दरअसल

कहानी


तारा पांचाल

(तारा पांचाल 28 मई,1950 – 20 जून, 2009।  ‘सारिका’, ‘हंस’, ‘कथन’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘पल-प्रतिपल’, ‘बया’, ‘गंगा’, ‘अथ’, ‘सशर्त’, ‘जतन’, ‘अध्यापक समाज’, ‘हरकारा’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में पाठक उनकी कहानियों से निरन्तर परिचित होते रहे हैं। ‘गिरा हुआ वोट’ संग्रह की दस कहानियों समेत तारा पांचाल की कुल चालीस के आसपास कहानियां हैं, जिनमें कुछ अप्रकाशित हैं। तारा पांचाल हरियाणा के जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। । हरियाणा की साहित्य अकादमी ने भी वर्ष 2007-08 का बाबू बालमुकुन्द गुप्त सम्मान प्रदान करके  तारा पांचाल की रचनात्मक प्रतिभा का सम्मान किया। प्रस्तुत है उनकी कहानी  – सं.)

यह देखते हुए कि गोष्ठी में राष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं, सैक्रेटरी को मन्त्री जी का समापन समारोह का भाषण तैयार करने में पूरी मेहनत करनी पड़ी थी। देश में अन्तरिक्ष, टेलिविजन, इलेक्ट्रानिक्स आदि के क्षेत्र में वैज्ञानिकों की उपलब्धियों के साथ-साथ प्रधानमन्त्री के जायके का खयाल रखते हुए भाषण में इक्कीसवीं सदी का जिक्र भी लगभग हरेक पैरे में किया गया था। यहां तक कि पूरे भाषण से एक ही बात स्पष्ट हो रही थी- इस मन्त्री की पार्टी की नीतियों के फलस्वरूप ही इक्कीसवीं सदी देश में आ रही थी- अन्य किसी पार्टी की सरकार होती तो जादू-टोने वाला यह देश शायद बीसवीं सदी में ही पांव पीटता रहता। दूसरे, भाषण से यह भी लगता था कि हिमालय की ऊंचाई और गंगा-जमुना की पावन धाराएं भी इस मन्त्री की पार्टी के प्रयासों के फलस्वरूप ही वर्तमान थीं। भाषण के अंत में जैसा कि आम तौर पर होता है, स्पष्ट कहा गया था कि प्रधानमन्त्री की इन नीतियों को फलीभूत करने के लिए देश के वैज्ञानिक आगे आयें…

अपनी कोठी के लॉन में धूप सेंकते हुए मन्त्री जी परसों पढ़े जाने वाले इसी भाषण का पाठ कर रहे थे। उन्हें उच्चारण में या कहीं पर समझने में कोई दिक्कत न आये, सैक्रेटरी वहीं मौजूद था। यूं वह विज्ञान एवं टेक्नोलोजी सम्बन्धी सरकारी आंकड़ों की फाइलें भी साथ ले आया था। उन्होंने चश्मा उतारकर धोती से साफ करते हुए कहा, ‘किसान और मजदूरों का थोड़ा कम जिक्र हुआ है – और एक पैरा अगर ये भी जोड़ दो तो ठीक रहेगा कि सरकार वैज्ञानिकों को और अधिक सुविधाएं जुटाने के लिए कृतसंकल्प है ताकि हमारे देश के वैज्ञानिक बाहर के देशों में न जाकर अपने देश की, देश के लोगों की, गरीब किसान और मजदूरों की सेवा में ही रहें…मेरा मतलब है ऐसा ही कुछ…‘सैक्रेटरी ने भाषण के पृष्ठ ले लिए, उनमें मन्त्री जी के सुझावों को कहां फिट किया जाये, देखने लगा।

