ज़िन्दा जला कर शहीद कर दिया था क्रांति कुमार को

क्रांति कुमार कौन? नौजवान भारत सभा का पहला महासचिव । शहीद भगत सिंह का चहेता प्यारा दोस्त । जेल में रहते ही तो भगत सिंह ने इसे क्रांति कुमार नाम दिया था । वास्तव में उनके हंस राज नाम का एक साथी पुलिस का मुखबिर बन गया तो भगत सिंह ने अपने इस दूसरे साथी जिसका भी नाम हंसराज था उसे क्रांति कुमार का नाम दिया । वैचारिक रूप से मजबूत इस साथी को भी उम्र कैद की सजा सुनाई गए व इस दौरान भगत सिंह ,राजगुरु , सुखदेव व बी के दत्त के साथ जेल में रहे । बाद में 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद होने पर इन्हें रिहाई मिली ।

 

राम मोहन राय

15 मार्च,1965 का दिन मेरे शहर पानीपत के लिये बहुत ही बदनुमा दिन रहा ।मै उस समय कुल सात वर्ष का था पर वह मंजर आज भी ज्यों का त्यों याद है ,वह घटना बाल मन पर ऐसे अंकित हुई कि भुलाने से भी नही भूलती । तत्कालीन पंजाब भाषायी व साम्प्रदायिक आग में झुलस रहा था । कई टुकड़ो में बटे पंजाब को पंजाबी सूबे व हरियाणा में बांटने का अलग अलग आंदोलन चल रहा था । नाम तो भाषायी था पर पूरा खेल साम्प्रदायिक था ।एक तरफ अकाली थे दूसरी तरफ हिंदूवादी ताकत। झगड़ा हिंदी व गुरुमुखी को लेकर था और इस झगडे में जनता को लपेटा गया था । शहर में आंदोलन व प्रदर्शन होता रहता था ।

उस दिन भी ऐलान हुआ कि हिंदूवादी संगठनो की तरफ से एक जुलुस हलवाई हट्टे से चल कर जी टी रोड पहुचेगा और वहाँ जनसभा होगी । मेरा परिवार आर्य समाजी तो था पर कांग्रेसी भी । मेरे माता-पिता ,तत्कालीन कांग्रेस की नीति के हामी थे कि पंजाबी व हिंदी के आधार पर पंजाब का विभाजन नही होना चाहिए इस लिये आंदोलन के हक में न थे ,परन्तु बाल काल से ही राजनितिक चेतना के कारण जुलुस -जलसों में उन्हें देखने के लिए हम जाते थे । उस दिन भी यह सूचना सुन कर मै व मेरी बहन दोनों हलवाई हट्टे में श्री प्यारे लाल सर्राफ की दुकान की छत पर चढ़ कर तमाशा देखने लगे ।एक तरफ काफी भीड़ थी दूसरी ओर पुलिस का भी भारी बन्दोबस्त था । जोर जोर से नारे उछाले जा रहे थे ‘हिंदी -हिन्दू -हिंदुस्तान-लेकर रहेंगे ‘, ‘भारत माता की जय ‘ ‘हरियाणा सूबा ले कर रहेंगे’। तभी आवाज सुनी कि भीड़ की तरफ से पुलिस पर पत्थर बाजी शुरू हो गयी है और पुलिस ने भी कार्यवाही की तभी गोली चलने की आवाज आई और फिर एक दम भगदड़ मच गयी । तभी देखा एक 18 -20 साल के नौजवान को एक चारपाई लिटाया हुआ है उस की छाती से खून निकल रहा था और उसको उठा रहे सेंकडो की तादाद में लोग ‘खून का बदला -खून से लेंगे’ के नारे लगाते हुए बाजार से जी टी रोड की तरफ ले जा रहे है । जुलुस आगे चला गया और हम घर लौट आये कि तभी सुना कि कांग्रेसी दीवान चन्द टक्कर की जी टी रोड पर साइकिल दुकान को आग लगा दी । हम अपने घर की छत पर गए तथा शहर के पश्चिम से काला धुँआ उठता देखा ,इतने हम नीचे उतरे तो माता जी ने बताया कि पिता जी पता करने गए है कि टक्कर साहब की दुकान में कोई ज्यादा नुकसान तो नही हुआ ।

