चसवाल साहेब यानी आबिद आलमी सिद्धांत के आदमी थे

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यादें


शशिकांत श्रीवास्तव

मैं अपने-आपको बहुत खुश-किस्मत समझता हूं कि मुझे प्रो. रामनाथ चसवाल के साथ कुछ साल काम करने का मौका मिला। पहले जी.सी. भिवानी और फिर जी.सी. रोहतक में। वह भी अंग्रेजी विभाग में थे और कई बार मैंने उनके साथ क्लास शेयर की। ऐसा अक्सर होता था कि मैं कोई कविता पढ़ा कर आया, तो वह मुझसे पूछते थे कि बरखुरदार, इस पैरे या उसका क्या अर्थ बताया विद्यार्थियों को? उन्हें पता था कि मेरा हाथ कविता को properly appricite करने में तंग था, फिर वह मुझे समझाते कि बी.ए. फाईनल तक आते-आते विद्यार्थियों को कविता के finer points भी समझा देने चाहिएं, सिर्फ paraphrasing से काम नहीं चलता। इसी तरह वह ग्रामर पर भी कभी-कभी मेरी क्लास लगाते और बहुत कुछ बताते। उनके सान्निध्य में मैंने भी भरपूर कोशिश की कि मैं अच्छा अध्यापक बन पाऊं। निस्संदेह वह एक बहुत polished और complete  teacher थे, जिनकी grammer, poetry, prose, plays etc. सब पर पकड़ थी और गहरी समझ थी। उम्र में प्रो. चसवाल मुझसे 7-8 साल बड़े थे, लेकिन काबलियत में वह मुझ से बहुत, बहुत ही बड़े थे।

अत्यंत धीर, गम्भीर चसवाल साहेब सिद्धांतों के आदमी थे, बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि वह सिद्धांतों के नहीं, बल्कि एक ही सिद्धांत के आदमी थे। उसी सिद्धांत ने उनकी तमाम शायरी को प्रेरित किया और वह उनकी सभी गतिविधियों के पीछे दिखाई देता था। चसवाल साहेब किसी भी शक्ल में किसी का भी, कहीं भी कोई शोषण नहीं सह पाते थे और उसके विरुद्ध आवाज उठाना वह अपना पहला इन्सानी फर्ज समझते थे।

 मैं चसवाल साहेब के व्यक्तित्व  के एक-दूसरे-बिल्कुल भिन्न-पहलू को दिखाने वाली कुछ यादें शेयर करना चाहता हूं। वह अपने दोस्तों के साथ बैठकर (उस सीमित दायरे में) एक अलग ही इन्सान हो जाते थे – हंसी, मजाक, खिलखिला कर हंसना, जोक्स शेयर करना – ये सब भी उनकी परसनेलिटी में शामिल था। हमारे घर जब पहली बार आए तो श्रीमती जी ने उनसे पूछा – भाई साहेब, आप चाय लेंगे या कुछ ठंडा? चसवाल साहेब ने थोड़ा बनावटी सीरियस होते हुए कहा था कि मुझसे आईन्दा यह सवाल मत पूछना और मुझे देखते ही चाय बना दिया करना और हां मेरी चाय में दूध एक चम्मच होना चाहिए, वह भी उल्टा (जितना भी दूध उस उल्टे चम्मच के साथ, लिपटा आ जाए) दूसरी बात, जब मुझे तुम ‘भाई साहेबÓ कह रही हो तो मेरी छोटी बहन जैसी हुई। इसलिए कभी-कभी पकौड़ी भी चलेगी। ये बातें तकल्लुफ की किसी भी दीवार को तोडऩे के लिए का$फी थी। उसके बाद तो अक्सर बैठक जमती, उनकी सिगरेट के कश, चाय की चुस्की के साथ गप्पबाजी। कभी-कभार ताश भी जमती थी।

कालेज में मैंने कई बार कोशिश की कि वह अपनी कोई गज़ल सुनाएं। लेकिन वह कतराते रहे। उनका मानना था कि शायरी सिर्फ knowledgeable audience के सामने सुनाई जानी चाहिए, शायरी तब ही कामयाब है जब सुनने वाले उसे समझें और appreciate करें।

वह कला के लिए कला में ज्यादा विश्वास नहीं करते थे, उनका मानना था कि शायर भी समाज में रहता है, वह समाज में व्याप्त अच्छाइयों-बुराइयों से प्रभावित होता है। ऐसे में शायर का यह फर्ज है कि वह इन बुराइयों को चिह्नित करे, जो सुधार के लिए पहला जरूरी कदम है। हां, शायर के लिए यह भी जरूरी है कि वह डायरेक्ट उपदेश न देकर अपनी बात इशारों में, प्रतीकों के द्वारा कहे, ताकि ग़ज़ल की ‘ग़ज़लियत’ बनी रहे और $गज़ल गद्य न होने पाए पर ऐसी बातें आबिद आलमी बहुत कभी, कभी अपनी कुछ दोस्तों के साथ या मुशायरे में ही किया करते थे। वरना आम तौर पर वह शायरी खास तौर पर अपनी शायरी पर चुप्पी साधे रहते थे।

इतने बरसों के साथ में एक बार मुझसे गुस्ताखी हुई और मैं उनसे पूछ बैठा भाई साहेब आप इतनी शराब क्यों पीते हैं, धीरे-धीरे कम करने की कोशिश क्यों न हीं करते। उन्होंने मुझे देखा और बोले मैं शराब पीता नहीं हूं में उसकी इबादत करता हूं और उसके साथ ही उन्होंने पहली बार वह भी बिना कहे एक शेर कहा :

यह मय-नोशी सही, मय-परस्ती कहते हैं
जहां टपका कोई कतरा, वहीं मैंने जबां रख दी।

उस मौके पर मुझे चुप कराने के लिए चसवाल साहेब के पास इससे अच्छा शेर शायद और कोई नहीं हो सकता था। लेकिन मुझे आज तक यकीन नहीं हुआ कि यह शेर उनका अपना था या किसी और का। यह शेर बहुत अच्छा होते हुए भी आबिद आलमी साहेब की सोच और स्टाईल से मैच नहीं करता।

आखिरी दिनों में आबिद साहब ने शराब और सिगरेट दोनों ही छोड़ने की कोशिश की थी और कुछ हद तक छोड़ भी दी थी, लेकिन तब तक देर, शायद बहुत देर हो चुकी थी। शरीर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था (मैं उनके शरीर त्यागने से कुछ दिन पहले ही भिवानी उनके घर मिलने के लिए गया था। आंगन में उनका बेटा उन्हें नहला रहा था। उनके कहने पर बेटे ने मुझे वहीं आंगन में कुर्सी रख कर बैठा दिया था) कुछ दिनों बाद ही वह खबर आई जो कोई सुनना-जानना नहीं चाहता था।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-अप्रैल, 2018), पेज- 56

 

 

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