अर्जुन अवार्डी पहली महिला पहलवान – गीतिका जाखड़

  अविनाश सैनी

(खेल के क्षेत्र में हरियाणा नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, जो खिलाड़ियों की जी तोड़ मेहनत और लगन और निरंतर अभ्यास का नतीजा है। गीतिका जाखड़ अर्जुन अवार्डी पहली महिला पहलवान है। प्रस्तुत है गीतिका के संघर्ष पर प्रकाश डालता अविनाश सैनी का लेख।  देस हरियाणा पत्रिका के संपादक मंडल से जुड़े रंगकर्मी-संस्कृतिकर्मी अविनाश सैनी रोहतक निवासी हैं। वर्षों तक नवभारत टाइम्स में रिपोर्टिग की। राज्य संसाधन केंद्र हरियाणा, रोहतक में कार्य करते हुए हरकारा पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे हैं। आकाशवाणी के उदघोषक हैं। पिछले दो दशकों से साक्षरता अभियान में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे हैं – सं.)

कुश्ती के खेल में हरियाणा ने खास पहचान हासिल की है। महिला कुश्ती की तो शुरुआत ही हरियाणा से हुई है। पहली महिला ओलम्पियन और कॉमनवेल्थ खेलों की पहली स्वर्ग पदक विजेता पहलवान गीता फौगाट, ओलम्पिक में पदक जीतकर देश का नाम रोशन करने वाली पहली महिला पहलवान साक्षी मलिक और एशियाई तथा कॉमनवेल्थ, दोनों खेलों में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली महिला पहलवान विनेश फौगाट भी हरियाणा की ही रहने वाली हैं। सबसे अधिक बार भारत केसरी का खिताब अपने नाम करने वाली सुमन कुण्डू भी इसी प्रदेश की देन है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अभी तक ओलम्पिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व करने वाली सभी महिला पहलवान हरियाणा की रही हैं। इसी कड़ी में आइए बात करते हैं प्रतिष्ठित “अर्जुन अवार्ड” हासिल करने वाली पहली महिला पहलवान गीतिका जाखड़ की।

2008 में विभिन्न खेलों के उत्कृष्ट खिलाड़ियों को प्रदान किए जाने वाले देश के इस सबसे बड़े खिताब से नवाजी गई गीतिका जाखड़ को भारतीय खेलों के इतिहास में पहली बार कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप की सर्वश्रेष्ठ पहलवान चुने जाने का गौरव भी प्राप्त है। गीतिका को यह सम्मान 2005 में प्राप्त हुआ। इसके अलावा, वह ऐसी महिला पहलवान है जिसने सर्वप्रथम एशियाई खेलों में दो बार पदक जीते हैं। उसने 2006 और 2014 के एशियाई खेलों में पदक जीतकर यह उपलब्धि हासिल की। गीतिका के बाद अब विनेश फौगाट भी दो एशियाई खेलों में पदक ( 2014 में कांस्य और 2018 में स्वर्ण पदक ) जीतने का कारनामा कर चुकी है।

18 अगस्त1985 को हिसार ज़िले के अग्रोहा में जन्मी गीतिका के मन में बचपन से ही खिलाड़ी बनने की चाह थी। उसने एथलेटिक्स से अपने खेल जीवन की शुरुआत की। घर में खेलों का माहौल था – पिता  बलजीत सिंह कोच थे तो दादा अमरचंद जाखड़ ,पहलवान। दादा को देखकर वह भी पहलवान बनने की सोचती पर कुश्ती के लिए पर्याप्त माहौल के अभाव में कुछ न कर पाती।

1998 में उनका परिवार अग्रोहा से हिसार आ गया। वहाँ उसने दूसरी लड़कियों को कुश्ती करते देखा तो बस उसने भी पहलवान बनने की ठान ली। इस तरह उसने 13 वर्ष की आयु में कुश्ती की शुरूआत की और 4 महीने बाद ही मणिपुर में हुए राष्ट्रीय खेलों में अपनी चुनौती पेश कर दी। राष्ट्रीय खेलों में भाग लेने वाली देश की सबसे कम उम्र की पहलवान बनी गीतिका वहाँ चौथे स्थान पर रही। सन 2001 में हुई राष्ट्रीय चैंपियनशिप में उसने सब जूनियर, जूनियर और सीनियर, तीनों वर्गों में गोल्ड मेडल जीत कर इन खेलों के तीनों प्रारूपों में स्वर्ण पदक जीतने  वाली देश की सबसे कम उम्र की पहलवान बनने का गौरव हासिल किया। गीतिका का यह रिकॉर्ड आज भी कायम है।

