पंज प्यारे – जातिवाद पर कड़ा प्रहार और जनवाद का प्रतीक

अर्शदीप

होला- मोहल्ला विशेष

गुरु की नगरी के नाम से मशहूर आनंदपुर साहिब शहर का यह पंज प्यारा पार्क है। यह वही पार्क हैं जहां पर सर्वोच्च बलिदान यानी अपने शीश की बलि देने के लिए भारत के पाँच वीर सपूत तैयार हो गए थे। बात 1699 की बैशाखी की है। इस बात को गुजरे 320 साल हो चुके हैं।

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पंज प्यारा पार्क – आनंदपुर साहिब, पंजाब – image himyatri 

जिस दौर में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की उस समय देश की राजनीतिक व आर्थिक पटल पर नजर दौड़ाएं तो साफ पता चलता है कि उस समय देश में सामंती ढांचा टूट रहा था, सामंतवाद का आर्थिक ढांचा किसानों, दस्तकारों और व्यापारी वर्ग के विकास में बाधा बनता जा रहा था। सामंती आर्थिक ढांचे पर खड़ा जातिवाद सामाजिक रूप से लोगों की एकता को न केवल तोड़ रहा था बल्कि इसने सदियों से समाज को जातियों में बांट कर शोषित वर्गों को एकजुट न होने देने में मुख्य भूमिका निभा रहा था।

बाहरी मुगल आक्रमणकारियों ने भारतीय सामंतवाद के साथ गठजोड़ कर न केवल जाति व्यवस्था को टिकाए रखा था बल्कि सामंतवाद को मजबूती प्रदान की थी। किसानों पर लगान का इतना अधिक बोझ था कि खेती में कुछ बचत नहीं होती थी। किसानों को जमींदारों और राजाओं की जमीन पर बेगारी में खेती करनी होती थी वह अपने लिए कुछ नहीं कर पाते थे। जिस जमीन पर वह खेती करते थे उसका मालिकाना उनका नहीं होता था बल्कि वह जमींदार और राजा की होती थी किसान उस पर हिस्से या बटाई पर खेती करते थे।

दस्तकार जमींदारों व राजाओं के साथ बंधे हुए थे। उनको उनकी मेहनत का भुगतान मुद्रा के रूप में न होकर फसल पर हिस्से के रूप में होता था। वह जो उत्पादन करते थे उसके लिए कच्चा माल भी जमींदार और राजा ही देते थे या वह किसान देते थे जो उस से औजार बनाते थे। दस्तकार स्वतंत्र रूप से उत्पादन नहीं कर सकते थे। राजाओं के जमीनों और युद्धों की जरूरत के अनुसार दस्तकारों को मल तैयार करना होता था।

वहीं व्यापारी वर्ग पर राजा और जमींदारों ने भारी कर लादे हुए थे। उनको जगह-जगह पर छोटे-छोटे राज्यों को भारी चुंगी देनी होती थी। उनको उत्पादन करने या कहें कारखाने आदि लगाने के लिए न मजदूर मिल पाते थे न दस्तकार, किसानों को जबरन खेती के साथ बांधा हुआ था।

इन परिस्थितियों में देश का किसान, दस्तकार और व्यापारी वर्ग उलझा हुआ था। ऊपर से जातिवाद ने लोगों की एकता को छिन्न-भिन्न कर रखा था। इस के खिलाफ भक्तिकाल में बड़े पैमाने पर संतों द्वारा शब्द, कविता रची गई और लोगों को एकजुटता का संदेश दिया। व्यवस्था के खिलाफ लड़ने का खाका खींचा। भक्तिकाल से चला विचार गुरु गोबिंद सिंह जी के आते-आते तक वह राजनीतिक व सैनिक ताकत के रूप में मजबूत हुआ।

व्यवस्था से तंग आए किसान, दस्तकार और व्यापारी वर्ग का गुरु गोबिंद सिंह जी को बड़े पैमाने पर समर्थन मिला। इसका कारण यह था कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने जातिवाद को तोड़ने का आह्वान किया। जमींदारों व राजाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी। अपना राज कायम करने की बात कही गई जिसमें जमींदारियों की बजाए जमीनों को मालिक किसानों को बनाया जाना, दस्तकारों की विकास और व्यापार को बढ़ावा देना का संकल्प मौजूद था।

1699 से पहले अंग्रेजों को प्रवेश ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी के रूप में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का प्रवेश भारत में हो चुका था। मुगल सत्ता कमजोर हो रही थी। गुरु नानक जी द्वारा स्थापित सिख पंथ मजबूत हो चुका था व उसने मुगलों की सत्ता का टक्कर देनी शुरू कर दी थी।

सिख गुरुओं ने संगत और पंगत की व्यवस्था चला कर जातिवाद पर बड़ा प्रहार किया था। संगत का मतलब था सब एक जगह बैठकर कीर्तन सुन सकते हैं, आराधना कर सकते हैं और पंगत का मतलब था बिना किसी जातिवाद के भेदभाव के सभी एक लाइन में बैठ कर भोजन किया करेंगे।

गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 को आनंदपुर साहिब (जिला रोपड़ा) में सर्वत खालसा का आह्वान किया। सर्वत खालसा का मतलब होता है दुनिया में जहां कहीं भी सिख हैं वह उस जगह हाजिर हों। सिख धर्म के सबसे बड़े और मूल फैसले सर्वत खालसा आयोजन करके ही लिए जाते हैं।

आनंदपुर साहिब के मैदान में पूरे भारत से गुरु गोबिंद सिंह जी के विचारों से सहमत जनता पहुंची। उन्होंने एक छोटी सी पहाड़ी पर अपना तख्त सज़ा रखा था। उस तख्त के पीछे एक छोटा तंबू लगा रखा था।

