17वीं लोक सभा के चुनावों की सरगर्मियाँ

सुरेंद्र पाल सिंह

ऐसे में क्या शुरू के चार सालों में नौकरियों के मामले में गोलमाल, कोर्ट केस, रिक्त स्थान, पैसा- सिफ़ारिश, मंत्रियों के भ्रष्टाचार, रोडवेज कर्मचारियों का दमन, पंचो सरपंचों का अपमान, गिनाने योग्य विकास का कोई बड़ा काम ना होना, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई विशेष कार्य ना किया जाना, नोटबंदी का झटका, बेरोज़गारी, जीएसटी की ज़्यादती, फ़सलों के पूरे दाम ना मिलना आदि आदि पहलू हमारे वोटिंग व्यवहार से अनछुए रह पाएँगे. क्या जनता भाजपा के संकल्प पत्र के नाम पर 2014 वाले जुमलों पर यक़ीन कर लेगी ? क्या काँग्रेस पार्टी का न्याय वाला घोषणापत्र कोई असर नहीं डाल पाएगा?

17वीं लोक सभा के चुनावों की सरगर्मियाँ पूरे उफान पर हैं. चर्चाएँ, अफ़वाह, क़यास, उत्सुकता, रैलियाँ, टीवी चैनल, फेसबुक, यूट्यूब, वहट्सप्प, अख़बार, बैठकें अपनी अपनी चरम सीमा को छू रहे हैं. कभी बड़ी बड़ी रैलियों की ख़बर मिलती हैं तो कभी फ़्लॉप शो की दोतरफ़ा व्याख्याएँ दिखाई देती हैं. जो भी हो मिला जुला कर इस चुनाव ने प्रत्येक भारतीय की नब्ज़ को एकबार तो अपने कब्जे में जकड़ लिया है.
जो व्यक्ति टीवी नहीं देखता, जो अख़बार नहीं पढ़ता, जो सोशल मीडिया में समय नहीं खपाता, जो गली-मुहल्ले- नुक्कड़, हुक्के, ताश आदि से दूर है या नज़दीक है सभी की व्याख्याएँ या आकलन भिन्न भिन्न मिलेगा. अधिकतम चैनल भाण्ड मीडिया की शक्ल अख़्तियार कर चुके हैं और केवलमात्र टीवी देखने वालों के ज़ेहन में जो तस्वीर उभर रही है उसके हिसाब से एक दिव्य पुरुष अपनी असीमित शक्तियों के साथ किसी भी प्रकार का चमत्कार करने में समर्थ है. बचपन से लेकर लगातार धर्म को बचाने के लिए समय समय पर अवतार के जन्म लेने की कथाएँ हमारे अवचेतन मन में इस प्रकार पैठ चुकी है कि सहज ही दिव्य पुरुष की परिकल्पना हमें रूचने लगती है.
16वीं लोकसभा के चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बड़ी सफलता हासिल की थी. उसके बाद लगातार मोदी जी की तस्वीर को योजनाबद्ध तरीके से एक महामानव के रूप में निखारा जाता रहा है. एक ऐसा पुरुष जो हर परिस्थिति में संकटमोचक है और देश को हर क्षेत्र में विश्वगुरु का दर्जा दिलाने में पूर्णतया समर्थ. आज भी भाण्ड मीडिया इसी राग को निर्बाध रूप से गा रहा है. ऊपर से एक बहुत बड़े पैमाने पर सत्तापक्ष की आइटी फ़ैक्टरी ने एक कुंठित, फ़ेक, छिछला, विकृत, घटिया स्तर के विमर्श को वैचारिक सिलसिले का सक्रिय हिस्सा बना दिया है. घर में बैठकर टीवी और सोशल मीडिया के भरोसे जो तस्वीर आमजन को दिखाई देती है उसके हिसाब से जहाँ नज़र डालो वहाँ एक ही रंग दिखाई देता है. हालाँकि सोशल मीडिया पर दूसरा पक्ष भी लगातार मोजूद है जो जनपक्ष के मुद्दों पर या सरकार विरोधी या व्यवस्था विरोधी पक्षों को प्रभावशील तरीके से उठाता है और बीच बीच में अनेकों यूट्यूब लाखों व्यक्तियों द्वारा देखी जाती हैं. पिछले 1-2 वर्षों से फेसबुक और वहट्सप्प पर भी विरोधी तेवर स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं जो पहले कहीं ना कहीं ट्रोल के आतंक से सहमे सहमे थे.
