रेलगाड़ी

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सुरेश बरनवाल

ज्यों ही रेलगाड़ी की सीटी की आवाज सुनाई दी, बूढ़ा जसवन्त मंजी से तेजी से उठा और लंगड़ाता सा घर के भीतर चला गया। भीतर जाते समय उसने एक बार कातर निगाहों से अपने पोते सुलतान की तरफ  देखा। सुलतान ने अपनी नजर नीची कर ली और सामने खड़े ग्राहक को सामान देने का बहाना करने लगा। जसवन्त घर के दरवाजे को खोलता अपने कमरे में चला गया। तभी रेलगाड़ी ने दूसरी सीटी दी। जसवन्त का चेहरा पसीने से नहा गया। उसके मुंह से या रब…निकला और वह बिस्तर के पास रखी लोहे की जंग लगी कुर्सी पर बैठ गया। उसकी बहू ने देखा तो तुरन्त पानी का गिलास ले आई। जसवन्त ने गिलास को मुंह से लगाकर एक बार में ही खाली कर दिया। उसके दिल की धड़कनें हमेशा की तरह तेज हो आई थीं। एक मिनट बाद गाड़ी की छुक-छुक की आवाज उभरी और फिर एक सीटी बजी। जसवन्त को लगा कि रेलगाड़ी अभी आएगी और उसके घर का दरवाजा तोड़ती भीतर आ रूकेगी। फिर उसमें से लहू आलूदा ढेर सारी लाशें अनाज की बोरियों की तरह गिरने लगेंगी। उनमें से दो लाश उसके…। उसने कसकर आंखें बन्द कर लीं। एक दृश्य आंखों के आगे उभरा…फिर विलुप्त हो गया। यह रोज होता है। उसका यह डर उसे रोज मारता है। उसकी बहू को हैरानी है कि इतने वर्षों से उसका बूढ़ा ससुर रेलगाड़ी की आवाज से डर रहा है और उसके डर की मात्रा तनिक भी कम नहीं हुई। अपनी शादी के बाद जब उसने पहली बार अपने ससुर को यूं डरते देखा था तो उसे बहुत हंसी आई थी, जिसे वह अपने घूंघट में छिपा गई थी। उसने अपने पति से इस बात की चर्चा की तो सुलतान गंभीर हो गया था। उसने अपनी नई नवेली दुल्हन को सिर्फ यही बताया था कि दादा के साथ एक बड़ा हादसा हुआ है। विभाजन के समय उसने रेलगाड़ी में लाशें ही लाशें देखी हैं, इसलिए वह रेलगाड़ी से डरता है। ज्यादा कुरेद कर पूछने पर तिक्त स्वर में सुलतान ने उसे कहा था कि इससे अधिक उसे भी पता नहीं है। अब उसे अपने ससुर से सहानुभूति होने लगी है। उसने आज भी भय से जर्द हो चुके उसके चेहरे की तरफ  देखा तो हमेशा की तरह दया का भाव उसके मन में भर आया।

रेलगाड़ी की आवाज धीमे होने लग गई थी। उसी के साथ जसवन्त का चेहरा भी सामान्य होता चला गया। एक पल कुर्सी पर ही बैठकर उसने अपने सिर पर रखे साफे को ठीक किया, अपने झुर्रीदार चेहरे पर हाथ फिराया और घर से बाहर आ गया।

दुकान पर रणजीत बैठा हुआ था और सुलतान से बातें कर रहा था। उसे देख रणजीत बोल उठा-‘क्या दादा, फिर दौरा पड़ा क्या?’

आमतौर पर शान्त रहने वाला जसवन्त मंजी पर बैठता भड़क उठा-‘रणजीते, यह दौरा नईं एै। यह जख्म है मेरा। दौरा और जख्म में बहुत फर्क होता है रणजीते।’

रणजीत उसके पास आ गया और मंजी के पैताने बैठ गया-‘दादा, यह जख्म अब खतम कर ले। बहुत दिन बीत लिए विभाजन को अब। अब सब शान्त है दादा। हिन्दू-मुसलमान सभी सुरक्षित हैं अपने देश में। अब वो दिन खतम हो लिए।’

जसवन्त मंजी पर बैठ गया। कुछ बोला नहीं। वह भी जानता था कि बहुत दिन बीत गए हैं भारत-पाकिस्तान के विभाजन को। अब सब कुछ शान्त है। पर वह क्या करे। जो कुछ उसने देखा है वह भूलाए नहीं भूलता। वह आगजनी, वह अमानवीयता। उसकी यादों की दीवारों पर वह तस्वीर कुछ इस कदर चस्पां है कि दीवार भले गिर जाए, वह तस्वीर नहीं हटती।

उसने मंजी के पास रखे हुक्के को मुंह से लगाया और अपने मन के भीतर उठते गुबार को बाहर के धुंए में मिलाने लगा। वह कुछ और भी कहना चाहता था परन्तु चुप रह गया। धुंए के साथ ही उसके भीतर से खांसी उभरी और खौं…खौं करता वह पानी का लोटा मंजी के नीचे तलाश करने लगा। सुलतान ने यह देखा तो दुकान से पानी का लोटा लेकर उसके पास आकर उसे थमा दिया। जसवन्त ने लोटे में से एक घूंट पीकर सुलतान की तरफ  देखा और बोला-‘सुलतान, ले चल बेटा। दिखणादे मोहल्ले में ले ले मकान। यहां से चला चल। बेच दे सब कुछ। यह रेलगाड़ी खा जाएगी मुझे।’

सुलतान अपने पजामे को घुटनों तक मोड़ता मंजी केपास उकड़ूं बैठ गया-‘दादा, कुछ नहीं रखा वहां। वहां मकान लेने के लिए बहुत रूपैये खर्च करने होंगे। ये दुकान मकान बेचकर भी इतने ना बनेंगे कि वहां कुछ बना सकें।’

‘तुझे उसने…क्या नाम है उसका….गुलजारे ने बताया तो था कि डेढ़ मरले का मकान बिकाऊ है। इतने में ही मिल जाएगा, जितने इसके बंटेंगे।’ जसवन्त बोला।

‘दादा…फिर वही बात। मकान तो मिल जाएगा, पर दुकान का क्या होगा? वहां दुकान तो नहीं बननी।’-सुलतान बोला।

‘अरे दुकान भी धीरे-धीरे बन जाएगी…।’-जसवन्त बोला।

इस पर सुलतान भड़क उठा-‘दुकान धीरे-धीरे बन जाएगी। तब तक मैं क्या करूंगा?’

‘पहले क्या करता था?’

‘दादा…अब वो न होगा। बहुत धक्के खाए। बहुत बोझा उठाया। अब वो उमर नहीं है। बड़ी मुश्किल से दुकान बनी है इधर। इसे ना छोड़ता मैं यूं ही।’

‘तू दुकान नहीं छोड़ता, रेलगाड़ी मुझे ना छोड़ती। यूं तो सुलताना मैंने मर ही जाना है।’-जसवन्त लाचारी से सिर हिलाता बोला।

‘देख दादा, तुझे कितनी बार कहा है कि शहर में चल। ईलाज करवा दूंगा। बड़े नए-नए नुस्खे आ रहे हैं आजकल।’-सुलतान समझाने वाले अन्दाज में बोला।

जसवन्त सिर हिलाता बोला-‘ये नुस्खे काम ना आने सुलताना। तुझे पता है, मेरा ईलाज मेरी मौत है। या मेरे कान में जहर डाल दे।’

सुलतान उठता हुआ व्यंग्य से बोला-‘तो यूं बोल ना दादा कि तैंने सलीम के घर के पास जाना है ताकि तू वहां जा सके बार-बार।’

जसवन्त का मन दुखी हो गया। ‘सलीम’ उसके मुंह से आह सी निकली। यह नाम कितना सुकून देता है उसे। वह कुछ कहना चाहता था पर चुप रह गया। जानता था कि अगर सलीम की और भी बातें निकली तो सुलतान बहुत गंदा बकने लगेगा।

इस समय धूप निकली हुई थी और दुकान पर ग्राहक भी थे। सुलतान चला गया और जसवन्त लेट गया।

‘सलीम’। कितने दिन हो गए उससे मिले। अब और भी बूढ़ा लगने लगा होगा वह। चार महीने से अधिक हो गए उसे देखे हुए। उसे देखा भी तो तब जब कि वह डाक्टर के पास अपने घुटने के लिए दवा लेने गया था। वहीं अप्रत्याशित रूप से उसे सलीम बैठा हुआ दिखा। सलीम भी खुद को दिखाने के लिए आया हुआ था। काश कि बहू साथ ना होती’-जसवन्त ने सोचा। कितने आराम से वह सलीम से मिलता। उसे गले से लगाता। कुछ अपनी कहता, कुछ उसकी सुनता। वह उसे टटोलकर देखता कि उसका सलीम कहां से और बिखर गया, कहां से जुड़ गया।

सलीम उसकी जिन्दगी के इतिहास का जिन्दा अध्याय था। सियालकोट से दोनों साथ ही आए थे। एक-दूसरे का सहारा बने। एक-दूजे का हाथ यूं पकड़े कि एक क्षण भी दोनों अलग न होंगे। छोटे से सुलतान को साथ लिए। परन्तु अब वही सुलतान दोनों के बीच का रोड़ा है। जब तक सुलतान नहीं चाहेगा, वह नहीं मिल सकेंगे। सुलतान क्रोध को देखकर सलीम भी उससे कन्नी काटने लगा था।अफसोस तो यह भी था कि उसके साथ ही सलीम के भी घुटनों में दर्द रहता था। न तो सलीम से उतना चला जाता था और न उससे। इसलिए भी आपस में वह मिल भी नहीं पाते थे। दोनों दोस्त एक ही दर्द के मारे थे। एक ही दुख से पीडि़त थे।

जसवन्त सारे दिन मंजी पर ही रहता था। बहुत हल्की सर्दी में भी उसे धूप की आवश्यकता सारे दिन बनी रहती थी। उसकी बहू दिन में दो बार कड़वा तेल गरम करके कटोरी में रख जाया करती थी और वह कभी तेल घुटनों के मलता तो कभी मंजी पर चादर ओढ़कर लेट जाता। आने-जाने वालों से उसकी बात होती रहती या फिर वह ख्यालों में खोया रहता था। ख्याल…वही… सियालकोट…वहां की गलियां…वहां की सडकें…इक्के…खेत। फिर अचानक ही उसके ख्यालों में शोर उठने लगता। बन्द आंखों के आग लपलपाती…खून…हत्याएं…बलात्कार। वह घबराकर जाग जाता।