जब गुरु गोबिंद सिंह जी तंबू से बहार निकले और जनता को संबोधित किया तो कहा आज देश और दीन के लिए कुर्बानी की जरूरत है, मुझे एक सिर चाहिए। कौन है जो शीश देने के लिए तैयार है। गुरु जी के हाथ में नंगी तलवार थी।

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भिड़ में सन्नाटा पसर गया। जनता के लिए यह बहुत ही हैरान करने वाली बात थी कि गुरु जी मानव बलि चाहते हैं। लेकिन गुरु जी के विचारों पर अथह विश्वास करने वाले लोग वहां मौजूद थे। भिड़ में से सबसे पहले लाहौर के 30 वर्षीय दयाराम उठे। उन्होंने कहा गुरु जी मेरा शीश हाजिर है।

गुरु जी उनको तंबू में ले गए। फिर गुरु गोबिंद जी बहार निकले, उनके हाथ में खून से सनी तलवार थी। ताजा खून उनकी तलवार से टपक रहा था। फिर बोले मेरी तलवार की प्यास अभी बूझी नहीं, इसको और कुरबानी की दरकार है।

फिर भिड़ में सन्नाटा, फिर जिला सहारनपुर के गांव जावड़ा के निवासी 36 वर्षीय धरमदास जी उठे। गुरु जी मेरा शीश हाजिर है। वह उनको तंबू में ले गए। फिर बहार निकले फिर तलवार खून से सनी थी। फिर गुरु जी ने एक और शीश मांगा। इस प्रकार क्रमशः गुरु गोबिंद सिंह जी ने पाँच शीश मांगे और इसके बाद शीश देने के लिए ओड़िशा के जगन्नाथ पुरी के 38 वर्षीय हिम्मत राय, द्वारका के 36 वर्षीय मोहकम चंद व अंत में बीदर निवासी 37 वर्षीय साहिब चंद उठे। गुरु जी बारी-बारी उनको तंबू में ले जाते रहे। इसके बाद तो पूरा पंडाल ही तैयार हो गया और शीश देने की होड़ लग गई। गुरु जी ने इसे रोक दिया।

अंत में जब गुरु गोबिंद सिंह जी बाहर निकले तो उनको साथ सिखी बाणे व पगड़ी, सिखी के पाँच प्रतीक (पाँच ककार) – कछा, कड़ा, कंघा, किरपाण, केश सजाए पाँच लोग बहार निकले। वह पांचों वहीं लोग थे जो अपना शीश देने के लिए उठे थे। उनको गुरु गोबिंद सिंह जी ने तख्त पर बैठा दिया और ऐलान किया कि आज से जो भी निर्णय सिखों द्वारा लिया जाएगा, जो भी कार्य किया जाएगा उसका निर्णय पंच प्यारे किया करेंगे। दरअसल गुरु गोबिंद सिंह जी जमा हुई जनता में से सर्वाधिक समर्पण, कुरबानी का जज्बा रखने वाले व्यक्ति चाहिए थे जो जनता का नेतृत्व कर सकते।

खास बात यह है कि अपना शीश देने के लिए तैयार हुए पांचों व्यक्तियों में से ज्यादा समाज द्वारा नीची समझी जाने वाली जातियों में थे और खासतौर पर दस्तकार थे। उनमें से एक खत्री था, एक जाट, एक धोबी, एक नाई और एक कुम्हार था। इस से पता चलता है कि गुरु गोबिंद सिंह जी को तमाम जातियों और खासकर छोटी समझी जाने वाली जनता का अपार समर्थन था। उसे मेहनतकश किसान और मजदूरों का समर्थन हासिल था। उसे व्यापारी वर्ग का समर्थन था। हालांकि पाँच प्यारों की जातीयों पर अलग-अलग राय भी है लेकिन मूल बात है उनके दलित-दमित जातियों से होना।

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इस मौके पर सबसे पहले गुरु गोबिंद सिंह ने उन्हीं पंच प्यारों को अमृत पान करवाया। एक बहुत बड़े लोहे के कड़ाहे में अमृत तैयार किया गया। यह गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा युद्ध में इस्तेमाल किये जाने वाले हथियार लोहे के खंडे  (मुड़े हुए आकार की तलवार) से हिला कर तैयार किया गया था। इसको खंडे के पाहुल कहा जाता है। एक की बाटे (कटोरे) से सभी को अमृत पान करवाया और सिख बनाया गया। इसके बाद खुद भी उनके हाथों से अमृत पान किया। इस से तमाम जातीय बंधन, सांप्रदायिक बंध तोड़ फेंके।

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पंज प्यारों को लिए जो नियम बनाए वह बेहद जनवादी थे। जो भी निर्णय लिया जाएगा वह पाँच प्यारों के विचार से लिया जाएगा। पूरे सिख पंथ को ही नहीं स्वयं गुरु को भी पाँच प्यारों का निर्णय स्वीकार होगा। इसका सबसे जबरदस्त उदाहरण चमकौर साहिब की गढ़ी की लड़ाई है। किले के बाहर लड़ाई में गुरु गोबिंद सिंह जी को दो साहिबजादे शहीद हो गए थे। किले में रसद आपूर्ति कम हो गई थी। किला छोड़ कर जब जाने का निर्णय लिया गया। गुरु गोबिंद सिंह जी नहीं माने तो पाँच प्यारों द्वारा मत्ता (प्रस्ताव) पारित कर के उनको वहां से भेजा गया ताकि वह बाद में बिखर चुके योद्धाओं को संगठित कर सके और लड़ाई को जारी रख सके। इनकी जगह वहां पर उन्हीं के हम उम्र और हम शक्ल भाई संगत सिंह जी लड़े थे।

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