पिछले चुनावों और तत्कालीन लोक सभा के चुनावों के दौरान गंगा में बहुत सा पानी बह चुका है. देवताओं के सिंहासन अस्त व्यस्त भी हुए हैं . उनके अस्त्र शस्त्रों की धार कुन्द हुई हैं और देवलोक की अप्सराएँ अब उतना सुंदर नृत्य करने से विरत भाव दिखाने लगी हैं. इसी दौर में दिल्ली, बिहार और पंजाब के चुनावों ने कुछ भिन्न व्याकरण गढ़ी है. गुजरात के चुनाव ने मोदी जी को पसीने से तर बतर कर दिया और बहुत मुश्किल से शहरी वोटरों के बूते से इज़्ज़त सी बची है. गोवा और मणिपुर में छोटी पार्टी होने के बावजूद येन केन प्रकारेण जोड़ तोड़ हुआ. फिर कर्नाटक में विधान सभा चुनावों के बाद समीकरण की राजनीति ने एक नया अध्याय खोला. इसी दौरान त्रिपुरा और असम के चुनावों ने भाजपा को नई ऑक्सिजन भी प्रदान की. बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान में हुए उपचुनावों के नतीजे और ताजातरीन छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश से भाजपा का उखड़ना, ये सब बँधी बधाई अवधारणों की पुनर्व्याख्या की दरकार करते हैं कि स्वर्ग में सब देवता अमर नहीं हैं.
चुनावों का अलग अलग तरीके से आकलन किया जा रहा है. दोनों तरफ़ के अतिवादी आकलन दिखाई दे रहे हैं तो कुछ संतुलित स्वरुप लिए हुए भी मिल रहे हैं. माहौल ऐसा हो चुका है कि थोड़ा सा भी गहराई में जाँचने पर पूर्वाग्रहों की प्रचुरता स्पष्ट दिखाई देने लगती है. फिर भी, इतना स्पष्ट है कि राजनैतिक पार्टियों की स्थिति राज्यवार भिन्न भिन्न है. कोई भी पार्टी सभी राज्यों में उपस्थित नहीं है. यहाँ तक कि बड़े राज्यों में भी क्षेत्र के हिसाब से राजनैतिक समीकरण अलग अलग है और इस प्रकार नतीजों का आकलन करते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि स्थानीय समीकरणों और डायनामिक्स को समझे बिना किसी निष्कर्ष पर पहुँचना अपरिपक्वता ही साबित होगा.
उपरोक्त सूत्रों को मद्देनज़र रखते हुए अब हरियाणा राज्य के परिदृश्य पर चर्चा की जाए. विस्तार में जाने से पहले इतना ज़िक्र करना आवश्यक लगता है कि सन् 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान भड़की हुई हिंसा-आगज़नी के ज़ख़्म भरने और एक बनाम पैंतीस के ज़हरीले समाज तोड़क प्रयास का विरोध करने के लिए सद्भावना मंच का समन्वयक होने के नाते क़रीब महीना- डेढ़ महीने तक राज्य में सघन भ्रमण से लेखक को हरियाणा के सामाजिक राजनीतिक धरातल को बेहतर समझने का मौक़ा मिला था. उस मौक़े पर पैदा हुई समझ आज भी कहीं ना कहीं राजनैतिक घटनाक्रम का विश्लेषण करने का सटीक औज़ार बनी हुई है. राज्य में म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव और उसके कुछ समय बाद जींद विधानसभा के उपचुनाव के नतीजे हमारे सामने एक ऐसा सबक़ है जिसके तार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जाट आरक्षण आंदोलन के घटनाक्रम से उपजी मानसिकता से जुड़ते हैं. और इस प्रकार इस सिलसिले से हमें आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए एक अंतर्दृष्टि भी मिलती है.