आज भी सुलतान ने उसकी दुखती रग को छेड़ दिया था। वह सलीम से मिलना चाहता था। कैसे मिले? वह उन दिनों को कोस रहा था जब सुलतान के मन में सलीम के प्रति नफरत का लावा फैलता जा रहा था। उसे वह दिन याद आ गए जब सियालकोट से वह तीनों आए थे।

”यह हिन्��ू मुसलमानों के बीच नफरत का दौर था। हर आंख में शंका थी, गुस्सा था, अफसोस था। जसवन्त को एक सेठ ने उसकी कहानी सुनकर और एक छोटे से बच्चे को गोद में देखकर उसे अपने खेत में रख लिया था। जसवन्त मेहनती था, जल्दी ही काम सीख गया और सेठ का विश्वासपात्र बन गया। सलीम को एक मुसलमान दुकानदार के यहां नौकरी मिल गई। सुलतान को पढ़ाने की जसवन्त ने कोशिश की थी परन्तु वह पांच जमात से आगे जा ही नहीं सका। वह भी मजूरी करता कभी खेतों में तो कभी गोदामों में। सुलतान अपने काम से कभी खुश नहीं रहा। उसके कंधे शाम के समय दर्द करने लगते थे। जसवन्त उसे कहता था कि इतनी मेहनत मत कर, गुजारा तो चल ही रहा है। सलीम भी अपने काम से फारिग होकर कभी-कभी रात को उनके पास चुपके से आ जाता था और सुलतान को कहता था कि इतनी मेहनत न करे कि शरीर खराब हो जाए। परन्तु सुलतान पर तो बचपन से भूत सवार था पैसों का। वह एक बार किसी काम से जसवन्त के साथ शहर क्या चला गया था, वहां की रौनक देख हतप्रभ रह गया था। उसे सपने में पैसे दिखते, शहर दिखता। इस साधारण से कस्बे में उनका गुजारे लायक काम तो चलता था, परन्तु ऐसी उम्मीद नहीं थी कि यहां अमीर आदमी बना जा सकेगा।

एक दिन उसने जसवन्त को कहा कि वह शहर जाना चाहता है। जसवन्त घबरा गया। पन्द्रह साल का लड़का शहर कैसे जाएगा? फिर उसे छोड़कर! समय की मार से उसके कंधे समय से पहले झुक गए थे। ऐसे में उसका यह भी सहारा जाता रहता। उसने उस रात सलीम को बुला भेजा। सलीम आया, सुनकर उसके भी चेहरे पर चिन्ता की लकीरें आ गईं। उसने भी दुनिया की ऊंच-नीच को समझाया और सुलतान को मनाने की कोशिश की कि वह शहर न जाए। जब सलीम सुलतान को समझा रहा था, उस समय जसवन्त एक कोने में बैठकर चुपचाप उन दोनों को देखता रहा था। इसके बाद जब भी वह जिद्द करता, जसवन्त सलीम को बुला भेजता और दोनों के वाद-विवाद के बीच एक कोने में बैठा दोनों की तरफ  देखता रहता। इससे सुलतान बहुत चिढ़ गया था। उसे यह लगने लगा था कि उसका दादा उसके शहर जाने के इतना खिलाफ  नहीं है, जितना सलीम है। एक बार उसने चिढ़कर सलीम को कह दिया-‘दादा, यह हमारे घर का मामला है, आप इसमें दखल न दें तो ही बेहतर होगा।’ ऐसा सुनते ही सलीम का चेहरा उतर गया। वह हैरानी से आंखें मिचमिचाता सुलतान को देखता रह गया, परन्तु जसवन्त पर मानो भूत सवार हो गया था। उसने पहली बार सुलतान पर हाथ उठाया-‘तेरी हिम्मत कैसे हो गई सलीम मियां से ऐसे बोलने की? तू इतना बड़ा हो गया कि अपना-पराया करने लगे?’ सुलतान थप्पड़ खाकर कुछ नहीं बोला पर अगले ही दिन जब जसवन्त सो कर उठा था तो सुलतान घर में नहीं था। वह भाग गया था। एक दिन-दो दिन, जसवन्त ने उसे ढूंढा। सलीम ने भी तलाश किया परन्तु वह नहीं मिला। जसवन्त अपराध बोध से ग्रसित होकर बीमार हो गया। इतना कि सलीम को फिर शहर जाना पड़ा। पांच दिन बिना आराम किए सलीम ने आखिर उसे ढूंढ ही निकाला। थके, हारे हुए सलीम ने सुलतान के मिलने पर उसे मात्र इतना कहा-‘तेरा दादा मर जाएगा, वापिस आ जा। बहुत बीमार है वह।’

सुलतान क्रोध में घर तो छोड़ आया था परन्तु अपराधबोध से ग्रस्त था। सलीम की बात सुनकर उसके पीछे-पीछे घर तो आ गया परन्तु उसकी नाराजगी गई नहीं थी। जसवन्त उसे देखते ही बच्चे की तरह फ़फक पड़ा। आज तक वह सुलतान को यही बताता आया था कि उसके माता-पिता की मौत बीमारी से हुई थी, परन्तु उस दिन पता नहीं किस भावावेश में बहकर वह कह बैठा कि उसने अपने बहू-बेटे को विभाजन के दंगों में मरते देखा है। अब वह किसी अपने से अलगाव नहीं सह सकता। सुलतान के लिए यह जानकारी नई थी। यह सुनते ही वह हक्का-बक्का रह गया था। उसे अपने माता पिता की सूरत तक याद नहीं थी। उसके माता पिता की उसके पास कोई फोटो भी नहीं थी। यह सुनते ही कि विभाजन में उसके मां बाप को कत्ल कर दिया गया था वह चीख पड़ा। विभाजन की जिन्दा कहानियां उसने भी सुनी थीं। किस प्रकार के अमानवीय अत्याचार किए गए थे, खासकर स्त्रियों पर। इस सूचना ने उसके मन में मुसलमानों के प्रति नफरत प्रगाढ़ कर दी। वह चीख पड़ा-‘किसने मारा था मेरे मां पिताजी को। मुसलमानों ने? इसे पता होगा,’ वह सलीम की तरफ  इशारा करने लगा। भावावेश में कहने के बाद जसवन्त भी पश्चाताप कर रहा था कि यह क्या निकल गया उसके मुंह से? परन्तु अब क्या हो सकता था। सुलतान ने सलीम के लिए धमकी दे दी कि यदि यह घर पर आया तो वह वापिस भाग जाएगा। वह कहता था-‘माना कि हम मुसलमान नहीं थे, इसलिए हमें पाकिस्तान से भागना पड़ा, परन्तु यह तो मुलसमान था, यह क्यूं आया? वहीं मरता।’ जसवन्त इस पर खून के घूंट पीकर रह जाता था। सलीम उस दिन का निकला फिर कभी घर नहीं आया। उस दिन सलीम की आंखों से आंसू यूं बह रहे थे मानो कहीं बांध टूट गया हो। परन्तु जुबान से एक शब्द भी नहीं निकला। वह दर्द की अधिकता से मुस्करा रहा था, रो रहा था, बिल्कुल चुप था। जसवन्त सियालकोट के विभाजन को भी सह नहीं पाया था, यह दूसरा विभाजन था जो उसे बिल्कुल तोड़ गया था। परन्तु सुलतान के मन में सलीम के प्रति ऐसी नफरत फैल चुकी थी, कि उसका हल नहीं था। समय गुजरते हुए उनका घाव तो नहीं भरा, परन्तु उस पर दर्द की ऐसी पपड़ी जम गई थी कि वह किसी को दिखती नहीं थी परन्तु भीतर ही भीतर उसमें टीस उठती थी। जसवन्त आज भी चाहता था कि सुलतान उसे सलीम से मिलने दे। रात अंधेरे वह कभी-कभी सलीम से मिलने जाता था, परन्तु एक दिन सुलतान को न मालूम कैसे पता चल गया और फिर घर में वही महाभारत शुरू हो गई थी।’’

समय के साथ सुलतान ने कुछ पैसे एकत्र किए और यह दुकान कर ली। एक लड़की का रिश्ता भी आ गया और आज सुलतान है, वह है, उसकी बहू है परन्तु सलीम नहीं है।

मंजी पर लेटे-लेटे जसवन्त ने करवट बदली। सुलतान दुकान पर अकेला बैठा था। जसवन्त सुलतान के चेहरे की तरफ  देखता रहा। उसे सलीम भी याद आता रहा।

‘दादा, कल तेरी दवाई लानी है। कल जाकर डाक्साब को दिखा देना।’-अचानक सुलतान बोला।

जसवन्त ने लेटे-लेटे हुंकार भरी। अचानक उसके मन में एक बार आया कि कल समय निकालकर वह सलीम के पास जाएगा। सुलतान को कह देगा कि उसके घुटने में दर्द कम है, इसलिए वह खुद ही डाक्टर के पास चला जाएगा। साथ में बहू को भेजने या उसे साथ जाने की जरूरत नहीं है। ऐसा सोचकर उसके होंठों पर हल्की सी संतोषप्रद मुस्कान आ गई। वह कई देर अपना कार्यक्रम बनाता रहा, बहाने सोचता रहा। शाम को एक बार फिर रेलगाड़ी ने सीटी दी। पसीना पसीना होता वह कमरे में घुस गया और चादर तानकर लेटा रहा। वहीं खाना खाया और यह सोचते हुए कि यदि कल सब ठीक रहा तो वह सलीम से कल अवश्य मिलकर आएगा। रात नींद से पहले वह मानो यादों की नींद में गहरा उतर गया।

”वह सियालकोट की मुख्य सब्जी मण्डी से घर की तरफ  छुपते हुए जा रहा था। उसे पता चला था कि इसी इलाके में कहीं दंगा हुआ है और गोली भी चली है। इस समय चारों तरफ मौत की शांति थी। कल एक गुरूद्वारे को जला दिया गया था, जिसमें कई लोग, जिसमें औरतें और मासूम बच्चे भी थे, जिन्दा जल गए थे। उसे यह भी पता चला कि स्थानीय पुलिस भी आक्रमणकारियों के साथ मिल गई है। सिक्खों पर विशेष कयामत ढाई जा रही थी। जिन सिक्खों ने सियालकोट को इतना कुछ दिया, उन्हीं के साथ हद दर्जे की निर्दयता बरती जा रही थी। हालांकि सिक्खों ने काफी विरोध किया था, पर बहुतेरे सिक्ख काट डाले गए। कल रात उसकी गली में रामदीन का भी मकान जला दिया गया था और उसके घर का सारा सामान लूट लिया गया था। इस लूट के कुछ देर पहले ही रामदीन और उसके परिवार वाले चुपके से घर छोड़ के गए थे। हकीकतन जब रामदीन और उसका परिवार घर छोड़कर जा रहे थे, वह अपनी छत से उन्हें जाते हुए देख रहा था। उस रात उसे लगा था कि रामदीन जल्दबाजी कर रहा है। सियालकोट में सिक्खों के वर्चस्व को खतम करने के लिए सिक्खों को मारा जा रहा है, परन्तु क्या पता हिन्दुओं के साथ इतना अत्याचार न हो। कुछ देर बाद जब कुछ लोगों ने रामदीन के घर पर हमला किया और आगजनी की तो उसने समझ लिया कि नहीं, अब जाना ही होगा। यह आग उसके घर तक भी आ सकती है।

