्षेपकारी भूमिका में भी बड़े पैमाने पर शिरकत करनी होगी।
नारीवाद की सार्थकता को सिर्फ देह-मुक्ति से ना जोड़ा जाए अगर महिला अपनी कोख पर अधिकार मिल जाए जिसमे स्त्री अपने हिसाब से अपना बच्चा पैदा कर सके तो नारीवाद की सार्थकता सिद्ध हो जाएगी। महिलाओं ने नारी की समस्याओं पर विभिन्न दृष्टियों से चिंतन किया है और नारीवाद के अनेक आयाम स्थापित हुए हैं। इसमें अभिजात्य वर्ग की महिलाओं से लेकर मजदूर महिलाओं तक की अपेक्षाओं व संघर्षों को अपने चिंतन में शामिल किया है। नारीवाद का अर्थ अनिवार्यतः पुरुष का विरोध नहीं बल्कि महिला-पुरुष बराबरी की संकपल्पना पर टिका है।
विपिन चौधरीः लेखन की अलग-अलग विधाओं से होते हुए प्रकाशकों, सम्पादकों और विचारकों के सहयोग से इस क्षेत्र में आत्मविश्वास अर्जित किया। हरियाणा से और जाट जाति ताल्लुक होने से बहुत चुनौतियां आई क्योंकि दोनों ही स्तर पर प्रचलित रूप से “स्त्री छवि” को लेकर खास तरह की अपेक्षाएं हैं। सामाजिक ढाँचे के चलते एक सृजनकर्ता की आत्मछवि बनाए रखने का अपना संघर्ष है क्योंकि महिला सृजनकारों को अधिक प्रोत्साहन नहीं मिलता।
देहमुक्ति के बारे में बात करना ही नारीवाद की सार्थकता है ऐसी संकल्पना अपने आप में विवादित है जिस तरह हरियाणा में नारीवाद पर बात करने का मतलब पुरुषों को गाली देना समझा जाता हैं ठीक उसी तरह देह से मुक्ति को लेकर भी गलत अवधारणा है क्योंकि जिस तरह से पुरुषों का शरीर है उसी तरह से औरतों का शरीर है जो की जैविक जरूरतों को पूरा करने का टूल है। देह मुक्ति के बारे में बात करने का मतलब पाश्चात्य पोशाक पहनने की आज़ादी नहीं है बल्कि महिला शरीर का सम्मान और आत्म-जागरूकता है। नारीवाद की शुरूआती संकल्पनाओं में काफी बदलाव आया है। अगर इन 10 सालों में ही देखा जाए तो पहले के हालातों में एक हद तक बदलाव आया हैं । आज लडकियाँ आसानी से जींस पहन लेती हैं जबकि 10 साल पहले तक सिर्फ खिलाड़ी लडकियाँ ही जींस पहन सकती थी। इसलिए नारीवाद को सिर्फ शरीर, कपड़े या स्त्री-पुरूषों के अंतर से मुक्त होकर खुले तौर पर सोचने की ज़रूरत है जिस में औरतें अपनी अभिव्यक्ति दर्ज करा सके और इस प्रकिया में बाधक और सहायक कारकों को समझना ही असल में स्त्री मुक्ति की सही दिशा है। नारीवाद के बारे में समझ बनाने के लिए इस विषय में ज़्यादा से ज़्यादा पढने-लिखने, विमर्श करके और अधिक इजाद करने की ज़रूरत है । सम्भवत: लेखन और सृजन के सभी माध्यम एक औजार हैं जो समाज को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने की नज़र पैदा करते हैं।