तभी चपरासी एक चिट लिये आया। मन्त्री जी ने चिट को देखा और तटस्थ भाव से कहा, ‘कहो, मैं आ रहा हूं।’ चपरासी जाने लगा तो कुछ पल सोचकर वे बोले, ‘ठहरो, मैं ही जाता हूं…तुम ऐसा करो कि यहीं पर कुछ कुर्सियां और डाल दो और बल्लू को चाय के लिए बोलो’, इतना कहकर वे उन्हें लाने के लिए स्वयं ही अपनी कोठी के साथ बने रिसैप्शन में गये और उनके स्वागत में जुट गये, ‘आओ जी…आओ सेठ जी…राम-राम जी… नमस्ते जी…नमस्ते -और क्या हाल है…आओ… आओ…इधर बाहर ही बैठते हैं धूप में…आओ… कुर्सियां और रखवाओ यहां और चाय का प्रबन्ध करवाओ…पहले पानी पिलवाओ’ उसने सैक्रेटरी को भी बोल दिया जिससे थोड़ा अपनत्व आने के साथ-साथ उनके स्वागत में भी बढ़ोतरी हो गयी थी।

‘और सुनाओ जी, हलके की बातचीत…कोई नया समाचार…लो पानी पियो…अं आपका डी.सी. अब तो ठीक चल रहा है ना…होम सैक्रेटरी से भी खिंचवा दिया था उसको…मैंने तो खींचा ही था…अभी जवान खून है ना धीरे-धीरे ठंडा होगा…और, वो एक शिकायत आयी थी, कौन आया था भला…एक्साइज अफसर की शिकायत थी शायद…साला बड़ा ईमानदार का पुतर बनता था…अब तो सैट है न वो…और हां याद आया…एक गणेश रिफाइण्ड ऑयलवालों का मिलावट का केस आया था…उसका क्या रहा…आपका फोन आते ही मैंने एस.पी. और कमिश्नर को फोन तो कर दिया था…इधर भी दे पानी…चाय ला रहा है बल्लू ?…पीछे कुछ दिन हुए अखबारों में आपकी म्युनिसिपेलिटी के सफाई कर्मचारियों के आन्दोलन की भी काफी खबरें आती रही…इनको भी सरकार ने ज्यादा ही सिर चढ़ा लिया है…लो चाय लो जी…लो जी, कोई नी लेता हूं मैं भी…आप भी लो जी…हां अब बताओ कैसे आना हुआ दल-बल के साथ ? हां एक बात और याद आ गयी…पीछे कोई एक परचून वाला आया था…फंसा हुआ था-माप-तोल वालों ने उसके बाट चैक किये तो सब-के-सब कम उतरे। केस बना तो यहां आकर गिड़गिड़ाने लगा। जब मैंने कहा कि गलत काम करते ही क्यों हो तो पट्ठा कहता है – अगर सही होता तो आपके पास आता ही क्यूं…’ मन्त्री जी हंसे थे और उनके हंसने के साथ ही वे सब भी मुस्कराये थे। मन्त्री  जी हंसते-हंसते ही बोलने लगे थे, ‘जैसे हम यहां सारे-के-सारे गलत काम ही करवाने के लिए बैठे हैं।’

हंसते-हंसते ही उन्होंने कप अपनी ओर सरकाया और गम्भीर होते हुए बोले, ‘वैसे देखा जाए तो श्रीचन्दजी, निन्यानवे फीसदी इसी तरह के उट-पटांग काम ही हमें करवाने पड़ते हैं…अरे बिस्कुट भी लो ना…कोई बात नहीं …आप लो…लेता हूं मैं भी…’ पूरे वार्तालाप में सेठ श्रीचन्द ही शरीक था, बाकी सब-के-सब उन दोनों पर ही ध्यान केन्द्रित किये हुए थे। जैसे भाव उन दोनों के चेहरों पर आते लगभग वैसे ही भाव उन सबके चेहरों पर भी स्वत: ही आ-जा रहे थे।

‘हां, अब बताओ सेठ जी, आज अचानक कैसे आना हुआ ?’ मन्त्री जी ने मसूढ़ों और गालों के बीच फंसे बिस्कुट के मैदे को जीभ से इधर-उधर सरकाते हुए पूछा।