सुबह वह उठा भी नहीं था कि सलीम उसके घर छिपता सा आया था और उसने बताया था कि उसके ताया के बेटे नियामत और जावेद उससे उसका हाल-चाल पूछ रहे थे। सलीम ने बताया था कि उनके पूछने के अंदाज से उसे शक हुआ था इसलिए वह ताकीद करने आया है। जसवन्त का कलेजा धड़क उठा था। तो क्या वास्तव में बंटवारा हो गया है? क्या वास्तव में उसका देश, उसकी जमीन उससे छूट जाएगी। लगभग सारा शहर उसे जानता है। इसी शहर में वह पैदा हुआ, पला, बढ़ा। सभी उसके दोस्त हैं। क्या करीम, क्या जावेद, क्या नियामत और यह जो शहर के प्रमुख लोग हैं, लगभग सभी के ही साथ तो उसकी उठ-बैठ है। वह लोग, जिनसे वह बिछडऩे के नाम पर ही उदास हो जाए, क्या वह उसके दुश्मन हो गए हैं? क्या सलीम भी? नहीं, सलीम तो उसे ताकीद करने आया था। तो वह क्या करे? उसने फैसला कर लिया था कि जोखिम लेने की जरूरत नहीं। वह अपना घर छोड़ देगा। हमेशा के लिए। सोचते ही उसका कलेजा फट पड़ा। उसे लगा कि वह चीख-चीखकर रोने लगेगा। हिन्दुस्तान के दो टुकड़े! क्या यह संभव है? क्या जमीन दो टुकड़ों में बंट जाएगी? अपनी जमीन पर हमेशा रहते आए लोगों को एक अनजान नाम बताया गया ‘पाकिस्तान’ और इस नाम ने उनका सब कुछ छीन लिया। यह पाकिस्तान किसने रचा, क्यों रचा, किससे पूछकर रचा? क्या दो अति महत्वाकांक्षी व्यक्तियों की महत्वाकांक्षा के लिए किसी देश के दो टुकड़े भी स्वीकार किए जा सकते हैं? एक को हिन्दुस्तान चाहिए और एक को पाकिस्तान। कांग्रेस पार्टी पर तो उसे भरोसा नहीं था, वहां व्यक्तिगत स्वार्थ हावी हो चुके थे, परन्तु क्या गांधी जी भी कुछ नहीं कर सके? बात-बात पर अनशन करने वाले गांधी जी अब क्यों शान्त रह गए? उसके मन में प्रश्न भी बहुत थे और दुख भी।

उसका कलेजा फटा जा रहा था। सब्जी मण्डी से निकलते ही जब वह अपने घर की गली में घुसा तो देखा रामदीन के घर से अब भी धुंआ निकल रहा है। कुछ लोग रामदीन के घर के बाहर खड़े हैें। वह सकपका कर तुरन्त एक मकान की ओट में हो लिया। यहां से उसका मकान दिखाई तो नहीं देता था परन्तु कुछ ही दूरी पर था। वह जिस मकान की ओट में था, उसके भीतर घुस गया। उस घर के सदस्यों ने उसे शंका की दृष्टि से देखा परन्तु वह उनके नजरों की परवाह किए बिना छत पर पहुंचा और फिर छतों से होता हुआ अपने घर की छत तक जा पहुंचा। अभी तक लोग उसके घर तक नहीं पहुंचे थे। एक बार उसके मन में फिर आया था कि शायद कुछ न हो, शायद उसे घर ना छोडऩा पड़े परन्तु जब वह छत से होता अपने घर के आंगन में पहुंचा तो एक कोने में उसे अपनी बहू दिखी। घबराहट उसके मासूम चेहरे पर लिपटी हुई थी। उसके दिल से हूक से उठी। अभी एक साल भी तो नहीं हुए उसे इस घर में आए। उसकी गोद में दूधमुंहा बच्चा था। शहर में जो वारदात हो रही थी, क्या वह भी उसी का शिकार हो जाएगी। घर छोडऩे की जो दुविधा उसके मन में थी, वह एकाएक खतम हो गई थी। उसने तुरन्त घर छोडऩे का फैसला कर लिया। अंधेरा होने को था। उसने अपने बेटे को आवाज दी। भीतर के कमरे से उसका बेटा कृपा बाहर आया।

‘बेटा, हमें अभी शहर छोडऩा है।’ वह बोला तो बहू के मुंह से चीख निकल गई।

फिर तीनों जरूरी सामान समेटने में लग गए। जो समेटा गया उसे एक बक्से और एक गठरी की सूरत में और अंटी में समेट लिया गया। वह पूरी तरह फारिग हुए भी नहीं थे कि बाहर शोर सा मचा। शोर पता नहीं किसका था। जसवन्त चीखा-‘भागो।’ तुरन्त ही तीनों छत पर जा चढ़े। छत के पीछे सुहागसिंह का मकान था। तीनों उसके मकान में कूद गए। सुहागसिंह का मकान भी खाली हो चुका था। तीनों गलियों में भागते किसी सुनसान जगह की तलाश में थे। राह में उन्हें कुछ घर जले मिले। सिक्खों और हिन्दुओं के लगभग सभी घर खाली हो चुके थे। वह हैरान था कि उसे माहौल समझने में इतनी देरी कैसे हो गई? एक स्थान पर दो लाशें दिखाई दीं, जिसे चार-पांच लोग घेरे खड़े थे। एक गली में किसी अभागे का पैर आधा कटा हुआ एक कूड़े के ढेर पर पड़ा था। यह सब देखकर उनका दिल सहम गया था। क्या मानव का शरीर अब कुड़े से भी गया गुजरा हो गया। भीगे मन से भागते हुए उसके बेटे ने पूछ लिया-‘कहां जाना है पिताजी?’

‘सलीम ताया के घर।’ उसके मुंह से बरबस निकला। उसके बेटे के पांव ठिठके पर उसके पांव नहीं रूके थे। लम्बा रास्ता पकड़ते हुए, गलियों में छिपते-छिपाते अंतत: वह सलीम के घर के पास पहुंच गए। उन्हें एक सुरक्षित और सुनसान स्थान पर खड़ा करके जसवन्त सलीम के घर गया। वहां संयोग से सलीम बैठा ही था। जसवन्त को देखते ही सलीम उसे खींच कर भीतर ले गया।

‘बाकी कहां हैं?’ सलीम सरगोशी करता पूछा।

तब से सलीम की बेगम रूखसाना और उसका बेटा करीम भी आ गए।

जसवन्त ने बताया। तुरन्त करीम बाहर की तरफ भागा। थोड़ी देर में आया तो करीम के साथ कृपा और उसकी बहू भी थी।

‘देवरजी चिन्ता मत करो।’ रूखसाना बोली-‘आप यहीं छिप जाओ। आधी रात को आपको बाहर तक छोड़ आएंगे। रात के लिए एक लारी कर रखी है जो कुछ लोगों को लेकर वजीराबाद होते हिन्दुस्तान जाएगी। उसी लारी में आप सभी के लिए कह रखा है। यह भी सुना है सरकार यहां पर जल्दी ही फौज तैनात कर देगी। खुदाया सब भली करेंगे।’

तीनों वहां छिपने को राजी हो गए। और कोई विकल्प भी नहीं था। हर गली में सन्नाटा बिखरा पड़ा था और लोग रात के अंधेरे में ही भाग रहे थे या फिर काफी सारे लोग एक साथ जत्था बनाकर निकल रहे थे। अब लोगों से संपर्क करने का समय नहीं था इसलिए उनका भी रात के अंधेरे में निकलना आवश्यक हो गया था। सलीम ने उन्हें अपने घर की एक अंधेरी कोठरी में छिपा दिया था जो उसके घर के बिल्कुल पिछवाड़े पड़ती थी। उस अंधेरी कोठरी में वह तीनों अपने सीने की धड़कन सुन सकते थे। देर रात जसवन्त को एकदम से ध्यान आया कि उसकी पत्नी की एकमात्र निशानी उसकी फोटो तो घर में ही रह गई। उसने उसकी फोटो अपने खेती बाड़ी के कागजों के साथ एक छोटी सी संदूक में अनाज वाले कोठे में रख रखी थी। आज उससे उसका घर छूट रहा था। इस घर की समस्त यादें भी यहीं रह जानी थीं। पर कृपा की मां की याद, जो जब तक जिन्दा रही, उसका हमसाया बनी रही, उसकी एकमात्र याद को वह कैसे पीछे छोड़ जाता।

वह अपने स्थान से उठने लगा।

‘पिताजी।’-तुरन्त ही कृपा ने अंधेरे में ही उसका हाथ पकड़ लिया।

‘अभी आया पुतरा।’-कहकर जब तक कृपा उसे रोकता, वह तेजी से दरवाजे की तरफ  बढ़ा और दरवाजा खोलकर धीरे से बाहर झांका। बाहर नीम अंधेरा था। कहीं दूर पर कुछ आवाजें आ रही थीं। जसवन्त बाहर निकल गया। पीछे कृपा और उसकी पत्नी अपने कलेजे को थामे और परमात्मा को याद करते बैठे रहे। वह अपने घर की तरफ  धीरे से निकल गया था। रास्ते में कोई नहीं मिला। सारी गलियां यूं शांत पड़ी थीं कि उसे उस शांति में मौत के कदमों की आहट सुनने लगी थी। दूर कहीं अब भी अजीब सी आवाजें आ रही थीं जो डर को बढ़ा ही रही थीं। वह अपने घर के पास पहुंचा तो धक से रह गया। बाहर का दरवाजा गिरा पड़ा था। भीतर से कुछ लोगों की आवाजें आ रही थीं। यूं लग रहा था कि कुछ लोग भीतर हैं जो सामानों को उठाकर फेंक रहे हैं। वह डरते हुए दरवाजे के पास पहुंचा। भीतर कुछ लोग उसे दिखे भी। अब भीतर जाने का कोई फायदा नहीं था। उसने अपने घर को एक बार हसरत भरी निगाह से देखा, उसके दीवार पर हाथ फिराया मानो किसी बच्चे को सहला रहा है और फिर उल्टे पांव वापिस हो लिया। वह लगातार भाग रहा था। जब वह सलीम के घर के पास पहुंचा तो अंधेरे में अचानक किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसके मुंह से चीख निकल गई थी।

