ले परधान बीड़ी जला-हरभगवान चावला

कहानी

ले परधान बीड़ी जला


गांव के लगभग मध्य में बने मकान के सामने वाले चबूतरे पर चीेकट तहमद-कमीज धारण किए ‘परधान’ अक्सर बैठा रहता। उसके पैरों की जूती कभी साबुत नहीं होती थी, एड़ी को ढकने वाला पीछे का हिस्सा तल्ले के ऊपरी हिस्से के साथ यूं चिपका रहता जैसे किसी ट्रक के नीचे कुचले जाने वाले कुत्ते के लोथड़े सड़क से चिपक जाते हैं। मुख्य गली थी, लोगों का आवागमन लगातार बना रहता था। परधान हर आने-जाने वाले से ‘राम-राम’ बोलता और जवाब मिलते ही कहता, ‘हिक बीड़ी ता पिला…।’ कोई उसे बीड़ी देता, कोई नहीं देता। लोग जानते थे कि उसका राम-राम बोलना बीड़ी मांगने की भूमिका ही है। इसलिए कुछ लोग उसकी राम-राम का जवाब देने की बजाय सीधे ही बंडल से बीड़ी निकालने लगते, कुछ ऐसे भी होते जो बिना जवाब दिए और बिना उसे देखे अपनी राह चले जाते। जब ऐसा होता तो वह पीछे से आवाज़ लगाता,’ओए, राम-राम वी नईं बोलदा, वाह भई वाह…!’ अपनी राह जाता आदमी पीछे देखे बिना ही कह देता,’आज बीड़ी नहीं है परधान।’

गांव के पंद्रह-बीस आदमी उसे बीड़ी के लिए बहुत परेशान करते थे। वे जेब से बीड़ी निकालते, उसकी तरफ बढ़ाते, पकडऩे लगता तो हाथ खींच लेते। कभी बीड़ी में पटाखे का बारूद भर देते, बारूद तड़-तड़कर जलता तो तालियां पीटकर हँसते। कभी उसे बीड़ी दिखाते हुए कुछ दूर तक ऐसे ले जाते जैसे रोटी का टुकड़ा दिखाते हुए कुत्ते को ले जाया जाता है। परधान दीन हो आता,’दे यार, ना तंग कर।’ उन्हें दया आ जाती तो बीड़ी दे देते, नहीं तो परधान के उचककर पकडऩे से ठीक पहले बीड़ी तोड़ डालते। वह गुुस्से में गालियां बकने लगता,’मसखरी करेंदा हे भनत्तरीचोद…।’ अक्सर लोग हंसते रहते पर दो-चार बार ऐसा भी हुआ कि सामने वाले ने हाथ छोड़ दिया। जिस दिन ऐसा होता, परधान सारा दिन गालियां बकता रहता और उसकी घरवाली अपने हाथ को लानत की मुद्रा में तानकर उसे ही ‘पलूते’ निकालती रहती,”वे मोया, मर क्यूँ नी वैंदा, लोकां दियां गालियां खाने, मार खाने, तैकू शरम नईं आंदी, ओ रब हा…कडण ए मरसी ते कडण सोने दा सेझ उभरसी।’’ (मर क्यों नहीं जाता, लोगों की गालियां सुनता है, मार खाता है, तुझे शर्म नहीं आती, हे भगवान, कब ये मरेगा, कब सुनहरी सुबह उगेगी)। फिर परधान की गालियों की बंदूक का रुख़ उसकी तरफ़  हो जाता। वह अपनी पत्नी को पीटता जाता और ईश्वर से जल्दी ही सोने में मढ़ा दिन उगाने की गुहार लगाता, जिसेे जाहिर है उसकी पत्नी की मृत्यु पर ही उगना था। भद्दी गालियों और एक दूसरे को दिए जाने वाले शापों में पूरा दिन बीत जाता। अगले दिन से परधान की पुरानी दिनचर्या शुरू हो जाती।

परधान शराब का भी शौकीन था पर शराब पर भी वह जेब से पैसे खर्च नहीं कर सकता था। बीड़ी या शराब के लिए उसे कोई कहीं भी ले जाए, वह तैयार रहता था। असल में वह गांव-भर के लिए मनोरंजन का सामान था और मनोरंजन के लिए दो-चार बीडिय़ां या थोड़ी शराब कोई ज़्यादा कीमत नहीं थी। गांव का पूर्व सरपंच जो तबीयत से घुमक्कड़ था, कई बार उसे अपने साथ घुमाने ले गया था। वे दिन परधान के लिए बड़े अच्छे दिन होते थे। पूर्व सरपंच स्वभाव से दयालु था, उसके लिए परधान मनोरंजन का साधन मात्र नहीं था; बल्कि वह उसके प्रति एक आत्मीयतापूर्ण लगाव भी महसूस करता था। उसकी संगति में परधान को कभी बीड़ी-शराब की कमी नहीं आई। उम्र और घर की जिम्मेदारियां बढऩे के कारण अब उसने घूमना लगभग बंद कर दिया था, फिर भी गली से गुजरते हुए वह परधान को बिना तंग किए बीड़ी जरूर पिलाकर जाया करता था। एक और आदमी था सेवाराम जो अब अपने बच्चों के साथ शहर में रहता था। जमीन की देखभाल के लिए महीने-बीस दिन में एकाध बार गांव आता था। वह जब भी आता, परधान को दो-चार पैग शराब मिलती और बहुत सारी बीडिय़ां। गांव के ये दो आदमी ऐसे थे, जिन्हें परधान बहुत पसंद करता था।