‘ये हैं जी अपने पंडित देवकीनन्दन जी…आजकल शहर की बहुत सेवा कर रहे है…आप कभी गये हो पुराने तालाब की तरफ, जहां एक बड़े से पीपल के नीचे हनुमान जी की मढ़ी होती थी…वो उधर गोगू बस्ती की ओर जहां हमें सबसे ज्यादा वोट मिले थे…लेकिन मन्त्री जी के चेहरे पर असमंजस देखकर श्रीचन्द ने खुद ही कहा था, ‘नहीं , हम इधर से ही वापिस आ गये थे…वह थोड़ा दूर पड़ता है…तो जी इन्होंने खुद घूम-घूम कर लोगों से एक-एक दो-दो रुपया इकट्ठा करके वहां मन्दिर खड़ा किया है और मन्दिर के पिछवाड़े ही अपनी रिहायश भी बना ली है…’

मन्त्री जी ने रिहायश बनाने की बात को लेकर, ‘बहुत खूब…बहुत खूब’ कहा और बड़े ही रहस्यमय ढ़ंग से मुस्कराकर उस लीडर-सरीखे नौजवान पंडित जी की ओर देखा जैसे मन-ही-मन उसके दिमाग की दाद दे रहे हो और यह सोचकर बराबर का मान रहे हो, ‘मैं महात्मा गांधी के नाम का खा रहा हूं और तुम हनुमान जी के नाम का।’ पंडित जी ने भी जैसे सब कुछ समझते हुए दोनों हाथ फैलाकर ‘सब बजरंगबली की किरपा है जी…’ कहा फिर अपने आपको ढीला छोड़ते हुए बुड़बुड़ाये, ‘जै हो बजरंगबली महाराज की…सबको सुखी राखियो…खुशी राखियो…’

श्रीचन्द ने फिर कहना शुरू किया, ‘लेकिन अभी ना तो मन्दिर ही पूरा हुआ है और ना इनकी रिहायश ही इतनी अच्छी बन सकी है…इन्होंने अब एक बजरंग दल की स्थापना की है और मुझे उसका प्रधान बनाया है…’

‘प्रधान’ शब्द आते ही अब तक हल्के-फुल्के मूड में बात कर रहे मन्त्री जी सचेत होकर सीधे हुए और पूछा, ‘इन निक्करधारियों को तो कहीं हावी नहीं  होने दिया दल में ?’

‘अजी कहां…हमारे होते…’

‘नहीं …नहीं , इन संधियों को आप नहीं   जानते…ये समझते हैं राम, कृष्ण, हनुमान, गीता सब इन्हीं के हिस्से की चीजें हैं…’

‘अजी पूछो न…गंगाधर क्रोकरीवाले को उसी के लोगों से वो पटकी दिलवायी कि याद करेगा…हमारा बनाया हुआ ‘बजरंग दल’ और प्रधान बने संघी’, कहकर सेठ श्रीचन्द ने साथ आये लोगों के चेहरों पर देखा जहां उनके लिए ‘वाह जी सेठ जी…आप भी अपनी किस्म के एक ही हैं’ जैसे भाव थे।

‘शाबाश…क्या बात है, मान गये सेठ जी…अरे भई इसीलिए तो हम निश्चिन्त हुए यहां बैठे हैं…हमें पता है आप जैसों के होते हलके में कोई भी गलत काम हो ही नहीं   सकता…’ मन्त्री जी अब ‘हो…हो’ करके हंसे थे और खूब हंसे थे, हंसते-हंसते ही उन्होंने चश्मा उतारकर धोती के पल्ले से आंखे पोंछी थी-जो शायद खुशी में नम हो गयी थी। साथ ही वे सब भी हंसे थे।

‘अब बात ये है जी कि पिछले महीने इसी बजरंग दल की मीटिंग थी। मीटिंग में हमने फैसला किया था कि इस बार हनुमान जयन्ती समारोह अपने उसी मन्दिर में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाये।’ श्रीचन्द ने ‘अपने उसी मन्दिर’ को जोर देकर कहा।

साथ आये एक और सज्जन ने थैले से एक बड़ा-सा पोस्टर निकालकर मन्त्री जी की ओर बढ़ाते हुए थोड़ा मुस्कराकर बताया, ‘मैं प्रचारमन्त्री हूं जी…’और कन्धे पर गड़ रही कागजों से भरे थैले की तनी को थोड़ा सरकाया।