‘यह मैं हूं सलीम, कहां गया था?’- वह सलीम ही था।

उसकी सांस फूल रही थी। उससे कोई जवाब नहीं दिया गया। सलीम उसे खींचता हुआ एक तरफ  ले चला।

‘कृपा और बहू…? उसने पूछा। सलीम उसे अपने घर से दूर लिये जा रहा था।

‘उन्हें लारी में बैठा दिया। अचानक ही कार्यक्रम बदलना पड़ा। पर तू चिन्ता मत कर। वह सुरक्षित हैं। तू मिला नहीं तो तुझे ढूंढने तेरे घर जा रहा था।’

‘पर मेरा इन्तजार तो कर लेता।’-वह शिकायत भरे लहजे में बोला।

‘घर पर बिलावल आया था। वह बता रहा था कि जावेद को पता नहीं कैसे शक हो गया है कि तू यहां छिपा बैठा है। यह भी बता रहा था कि जावेद कुछ लोगों को लेकर तेरे घर की तरफ गया है। और बताया कि वजीराबाद में कत्लेआम मच गया है। उसके जाने के तुरन्त बाद रूखसाना को भेजकर लारी वाले को वजीराबाद जाने से रोका है और उसे कश्मीर रोड पर एक गली में रूकने को कह रखा है। अब स्टेशन से अमृतसर वाली गाड़ी पकड़ेंगे।’- सलीम उसे खींचता सा बोला।

‘पर वहां तो…?’-वह सहम गया।

‘इस समय वहीं से ही जाना सुरक्षित है। चल चलते हैं। समय बिल्कुल नहीं है। जावेद तुझे घर पर नहीं पाकर यहां भी आ सकता है। वह बहुत गुस्सैल है। कुछ अनहोनी यहीं न हो जाए जसवन्ता। जल्दी कर।’

दोनों भागते हुए कश्मीर रोड तक आए और उसे लेकर सड़क से लगती एक चौड़ी गली में सलीम घुस गया। वहां कोई लारी नहीं थी।

‘लगता है लारी चली गई।’-सलीम की भी सांसे चढ़ आई थीं।

‘हमें स्टेशन जाना होगा।’-वह बोला।

‘चल, मैं भी चलता हूं।’- सलीम बोला।

‘तू क्या करेगा? स्टेशन आठ किलोमीटर दूर है। तू घर जा।’

सलीम बड़ी लाचारी वाली हंसी हंसा। बोला-‘तेरी भाभी कृपा और बहू के साथ कुछ और लोगों को भी सुरक्षित पहुंचाने गई है। मैं तुझे भी कैसे छोड़ दूं मेरे जिगरी यार। फिर तेरी भाभी को वापिस भी तो लाना है।’

जसवन्त का कलेजा रो उठा। कैसी त्रासदी थी। एक मुसलमान कुछ लोगों के लिए जान का जोखिम तक उठा रहा था तो दूसरे मुसलमान उनकी जान के पीछे पड़े थे। सुनने में आ रहा था कि ऐसा ही हाल देश के अन्य स्थानों पर भी था। कहीं हिन्दू मार रहे थे, तो कहीं मुसलमान। हां, इतना अवश्य था कि जो मर रहे थे वह इन्सान थे। लाचार, बेबस, दुखी। वह दोनों भागते रहे। स्टेशन के बाहर लोगों का हुजूम उमड़ा पड़ा था। वहां उन्हें फौज का कोई आदमी नहीं दिखाई दिया। कुछ पुलिस वाले खड़े थे, परन्तु उन पर कतई विश्वास नहीं किया जा सकता था।

वह स्टेशन के भीतर गए तो वहां का हाल देखकर उनकी रूह कांप गई। सारा स्टेशन लोगों से जिनमें अधिकांश सिक्ख थे और उनकी तुलना में आधे हिन्दू थे, से भरा पड़ा था। उनमें से बहुत से लोग घायल थे। वहां कुछ लोग हथियार लिए हुए जत्थे बनाए खड़े थे। यह वह लोग थे, जो अपने रिश्तेदारों को गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। स्टेशन के एक तरफ भयंकर चीख पुकार मची थी। सहमते हुए दोनों ने उधर देखा। पता चला कि स्टेशन से थोड़ी दूरी पर वजीराबाद से अभी-अभी एक रेलगाड़ी पहुंची है, जिसमें सभी लोगों को मार डाला गया है। भीड़ का बहुत सा हिस्सा उधर की तरफ भाग रहा था, हालांकि वह रेलगाड़ी यहां से दिखाई नहीं दे रही थी। उस रेलगाड़ी को स्टेशन के बाहर ही रोक दिया गया था। कुछ लाशें वहां से स्टेशन पर लाई गई थीं और कुछ लाई जा रही थीं। उन लाशों को स्टेशन पर ही रखा गया था। उसने भी देखा। एक लाईन से करीब तीस लाशें रखी हुई हैं। शायद ही उनमें से किसी लाश के पूरे अंग थे। एक पुलिस वाला उन लाशों की गिनती कर रहा था और कागज पर कुछ नोट कर रहा था। उनमें बच्चों की भी लाशें थीं। उसने एक औरत की लाश देखी। वह नंगी थी। अचकचाकर उसने नजरें घुमा ली। उसे लगा कि वह वहीं बेहोश होकर गिर जाएगा। सलीम ने उसका हाथ थाम रखा था। सलीम का भी चेहरा दर्द से भरा हुआ था। लाशों से निगाहें हटाते दोनों अमृतसर जाने वाली गाड़ी को देखने लगे। वह देरी से पहुंचे थे और उस समय अमृतसर जाने वाली रेलगाड़ी स्टेशन से रवाना हो चुकी थी। रेलगाड़ी का अन्तिम डिब्बा ही सामने था। रेलगाड़ी का बहुत कम हिस्सा दिखाई दे रहा था। उसके ईंजन के पुश्तों से लेकर उसकी छत तक लोग ही लोग दिख रहे थे। छोटे बच्चे तक रेलगाड़ी की छत पर लटक रहे थे। डिब्बों के बीच बहुत से लोग खड़े थे। चारों तरफ  चीख-पुकार मची थी। कोई स्टेशन पर छूट गया था और रेलगाड़ी के पीछे बेतहाशा भाग रहा था। एक औरत की गोद में बच्चा था और वह भीड़ को तीर की तरह चीरती चीखती हुई रेलगाड़ी के पीछे भाग रही थी उसकी पुकार से लग रहा था कि उसका कोई संबंधी रेलगाड़ी में बैठ चुका है और वह बैठ नहीं पाई। ऐसे ही और भी लोग दिख रहे थे, जो यदि अपने परिवार से आज बिछुड़ जाते तो पता नहीं कहां मिलते। मिलते भी या नहीं। रेलगाड़ी की छत पर खड़े कुछ लोग भी अपने अपने संबंधियों को बुला रहे थे जो स्टेशन पर ही रह गए थे। कोई भीड़ में अपने परिचितों को तलाश रहा था। सभी के चेहरों पर गम और आंसू दिख रहे थे। रेलगाड़ी में इतने लोगों के चढऩे के बावजूद भीड़ इतनी थी कि अपने संबंधियों को तलाशना नामुमकीन था। ऐसे में जसवन्त अपने बेटे, बहू को कहां देख पाता? वह रेलगाड़ी के पीछे भागते हुए बेटे को पुकारने लगा। उसे यह भी तो पता नहीं था कि दोनों रेलगाड़ी पर चढ़ भी गए या नहीं। इधर सलीम रूखसाना को बुलाए जा रहा था, आखिर रूखसाना के साथ ही दोनों यहां आए थे। रेलगाड़ी कछुए की चाल की तरह चलती चली जा रही थी। धीरे-धीरे उसने गति पकड़ ली और रेलगाड़ी की छुक-छुक और तेज सीटी की आवाज से उसका कलेजा कांप उठा। उसे लगा कि कृपा और उसकी बहू सदा के लिए दूर हो रहे हैं। रेलगाड़ी की वह आवाज उसके कलेजे में हमेशा के लिए घर करती लग रही थी। रेलगाड़ी चली गई तो थक हार कर सलीम और वह बाहर आ गए। जसवन्त के शरीर में कोई ताकत नहीं रह गई थी। उसके मुंह से रूदन भरी डकार निकली और वह जमीन पर बैठ गया। तभी पता नहीं कहां से रूखसाना उनके पास आ गई। उसके साथ कृपा और उसकी पत्नी नहीं थे।

‘दोनों कहां हैं?’- सलीम और उसके मुंह से एक साथ निकला।

‘दोनों गए। रेलगाड़ी में किसी तरह चढ़ा दिया दोनों को।’ वह हांफती सी बोली।

जसवन्त का कलेजा दुख और संतोष से एक साथ भर उठा। दुख यह सोच कर हुआ कि क्या दोनों उसके बिना सियालकोट की जमीन छोडऩे को तैयार हो गए? संतोष यह सोच कर हुआ कि इस मौत की नगरी से दोनों बच तो गए। ‘दोनों जाने को तैयार नहीं हो रहे थे।’-रूखसाना बोल रही थी-‘मैंने यह कह दिया कि देवरजी भी इसी रेलगाड़ी पर या अगली रेलगाड़ी से अमृतसर पहुंचेंगे।’ रूखसाना की आंखों में कहते हुए आंसू आ गए।

‘मैं जाता हूं।’- कहकर जसवन्त खड़ा होने लगा।

‘कहां?’- दोनों हड़बड़ा गए।

‘इस रेलगाड़ी के साथ। जहां मेरे बच्चे गए हैं। जहां मेरा परिवार गया है। अब मेरा यहां रह ही क्या गया है सलीम मियां।’ वह बोला तो उसकी आवाज में जमाने भर का दर्द था।

‘मैं तेरा कुछ नहीं जसवन्ता। मैं तेरे बचपन का साथी एक ही दिन में पराया हो गया?’ सलीम उसे कंधे से पकड़ता बोला।

‘तू ही है मेरा। यहां मेरी इस जमीन पर अब है ही कौन मियां। तुम हो, भाभी है। पर मेरा परिवार तो वह जा रहा है, उधर। उसने अपनी बाहें लम्बी करके गई हुई रेलगाड़ी की दिशा में इशारा किया।