आज से साल दो साल पहले एक आम मान्यता बन चुकी थी कि हरियाणा की खट्टर सरकार एक बेहद निक्कमी सरकार हैं लेकिन आज के दिन यह धारणा है कि पूरे देश में अगर भाजपा सबसे मज़बूत स्थिति में है तो वो हरियाणा में है. ऐसा क्यों? आइए कुछ गहरे में विश्लेषण करने का प्रयास करें.

जरा याद कीजिएगा पिछले विधानसभा चुनावों के परिदृश्य को. सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के मुखिया राम रहीम ने भाजपा को समर्थन देने का ऐलान किया था और भाजपा को मिली जीत के बाद बहुत से लोगों का ये कहना था कि इस जीत का बड़ा श्रेय बाबा राम रहीम को जाता है. कुछ महीनों के बाद दिल्ली विधानसभा के चुनावों में डेरे के समर्थन का कोई असर भाजपा के पक्ष में दिखाई नहीं दिया. इस अंतर्विरोध को समझने के लिए हरियाणवी जन समुदाय की मानसिकता के डायनामिक्स को समझना पड़ेगा. एक लम्बे अरसे तक हुडा सरकार और उससे पहले चौटाला सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्य के प्रभुत्वशाली तबके को गाहे बगाहे अपने प्रभुत्व को मज़बूत करने का जो अवसर दिया गया उसकी प्रतिक्रिया का अँतरप्रवाह भी सामाजिक मनोविज्ञान के अनुसार चलता रहा. डेरे के अधिकतम प्रेमी समाज के उन तबक़ों से हैं जिन्हें सामाजिक संरचना के अनुरूप सम्माजनक स्थिति पाने की ललक रहती है और यह स्थान उनको डेरा सच्चा सौदा या इसी प्रकार से संत परम्परा से जुड़े डेरों से मिलती है. ये तबके चुनाव के दौरान दबंगता के विरुद्ध जैसा करना चाहते थे वैसी ही रास्ता डेरा प्रमुख ने भाजपा को समर्थन का ऐलान करके आसान कर दिया. लेकिन दिल्ली में सामाजिक समीकरण हरियाणा जैसे ना होने की वजह से वैसा फल नहीं मिल पाया.

कुछ समय बाद फ़रवरी 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा -आगज़नी ने हरियाणवी जनमानस की मानसिकता में पत्थर की लकीर जैसा काम कर दिया और पैंतीस बनाम एक के नाम पर सामाजिक विभाजन के नाम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का काम आसान हो गया. हिंदू हिंदू का राग अलापने वाली भाजपा को मुँह माँगी मुराद मिल गई. जहाँ एक और राजकुमार सैनी को पैंतीस के नाम पर अपने राजनैतिक करियर का भविष्य दिखाई दिया वहीं भाजपा ने अपने सधे अन्दाज़ में चुपचाप तरीके से इस राजनीति को सटीक औज़ार बना लिया गया. संसाधन, संगठन, राजनीतिक क़द, सत्ता और प्रचार की महारत के सहारे भाजपा इस मामले में राजकुमार सैनी से बहुत ऊपर है. शहरों में ग़ैर जाट समुदायों को एकजुट करने का सफल प्रयोग मेयर के चुनावों में किया जा चुका है. और जींद के उपचुनाव में इसी प्रयोग को ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तारित करने का अनुभव भी भाजपा को हासिल हो चुका है. बेशक इनेलो ने रोहतक मेयर चुनाव में और जींद में जजपा ने अपनी अपनी राजनीति की वजह से भाजपा की चुनावी राजनीति को अप्रत्यक्ष रूप से मज़बूत करने का काम किया है. कांग्रेस को अपने राजनैतिक चरित्र और सामाजिक आधार के हिसाब से इस राजनीति में स्वभाविक तौर पर तीसरे नम्बर पर रहना ही था. इसी दौरान डी ग्रेड की व पुलिस की नौकरियों में बिना सिफ़ारिश और पैसे के सिलेक्शन ने भाजपा के पक्ष में एक नया प्रचारात्मक व्याकरण गढ़ा जा रहा है. इसका भी लम्बे अरसे से सरकारी नौकरियों से वंचित रहने वाले समुदायों पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है.

अब सवाल यह उठता है क्या हरियाणा में आगामी लोकसभा चुनावों के लिए मुहावरे स्थापित हो चुके है और परिणाम भी इसी दिशा में होंगे? मेरे विचार से कुछ अन्य महत्वपूर्ण पक्ष हैं जिन पर मन्थन की आवश्यकता है. बड़ी पर्ची और छोटी पर्ची के चुनावों की मानसिकता एक सी नहीं होती है. पूरे चुनाव अभियान पर राष्ट्रीय स्तर पर जो मुद्दे बहस का हिस्सा बन रहे हैं उनका स्थानीय चुनावी व्यवहार पर सीधा असर पड़ता है. पुलवामा और बालाकोट के बाद मानो नरेन्द्र मोदी को मुँह माँगी ख़ैरात मिल गई है. भाजपा को अगर उपलब्धियों के आधार पर अभियान चलाना पड़ता तो लेने के देने पड़ जाते . लेकिन अब उसके पास पाकिस्तान, आतंकवाद, हिंदू-मुसलमान, राष्ट्रवाद जैसी भावनात्मक लफ़्फ़ाज़ी है. इसी प्रकार हरियाणा में कुछ नौकरियों में फ़ेयर सिलेक्शन और कुछ प्रशासनिक सुधारों के अलावा दावा करने के लिए केंद्र सरकार की तरह राज्य सरकार के पास कुछ विशेष नहीं है.