‘हुम’ पोस्टर पर बनी हनुमान जी की तस्वीर देखकर मन्त्री जी का सिर थोड़ा झुका। इतना अधिक भी नहीं   कि साष्टांग प्रणामवाला पुराना फुहड़पन झलके और इतना कम भी नहीं   कि हनुमान जी के बुरा मानने का अन्देशा मन में रह जाये। या इन लोगों को भी पता न चल सके। उन्होंने पोस्टर को सरसरी नजर से देखते हुए मेज पर रख दिया। ‘विज्ञान एवं तकनीकी संगोष्ठी’ के कार्ड पर से पेपरवेट उठाकर पोस्टर पर रखा और अपना चश्मा उतारकर पेपरवेट की जगह उस कार्ड पर रखते हुए बोले, ‘हां…सेठजी…तो बताओ मेरे लिए क्या हुक्म है…मैं क्या सेवा कर सकता हूं…आप बतायें पंडित जी, आपने तो अभी कुछ कहा ही नहीं  …’

युवा पुजारी थोड़ा तना। अपने जापानी सिल्क के कुरते की बाजू ऊपर खींची जिससे उसकी कलाई पर बंधी गोल्डन घड़ी चमक उठी। लम्बे-काले बालों में अंगुली फिराते हुए उसने अपने पान रचे लाल होंठ हिलाये, ‘सेवा हमारी क्या जी…हनुमानजी की करनी है…जैसा कि सेठजी ने बताया है कि शहर में बजरंग दल बनाया है…परसों हनुमान जयंती समारोह धूम-धाम से मनाना चाहते हैं…अगर जनाब उसका उद्घाटन कर सकते…’

‘परसों…लेकिन…’

‘बड़े उपकार का काम है जी…यूं तो आप जानते हैं कि कितने ही मिनिस्टर, एम.एल.ए., एम.पी. पड़े हैं…पर आपकी अपने हलके में और धर्म-कर्म में रुचि है…’ पंडित जी की बात बीच में ही काटकर मन्त्री जी ने फिर ‘हुम’ किया और हुम के साथ ही गरदन भी हिलायी। उनका सारा ध्यान अब मेज पर पड़े हनुमान जी के पोस्टर पर था। जब उनका ध्यान अचानक हनुमान जी के ऐन मुंह पर रखे पेपरवेट पर गया तो उन्हें झटका लगा। धीरे से उन्होंने पेपरवेट मुंह पर से सरकाकर एक ओर हटा दिया और मेज की ओट से ही दोनों हाथ जोड़कर हनुमान जी से इस गलती के लिए क्षमा मांगी।

अब तक वहां बैठे चुपचाप विज्ञान गोष्ठीवाले भाषण में फेर-बदल कर रहे सैक्रेटरी के चेहरे पर उनकी बातों से उलझन उभरी और उसने मन्त्री जी की ओर देखा। उनके चेहरे पर उलझन थी। मन्त्री जी सोच रहे थे-सेठ श्रीचन्द ने इलेक्शन में खुलेआम और पल्ले के नीचे से भी काफी चन्दा दिया था। बदले में इसे स्टील-सीट का कोटा और ‘इम्पोर्ट’ का लायसेन्स दिलवाकर फायदा तो मैंने भी इसका किया है-इसके और इसके भेजे आदमियों के और कई काम भी करवाये हैं…पर फिर भी आदमी काम आने वाला है…ये पुजारी भी दमदार लगता है…बाकी ये जो आठ-दस आदमी और साथ आये हैं ये भी थोड़े-बहुत दमदार जरूर होंगे…लल्लू-पंजू होते तो श्रीचन्द इन्हें साथ ना लाता। हलके में भी इलेक्शन के बाद लोगों से मिलना नहीं   हो सका है। तीसरा साल गुजर रहा है। पता नहीं   कब इलेक्शन हो जायें…ये मौका अच्छा है इन लोगों का और जनता का दिल जीतने का…लेकिन विज्ञान गोष्ठी? उसने चश्मा लगाकर गोष्ठी का कार्ड उठाया। सरसरी निगाह से देखा…कोई हल न पाकर फिर रख दिया। ‘हलके के एक बार तो दर्शन करने ही चाहिए…ये विज्ञान गोष्ठियां तो चलती ही रहती हैं…संसद में दोबारा तो मुझे ये लोग ही पहुंचायेंगे…ये गोष्ठियां क्या देंगी…आजकल विरोधी पार्टी वाले भी कभी पद-यात्रा कभी जन-सभा अभियान छेड़े हुए हैं लेकिन ये गोष्ठी…और परसों का पूरा प्रोग्राम…ये गोष्ठी भी अभी अडऩी थी बीच में…पर राजनैतिक रूप से तो मेरा और पार्टी का हित हनुमान जयन्ती समारोह में जाने से होगा…इससे तो हाईकमान भी खुश होगी…ठीक है हनुमान जयन्ती समारोह में ही जाया जाये…’ उन्होंने एक बार फिर बड़े गौर से हनुमान जी की तस्वीर को देखा और मन-ही-मन ‘पवन पुत्र हनुमान की जै’ बोलकर श्रीचन्द से कहा, ‘ठीक है सेठ जी , मैं पहुंच जाऊंगा…’