परधान सारा दिन चबूतरे पर ही नहीं बैठा रहता था। वह अपनी जूती चटखाता हुआ गांव में निकल जाता और जब लौटता तो रस्सियों के टुकड़े, टूटी-फूटी ईंटें, गत्ते के डिब्बे यानी वह सारा सामान गलियों से चुन लाता जो लोगों के लिए बेकार होता था। सत्तर-पचहत्तर साल का परधान गरीब नहीं था। उसके परिवार के पास पचास एकड़ ज़मीन थी; पर लोग कहते हैं, हर आदमी की किस्मत में सुख भोगना नहीं लिखा होता, परधान की किस्मत में भी नहीं लिखा है। उसका बेटा जयकिशन इस समय गांव का पंच था। थोड़ी दूरी पर उसकी शानदार कोठी थी, आने-जाने के लिए उसने जीप रखी हुई थी। उसे अपने बाप की हरकतों से सख्त चिढ़ थी और वह अपने बाप को कलंक की तरह ढो रहा था। पंच बनने के बाद उसने एक ट्रॉली ईंटों के टुकड़े परधान के घर से उठवाकर निर्माणाधीन पशु अस्पताल की नींव में डलवाए थे। कितनी ही बार वह अपने बाप को बीडिय़ों के बंडलों के पुड़े, अंग्रेजी शराब की बोतलें, नए कपड़े, नई जुतियां लाकर दे चुका था पर वह हमेशा उन्हें वापस कर देता। पैसा खर्च होते देख उसका दिल कटता था। पंच बेटे के लिए परधान शर्मिंदगी का कारण था। वह कितनी बार लोगों से प्रार्थना कर चुका था कि इसे बीड़ी मत दो, इससे बात मत करो, पर लोग इतने सस्ते मनोरंजन को छोड़ देने के लिए तैयार नहीं थे।

…गर्मियों के दिन थे, शाम का समय। परधान बाहर चबूतरे पर बैठा था। उसके घर के सामने साहबराम का घर था। साहबराम के बेटे ऊंटगाड़ी में खलिहान से सरसों भर कर लाए थे। गली में खड़ी गाड़ी में जुता ऊंट सामने रखे ‘नीरे’ में मुँह मार रहा था। साहबराम के परिवार के लोग तसलों और बाल्टियों से सरसों घर में ढो रहे थे। गाड़ी के पहियों के आगे एक-एक साबुत ईंट रखी हुई थी कि गाड़ी खिसके नहीं। थोड़ी देर पहले पूर्व सरपंच परधान को बीड़ी जलाकर दे गया था। परधान बीड़ी को दो उंगलियों के बीच दबाकर, मु_ी बंद किए कश पर कश ले रहा था, पर धुएं को भेदती उसकी आंखें उन साबुत ईंटों पर टिकी थीं। जब बीड़ी उंगलियों में दबाने लायक  नहीं रही तो उसने बीड़ी फेंक दी। पल भर कुछ सोचता बैठा रहा, फिर उठा और गाड़ी के टायर के सामने लगी ईंट खींच ली। वहां ज़मीन नीची थी, ईंट खिसकते ही गाड़ी फिसल गई। बेखबर ऊंट गाड़ी का झटका संभाल नहीं पाया और गिरकर टूट गया, सरसों गली की मिट्टी में बिखर गई। देखते ही देखते साहबराम के बेटों ने परधान को लाठियों से मार-मारकर लहूलुहान कर दिया। लाठियों का वार रोकने की कोशिश में उसके एक हाथ की उंगली टूट गई। आक्रमण जब रुका तो परधान ने पाया कि एकत्र हो गए लोगों की भीड़ में उसका पंच बेटा भी है। उसके तेवर देखकर परधान को लगा कि वह भी उसे मारेगा। उसका संदेह सही साबित हुआ। उसके बेटे ने साहबराम के बेटे से लाठी छीनी और अपने बाप की पीठ पर दे मारी। परधान रोया नहीं, बल्कि एक अपराधबोध से भर गया। लोगों ने पंच के हाथ से लाठी छीन ली। परधान ने अपने बेटे की आंखों में आंसू देखे तो सिसकने लगा। उसी समय परधान के पंच बेटे ने सरसों और ऊंट के नुक्सान के बदले पचास हजार रुपये देने की हामी भरी। चार दिन तक परधान को शहर के अस्पताल में रहना पड़ा। दो महीने तक उसकी बीवी उसके जख्मों पर मरहम लगाती रही और उसके मरने की दुआ मांगती रही। जख्मों के ठीक होने के बाद भी परधान पहले की तरह हर वक्त चबूतरे पर बैठा नहीं दिखता। जहां पहले उसके बारह-चौदह घंटे चबूतरे पर कटते थे, अब बमुश्किल घंटा-दो घंटे वह चबूतरे पर आता। गली में अब एक खालीपन था जो लोगों को खलने लगा था। लोग अब अक्सर उसे घर से बुला लेते। कई बार वह घर से बाहर आता तो कई बार उसकी बीवी की गालियां। परधान अब आते ही लोगों से बीड़ी नहीं मांगता था बल्कि वह लोगों को पहले बैठने के लिए क���ता और उम्मीद करता कि जब सामने वाला खुद बीड़ी पिएगा तो उसे भी पिलाएगा, अक्सर यही होता भी। गांव की गलियों से रस्सियां, ईंटें आदि बटोरना उसने छोड़ दिया था।