कमलाः जिस तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से आती हूं वहाँ लड़कियों को विकास के अवसर मिलना तो बहुत दूर की बात हैं यहाँ तक पढ़ाई के अवसर भी नहीं मिलते हैं। लड़कियाँ या तो घर के काम करती हैं, मजदूरी करती हैं या फिर आठवीं के बाद ही उनकी शादी हो जाती है।
एक नाटक कार्यकर्ता के रूप में यह हौंसला अर्जित किया जिससे अपनी बात कहने का आत्मविश्वास पा सकी। नाटक से एक पहचान मिली मगर हरियाणा में जहाँ एक पुरुष नाटककर्मी को भी कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, वहीं अगर नाटककर्मी कोई लड़की है तो उसका संघर्ष ज्यादा हो जाता है जैसे लडकी घर से बाहर नहीं जाएगी, लड़कों के साथ नाटक करेगी तो शादी नहीं होगी। उस दौरान वह 15- 16 साल की लडकी के लिए इन सवालों का जवाब देना और खुद की जगह बनाना बहुत कठिन था। समाज के द्वारा सीधे-सीधे चरित्र को लेकर छींटाकशी की जाती हैं। लडकियों का सामाजिक भूमिका में आने तक का संघर्ष और फिर उसकी स्वीकार्यता का संघर्ष चलता रहता है। यह संघर्ष परिवार, शिक्षण-संस्थान और कार्यस्थल पर अलग-अलग स्तर पर देखने को मिल जाता हैं
अपने सहपाठियों के साथ नाटक का निर्देशन करते हुए अपने पुरुष सहपाठी की अवहेलना झेलनी पड़ी। “कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय” में प्रोजेक्ट कोर्डिनेटर की भूमिका में भी इस तरह की कई चुनौतियों को झेलना पड़ा। पुरुषवादी मानसिकता के चलते इस पद पर कोई महिला लम्बे समय से नहीं टिक पाई मगर उन्होंने 7 महीने वहाँ टिक कर काम किया और नई पहल भी की। इस तरह के कई अनुभवों का सामना करते हुए भी बहुत से लोग ऐसे भी मिले जिन्होंने साथ भी दिया। इस तरह के सहयोग के चलते आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मिली।
संघर्ष और हौसले के चलते एक सामाजिक नेतृत्त्व मिला और एक मिसाल पेश की। इससे प्रेरित होकर समाज की लड़कियों ने न सिर्फ़ पढ़ने का बल्कि उच्च शिक्षा तक जाने का हौंसला किया। कर्नाटक और बिहार राज्यों में काम करते हुए यह महसूस हुआ कि दूसरे राज्यों की तुलना में हरियाणा में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा प्रखर रूप से दिखाई देती है।

अनुराधाः हरियाणा की सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर वैकल्पिक सम्भावनाएँ मौजूद हैं और इन सम्भावनाओं को लाने और इनकी स्वीकार्यता बनाने की ज़रूरत है। इसके लिए हरियाणा की तथाकथित छवि जिसमें या तो बहुत ही नकारात्मक रूप से पेश किया जाता है या बहुत ही महिमामंडन किया जाता है इस छवि को छोड़ कर नई सम्भवनाओं की तलाश करने की ज़रूरत है। निश्चित ही इस सम्भावनाओं के चलते स्त्रियों और दलितों की अभिव्यक्ति और सृजनकारी भूमिका भी समान रूप से सामने आएगी।
हरियाणा के लोकसाहित्य में शुरू से ही महिलाएं केन्द्र में रही हैं । महिलाओं को लेकर उनकी तथाकथित छवि के अलावा उनके पक्ष में लिखी हुई रागनियाँ भी मिली हैं इन रागनियों में सामाजिक व्यवस्था को लेकर अपने-अपने समय की बेचैनियाँ नज़र आती हैं । लख्मीचंद के सांगों की महिला पात्रों के ज़रिये बेमेल-विवाह, यौन-शोषण, कन्या-भ्रूणहत्या और प्रेम-विवाह जैसे मुद्दे सामने आये हैं जिन पर खुल कर बात नहीं होती है। इन रागनियों में महिलाओं के प्रति मानवीय संवेदना, उनकी व्यथा और आदर्श पुरुषों की आलोचना भी सामने आई है। इसके अलावा जनवादी आंदोलनों, जनवादी रागनी और नाटकों ने नये और पुराने के तालमेल से महिलाओं की अभिव्यक्ति के विकल्प रचे हैं । इन विकल्पों के ज़रिये महिला न केवल संवाद करने की जगह पर आई है बल्कि उन्होंने सामाजिक नेतृत्व भी लिया है। ये महिलाएं खुद अपने फैसले लेती हैं इन फैसलों की कामयाबी और नाकामयाबी की जिम्मेदारी भी लेती हैं । महिलाओं की अभिव्यक्ति तमाम विकल्पों और सम्भावनाओं से निकली हुई उपलब्धि है।
लोक साहित्य में औरतें अलग-अलग भूमिका में तो दिखाई देती हैं चाहे वो पात्र, नर्तकी या गायिका के तौर पर हो मगर जनवादी आंदोलनों ��े अलावा महिला लेखिकाओं की भूमिका में बहुत कम दिखाई देती हैं। महिला सृजन अलग-अलग तरह से मजबूत करने की जरूरत हैं चाहे वह साझे प्रयासों से हो या फिर व्यक्तिगत पहलकदमी से हो। सम्भवत: यह जागरूकता क्षणिक नहीं इसको बनाए रखने के संघर्ष लगातार करने होंगे और कई स्तर पर करने होंगे तभी महिला सृजनकारों की तादाद भी बढ़ेगी और महिला विमर्श की परतें खुलेगीं ।