‘यूं नहीं जाने दूंगा। रेलगाड़ी तो अमृतसर पहुंच जाएगी। तू केसे पहुंचेगा?’ सलीम बोला।

‘किसी तरह तो पहुंच ही जाऊंगा। वहां दोनों मेरा इन्तजार तो करेंगे।’

‘मैंने दोनों को कह दिया है कि तुम्हारे पिताजी तुमसे अमृतसर में ही मिलेंगे।’-रूखसाना बीच में बोली।

‘बढ़िया किया भाभी।’- जसवन्त रूखसाना का हाथ पकड़ते बोला। जसवन्त का आंसूओं में भीगा चेहरा देख रूखसाना फिर रो पड़ी।

इसके बाद सलीम जसवन्त को लिपटाकर रोने लगा। उसके बचपन का साथी आज उससे बिछुड़ रहा था, पता नहीं कभी मिलेगा भी या नहीं। जसवन्त बच्चों की तरह रो रहा था। रूखसाना वहीं ज���ीन पर बैठ हिचकियों से रो रही थी।

जसवन्त आगे बढ़ा तो पीछे से सलीम ने पुकारा-‘जसवन्ता।’’

‘दादा।’- अचानक सुलतान की आवाज आई। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। देखा तो कमरे के दरवाजे से दिन की हल्की रोशनी आ रही थी।

‘क्या बात है, आज टैम पर नींद नहीं खुली तेरी।’-सुलतान उसके पास बैठता बोला।

जसवन्त खुद हैरान था कि उसे ऐसी कैसी नींद आई। सारी रात वह सोचता रहा या सपना लेता रहा? वह उठ बैठा। इसके बाद दैनिक कामों से फारिग होकर जब वह मंजी खींचकर दुकान के पास ले जा रहा था तो देखा कि दुकान पर रेलवे का लाईनमैन सत्तू बैठा है।

‘दादा, ले तेरा ईलाज हो गया।’-सत्तू उसे देख चहकता सा बोला।

‘क्या बात होग्गी?’-वह बैठता हुआ बोला।

‘कल से रेलगाड़ी बन्द।’-सत्तू एकदम से बोला।

‘क्या!’- जसवन्त का कलेजा हैरानी और खुशी से पुलक उठा-‘क्या कहा तूने?’

‘रेलगाड़ी बन्द। – सत्तू उसकी स्थिति का आनन्द लेता बोला।

‘दादा, रेलगाड़ी बन्द ना होई है।’-सुलतान बीच में बोल पड़ा-‘इदर बड़ी लाईन पड़ रई है तो कल से छ: महीने तक रेलगाड़ी नहीं आएंगी। इसके बाद फिर कई और रेलगाडिय़ां चालू हो जाएंगी।’-दूसरी बात कहते-कहते सुलतान की आवाज धीमी हो गई।

जसवन्त ने मानो आधी ही बात सुनी। उसने सुना कि रेलगाड़ी बन्द हो गई है। उसका कलेजा खुशी से धक-धक करने लगा था। वह लंगड़ाता हुआ दुकान तक पहुंचा और सत्तू का हाथ खुशी से थाम लिया-‘बेटा यह तो बहुत बढ़िया खबर सुनाई तूने।’

‘दादा, छह महीने तक बन्द है रेलगाड़ी, फिर इससे ज्यादा आएंगी।’-चिढ़ता सा चिन्तित स्वर में सुलतान फिर बोला।

‘अरे बेटा, छह महीने तो आराम है ना, फेर की फेर देखेंगे। क्या पता फेर मैं तेरी रोटी तोडऩे के लिए जिन्दा रहूं भी ना।’

‘दादा, तू हजार साल जिएगा।’-सत्तू बीड़ी सुलगाता और ढेर सारा धुंआ उसकी ओर उगलता बोला।

‘ना बेटा। और नहीं जीना। बहुत हो लिया बेटा। और रेलगाडिय़ां शुरू होने से पहले खुदा मुझे उठा ले तो ठीक।’-वह फिर मंजी पर जा बैठा और सोचने लगा कि सलीम को यह खबर सुनानी बहुत जरूरी है। वह अपनी खुशी में सलीम को शरीक किए बिना कैसे रह सकता था? जो सलीम उसकी हर हंसी का, हर आंसू का गवाह रहा है, उसे सुनाए बिना यह खुशी कैसे पूरी होगी? पर उसके लिए उसे चुपके से सलीम के पास जाना होगा। सुलतान को यह विश्वास दिलाना होगा कि उसका पैर इतना ठीक है कि उसे डाक्टर के पास जाने के लिए बहू को या सुलतान को साथ ले जाने की जरूरत नहीं है। डाक्टर के पास जाने में अभी समय था। वह यूं ही एक-दो बार मंजी से उठकर चलने का दिखावा करने लगा।

‘क्या बात दादा।’-सुलतान हंसा-‘बड़ा फुदक रहा है।’ अपने दादा को खुश देखकर उसका मन संतोष से भरा हुआ था।

‘हां बेटा, यूं लग रहा है कि यह खबर सुनते ही घुटनों का दर्द भी ठीक हो गया है।’-इसके बाद वह डाक्टर के पास अकेले जाने की बात करना चाहता था परन्तु अनजानी आशंका से चुप रह गया।

इसके बाद दुकान पर ग्राहक आ गए। जसवन्त कृतसंकल्प था। वह उठकर धीरे से दो कदम चला फिर नजर बचाता निकल गया। उसने सोच रखा था कि सुलतान उससे अकेले जाने के बारे में पूछेगा तो कह देगा कि पैर भी ठीक लग रहा था और दुकान में व्यस्त होने के कारण वह उससे बिना कहे निकल आया।

जब वह उस मोड़ पर पहुंच गया जहां से दुकान दिखनी बन्द हो गई थी तो उसका दिल बल्लियों उछलने लग गया। सलीम का घर करीब एक कोस था। इतनी दूर एक बार में जाना उसके लिए असंभव था, परन्तु आज सलीम से वह अवश्य मिलेगा। डाक्टर की छोटी सी क्लिनिक रास्ते में थी। वहां दिखाकर, दवा की एक खुराक वहीं खाकर वह चल पड़ा। रास्ते में उसे दो जगह आराम करना पड़ा। घुटनों का दर्द यूं हो जाता कि लगता नहीं जा पाएगा। पर अन्तत: वह सलीम के घर पहुंच ही गया।

सलीम का घर साधारण सा था। मकान के बाहर एक आंगन था और भीतर दो कमरे, रसोई और बाथरूम थे। आंगन में एक नीम का पेड़ लगा था, जिसकी छाया तले बहुत बार ताश की बाजियां लगती थीं। सलीम अपना सारा सामान एक कमरे में रखता था और दूसरे कमरे में तीन-चार मंजियां बिछी रहती थीं, जिनके बीच में एक लकड़ी की पुरानी सी मेज होती थी। उस कमरे में हमेशा ताशेडिय़ों का अड्डा जमा रहता था। इस समय भी वहां पर तीन अन्य लोग थे जिनके साथ सलीम ताश की बाजी लगा रखा था। लंगड़ाता जसवन्त वहां पहुंचा तो सलीम उसे देखते ही हक्का बक्का रह गया। उत्तेजना से वह खड़ा हो गया। एक पल वह जसवन्त को देखता रहा, जसवन्त उसे देख मुस्कराता रहा, फिर लगा कि सलीम रो पड़ेगा। उसने ताश फेंकी और जसवन्त से लिपट गया।

‘जसवन्ता तू!’-वह बोल उठा।

‘हां, मियां मैं, कैसा है?’-जसवन्त ने भी उसे लिपटा लिया।

‘अचानक! सब ठीक तो है?’-सलीम ने पूछा।

‘हां, सब ठीक है। आज मन किया तू तुझे देख लूं। महीनों हो गए, तुझे देखे हुए।’-जसवन्त बोला-‘कैसे रह रहा है अकेला?’

‘अरे ताऊ, तुम्हारे सलीम मियां को हम अकेले रहने ही नहीं देते। इनकी बीबी ताशबानो और हम इनके साथी हमेशा इनका ध्यान रखे रहते हैं।’-बैठे लोगों में एक चालीसेक साल का व्यक्ति ठठाकर हंसते हुए बोल उठा-‘मियां जी, चलो अपनी चाल चलो।’ वह सलीम से बोला।

‘बस! अब नहीं।’-तुरन्त सलीम बोल उठा। कहकर वह जसवन्त को लेकर दूसरे कमरे की तरफ  चला।

‘अरे ऐसे कैसे?’-तुरन्त ही तीनों जोर-जोर से बोलने लगे, परन्तु सलीम ने उनकी परवाह नहीं की और जसवन्त को लेकर दूसरे कमरे में आ गया।

‘सुलतान कहां है?’-सलीम ने उसे एक कुर्सी पर बैठाते हुए पूछा।

‘दुकान पर ही है।’

‘फिर कैसे आ सका?’

‘डाक्टर को दिखाना था। आगे तक आ गया।’

‘तेरे घुटने का दर्द?’-सलीम ने चिन्तित स्वर में पूछा।

‘वैसा ही है, पर जाने दे। तू बता कैसा है?’

सलीम कुछ बोलता कि अचानक ही बाहर से कुछ आवाजें आनी शुरू हो गईं। यह आवाजें सामान्य नहीं थीं। सलीम ने देखा कुछ लोग उसके दरवाजे से भीतर की तरफ आ रहे हैं। उनके चेहरे पर उत्तेजना साफ  दिख रही है।

‘क्या हुआ कमले?’-सलीम ने उनमें से एक से पूछा।

‘दादा, दंगा हो गया है।’-कमले ने बताया।

जसवन्त को लगा कि रेलगाड़ी ने उसके घर का दरवाजा तोड़ दिया है और उसकी तरफ आ रही है।

‘हे रब्बा!’-सलीम के मुंह से निकला-‘क्या हुआ रे?’