…फागुन का महीना था। एक रात आठ-साढ़े आठ बजे दो आदमी परधान को सँभाले हुए पंच की कोठी में लाए। उसके माथे पर खून छलक रहा था और वह कुछ बड़बड़ा रहा था। उन लोगों ने पंच को बताया कि परधान उनकी गली में गिरा पड़ा था, किसी ईंट से ठोकर खा गया होगा। आज सेवाराम गांव में आया हुआ है, शायद उसी के पास पैग-वैग लेने गया होगा। सुनते ही बेटा तैश में आ गया और बाप को कंधों से पकड़ झिंझोड़ता हुआ चिल्लाया, ‘शरम आंदी हे तैकू अब्बा…! रात दे टैम शराब वास्ते मरण टोर पियें। अखां तू दिसदा नईं ता जरूरी हे घरू निकलणां…मैं तैकू मना कीता हाई ना घरू निकलण वास्ते, वत क्यूं गियों तू?’ (शर्म आती है तुझे अब्बा ! रात के समय शराब के लिए मरने निकल पड़ा तू, आंखों से दिखता नहीं तो घर से निकलना ज़रूरी है क्या…मैंने तुझे घर से निकलने के लिए मना किया था, फिर क्यों गया तू?) यह इल्ज़ाम सुनकर परधान तिलमिला गया। चोट का दर्द भूल करुण स्वर में बोला,’ओ भलेमाणसा, मैं शराब पीवण कोयना गिया हामी … मैकू ता सेवाराम दे आए दा पता ही कैनी…मैं ता श्रीचंद दे घर वैंदा पिया हामी…भिरा हूंदा ओमी जो मर गिये शोदा, जुआन मौत हे, मैडा फर्ज नी बणदा वंजण दा ?’ (ओ भलेमानस, मैं शराब पीने नहीं गया था…मुझे तो सेवाराम के आने का पता ही नहीं… मैं तो श्रीचंद के घर जा रहा था…उसका भाई ओमी जो मर गया है बेचारा, जवान मौत है, मेरा फर्ज नहीं बनता क्या जाने का ?)

‘मैं आपे निभा लैसां फर्ज। चल घर, होण जे तू घरू निकला ना ता चंगा कोयना होसी।’ (फर्ज मैं अपने आप निभा लूंगा, घर चल, अब जो तू घर से निकला तो ठीक नहीं होगा) बेटा उसे लगभग धकेलता हुआ उसके घर छोड़ आया।