गीता कुंडूः लडकियों को घर में कंघी करना और बालों में पिन लगाने से लेकर जींस पहनने तक पर पाबंदी है और इसे माओं और खुद अध्यापिकाओं के द्वारा भी गलत माना जाता है। उनकी इस अवधारणा पर पितृसत्तात्मक सोच का असर दिखाई देता हैं। उनका सोचना है कि अगर लडकियाँ फैशन करेंगी तो चाल-चलन बिगड़ जाएगा । लड़कियों को इसी शर्त पर स्कूल भेजा जाता है कि वह ऐसा कोई काम नहीं करेंगी जो इनकी छवि को ख़राब करें । इस तरह परिवार में तमाम समझोतों के बाद चाहे लडकियाँ अपनी शिक्षा के अधिकार को अर्जित करती हैं और इस अवसर के लिए भी अपने परिवार के लिए शुक्रगुज़ार होती हैं । इस तरह के संकीर्ण विचारों के विरुद्ध बतौर एक शिक्षक लड़ाई करने की बहुत चुनौतियाँ हैं लेकिन इस तरह के संघर्षों के साथ-साथ दलित समाज से आने वाली लड़कियों में यह विश्वास भी जागा है कि वो भी कुछ कर सकती हैं यह बात उन्हें बहुत ताकत भी देती है।
सिर्फ किताबी शिक्षा ही नहीं बल्कि ऐसे कविता,नाटक और गीत जो की उनके पक्ष में लिखे गये हैं उनमे आत्मविश्वास जगाते हैं। एक चुप-चाप रहने वाली लडकी नाटक के माध्यम से सामने आती है और फिर उसने अपने साथ और 10 लड़कियों को जोड़ती है। इस तरह की लड़कियों को देखकर अपने काम की ताकत दिखती है।

गीता पालः छोटी-छोटी चीज़ों में और व्यवहार में पितृसत्तात्मक सोच का असर दिखाई देता है। यह उनकी अभिव्यक्ति के सामने बड़ी बाधा है। अगर लड़कियों को मौका दिया जाता हैं लड़कियों ने खुद को साबित किया है। मेरे स्कूल में लड़कियाँ पढाई में, खेल में अव्वल आती हैं। स्कूल के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर संतोष यादव, साक्षी मलिक और कल्पना चावला जैसी महिलाओं ने भी साबित किया है हालांकि इस तरह की सफलता तक पहुंचने के उनके भी संघर्ष रहे हैं । साक्षरता के दौरान अपनी अधेड़ उम्र की साथी को साक्षरता जैसे सामाजिक काम करने में भी अपने पति का इतना दबाव रहता था कि कई बार वह रात में देर से घर पहुंचने पर रसोई में भी नहीं जाती थी ताकि शोर न हो और उनके पति जाग न जाए । इस तरह भूखे रहकर वह झगड़े से बचाती थी और साक्षरता में काम करते रहने के तरीके निकालती थी। लेकिन धीरे-धीरे नाटक करते हुए उस महिला ने घूंघट खोल कर मंच पर प्रस्तुति की और नए गीत रचने लगी। इस तरह एक महिला सृजन की शुरुआत हुई ।
आज भी 70 प्रतिशत लडकियोँ खून की कमी का शिकार हैं क्योंकि परिवार में खाने-पीने में भेद-भाव किया जाता है। महिलाओं की सामाजिक स्थिति के अलावा कुपोषण के चलते स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सही स्थिति नहीं हैं।
इस तरह के अनदेखियाँ इस तरह स्वाभाविक लगती हैं कि इन पर बात ही नहीं की जाती क्योंकि यह सोच नैतिक-मूल्यों और परम्पराओं के रूप में भी परोसा जाता है। इसलिए नैतिक-मूल्यों और परम्पराओं को बदलने ज़रूरत है और इसकी शुरुआत परिवारों से ही करनी होगी। शिक्षा, खेल, नाटक और साहित्य जैसे मंचों पर लड़कियों की अभिव्यक्ति के अवसर खोलने होंगे ।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज -48 से 50

 

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