‘अरे दादा, उसे नहीं जानते…उसे…आपके रमजान को?’- कमल बोला।

‘हां, तो?’- सलीम ने पूछा।

‘उसने गौशाला की जमीन पर कब्जा कर लिया है।’

‘रमजान ने? पर वह तो ऐसा नहीं है कमले।’-सलीम ने आश्चर्य प्रकट किया।

‘अरे दादा, आप भी उसका पक्ष लेने लगे। रमजान ने गौशाला की जमीन पर अपने दुकान का सारा पुराना फर्नीचर डाल लिया है। जब गौशाला वालों ने उससे कहा कि यह सामान हटा लो तो कहने लगा कि यह जमीन मुसलमानों की है।’

जसवन्त और सलीम का कलेजा धड़क रहा था। अब भी वही हो रहा था। वही जमीन…वही हिन्दू…वही मुसलमान।

‘उसने ऐसा नहीं कहा था कमले।’-तुरन्त ही एक लम्बी दाढ़ी वाले व्यक्ति ने विरोध किया।

‘अरे रहने दो करीम चचा।’-कमले के साथ खड़ा एक और व्यक्ति बोल पड़ा-‘आपने तो रमजान का पक्ष लेना ही है। उसकी दुकान से आपका उधारी सामान जो आता है।’

‘बात उधारी की नहीं है गुलजारी…बात सही गलत की है। रमजान हर साल गौशाला को चन्दा देता है। उसने अपने गोदाम की सफाई करवाई थी, इसलिए एक बार सामान उस जमीन पर रखवा दिया। पर गौशाला का मैनेजर जाकर बोल पड़ा कि क्या कब्जा करने का विचार है? इसपर रमजान बिगड़ गया।’-करीम समझाने लगा।

‘अरे रहने दो चचा…।’

इसके बाद वहां पर विवाद बढ़ता चला गया। जसवन्त ने देखा कि सलीम लाचारी से कभी एक पक्ष को समझा रहा था तो कभी दूसरे पक्ष को। परन्तु यहां भी विभाजन रूक नहीं रहा था। जसवन्त समझ सकता था कि कितनी आसानी से बातें दूसरा रूप ले लेती हैं। वह भी सलीम के साथ सभी को कहना चाहता था कि रूक जाओ…न बोलो इतना कि नफरत फैलती जाए… नहीं जानते विभाजन क्या होता है, कैसा होता है? परन्तु वह कुछ नहीं कह सका। वहां भीड़ बढ़ती जा रही थी। ताश खेलने वाले तीनों व्यक्ति भी इस बहस में उलझ गए थे। सभी ने सलीम को भी उलझा रखा था। जसवन्त दो-चार मिनट वहीं खड़ा रहा फिर धीरे से निकल आया। उसे बहुत अफसोस हो रहा था कि लम्बे समय बाद वह सलीम से बगलगीर होकर मिलता परन्तु फिर कुछ लोगों की नफरत ने उन्हें मिलने नहीं दिया। वह दंगे की आशंका से भी भयभीत था। चर्चा में यह भी किसी ने कहा था कि बात फैल गई है और हिन्दू मुसलमान गुटों में एकत्र होने लगे हैं। माहौल खराब हो सकता है। दंगा फैले और अंधेरा हो इससे पहले ही घर पहुंचना जरूरी था। वह जानता था कि जब सलीम उसे वहां नहीं पाएगा तो बहुत दुखी होगा। जसवन्त के घर पहुंचने के समय अंधेरा फैलने लगा था। सुलतान उसे देखते ही दुकान से बाहर को लपका-‘दादा, कहां गए थे?’

‘अरे डाक्टर को दिखाने…और कहां जाता?’-उसने भिनभिनाने का नाटक सा किया।

‘बहुत देर कर दी…सुना नहीं दंगा फैलने वाला है।’-सुलतान बोला।

‘किस बात का दंगा रे?’-अनजान बनने का नाटक करता जसवन्त मंजी पर बैठता बोला।

‘रमजान ने गौशाला की जमीन पर कब्जा कर लिया है और वहां पर मुसलमान मस्जिद बनवाना चाहते हैं। हिन्दुओं ने उसे मना किया तो वह अकड़कर बोला कि कुछ भी हो जाए, यहां मस्जिद जरूर बनेगी।’

जसवन्त हैरानी से सुलतान को देखने लगा। अफवाह क्या-क्या रूप ले लेती है? हकीकतन जसवन्त रमजान को व्यक्तिगत रूप से जानता था। रमजान शहर का प्रतिष्ठित और सुलझा हुआ इंसान था। दुख-सुख में सभी के काम आता था। अभी तक उसके व्यवहार से कभी नहीं झलका था कि वह जात पात में विश्वास भी करता है। एक साधारण सी बात कैसे रूप बदल लेती है कि वर्षों का विश्वास क्षण भर में खतम हो जाता है। वह एक गहरी सांस लेकर रह गया। यही तो हुआ था जब हिन्दुस्तान-पाकिस्तान अलग हुए थे। विभाजन में हिंसा की शुरूआत किसी एक ही आदमी ने की होगी। वह हिंसा भी किसी अफवाह से हुई होगी, जिसने लाखों मार दिए। जिसने करोड़ों को उजाड़ दिया। जिसने नफरत और अविश्वास का कभी खतम नहीं होने वाला दौर शुरू कर दिया। काश! काश कि उस शुरूआत को किसी ने वहीं पर रोक दिया होता।

‘दादा, अब भीतर चलो। माहौल खराब है, ठीक नहीं है यहां बैठना।’-सुलतान ने उसे कुछ सोचते देख कहा। जसवन्त चुपचाप उठकर घर के भीतर की तरफ चल दिया। आज अधिक चलने के कारण उसके घुटनों में भी बहुत दर्द हो रहा था। थकावट के कारण उसकी पलकें भी असमय भारी हो रही थीं। वैसे भी दुखी मन एकान्त चाहता है।

सुबह जब उसकी नींद खुली तो देखा सुलतान आंगन में नहा रहा है। हवा में हल्की सर्दी थी, फिर सुलतान धूप चढऩे पर ही नहाता था।

‘क्या बात है, आज इतनी जल्दी?’-जसवन्त ने पूछा।

‘हां, आज शहर से सौदा लाना है। क्या पता दंगा क्या रूप ले ले, बाद में जाना मुश्किल हो जाएगा।’-सुलतान फटाफट नहाता बोला-‘अगर माहौल ठीक लगे तो दुकान खोलना, नहीं तो दुकान खोलने की जरूरत नहीं है। मैं शाम पडऩे से पहले आ जाऊंगा।’

सुलतान नाश्ता करके रोटी बंधवा कर दो बड़े थैले लेकर चला गया। जसवन्त धूप पूरी तरह खिल जाने तक घर में बैठा रहा। वह सोच रहा था कि सत्तू की बात सही होती है या नहीं? रेलगाड़ी की सीटी बजेगी या नहीं? धूप तेज हो आई और रेलगाड़ी की सीटी नहीं बजी तो उसके मन में आशा बंधी कि शायद सत्तू की बात सही है। उसका मन खुशी से नाचने को हो रहा था और आशंका भी हो रही थी कि क्या पता आज रेलगाड़ी फिर लेट हो। इतनी देर में बाहर से किसी ने आवाज दी। वह बाहर आया तो देखा पड़ोस का सुखविन्दर पातर है।

‘दादा, कि गल…तुसी अज्ज दुकान नहीं खोलणी?

‘बेटा, आज माहौल चंगा नहीं है इसलिए नहीं खोली।’-जसवन्त बोला।

‘ल्यो जी’-सुखविन्दर हंसा-‘माहौल नू कि होया?’

‘वो दंगा…?’-जसवन्त हिचका।

‘केड़ा दंगा?’-सुखविन्दर फिर हंसा-‘ओ जी दंगा दांगा कुछ नहीं एै। सब चंगा हो गया। सब राजी रप्पा हो ग्या एै। तुसी बाहर आओ हौर मैनूं दो सेल फड़ाओ।’

जसवन्त भीतर जाकर दुकान की चाबी लाया और सुखविन्दर की सहायता से ही दुकान का दरवाजा खोला। सुखविन्दर को टार्च वाली सैल देकर वहीं मंजी बिछाकर बैठ गया। लगभग आधे घंटे बीत गए पर रेलगाड़ी की सीटी नहीं सुनाई दी। अब जसवन्त को विश्वास हो चला था कि सत्तू की बात सोलह आना सच थी। खुशी से उसके होंठों पर लम्बे समय बाद स्वत: ही गीत के स्वर फूटने लग गए। वह गीत गाने लगा। वही गीत जो सियालकोट की औरतें अपने प्रिय के परदेश जाने पर उसके इन्तजार में गाती थीं। खुशी के आलम में उसे सियालकोट फिर याद आने लगा। सलीम याद आने लगा। कल की घटना और सलीम से मिलकर भी नहीं मिल पाने की याद ने उसके मन को एक बार दुखी किया। वह सोचने लगा कि यदि माहौल वास्तव में ठीक रहा तो अवसर निकालकर वह दोपहर में दुकान बन्द करके सलीम के पास फिर जाने की कोशिश करेगा। परन्तु तभी उसे अहसास हुआ कि उसके घुटनों में दर्द बढ़ा हुआ है। वह गहरी सांस लेकर रह गया।

दोपहर हुई। फिर शाम उतर आई। इस बीच शहर से दो ग्राहक शाम के समय घुमते हुए उधर आ गए। पूछने पर उन्होंने बताया कि बस्ती का माहौल दोपहर तक ठीक था, परन्तु अब वापिस खराब हो गया है। रमजान ने गौशाला की जमीन से फर्नीचर कल रात को ही हटवा दिया था परन्तु उससे पहले कुछ लोग इसी बात को लेकर उलझ पड़े थे, जिसमें से एक के सिर में चोट लगी थी। हालत खराब होने पर आज उसे शहर के अस्पताल में भेज दिया गया है। इससे माहौल में फिर तनाव है और पुलिस भी तैनात कर दी गई है। कुछ लोगों ने नारे भी लगाए थे। हो सकता है कि रात को कुछ हो जाए…न भी हो।

वह दोनों चले गए परन्तु जसवन्त की बेचैनी बढ़ गई। उसे सुलतान की और सलीम की भी चिन्ता सताने लगी। शाम धीरे-धीरे गहरी होती चली गई। आज रेलगाड़ी न आने की खुशी इस दंगे के कारण कम हो गई थी। वर्षों बाद आज पहली बार वह रेलगाड़ी की मार से बचा रहेगा, परन्तु दंगा ने उसके मनोमस्तिष्क को फिर उसी डर से जकड़ दिया था। अब रात उतर आई थी। सुलतान अभी तक नहीं आया था। उसका मन शंकाओं में उतरने लगा था। क्या पता शहर से बसें आनी बन्द हो गई हो। क्या पता शहर में भी दंगा फैल गया हो। तमाम तरह की बातें। उसने कुछ सोचा फिर दुकान बन्द करने का विचार करके दुकान के भीतर सामान ठीक करने लगा कि अचानक अंधेरे में दुकान के दरवाजे पर एक आकृति उभरी।

‘सलीम मियां!’-मारे खुशी के जसवन्त चीख पड़ा।

यह सलीम ही था। वह दुकान के दरवाजे पर आंखें फाड़कर भीतर देखने का प्रयास कर रहा था।

‘हां, जसवन्ता मैं। इत्ता अंधेरा क्यूं कर रखा है?’-सलीम बोला।

जसवन्त लपका और सलीम को गले लगा बैठा। सलीम ने अपने हाथ की छड़ी हाथ से निकल जाने दी और जसवन्त को कसकर लिपटा लिया। कुछ देर तक दोनों साथी एक दूसरे से लिपटे रहे। दोनों ने अपने-अपने कंधे पर दूसरे के आंसुओं को महसूस किया।

‘अचानक कैसे?’-जसवन्त ने पूछा।

‘कल तू बिना बताए आ गया था?’-सलीम नाराजगी से बोला।

‘हां मियां, क्या करता। वहां हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बन रहे थे। इसलिए आ गया। अब हिम्मत नहीं थी एक और विभाजन देखने की।’-जसवन्त बोला। साथ ही वह दुकान से बाहर निकलकर पास रखी मंजी को दुकान के भीतर तक खिसका लाया।

‘बैठ।’-उसने बड़े प्रेम से सलीम का हाथ पकड़कर उसे मंजी पर बिठाया।

‘सुलतान शहर गया है?’-सलीम ने पूछा।

‘हां, तुझे कैसे पता?’