अब परधान घर में कैद था। कोई बुलाता तो भी बाहर नहीं जाता। मन करता तो कुछ मिनटों के लिए चबूतरे पर आता, इधर-उधर देखता, फिर घर लौट जाता। बीड़ी की अब उसे तलब ही नहीं होती थी। कभी-कभी हुक्का भर लेता तो कभी पत्नी से लड़ लेता। पति-पत्नी एक-दूसरे से व्यर्थ में ही खीझे रहते। पत्नी जब कभी बेटे के घर चली जाती तो उसके लौटने पर परधान के मुंह से गालियां चिंगारियों की तरह फूटने लगतीं। वह घर के कच्चे आंगन में लगातार थूकता जाता और दांत पीसता जाता। दोनों ही एक-दूसरे को कोसते और सोने की सुबह के उगने की दुआ मांगते…और फिर एक दिन वह सुबह उगी। परधान की पत्नी परलोक सिधार गई। जिस सोने की सुबह की कामना परधान हमेशा करता रहा था, उस सुबह ने उसकी जिंदगी में ऐसा अंधेरा भर दिया कि अब उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं देता था। वह चारपाई पर अकेला पड़ा रहता। उसे बार-बार और जगह-जगह अपनी लड़ाकी पत्नी दिखती, उसे उसके ‘पलूते’ याद आते। कोई साठ बरस का उनका साथ रहा था। परधान का जन्म तत्कालीन पाकिस्तान के मुल्तान जिले के दुनियापुर गांव में हुआ था। उसके बाप के पास पचास एकड़ बहुत उपजाऊ जमीन थी। उर्दू की दो जमातें दीवानचंद (परधान का यही असली नाम था) पढ़ा था, फिर खेती के काम में ही लग गया था। उसके खेत के साथ अकरम के खेत लगते थे। उनके पास सात एकड़ जमीन थी, उसके बाप ने खेत में ही घर बना रखा था। दीवानचंद अक्सर अकरम के घर चला जाता। अकरम उसका हमउम्र था। वह और उसका बाप दोनों हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाते और बेचते थे। उनके घर का आंगन मूर्तियों से भरा रहता। बहुत बार वह भी इस काम में अकरम का हाथ बंटाता। उसे इस काम में बहुत मजा आता। वह चाहता था कि वह भी मूर्तियां बनाकर बेचे पर उसके पिता ने उसकी इस इच्छा पर उसे बहुत डांट पिलाई थी। पिता इलाके के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे और यह काम उनकी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं था। अपनी इच्छा तो वह पूरी नहीं कर पाया पर अकरम उसका बहुत गहरा दोस्त बन गया। दीवानचंद चौदह का था जब उसकी बारात भोभतपुर में गई थी। अकरम भी बारात में गया था…परधान को अपनी पत्नी के साथ अकरम भी बेतरह याद आया। जब मुल्क बँटा, परधान सत्रह बरस का था। सब तरफ मारकाट शुरू हो गई थी। आसपास के गांवों से रोज ‘हमले’ की खबरें आतीं। हिंदुओं के घरों से माल-असबाब, ढोर-डंगर आदि सरेआम लूटे जा रहे थे। असली आफत तो औरतों पर टूटी थी। जगह-जगह औरतें इज़्जत बचाने के लिए नदियों में कूद रही थीं या अपने आप को आग के हवाले कर रही थीं। परधान के गांव के सारे हिन्दू मियां इलाहीबख्श की हवेली में रहने के लिए आ गए थे। इलाहीबख्श ने उनके साथ वादा किया था कि उसके जिंदा रहते हिंदुओं का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। इलाहीबख्श इलाके का बड़ा ज़मींदार था। उसके चार बंदूकधारी कारिंदे हर वक़्त पहरे पर तैनात रहते, पर वे लोग फिर भी $खौफज़दा रहते। उन्हें लगता, हमलावर दस्ते किसी दिन मियां इलाही बख्श को भी मार डालेंगे। हवेली के जिस हिस्से में औरतों का बसेरा था, वहां बड़ी मात्रा में मिट्टी का तेल रखा हुआ था ताकि अगर नौबत औरतों की इज़्ज़त पर हाथ डालने तक आ पहुंचे तो तुरंत ही इज़्ज़त बचाई जा सके। दिन में कई बार कई जत्थे ‘अल्लाहो अकबर’ के नारे लगाते हुए हवेली के पास से गुजरते। जब भी ऐसा होता, दहशत पसर जाती, औरतें मिट्टी के तेल के गैलन संभालने लगतीं, मर्द लाठियां। ख़बरें पहुंचतीं कि गोरखा और सिख मिलिट्री के संरक्षण में हिंदुओं के बहुत से काफिले हिंदुस्तान के लिए रवाना हो चुके हैं। उस गांव के लोगों को भी मिलिट्री का इंतजार था।

…और फिर एक दिन उनके गांव के लोगों का काफिला भी हिंदुस्तान के लिए निकला। काफिला चार बंदूकधारी सिक्ख फौजियों के संरक्षण में था। उस काफिले को मैलसी पहुंचना था और वहां से लोगों को रेलगाडिय़ों में लदकर हिंदुस्तान जाना था। काफिले में शामिल सब लोग लुटे-पिटे भिखारियों जैसे लग रहे थे, जमीन, धन-दौलत, दोस्त सब पीछे छूट रहे थे…पर अब दोस्त कहां बचे थे…जिन मुसलमान दोस्तों पर लोगों को नाज था, वही कत्लोगारत और लूटपाट का कोहराम मचाने वाले दस्तों में शामिल हो गए थे। पता नहीं कभी लौट पाना संभव होगा कि नहीं…दीवान सोचता था और आंखें मसलता था। रास्ता अकरम के खेत के पास से होकर जाता था। काफिला वहां से गुजर रहा था कि दीवान के साथ सबने एक चीखती आवाज सुनी-‘हाय ओए दीवान आं….तैडे बिना कीवें जीसां…मैकू छोड़ के ना वंज ओए…’-अकरम दौड़ता हुआ आकर दीवान के गले लग गया। फौजियों ने उसे झट से उससे अलग किया। काफिला चलता रहा … अकरम की हूक भरी रुलाई की डोर पीछे मुड़-मुड़कर देखतीं दीवान की आंखों की पतंग को कंपाती रही।