तभी सैक्रेटरी बीच में ही बोला, ‘लेकिन सर वो गोष्ठी…परसों सुबह की फ्लाइट से सीट भी बुक है और फिर सारा-का-सारा प्रोग्राम…?’

मन्त्री जी को सैक्रेटरी के टोकने से झुंझलाहट की बजाय भीतर-ही-भीतर खुशी हुई क्योंकि इससे उन लोगों पर और अहसान लद गया था। फिर भी प्रत्यक्षतः यह दिखाने के लिए कि मैं हलके की जनता की खुशी के लिए कुछ भी कर सकता हूं-थोड़ा तल्खी से बोले, ‘वो सब देखना तुम्हारा काम है…मुझे अपने लोगों के बारे में भी सोचना है…और फिर सेठ साहब के साथ इतने लोग आये हैं…’ उन सभी के हाथ स्वत: ही बंध गये गरदने मन्त्री जी के सम्मान में आधा-आधा इंच और झुक गयीं। ‘ठीक है सेठ जी…परसों का पक्का रहा…लेकिन एक ध्यान रखना…परसों नहीं  …मैं शायद कल ही पहुंच रहा हूं…अभी किसी को कुछ नहीं   बताना…कल मेरे आने के बाद ही कुछ करना…कहना…।’

‘बड़ी मेहरबानी जी आपकी…महावीरजी आपको, आपके परिवार को सदा सुखी रखें…आप जैसे दानी-ज्ञानी परम भक्तों और धर्मात्माओं के सहारे ही पृथ्वी कायम है जी…बजरंगबलीजी आपको तरक्की दिलवाएं, आपके बाल-बच्चों की उम्र लम्बी करें…’ कहते हुए पंडित देवकीनन्दन इतना झुके कि मन्त्री जी के पांव छूने को हो गये तो मन्त्री जी ने उन्हें कंधों से पकड़कर सीधा करते हुए कहा, ‘अरे-अरे ये क्या कर रहे हो…क्यों मुझ पर पाप चढ़ा रहे हो…पॉंव तो मुझे छूने चाहिए आपके…खैर, छोड़ो, ये तो पुरानी बातें हैं…देश इक्कीसवीं सदी में जा रहा है…’ फिर भी एकदम श्रीचन्द के कान के पास फुसफुसाये, ‘मेरी ओर से हनुमान जी के निमित जो भी दान-वान मन्दिर में या पंडित जी को देना हो वो आप…’

‘हां…हां…वो मैं सब कर लूंगा…आप निश्चिन्त रहिये…’ और भी कई बातें थीं जो उसी समय एक साथ मन्त्री जी और सेठ श्रीचन्द ने आंखों-ही-आंखों में तय कीं। मन्त्री जी उन्हें गेट पर खड़ी उनकी कारों और टैक्सियों तक छोड़ने आये। हाथ जोड़कर विदा लेते हुए उन्होंने फिर कहा, ‘बस यह ध्यान रखना कि कल मेरे आने के बाद ही प्रचार करवाना…’