‘किसी ने बताया था तभी आ सका। कल तू बिना बताए आ गया, रहा न जा रहा था। फिर दंगा हो गया। चिन्ता हो आई कि सुलतान शहर गया है, कहीं कोई बात न हो जाए। वह मुसलमानों के खिलाफ खुलेआम जो बोलता रहता है।’-सलीम बोलता गया।

‘तू उसकी चिन्ता मत कर। अब वह बच्चा नहीं रहा।’

‘पर बहुत देर हो गई है। उसे अब तक आ जाना चाहिए था।’-चिन्तित सलीम बोला।

‘आ जाएगा। अगर वह आ गया होता तो तू थोड़ी मिल पाता मुझसे।’-जसवन्त अंधेरे में उसका हाथ फिर थामता बोला।

‘हां, मिल तो न पाता जसवन्ता। पर अपने मिलने से कहीं अधिक जरूरी है कि अपने बच्चे ठीक रहें।’

‘तू चिन्ता मत कर। वह अभी आता होगा। तू बता कैसा है?’

‘मैं ठीक हूं। तू बता। सुलतान वैसे तो ठीक है न और बहू कैसी है?’-सलीम ने पूछा।

‘सुलतान भी ठीक है। बहू भी ठीक है। तूने उसे देखा है न?’-जसवन्त पूछा। पूछते समय उसे याद हो आया कि सुलतान की संक्षिप्त सी शादी में सलीम नहीं आ पाया था। सुलतान ने सलीम को उस अवसर पर भी नहीं बुलाया था।

‘हां देखा भी और नहीं भी देखा जसवन्ता। एक बार उसे ठीक से देखा होता तो कलेजे में ठंडक पड़ जाती।’-सलीम बोला तो उसकी आवाज में भर्राहट थी।

‘देखेगा?’-जसवन्त ने पूछा।

‘कैसे?’

‘उसे बता देते है सब।’-जसवन्त बोला।

‘क्या बकवास कर रहा है जसवन्ता?’-सलीम की आवाज एकदम से तेज हो गई-‘तेरा दिमाग खराब हो गया है?चुप कर।’

‘हां, मेरा दिमाग खराब हो गया है।-‘जसवन्त भी कुछ तेज आवाज में बोला-‘कब तक सहोगे मियां? कब तक? कितनी बार समझाया है। इतने साल अकेले रहते हो गए, अब तक नहीं समझे?’

जसवन्त कुछ और भी कहता परन्तु सलीम ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया। कसमसाता सा जसवन्त चुप रह गया।

‘लालटेन तो जला ले।’-जसवन्त के चुप होने के दो मिनट बाद सलीम बड़े प्यार से उससे बोला।

‘क्यों अब भी डर लगता है?’-जसवन्त ने हंसकर पूछा।

‘हां, बहुत। अब भी डर लगता है मियां। यूं लगता है कि अंधेरे में फिर वही आग लपकेगी। फिर वही चेहरे अंधेरे में एकदम सामने आ जाएंगे।’-संजीदा होकर सलीम बोला।

‘रात को सोते समय अब भी लालटेन जलाए रखता है?’-जसवन्त भी संजीदा हो गया था।

‘हां यार! पड़ोसी हंसते हैं इस डर पर, पर क्या करूं? यह डर नहीं मिटता।’

‘कब तक डरेगा अंधेरे से?-जसवन्त फिर हंसा।

‘जब तक तू रेलगाड़ी से डरेगा।’-सलीम भी हंसा।

जसवन्त चुप रह गया फिर बोला-‘हम दोनों कब तक यूं ही डरते रहेंगे सलीम मियां। तुम अंधेरे से…मैं रेलगाड़ी से?’

‘जब तक हम मर नहीं जाते जसवन्ता। हमारी यही नियति है। न अंधेरे ने हमें बख्शना,… न रेलगाड़ी ने।’

‘तुझे पता है रेलगाड़ी अब छ: माह के लिए बन्द हो गई।’-जसवन्त एकदम से चहका।

‘हां, पता है। पर फिर ढेर सारी रेलगाडिय़ां आएंगी। तब कहां जाएगा?’

‘जाना कहां है? जब तक रोटी पानी लिखी है, यहीं जिएंगे।’-जसवन्त आह सी लेता बोला फिर अचानक यूं बोला मानो कुछ याद आ गया हो-‘अच्छा…सुन…बहू के हाथ का खाना खाएगा?’

‘मेरी किस्मत में कहां मियां।’-सलीम की आवाज लरज गई।

‘है रे…तेरे नसीब में आज बहू के हाथ का खाना है। तू रूक मैं अभी आया।’-कहकर जसवन्त उठने लगा।

‘रहने दे जसवन्त। कहीं सुलतान आ गया तो? मैं तो बस तेरा हाल चाल लेने आया था और सुलतान के बारे में जानने आया था कि वह आया या नहीं?

‘अगर सुलतान आ जाता तो क्या तू मेरे पास नहीं आता?’

‘कैसे आता?’-सलीम बोला-‘बस उसे दूर से देखकर संतोष कर लेता और जिस रिक्शे से आया था, उसी से वापिस चला जाता।’

‘रिक्शा कहां है?’

‘उसे तो यह देखकर ही भेज दिया कि दुकान पर सुलतान अभी तक नहीं आया।’

‘तो रूक…मैं अभी आया।’-कहकर जसवन्त अपनी सामथ्र्य से अधिक फुर्ती से उठा और लपक कर घर की तरफ चल दिया। इस समय चारों तरफ अंधेरा था। दुकान के बाहर से किसी को तुरन्त ही यह नजर नहीं आना था कि दुकान के भीतर एक मंजी पड़ी है और उस पर केाई बैठा भी है। सलीम के कहने के बावजूद जसवन्त ने लालटेन यह सोचकर नहीं जलाई थी कि यदि सुलतान अचानक आ जाए तो…।’

‘जसवन्ता, जल्दी आईयो।’-उसने पीछे से पुकारा।

जसवन्त के जाने के बाद सलीम अंधेरे में दुकान के भीतर देखने का प्रयास करने लगा परन्तु कुछ समझ नहीं आया। उसने अपने कंधे पर की लोई को अपने पैरों पर डाला और मंजी पर लेट गया। उसे वह क्षण याद आने लगा जब जसवन्त उसे छोड़कर जा रहा था।

”जसवन्ता!’-उसने सियालकोट रेलवे स्टेशन के बाहर जसवन्ता को जाते देख फिर पुकार लिया था। उसे एकदम से यह ख्याल आया था कि पैदल तो जसवन्त अमृतसर जा नहीं पाएगा। अल्सुबह किसी से बात करके वह किसी मोटरगाड़ी या लारी में इन्तजाम करके भेज देगा। उसने जसवन्त को पुकारा और उसे सुबह भेजने का वादा करके वापिस अपने घर ले आया था। घर आने पर उसे पता चला कि जावेद आकर गया था और पूरे घर की तलाशी लेकर गया है। वह यह भी बार-बार पूछ रहा था कि घर के बाकी सदस्य कहां पर गए हैं? शंकित मन लिए थके हारे सभी सदस्य सो गए थे। जसवन्त को उसने अपने मकान के उस कोठे में छिपा दिया जिसमें जानवरों के लिए चारा रखा करता था। वह मकान में सबसे पीछे की तरफ बना कोठा था। इस समय पौ फटने में देर थी कि अचानक उसे आहट सुनाई दी। वह उठता इसके पहले ही उसे अपने घर के दरवाजे के भीतर दो-तीन व्यक्ति आते दिखाई दिए। उसने एक की आकृति को स्पष्ट पहचाना। यह जावेद था। वह बिना कोई आहट किए सोने का नाटक करता रहा। उसे समझ आ रहा था कि शायद जावेद जसवन्त की तलाश करेगा पर जसवन्त के पास जाने का रास्ता उसकी मंजी के पास से गुजरता था इसलिए संभव था कि जावेद वहां जाने की हिम्मत न करे। परन्तु कुछ देर बाद उसे अपने नथूनों में पेटोल की गंध महसूस हुई। वह कुछ समझ पाता कि अचानक उसके बिल्कुल पास जावेद का चेहरा उभरा। लाल आंखों के साथ जावेद के हाथ में एक जलती छोटी सी लकड़ी थी। वह जावेद को रोकता इससे पहले जावेद ने लकड़ी आंगन में फेंक दी। जावेद के दूसरे हाथ में तलवार थी। उसे विश्वास नही हो रहा था कि उसके ही जमात के लोग, उसके भाई उसके घर में आग लगा रहे हैं। वह तुरन्त ही छलांग लगाकर बिस्तर से उठा और जावेद से उलझ गया। वह चीखा-‘जावेद, क्या कर रहा है, अपने ही घर में आग?’