दीवान चन्द टक्कर एक निहायत ही शरीफ व उसूलपसन्द इंसान थे । गांधी जी के पक्के भक्त व कांग्रेस समर्थक । शहर के तमाम हम विचार लोग अक्सर या तो उनकी दुकान पर या का. बलवंत सिंह की लकड़ी की टाल, जो जी टी रोड पर थी वहीँ बैठते थे ।पिता जी व उनके दोस्त प0 जयंती प्रशाद (जिनके बहनोई पं. माई दयाल की दुकान टक्कर साहब की दुकान से लगती हुई थी) थोड़ी देर बाद घबराये हुए आये और रुआंसे से बोले कि टक्कर साहब की दुकान में आग लगा दी पर शुकर है कि वे दुकान में न थे ।पिता जी ने बताया आज संघियो ने उस दिन बाजार बन्द की कॉल थी ,कॉल के बावजूद टक्कर साहब अपने दो दोस्तों क्रांति कुमार व संत राम लाम्बा के साथ दुकान के बाहर बैठे थे पर जुलुस आता देख कर ये तीनो दरवाजा बन्द करके चले गए । उन्हें पता नही था कि आज तो वे ही निशाने पर है । पिता जी व हम सब को उनके बचने का इत्मिनान था । तभी एक अन्य व्यक्ति आये और बताया कि जब आग लगाई तो टक्कर साहब ,क्रांति कुमार और संत राम लाम्बा दुकान छोड़ चले गए थे और वे बच गए । पर उनकी सूचना अफवाह पर आधारित थी जो कि जानबूझ कर आम जनता व परिवार के लोगो को भ्रमित करने के लिये फैलाई गयी थी ताकि काम तमाम होने तक उनकी कोई खोज खबर न ले । बाद में पता चला उस दिन का पूरा मामला सुनियोजित था और हर तरह से निशाने पर टक्कर साहब की दुकान व उनके साथी क्रांति कुमार व संत राम लाम्बा थे । बाद में पता चला कि जब उन्मादियों पूरी तरह से आश्वस्त हो गए कि तीनो दुकान के अंदर चले गए है तो दुकान को बाहर से बन्द कर उसमे आग लगा दी गयी ।

दुकान पूरी तरह से टायरों से भरी थी ,आग फैलते देर न लगी । पुलिस व परिवार उन्हें बचा न सके क्योकि उन्हें तो भरमाया गया था कि वे तो दुकान से निकल गए है । अगले दिन जब तीनो कही न मिले और दुकान की आग ठंडी हुई तब जा कर दुकान के अंदर इन तीन लोगों के बुरी तरह शव मिले । पुलिस ने आर एस एस के लगभग दर्जन भर लोगो के।खिलाफ मुकदमा दर्ज किया ।उन पर करनाल कोर्ट में ट्रायल भी चला पर राजनितिक इच्छा शक्ति के अभाव व जटिल कानूनी पेचदिगियो के रहते आरोपी बरी हुए तथा भारतीय जनसंघ ने एक विजय जुलुस निकाल कर उनका स्वागत ‘बिच कचहरी दीवा बलया ‘ ( अदालत में दीपक जो भारतीय जनसंघ का निशान था उसकी जीत हुई ) के नारों से किया किया । उस दिन इन शहीद परिवारों के लिये दूसरी बार शहादत का दिन होगा ।

साम्प्रदायिक तत्वों के निशाने पर सबसे ज्यादा ‘क्रांति कुमार ‘ थे । क्रांति कुमार कौन? नौजवान भारत सभा का पहला महासचिव । शहीद भगत सिंह का चहेता प्यारा दोस्त । जेल में रहते ही तो भगत सिंह ने इसे क्रांति कुमार नाम दिया था । वास्तव में उनके हंस राज नाम का एक साथी पुलिस का मुखबिर बन गया तो भगत सिंह ने अपने इस दूसरे साथी जिसका भी नाम हंसराज था उसे क्रांति कुमार का नाम दिया । वैचारिक रूप से मजबूत इस साथी को भी उम्र कैद की सजा सुनाई गए व इस दौरान भगत सिंह ,राजगुरु , सुखदेव व बी के दत्त के साथ जेल में रहे । बाद में 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद होने पर इन्हें रिहाई मिली ।

क्रांति कुमार जिसने कभी भी न तो उसूलों से समझौता किया व न कभी किसी के आगे हाथ फैलाया । कलम के धनी क्रांति कुमार ने पानीपत में बस कर पत्रकारिता की तथा साम्प्रदायिकता के खिलाफ अपनी जंग को जारी रखा और इसी के चलते उन्हें ज़िन्दा जला कर शहीद कर दिया गया । क्रांति कुमार हमारे पारिवारिक मित्र थे वे अक्सर मेरे माता -पिता से मिलने हमारे घर आते थे । जब वे आते तो घर का माहौल ही दूसरा होता और गम्भीर चर्चाए चलती । उस समय तो पूरी समझ नही थी पर हाँ उनकी मौत की खबर से घर में मायूसी थी व खाना न बना था, क्योकि क्रांति चाचा नही रहे थे पर आज उनके जीवन का मकसद और उनके कत्ल के कारण जरूर जाने पहचाने लगते है ।

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