मन्त्री जी सीधे ड्राइंग रूम में गये। उनके चेहरे पर अब भी उलझन थी। उन्होंने सोफे पर पसरकर सैक्रेटरी को भी वहां बुला लिया। एक नौकर को एक पैग ह्विस्की बनाने को कहा और दूसरे को, दिन होने के कारण पान लेने को दौड़ाया। इनके शुभचिन्तकों का दावा है कि ये दिन के समय कभी नहीं लेते – हां जब भी कभी कोई राष्ट्रीय या अन्तराष्ट्रीय समस्या उन्हें उलझा देती है-तब उस समस्या को हल्का करने के लिए दिन में भी ले लेते हैं और यह विडम्बना ही थी कि मन्त्री जी इधर काफी दिनों से लगातार ले रहे थे।

सैक्रेटरी गोष्ठीवाला भाषण हाथ में लटकाये खड़ा हुआ मन्त्री जी के अगले हुक्म की प्रतीक्षा कर रहा था। मन्त्री जी ने पैग की चुस्की लेकर एक काजू मुंह में रखा और सैक्रेटरी को शाम तक ही हनुमान से सम्बन्धित तथ्यपूर्ण भाषण तैयार करने को कहा। वे मुंह चलाते हुए समझाने लगे, ‘भाषण में रामायण की कुछ चौपाई हों, कुछ अंश रामचरित मानस का वो उतर काण्ड है या दक्षिण काण्ड है, उसमें से ले लेना और हां…खूब याद आया…क्या बात…सोने पर सुहागा…वाह…वाह…क्या मौके पर याद आया है’, पैग खाली करके उन्होंने कहना जारी रखा, ‘भाषण में ‘राम जन्म भूमि मुक्ति’ के लिए सरकार के हाल ही में किये गये प्रयासों का जिक्र जरूर करना…और कई बार करना…लेकिन थोड़ा संभलकर और दबी जुबान में…’ मन्त्रीजी रुके। काजू चबाते हुए कुछ सोचते रहे। सैक्रेटरी के चेहरे पर उलझन बढ़ती जा रही थी। मन्त्री जी ने उससे धीरे-से पूछा, ‘कहीं से हनुमान की जात का सही-सही पता लग सकता है ? रामचन्द्रजी क्षत्रीय थे…भीलनी नीच जात की थी…परशुराम ब्राह्मण थे…नल-नील दस्तकार थे…उनको लुहार या बढ़ई कहा जा सकता है…लेकिन इस हनुमान के बारे में पता नहीं  कहीं कुछ लिखा है या नहीं …कोशिश तो करना…यूनिवर्सिटी के किसी प्रोफेसर को पूछ देखना…शायद कुछ पता चल जाये…सरकार इतना पैसा खरचती है शिक्षा पर तो क्या ये प्रोफेसर आज तक हनुमान की जात का पता नहीं  लगा पाये होंगे…’ कुछ स्पष्ट नहीं था कि वे बुड़बुड़ा रहे हैं या वे सब सैक्रेटरी को कह रहे हैं।

दूसरा पैग बनाते हुए अपनी इस उलझन को हल्का करते हुए फिर बोले, ‘इस ‘इक्कीसवीं सदी’ ने और तंग कर लिया। अब भाषण तो देना है हनुमान जयन्ती पर, बताओ यहां इक्कीसवीं सदी कैसे घुसेड़ें…?’ यह शराब की घूंट बोली थी वर्ना मन्त्री जी इतना बोलने की हिम्मत सपने में भी नहीं  कर सकते थे। वे कुछ संभले और तल्खी को दारू की कड़वी घूंट के साथ गटकते हुए बोले, ‘ऐसा कुछ लिख देना कि आं…कि देश…हां…माना कि इक्कीसवीं सदी में जा रहा है लेकिन निस्वार्थ सेवा और न्यायप्रियता के प्रतीक अंजनी सुत हनुमान जी को हमारे देश के लिए छोड़ पाना कठिन ही नहीं  असम्भव भी है…चाहे वह बाईसवीं सदी ही क्यों न हो…और मेरे खयाल से तालियां भी इसी बात पर ज्यादा बजेंगी…खैर छोड़ो…तालियां-वालियां तो बजती ही रहती हैं…आखिर में थोड़ी-बहुत धर्मनिरपेक्षता की बात जरूर कह देना।’ मन्त्री जी अब पूरी तरह उलझन से बाहर थे। उन्हें यदि कोई उलझन थी तो वह थी हनुमान की जात का पता लगाने की…क्योंकि इससे हनुमान की जात की वर्तमान पूरी बिरादरी को खुश किया जा सकता था।

