एक थे नामवर सिंह – प्रोफेसर सुभाष सैनी

प्रोफेसर सुभाष सैनी

नामवर सिंह (जन्म: 28 जुलाई 1926 बनारस, उत्तर प्रदेश निधन: 19 फरवरी 2019, नयी दिल्ली) हिन्दी के शीर्षस्थ शोधकार-समालोचक, निबन्धकार तथा मूर्द्धन्य सांस्कृतिक-ऐतिहासिक उपन्यास लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रिय शिष्‍य रहे। अत्यधिक अध्ययनशील तथा विचारक प्रकृति के नामवर सिंह हिन्दी में अपभ्रंश साहित्य से आरम्भ कर निरन्तर समसामयिक साहित्य से जुड़े हुए आधुनिक अर्थ में विशुद्ध आलोचना के प्रतिष्ठापक तथा प्रगतिशील आलोचना के प्रमुख हस्‍ताक्षर थे। शोध- 1 हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग – 1952 (पुनर्लिखित रूप में 1954 ई.) 2 पृथ्वीराज रासो की भाषा – 1956 (संशोधित संस्करण ‘पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य’) आलोचना- आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ – 1954 छायावाद – 1955 इतिहास और आलोचना – 1957 कहानी : नयी कहानी – 1964 कविता के नये प्रतिमान – 1968 दूसरी परम्परा की खोज – 1982 वाद विवाद संवाद – 1989 साक्षात्कार- कहना न होगा – 1994 बात बात में बात – 2006 पत्र-संग्रह- काशी के नाम – 2006 व्याख्यान- आलोचक के मुख से – 2005 हिन्दी आलोचना के ‘मेहतर’ – नामवर सिंह ‘‘मैं सोचता था कि कविता के द्वारा सरस्वती की आराधना करूंगा लेकिन देखा कि भक्तों के कारण साहित्य का मन्दिर उनके पैरों की धूल से भर गया है और उसकी सफाई ज्यादा जरूरी है, पूजा से पहले! और झाड़ू उठा लिया, सफाई करने लगा, पैंतीस वर्षों से मैं केवल सफाई कर रहा हूं। आगे चलकर मुक्तिबोध के शब्दों में अपने इस कर्म को गौरव भी देने की कोशिश की है ‘जो है, उससे बेहतर चाहिए,सारी दुनिया को साफ करने के लिए मेहतर चाहिए’। मेहतर होना कोई बुरी बात नहीं है, इसीलिए कविता छोड़कर आलोचना का कर्म, जो बहुत कुछ फाई जैसा ही है, करने की कोशिश करता रहा’’। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व में वामपंथ की ओर बढते रूझान को कम करने के लिए पूंजीवाद के समर्थकों ने बर्लिन में ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ की स्थापना की, जिसमें कई देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सोवियत-यूनियन और समाजवाद के खिलाफ निरन्तर प्रचार करने के लिए यह कांग्रेस विभिन्न स्थानों से छ: पत्रिकाएं प्रकाशित करती थी। इनमें ‘एनकाऊन्टर’ सबसे प्रमुख थी। फ्रांस से Freuve, वियना से Forum, फ्रांस से ही स्पेनी भाषा में Euderno, लन्दन से Soveit survey तथा The China Quarterly प्रकाशित की जाती थी। इनके अलावा राष्ट्रीय स्तरों पर दस से अधिक पत्रिकाएं छपती थी। भारत में भी कई साहित्यकार इससे जुड़े हुए थे। मार्च 1951में इस कांग्रेस का पहला एशियाई सम्मेलन बम्बई में हुआ। हिन्दी के प्रख्यात लेखक अज्ञेय को ‘भारतीय कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’का सचिव नियुक्त किया गया। बम्बई से ‘क्वेस्ट’नामक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित होती थी,जिसके सम्पादक अबु सईद अयूब तथा अम्लान दत्त। एक अन्य साप्ताहिक पत्र ‘थाट’ का सम्बन्ध भी ‘कांग्रेस’ से था और अज्ञेय इसके साहित्य-सम्पादक भी रहे। भारतीय समाज और साहित्य के संदर्भ में पहली परम्परा मर्यादावादी शास्त्रोन्मुखी,यथास्थितिवादी और केन्द्रवादी है तो दूसरी परम्परा स्वाधीनता को महत्त्व देने वाली, लोकोन्मुखी,परिवर्तनवादी और हाशिये के लोगों की चिन्ताओं से जुड़ी है। नामवर सिंह की पुस्तक में पहली परम्परा के प्रतिनिधि है -तुलसीदास और उनके व्याख्याकार आलोचक रामचन्द्र शुक्ल तो दूसरी परम्परा के प्रतिनिधि हैं – कबीर और उनके व्याख्याकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी। भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य में पहली परम्परा वैदिक-पौराणिक धारा से जुड़ी है तो दूसरी बौद्ध धर्म और दर्शन से।

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