आधुनिक कुश्ती के साथ-साथ गीतिका ने पारम्परिक कुश्ती में भी महारत हासिल की और सन 2000 में केवल15 वर्ष की आयु में भारत केसरी का खिताब जीतने में कामयाब रही। इस दंगल में उसने देश की पहली भारत केसरी पहलवान सोनिका कालीरमण को पटखनी दी। इसके बाद गीतिका ने लगातार 9 वर्षों तक भारत केसरी का खिताब अपने पास रखा।

राष्ट्रीय स्तर पर लगातार सफलता के झंडे गाड़ने के साथ-साथ गीतिका ने 2002 में 17 वर्ष की आयु में वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में भाग लेते हुए अपने अंतरराष्ट्रीय कैरियर की शुरूआत की। न्यूयॉर्क में हुई इस चैंपियनशिप में वे क्वार्टर फाइनल तक पहुँची। सन 2003 में उसने ‘एथेन्स वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में शिरकत की और यहाँ भी क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय किया। इसी साल उसने एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप, नई दिल्ली में ‘रजत’ और कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप, लंदन में ‘स्वर्ण’ पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया। सन 2005 में चीन में हुई ‘एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप’ में रजत पदक जीतने के बाद ‘कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप’ में भी उसने दूसरी बार स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। वह चैंपियनशिप की सर्वश्रेष्ठ पहलवान यानी ‘रेसलर ऑफ़ द टूर्नामेन्ट’ भी चुनी गई।

इसी साल लिथुआनिया में हुई ‘वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप’ में ‘सिल्वर मेडल’ जीतकर उसने दुनिया की सर्वश्रेष्ठ पहलवानों में अपना नाम शामिल करवा लिया। 2006 में गीतिका ने अपने खेल के स्तर को और ऊँचा उठाते हुए दोहा एशियाई खेलों में रजत पदक जीता जो इन खेलों में किसी भी भारतीय महिला पहलवान द्वारा जीता गया पहला पदक था। यही नहीं, एशियन गेम्स में यह उस समय तक किसी भी भारतीय पहलवान को मिलने वाला सर्वोच्च पदक था।

2007 में गीतिका ने ओंटेरियो ( कनाडा ) में हुई कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में रजत पदक हासिल करने के साथ-साथ गोहाटी राष्ट्रीय खेलों और नई दिल्ली सीनियर नेशनल रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीते। सन 2010 में गीतिका को गंभीर चोट लग गई। इससे एक बार तो लगा कि अब गीतिका के खेल कैरियर पर पूर्ण विराम लग जाएगा लेकिन ज़िद्द की पक्की इस खिलाड़ी ने जुझारूपन की मिसाल पेश करते हुए कमबैक किया और 2012 की सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर अपने आलोचकों का मुँह बंद कर दिया। सन 2014 के ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेलों में रजत पदक पर कब्ज़ा जमाने के बाद इसी साल उसने इंचियोन एशियाई खेलों में कांस्य पदक झटक कर इन खेलों में अपना दूसरा पदक जीता।

गीतिका की खेल उपलब्धियों को सम्मान प्रदान करते हुए हरियाणा सरकार ने उन्हें 2003 में ‘भीम अवार्ड’ और भारत सरकार ने 2006 में ‘अर्जुन अवार्ड’ से नवाजा।2008 में हरियाणा पुलिस में सीधे डी.एस.पी. नियुक्त की गई गीतिका को 2009 में ‘कल्पना चावला एक्सीलेंस अवार्ड फ़ॉर आउटस्टैंडिंग वीमेन’ भी प्रदान किया गया।

निःसंदेह गीतिका की उपलब्धियाँ हमेशा युवा खिलाड़ियों को प्रेरित करती रहेंगी।

संपर्क – 9416233992

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