…अकरम की वह हूक सदा के लिए परधान के दिल से चिपक गई है। अब वह अकेला है तो उसे सब याद आते हैं। मैलसी के रास्ते पर काफिले पर हुए हमले में ज़्यादातर लोग मारे गए थे, परधान के दो चाचा, दो बुआएं, मां-बाप तथा और भी कितने लोग…रास्ते में यह भी सुना कि मियां इलाहीबख्श को भी हिंदुओं को शरण देने के गुनाह के बदले हमलावर दस्तों ने आग में जिंदा जला डाला है… पर किसी के पास किसी के लिए रो लेने तक का अवकाश नहीं था। सब अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे।

यहां हिंदुस्तान में आकर परधान ने और सब लोगों की तरह कितने सालों तक मजदूरी की। अकरम का सिखाया हुनर भी उसके काम आया। मूर्ति बनाकर बेचने का काम जिस बाप की प्रतिष्ठा के लिए कलंक था, वह बाप तो रहा नहीं और भूखे पेट के सामने प्रतिष्ठा की कोई बिसात नहीं है। परधान ने दिल्ली शहर में मूर्तियां बनाकर बेचनी शुरू की। आठ-नौ साल बाद परधान को जमीन के बदले जमीन अलॉट हुई, वो भी एक ऐसे इलाके के गांव में जिसके बारे में कहा जाता था-जमीन एकसार नहीं, पेड़ फलदार नहीं। सारी जमीन झाडिय़ों से भरी पड़ी थी, ���दम-कदम पर सांप-गोह का खतरा था। शरणार्थी शब्द का प्रयोग उनके लिए स्थानीय लोग गाली की तरह करते थे। परधान को लगता कि उन लोगों का जन्म उजडऩे के लिए ही हुआ है और वे बार-बार उजड़ते ही रहेंगे। हर समय मुंह बाए खड़ी भूख और भविष्य में फिर से उजड़ जाने की आशंका ने उसे इस हास्यास्पद हद तक कंजूस बना दिया। अब उसके पास सब कुछ है। खेतों में फसल अच्छी होती है, बेटा पंच हो गया है, वह ख़ुद दो बार को-ऑपरेटिव सोसायटी का प्रधान रह चुका है (इसी कारण से वह परधान के नाम से जाना जाता है, नई पीढ़ी तो उसका असली नाम तक नहीं जानती) पर वह अब भी स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। उन लोगों को आज भी जिस नजर से देखा जाता है, वह नजर उसमें भय पैदा करती है।

…परधान आंगन में चारपाई पर लेटा हुआ था। उसे लगा आधी रात हो गई है पर नींद अब भी उसकी आंखों से घबराकर कहीं छुपी बैठी है। अभी-अभी वह अपनी यादों में जिंदगी के साठ बरस जी आया है … पत्नी की मौत के बाद बेटे ने उसे कोठी में आकर रहने के लिए कहा था पर उसी ने इन्कार कर दिया, आजकल पोता उसके लिए खाना दे जाता है। आज रात का खाना कमरे में ज्यों का त्यों रखा है, हर रोज खाने को अब मन ही नहीं होता, बीड़ी पिए तो अरसा हो गया … और किसी से बात किए … परधान का मन भर आया…। उसने आंगन की दीवार को देखा … दो छिपकलियों के अलावा कुछ नजर नहीं आया। उसे लगा, दुनिया में अब सिर्फ दीवारें और उनपर रेंगती छिपकलियां ही रह गई हैं, इन्सान कहीं नहीं बचे हैं। उसे अपने इन्सान होने पर भी शक होने लगा…वह इन्सान होता तो क्या उसे इतना भी मालूम न होता कि गांव में क्या हो रहा है… अनायास ही उसकी रुलाई फूट पड़ी…चादर में मुंह छुपाकर हिचकियां लेता रहा … कभी-कभी पड़ोस के मकान में रहने वाला रोशन हुक्का लेकर उसके पास आ बैठता था, गांव की खैर-खबर मिल जाती थी; पर वो भी अब कई दिन से नहीं आया। परधान अधीर हो उठा। उसका मन किसी से बात करने को तरस रहा था पर अब इस वक्त किससे बात करे? आधी रात हो गई होगी …पर मन नहीं माना …। वह उठा, धीरे से दरवाजा खोला और रोशन के घर में घुस गया। रोशन के घर में किवाड़ नहीं थे, बस कच्ची दीवार में एक द्वार बना हुआ था। द्वार लांघते ही आंगन था, उस आंगन में बिछी चारपाई पर रोशन सोया हुआ था। वह चारपाई के पायताने बैठ गया और धीरे से पुकारा, ”रोशन…रोशन !’’ उसका मन संभावित बातचीत के रस में विभोर था पर रोशन उठ ही नहीं रहा था। परधान बेचैन हो उठा। दो-तीन बार और पुकारा, जब वह नहीं उठा तो उसकी टांगें पकड़कर झिंझोड़ दिया और फिर तो जैसे कय़ामत ही आ गई। असल में उस चारपाई पर रोशन नहीं, उसकी पत्नी सोई हुई थी। रोशन तीन दिन से गांव में नहीं था, चारपाई पर आजकल उसकी पत्नी सो रही थी। रोशन की पत्नी ने शोर मचाया तो पड़ोसी जाग गए और फिर लानत, मलानत, गालियों, तानों के बाद अपमानित, प्रताडि़त परधान सिर झुकाए अपना दरवाजा खोलकर भीतर गया और चारपाई पर औंधा होकर रोने लगा।

