उत्पीड़न घटना नहीं, बल्कि एक विचारधारा है

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विकास साल्याण

IMG_0538.jpgसत्यशोधक फाऊंडेशन और डा.ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान, कुरुक्षेत्र की ओर से डा. भीम राव अंबेडकर और जोतिबाफुले के जयंती के उपलक्ष में एक विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसका विषयमौजूदा दौर में दलित उत्पीड़न के आयाम। इसमें मुख्य वक्ता के तौर पर प्रख्यात दलित चिंतक और जन मीड़िया के संपादक अनिल चमड़िया थे। उन्होंने बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा सविधान सभा के समक्ष भाषण का जिक्र करते हुए अपनी बात की शुरुआत की।उन्होंने जॉन स्टुअर्ट मिल की चेतावनी का उल्लेख कियाअपनी स्वतंत्रता को एक महानायक के चरणों में समर्पित करें या उस पर विश्वास करके उसे इतनी शक्तियां प्रदान कर दें कि संस्थाओं को तबाह करने में समर्थ हो जाए। आज भारतीय लोकतंत्र में जिस तरह से नायकों की पूजा हो रही है और जन साधारण की आवाज गुम हो रही है उनकी चेतावनी याद आती है और लोकतंत्र के रक्षकों को अपना कर्तव्य की निभाने की आह्वान कर रही है।

धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति और मोक्ष का मार्ग हो सकता है , लेकिन राजनीतिक क्षेत्र में भक्ति या नायक पूजा पतन और तानाशाही का मार्ग होता है। उन्होंने कहा ने कि डा. अंबेडकर के विचारों पर हम सीमित दायरे में हम बात करते हैं, इसे तोड़कर एक बड़े दायरे में बात करने की आवश्यकता है। डा. अंबेडकर ने जातपात तोड़क मंडल के लिए तैयार किए अध्यक्षीय भाषण में जिसे एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया था उसके पहले ही पन्ने पर एक स्कोटिश दार्शनिक और कवि की पंक्तियों का उल्लेख किया थाजो तर्क नहीं करेगा वो धर्मान्ध है, जो तर्क नहीं कर सकता वो मूर्ख है और जिसमें तर्क करने का साहस नहीं है वह दास है।IMG_0542

अनिल चमड़िया ने कहा कि उत्पीड़न घटना नहीं, बल्कि एक विचारधारा है। हम उत्पीड़न की जब हम बात करते हैं तो हम घटनाओं की बातकरते है तो उसकी जड़की और विमर्श की बात नहीं करते। हमेशा उत्पीड़न की अनेक घटनाओं का जिक्र करके उत्पीड़न की गाथा का वर्णन करते हैं।  उत्पीड़न की घटनाएं क्यों होती है उसके क्या कारणों और उसके कारणों की गहराई तक जाना चाहिए और इन उत्पीड़न के कारणों को दूर करने के जो रास्ते हमने निकाले थे वो क्यों विफल हुए इसकी तह तक हमें जाना चाहिए और मंथन करना चाहिए।

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ड़ा. भीमराव अंबेडकर की समग्र विचारधारा को एक बिन्दू या एक शब्द में कहे तो वो क्या चाहते थेवो समतामूलक समाज का निर्माण करना चाहते थे। दूसरी तरफ उनके समकालीन बाल गंगाधर तिलक भी एक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं जिनका मानना था कि जो स्त्री और अछूत के लिए शिक्षा राष्ट्र हित में नहीं है। यह वह दौर था जिसमें धर्म और राष्ट्र को परिभाषित किया जा रहा था उसकी व्याख्या की जा रही थी। ठीक इसी समय जोतिबा फुले और अंबेडकर जैसे जनबुद्धिजीवी अछूतों और स्त्रियों की शिक्षा के लिए ढांचे बना रहे थे। जोतिबा फुले और सावित्री बाई फुले स्कूल खोल रहे थे और दलितों स्त्रियों की शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे।

दलित उत्पीड़न का इतिहास बहुत पुराना है और लम्बे समय से उत्पीड़न हो रहा है पर आज के दौर में जो उत्पीड़न हो रहा है उसमें उत्पीड़न भी हो रहा है और उत्पीड़क गर्व भी किया जा रहा है। अर्थात मारा भी जाएगा और रोने भी नहीं दिया जाएगा। आज का उत्पीड़न राजनीतिक हमला है।यदि इस दृष्टि से नहीं देखेंगें तो इसको तो समझ पाएंगें और ही इसके बारे में एक नजरिया नहीं बन पाएगा। जैसे रोहित वेमुला की हत्या कैसे हुई उसे समझना होगा। रोहित वेमुला समाज को बदलने और सामाजिकसंस्थाओं में गैरबराबरी की स्थिति को खत्म करने के लिए संघर्ष कर रहा था।

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पीट पीट कर मारने की घटनाओँ की ओर संकेत करते हुए इसे सामाजिक न्याय की शक्तियों के खतरा बताया और १५ साल पहले हरियाणा के दुलीना पुलिस चौंकी से निकाल कर दलितों को मारे जाने की घटना का जिक्र करते हुए वर्तमान समय में इसके उभार के सामाजिकआर्थिक कारणों की ओर संकेत किया। उन्होंने कहा कि इसके कारण हमारे ढांचे में हैं उसे समझने की आवश्यकता है। डा. आंबेडकर और जोतिबा फुले का संघर्ष पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ था। आज इनका विकराल रूप सामने रहा है। न्याय की पक्षधर शक्तियों को संघर्ष करने के लिए एकजुट होने की आवश्यकता है।

इस परिचर्चा में प्रेम सिंह, विजय विद्यार्थी, डा. कृष्ण कुमार, राजविंद्र चंदी, रितू, सुमन ने भाग लिया। इसका संचालन अश्विनी दहिया ने किया और अध्यक्षता ओमप्रकाश करुणेश प्रोफेसर सुभाष चंद्र ने की।

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