ऐसे में क्या शुरू के चार सालों में नौकरियों के मामले में गोलमाल, कोर्ट केस, रिक्त स्थान, पैसा- सिफ़ारिश, मंत्रियों के भ्रष्टाचार, रोडवेज कर्मचारियों का दमन, पंचो सरपंचों का अपमान, गिनाने योग्य विकास का कोई बड़ा काम ना होना, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई विशेष कार्य ना किया जाना, नोटबंदी का झटका, बेरोज़गारी, जीएसटी की ज़्यादती, फ़सलों के पूरे दाम ना मिलना आदि आदि पहलू हमारे वोटिंग व्यवहार से अनछुए रह पाएँगे. क्या जनता भाजपा के संकल्प पत्र के नाम पर 2014 वाले जुमलों पर यक़ीन कर लेगी ? क्या काँग्रेस पार्टी का न्याय वाला घोषणापत्र कोई असर नहीं डाल पाएगा?

समग्रता में आकलन करते हुए कुछ निष्कर्षों तक पहुँचा जा सकता है.
1. चुनावों में जनता के व्यवहार का मूल्याँकन आसान नहीं होता है. 2004 के चुनावों में शाइनिंग इंडिया के ग्लैमर को जनता ने अप्रत्याशित रूप से धता दिखा दिया था. इसी प्रकार अभी अभी छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों के परिणाम तमाम आकलनों के विपरीत मिले.
2. गुजरात के विधानसभा चुनाव में बेशक भाजपा जीत गई है लेकिन इसने स्पष्ट कर दिया कि जनता को अपने जीवनस्तर के मुद्दे चुभते हैं. केवल भावनात्मक मुद्दों पर लम्बे समय तक जनता को बाँध कर नहीं रखा जा सकता. हाल ही में तीन राज्यों से भाजपा का उखड़ना इस बात का सबूत है.
3. दक्षिण में भाजपा का वजूद कर्नाटक को छोड़कर ना के बराबर है. उत्तर पूर्वी राज्यों में भाजपा की स्थिति पहले से बदतर हुई है. उत्तर प्रदेश और बिहार में गठबन्धन भाजपा को बड़ा झटका देने के कगार पर है. ऐसे में कोई क्षेत्र ऐसा नहीं दिखाई दे रहा है जो भाजपा की घटत को संतुलित कर पाए.
4. जब देश में राज्यवार और क्षेत्रवार आकलन किया जाता है तो लगता नहीं कि किसी भी राज्य में भाजपा 2014 के आँकड़ों को छू भी पाएगी. ऐसी स्थिति में पूरे देश में चल रहे चुनावी अन्तरप्रवाह से हरियाणा राज्य अछूता रह पाएगा ऐसा सम्भव नहीं है.
5. हरियाणा में पूरे राज्य में एक जैसे सामाजिक समीकरण नहीं है. इसलिए ये मान लेना अतिशयोक्ति होगी कि पूरे हरियाणा में जींद की पुनरावर्ती होगी.
6. जब संसदीय क्षेत्रों के हिसाब से आकलन किया जाता है तो ज़मीनी हक़ीक़त सामने आ जाती है कि भाजपा के पास हर सीट के लिए उपयुक्त उम्मीदवार ही नहीं है और कितनी ही सीटें ऐसी हैं जहाँ सिटिंग सांसदों के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त निराशा और जनविरोध है.
7. जजपा और इनेलो की राजनीति की अपनी सीमाएँ हैं और सन 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन के बाद ये सीमाएँ सिकुड़ चुकी है जो कई बार बड़ी ताक़त के रूप में दिखाई देती है लेकिन सत्तासीन होने की मंज़िल से काफ़ी दूर. राजकुमार सैनी की राजनीति का ट्रम्पकार्ड बड़ी सफ़ाई से भाजपा ने हथिया लिया है और इस हिसाब से वह छोटा प्लेयर बन कर रह गया है. बसपा का टार्गेट किसी प्रकार से वोट प्रतिशत बढ़ाने तक ही सीमित है. इसी प्रकार लेफ़्ट पार्टीयां अपने वोटों को बिखरने से रोकने के लिए मैदान में हैं. आम आदमी पार्टी की चुनावों के हिसाब से कोई स्थिति नहीं बन पा रही है. वो किसी पार्टी से अलाएन्स करने को लालायित है.
8. ऐसे में काँग्रेस के सामने एक चुनौती है कि वह अपने खोये हुए आधार को फिर से पाने के लिए अपने आपसी बिखराव को रोके, न्याय के घोषणापत्र को प्रभावी तरीक़े से जन मानस तक पहुँचाए और नया आधार बनाने के लिए नए औज़ारों का प्रयोग करे.
अंत में इस आलेख के माध्यम से इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि ये क़ुरान की आयतें नहीं है बल्कि चुनावी विमर्श को आगे बढ़ाने का एक बहाना मात्र है.

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