रोशन के आने के बाद दूसरे दिन शाम को पंचायत भवन में पंचायत जुड़ गई। लगभग पूरा गांव ही वहां मौजूद था। फैैसला सरपंच, पंचों और गांव के बुज़ुर्गों को करना था। रोशन पूरे गुस्से में था। परधान बार-बार पहले अपनी बात सुने जाने की गुहार लगा रहा था और बेटा बार-बार उसे डांटकर चुप रहने का आदेश दे रहा था। सरपंच परधान के बेटे से मुखातिब हुआ,’बोलो मेम्बर साहब, आपके बाप की इस करतूत पर आप क्या कहते हो ?’

‘मैं क्या कहूं …मुझे तो शर्म आती है कि मैं इस आदमी की औलाद हूं …पंचायत जो फैसला करे, मुझे मंजूर है।’ उसका चेहरा अपमान से लाल हो गया था। तभी परधान उठा और अपने हमउम्र बुजुर्गों के पैरों में सिर रख रोने लगा। एकबारगी वहां मौजूद सारे लोग दहल गए। परधान रोते-रोते उठा, सारे लोगों के सामने हाथ जोड़कर बोला, ‘हिक वारी मैडी गल सुणो…ओए मैं बुड्ढा ठेरा, इहो जिहा इल्जाम ता ना लाओ, भावें मैडी जान कढ लओ। मैं कल्हा पिया-पिया अक गिया हामी … मैडा जी कीता मैं रोशन नाल गल करां…मैं हीं वास्ते हूंदे कोल गिया हामी कि भई मैडे नाल गल कर, नईं ता मैं मर वैसां। रोशन उस्से मंजी दे रोज समदा हे। मैकू किहां पता हाई जो अज ऐ कैनी सुत्ता पिया। मैं जूठ नीं बुलेंदा पिया…मैकू मैडे पोत्र दी सौंह…’(एक बार मेरी बात सुनो, ओए मैं बूढ़ा, ऐसा इल्जाम तो न लगाओ, चाहे मेरी जान ले लो। मैं अकेला पड़ा-पड़ा ऊब गया था। मेरा मन किया कि मैं रोशन से बात करूं… इसी कारण मैं उसके पास गया था कि मेरे साथ बात कर, नहीं तो मैं मर जाऊंगा। रोशन उसी चारपाई पर रोज सोता है। मुझे क्या पता कि आज वह नहीं सोया हुआ। मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ, मुझे मेरे बेटे की कसम…) उसने बेटे के सिर पर हाथ रख दिया। तभी उत्तेजित रोशन चिल्लाकर बोला, ‘देखो गांव वालो परधान का सांग! तीन-चार साल पहले ये जंगल-पाणी गया तो श्योपत की छोरी के पास सरसों में जा बैठा। तब तो पंचायत ने सोचा कि चलो दीद कमजोर है, नहीं दिखी होगी छोरी, पर तुम सोचो, गर्मियों के दिन … कौन कपड़ा ओढ़ता है … इसको यह भी पता नहीं चला कि खाट पर आदमी सो रहा है कि लुगार्इ … और फिर यह तो बताओ, कौन आधी रात को बात करने के लिए किसी पराए घर में घुसता है ?’