लेकिन यह सब सैक्रेटरी के गले के नीचे उतर ही नहीं पा रहा था। वह मानसिक रूप से भी विज्ञान-टेक्नोलोजी-कम्प्यूटर और इक्कीसवीं सदी में कुछ देर पहले तक इतना रम गया था कि एकदम हनुमान युग में वापिस जाना उसे काफी कठिन लग रहा था। दूसरे, परसों सुबह की फ्लाइट से सीट बुक है, प्रोग्राम के कार्ड बंट चुके हैं…अखबारों वाले भी बात को उछाल सकते हैं…कोई नया रंग देकर भी प्रस्तुत कर सकते हैं..आदि ऐसी ही बातें उसे उलझाये हुए थीं।

मन्त्रीजी ने उसके चेहरे को पढ़ा-उनके होंठो पर मुस्कान आयी, ‘इस समय तुम्हारी उलझन वाजिब है…लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं  है। आओ बैठो…नोटबुक ले आओ…हां  अब अखबारों के लिए कुछ न्यूज आइटम तैयार करो। इन्हें तुम खुद अपने हिसाब से वहां  के लोकल, कुछ बड़े और नेशनल लैवल के अखबारों में लगवा देना। दो-चार संवाददाताओं को तो अभी फोन कर लेना। मेरी ओर से उनका हाल-चाल ही पूछना-बस, और ऐसा ही एक फोन वहां  के हस्पताल के सी.एम.ओ. को भी करना। वह भी कल शाम आयेगा। हां  लिखो-पहले कल के लिए-

नम्बर एक-मन्त्रीजी का हलके में अचानक दौरा। जनता में खुशी की लहर।

दो-मन्त्रीजी का हलके में अचानक दौरा। स्थानीय प्रशासन में खलबली।

तीन-मन्त्रीजी का हलके में अचानक दौरा। कई जगह पैदल ही गलियों-मुहल्लों में घूमे।

परसों के लिए-

नम्बर एक-हलके में दौरे पर गये मन्त्रीजी का स्वास्थ्य अचानक खराब। स्थानीय हस्पताल में भर्ती।

दो-मन्त्रीजी के स्वास्थ्य में गिरावट के कारण उनका विज्ञान-गोष्ठी का समापन समारोह का प्रोग्राम रद्द।

तीन-मन्त्रीजी ने आपसी भेदभाव को भुलाकर लोगों को परस्पर प्यार से मिलकर रहने को कहा।

चार-मन्त्रीजी ने धर्म-निरपेक्षता पर जोर देते हुए सभी धर्मों को समझने पर बल दिया।

पांच-मन्त्रीजी ने राजनीति को धर्म से दूर रखने को कहा। हां, एक न्यूज लोकल अखबारों में जरूर लगवानी है-लिखो-रात देर तक लोगों से मिलते रहने के कारण मन्त्रीजी का स्वास्थ्य गिरा लेकिन हस्पताल में भर्ती होने के बावजूद जनता के आग्रह पर मन्त्रीजी ने हनुमान जयन्ती समारोह में भाग लिया।

बस ठीक है, इतना काफी रहेगा।’ मन्त्रीजी ने एक पैग और बनाया। सैक्रेटरी को ऑफिस में फोन कर जरूरी फाइलें कोठी पर ही लाने को कहा और सोफे पर पसरकर नये सिरे से हनुमानजी की जात के बारे में सोचने लगे।

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