परधान चिल्ला-चिल्लाकर अपने बेकसूर होने की दुहाई देता रहा। उसकी चीख- पुकार के बीच रोशन ने अपना फैसला सुना दिया,’पंचायत जो चाहे फैसला करे, मैं तो परधान को जूतियों का हार पहनाऊंगा। अगर परधान या उसका पंच बेटा इस फैसले से सहमत न हों तो मैं थाने में रपट लिखाऊंगा और परधान को जेल की चक्की पिसवाऊंगा।’ पंचायत में हलचल मच गई। सरपंच ने रोशन को इस फैसले पर फिर से सोचने को कहा, परधान के बुढ़ापे का वास्ता दिया, पर रोशन टस से मस न हुआ। पंचायत में मौजूद सब लोग समझ रहे थे कि रोशन जूतियों का हार पहनाने पर क्यों अड़ा है। असल में रोशन का भतीजा अनिल तीन साल पहले एक लड़की के साथ जबरदस्ती के जुर्म में यही सजा भुगत चुका था। तब रोशन ने लड़की के बाप के पैरों में अपनी पगड़ी रख दी थी पर वह उसकी बात नहीं माना था और आज रोशन किसी की बात नहीं मान रहा है, बेशक उस मामले से परधान या उसके बेटे जयकिशन का कोई लेना-देना नहीं था पर लड़की इन्हीं की बिरादरी की थी। झूठा या सच्चा, आज जातीय अपमान चुकाने का मौका हाथ लग गया है तो वह उसे क्यों छोड़े ?

…जूतियों का हार पहने अपने बाप की कल्पना करके जयकिशन पसीने से नहा गया। उसे लगा वह पत्थर का होता जा रहा है, शरीर का सारा सत निचुड़ रहा है। उसने ठीक अपनी मां की तरह अपने दाएं हाथ की हथेली लानत की मुद्रा में अपने बाप के मुंह पर दे मारी और रोते हुए बोला,’तैं मैकू सारी जिंदगी दी जिल्लत दे दिती हे अब्बा…! मैं जींदे जी मर गिया हां…।’ फिर उसी झटके में अपनी जूती निकालकर रोशन की तरफ बढ़ा दी,’मेरे सिर में मार चाचा, जब तक तेरा गुस्सा ठंडा न हो जाए।’ पर रोशन नहीं माना। तब जयकिशन एक झटके से उठा और अपने घर की तरफ दौड़ता चला गया। दो मिनट बाद ही लोगों ने देखा कि वह अपनी बेटी का हाथ पकड़े लगभग घसीटता हुआ पंचायत में पहुंचा और उसे रोशन की तरफ धकेलता हुआ बोला, ‘तू इसको ले जा और रात भर अपने पास रख…।’  कुछ लोगों की सिसकियां निकल गई, विरोध में एक शोर हवा में तैरने लगा। तभी परधान गरजा-जैसे किसी भारी-भरकम बाज़ ने डैने फडफ़ड़ाए हों,’तू वंज छोरी घर, सुण रोशन! तू थाणे वैंदा हें ता वंज…आया हे वडा लाटसाब।’ (तू जा लड़की घर, सुन रोशन! तुझे थाने जाना है तो जा, आया है बड़ा लाटसाब)।

पंचायत के उखडऩे की संभावना बन गई। उधर, जयकिशन एक पल में सारे भविष्य का नक्शा देख गया। जूतियों की माला का प्रकरण तो पांच मिनट में निपट जाएगा, फिर गांव भर की सहानुभूति भी दिखाई पड़ रही है, शायद मौके पर रो��न का मन बदल जाए पर आज अगर यह थाने चला गया तो मामला पूरी तरह हाथ से निकल जाएगा, इस बुढ़ापे में बाप जेल में रहेगा कैसे? उसने अपने बाप को डांटकर चुप करवा दिया और रोशन से बोला,’तू बोल चाचा, क्या कहता है?’ रोशन ने जयकिशन की ओर तर्जनी तान दी,’यह बात ठीक नहीं, तेरी-मेरी छोरी में क्या फर्क है’, उसने लड़की को, जो अब तक पत्थर की तरह जड़ हुई खड़ी थी, घर जाने का इशारा करते हुए कहा,’कसूर परधान का है, उसको कल बारह बजे मैं जूतियों का हार पहनाकर बस-अड्डे तक लेकर जाऊंगा।’ उसके अडिय़ल रवैये को देख जयकिशन ने सर झुका लिया, मानो फैसले को मौन स्वीकृति दी हो। पंचायत उखडऩे लगी, लोग घरों को जाने लगे। ज़्यादातर लोगों की सहानुभूति परधान के साथ थी, पर हालात ऐसे बन गए थे कि कोई भी रोशन को कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं था। परधान उठा और बांहों को ऐसे झटकाता हुआ चला जैसे वे बांहें नहीं, जलती लकडिय़ां हों, जिनसे वह सारे गांव को आग लगाने जा रहा हो। जयकिशन कोठी में लौट आया। वह भयानक अन्तद्र्वन्द्व में था। क्या उसका बाप सचमुच ऐसा है…पर जिस प्रखरता से वह अपने ऊपर लगे आरोपों को नकार रहा था, उससे तो ऐसा नहीं लगता। कहीं पंच ने अपनी छवि को उज्ज्वल रखने के लिए बाप को बलि तो नहीं चढ़ा दिया…जयकिशन को कुछ समझ में नहीं आ रहा था…उसका दिल कहता था उसके बाप के साथ ज्यादती होने जा रही है, पर वह करे तो क्या करे। जयकिशन की आंखों के सामने कल का संभावित दृश्य आ रहा था। उसकी आंखें बह रही थीं। इस परेशानी में भी कब खाट पर पड़े-पड़े नींद आ गई, उसे पता ही नहीं चला। रात भर सपने में जूतियों की माला पहने रोता बाप ठहरा रहा। सुबह वह उठा तो मन बहुत भारी था। बाप जैसा भी है, है तो बाप ही। आज से पहले कभी बाप के लिए इतनी तड़प नहीं जागी, आज उसका मन बाप से मिलने को कर रहा है। उसने पत्नी को रोटी बनाने के लिए कहा। आज बेटे की बजाय वह खुद बाप को रोटी देने जाना चाहता था। अभी वह सब सोच ही रहा था कि सेवाराम ने आवाज लगाई और बिना उत्तर का इंतजार किए बैठक में घुस आया। जयकिशन ने उसके पांव छूते हुए पूछा,’आप कब आए चाचा ?’

‘तू मेरी छोड़, पहली बस आठ बजे आ जाती है, अब आठ पैंतीस हो रहे हैं। मैं ये सुन क्या रहा हूं? तू पंच बन गया तो क्या भगवान हो गया। बाप तो वो तेरा है, पर मैं उसको तेरे से ज्यादा जानता हूं। वो कंजूस व लालची चाहे जितना हो, इतना कमीना नहीं है। मुझे तो हैरानी है कि तूने इस फैसले को मान कैसे लिया। रोशन थाने जाता है तो हज़ार बार जाए पर ये सब…नहीं…नहीं…’ सेवाराम का सिर जोर-जोर से ‘न’ में हिल रहा था। जयकिशन हल्का हो आया, लगा जैसे टीसता फोड़ा फूट गया हो।

थोड़ी देर बाद सेवाराम और जयकिशन ने परधान के मकान में प्रवेश किया। दरवाजा अंदर से खुला ही था। सामने आंगन में चारपाई थी-खाली। जयकिशन ने सोचा शायद बाप शौच आदि के लिए कुई में गया हो पर सामने कुई का दरवाजा खुला पड़ा था और उसमें कोई नहीं था। जयकिशन ने बैठक में देखा, वहां भी कोई नहीं था। उसका मन हिचकोले खाने लगा…कहीं उसका बाप रात को कहीं भाग तो नहीं गया है। तभी सेवाराम ने उसका ध्यान एक तरफ खुदे हुए आंगन की ओर खींचा। उसने देखा-आंगन खुदने से वहां एक गड्ढा हो गया है पर उस गड्ढे की मिट्टी…। दोनों एक साथ लगभग दौड़ते हुए भीतर के कमरे में घुसे। उन्होंने देखा-परधान फर्श पर चित्त पड़ा है …उसके पास मिट्टी की तीन गीली मूर्तियां बनी रखी हैं। इनमें से एक मूर्ति एक औरत की थी जिसकी शक्ल जयकिशन की मां से मिलती थी। परधान का कलाई के पास से मुड़ा दायां हाथ जैसे उसे घेरे में लिए हुए था। दो मूर्तियां पुरुषों की थीं। इन दोनों मूर्तियों के गले में एक-एक जूती का हार डला हुआ था। ये वही जीर्ण-शीर्ण जूतियां थीं जो परधान पहना करता था। इनमें से एक मूर्ति तो निश्चय ही रोशन की होगी-जयकिशन ने सोचा…और दूसरी…उसकी है या…उसने सोचा और कांप गया।

‘अब्बा…!’ जयकिशन ने पुकारा और परधान की बांह पकड़कर उठाने लगा। बांह वापस जमीन पर जा लुढ़की। उसकी चीख निकल गई। उधर सेवाराम ने एक बीड़ी निकालकर परधान के मरे हुए होठों के बीच फंसा दी। माचिस से तीली जलाई। तीली की लौ तथा सेवाराम के हाथ कांपते हुए बीड़ी तक पहुंचे। उसने लौ बीड़ी के पास ले जाते हुए कहा, ‘ले परधान बीड़ी जला…!’

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-अप्रैल, 2018), पेज- 14  से 18