‘घर? कौनसा घर? यह मेरे भाई का घर नहीं। काफिर का घर है। तूने रामदीन को छिपाया। अब जसवन्त के परिवार को छिपाया। ले अब सभी जल मरेंगे।’

वह जावेद से तलवार छिनने की कोशिश कर रहा था परन्तु जावेद उससे बहुत अधिक ताकतवर था। जावेद हालांकि उस पर हमला नहीं कर रहा था परन्तु अपनी तलवार भी नहीं लेने दे रहा था। घर के कई स्थानों पर शायद पेट्रोल छिड़का जा चुका था इसलिए आग फैल चुकी थी।

‘अब कोई नहीं बचेगा। पीछे मेरे आदमी हैं। तुने जिसे भी छिपा रखा है, वह भागेगा, उस काफिर को काट डालेंगे।’

इसके बाद भयंकर शोर मचा था। भीतर से चीखती चिल्लाती रूखसाना निकली। फिर करीम अपनी पत्नी और दुधमुंहे बच्चे को लेकर निकला। बड़ी अफरा तफरी मची थी। उस आग में सारा घर जल गया। जिस जसवन्त को बाहर निकालने के लिए उसके घर में आग लगाई गई थी, वह जसवन्त उसे नहीं मिला। उसे डर था कि जसवन्त को वह साथ ले गए हैं या फिर उसे मार दिया गया है। आग तेजी पकडऩे के बाद जावेद निकल गया था। जाते-जाते वह धमकी देकर गया था कि सुबह तक यह शहर छोड़ दे वरना काफिरों की सहायता करने के एवज में उसे भी मार दिया जाएगा। वह जानता था, जावेद यह कर गुजरेगा। उसके लिए परिवार कोई मायने नहीं रखता। वह उसी अफरा-तफरी में रूख्साना, करीम, उसकी पत्नी और उसके दुधमुंहे बच्चे को लेकर निकल गया। अपने परिवार के ही एक धनी सदस्य से सहायता ली। उसने भी देश की इस हालत पर दुख दर्शाया और अपनी खुद की गाड़ी में व्यवस्था करके उसे अमृतसर के लिए भेज दिया। परन्तु अमृतसर कहां पहुंच पाना था। कोई एक घंटे चलने के बाद एक खेत के पास से गुजरते समय अचानक खेत में से कुछ लोग निकलकर उन्हें घेर लिए। सभी के मुंह पर कपड़े बंधे थे। वह समझ नहीं पाया कि यह कौन हैें। वह गिड़गिड़ाते रहे पर किसी ने नहीं सुनी। हमलावर जत्थे में ही थे। उसने अपने परिवार को बचाने की कोशिश की तो पहला वार उसी पर हुआ। फिर उसके परिवार पर भी लोग टूट पड़े। होश खोते हुए उसने देखा कि अचानक कुछ लोग उन्हें बचाने आ गए हैं। बचाने वालों में सिक्ख भी थे, हिन्दू और मुसलमान भी। उसे जब होश आया वह एक शरणार्थी कैम्प में एक अस्थाई अस्पताल के बिस्तर पर था और एक चेहरा उसपर झुका हुआ है। जसवन्त का…। जसवन्त उसे होश में आते देख पागलों की मानिन्द हंसने लगा था। जसवन्त के सिर पर पट्टी बंधी हुई थी और उसकी गोद में एक बच्चा भी था। वह किसी तरह बिस्तर से उठा। उसके खुद के पेट पर एक बड़ा सा घाव था। उसे याद आया कि यहीं पर एक धारदार हथियार से उसपर वार किया गया था। वह जसवन्त से अपने परिवार और उसके बारे में पूछने लगा परन्तु जसवन्त हंसता जा रहा था। वह कुछ नहीं बता पा रहा था। उसकी आंखें बिल्कुल रिक्त थीं। कहीं कोई भाव नहीं। कोई दुख नहीं। उसने जसवन्त को जोर से पुकारा। उसका कंधा पकड़कर जोर से हिलाया। अपना नाम सुनकर जसवन्त एकाएक उठा। बच्चे को उसके बिस्तर पर रखा। दो बार बच्चों की तरह सलीम…सलीम बोला फिर अपने दोनों हाथ फैला लिए और अपने होंठ गोल करके, कमर आधा झुकाकर रेलगाड़ी की तरह सीटी मारता चारों तरफ  चक्कर काटने लगा। दुख से सलीम का कलेजा फट पड़ा। जसवन्त पागल हो गया था। वह यह भी सोचकर हैरान था कि जसवन्त ने उसे कैसे तलाश किया? क्या संयोग से ही जसवन्त आज उसके पास है? वहां एक व्यक्ति ने बताया कि वह दो दिन बाद होश में आया है। उसने अपने परिवार के बारे में जब पूछा तो वहां काम करने वालों ने बताया कि उन्होंने सिर्फ इसी पागल को बच्चे के साथ उसके पास देखा है। कुछ लोग आए थे जो तीनों को यहां छोड़ गए थे। कई दिनों बाद जसवन्त का पागलपन दूर हुआ तो उसने बताया था कि जब उसके घर में आग लगी थी तो वह किसी तरह बचकर भागने में कामयाब हो गया था। यदि वह जावेद के हाथ पड़ जाता तो उसने सलीम के परिवार को भी काट डालना था। भागते हुए वह एक जत्थे में मिल गया फिर उसे एक लारी मिल गई थी। किसी तरह हाथ जोड़कर उनके साथ वह सियालकोट के बाहर आ सका। सुबह उसे सामने से आते कुछ लोगों से खबर मिली कि जो रेलगाड़ी सियालकोट से रात को रवाना हुई थी, उसे रास्ते में नारोवाल से पहले रोक लिया गया है। लारी से बीच में ही उतरकर वह नारोवाल पहुंचा। नारोवाल के आसपास के गांवों में पुलिस की सहायता से वहां पर भी कत्लेआम किया गया है। हर तरफ  लाशें ही लाशें थीं। जली हुई, कटी हुई। नारोवाल में भी रेलवे टे्रक पर लाशों का तांता लगा था। लाशों के हिस्से अलग-अलग स्थानों पर पड़े थे। पता चला कि रेलगाड़ी अभी तक वहां भी नहीं आई है। वह वहीं रूका रहा। करीब दो घंटे बाद रेलगाड़ी आती दिखाई दी। रेलगाड़ी धीरे-धीरे चल रही थी और लगातार सीटी दे रही थी। यूं लग रहा था कि रेलगाड़ी नहीं, मौत की बग्घी आ रही हो। उसमें डाईवर को छोड़कर कोई जीवित नहीं था। जब टे्रक पर लाशें आनी शुरू हो गईं तो ड्राईवर ने रेलगाड़ी रोक दी और नीचे उतरकर लाईन से लाशें हटाने लगा। कितनी लाशें हटाता। वह थक गया और वहीं बैठ कर रोने लगा। पर जिस रेलगाड़ी को वह अमृतसर ले जाना चाहता था उस रेलगाड़ी में था ही क्या, लाशें ही लाशें। कोई लाश पूरे शरीर के साथ नहीं थी। स्त्रियों को नंगा करके काटा गया था। पुरुषों के हाथ-पांव अलग किए गए थे। वह अपने कृपा और बहू को ढूंढता रहा। लाशों के बीच लाश के रूप में वह मिले। अन्य स्त्रियों की तरह उसकी बहू की लाश भी पूरी तरह नंगी थी। बड़ी निर्दयता से उस बेचारी के साथ बलात्कार किया गया था और फिर वीभत्सता से उसके शरीर को धारदार हथियारों से काटा गया था। कृपा का एक हाथ अलग था। बच्चों को भी पूरी निर्दयता से काट डाला गया था। उनमें से कुछेक जिन्दा थे भी तो इस स्थिति में कि उनका अब मर जाना ही बेहतर था। उसने एक-एक लाश को हटाकर अपने पोते को भी तलाशने की कोशिश की। एक औरत के कंधे पर बहुत बड़ा घाव था। वह मर चुकी थी। उसकी छातियां खुली पड़ी थीं और उसकी छातियों से ढेर सारा दूध निकलकर उसके शरीर पर बिखरा हुआ था। मरते समय उसे अपने दुधमुंहे बच्चे को दूध पिलाने की ममता उसके सीने में जज्ब नहीं हो पाई थी। वह रोता रहा और अपने पोते को तलाश करता रहा। बहुत देर बाद वह मिला तो…।’’

‘सलीम मियां..।’ उसकी तन्द्रा भंग हुई। जसवन्त आ गया था। उसके एक हाथ में भोजन की थाली थी और एक हाथ में पानी का लोटा।

‘ले, तेरी बहू के हाथ का खाना खा ले।’-जसवन्त खुशी से भरा हुआ भीतर से आया।

‘अच्छा!’- सलीम का चेहरा भी उल्लास से भर गया-‘आज पहली बार उसके हाथ का खाना खाऊंगा न!’

जसवन्त ने थाली उसके सामने रख दी। थाली में चार रोटियां और आलू, गोभी की सब्जी थी।

‘यह तो तेरे लिए है जसवन्ता।’-सलीम बोला।

‘नहीं, यह तेरे लिए है सलीम। तू खा। आज पहली बार तू बहू के हाथ का खाना खाएगा। तुझे मेरी सौगंध, मना मत कर। तू खा और तेरी कसम तुझे खाते देख मेरा पेट भर जाएगा।’

सलीम ने थाली पकड़ ली। रोटी को हाथ में उठाया और हाथ उठाकर आसमां की तरफ  देखता बोला-‘खुदा, आज तेरी यह नेमत मुझे पहली बार मिल रही है। हमारे बच्चों का ख्याल रखना मौला।’ फिर उसने रोटी को सूंघा और एक कौर तोड़कर सब्जी उठाकर वह कौर जसवन्त के मुंह में डाल दिया। जसवन्त ने चुपचाप मुंह खोला और खा गया।

इसके बाद सलीम रोटी खाता रहा और जसवन्त बड़े मनुहार के साथ उसे देखता रहा। बीच में सलीम ने जसवन्त को खिलाने की कोशिश की तो जसवन्त यह कहकर मना कर गया कि वह हमेशा यही खाना खाता है पर सलीम अपने खुद के हाथ की रोटी खा-खाकर बोर हो गया होगा।

खाना खाकर सलीम ने थाली खाट के नीचे रखी और लोटे से पानी पिया। फिर संतोष से भरी सांस भरता बोला-‘जसवन्ता, आज आत्मा खुश हेा गई। यूं लग रहा है मक्का मदीना यहीं था। फालतू वहां जाने की फिकर लिए बैठा हूं।

‘काश कि तू यहीं रहता। तुझे रोज खाना बनाने की फजीहत से निजात मिल जाती।’

‘अच्छा जसवन्त बता, क्या बहू मेरे बारे में जानती है?’-सलीम ने पूछा।

‘पता नहीं मियां। मैंने तेरी चर्चा नहीं की। क्या पता सुलतान ने की हो।’

‘सुलतान ने उसे यही बताया होगा न कि दादा का एक मुसलमान दोस्त पाकिस्तान से दादा के पीछे-पीछे यहां तक आ गया।’-सलीम ने पूछा।

‘क्या पता क्या बताया होगा मियां। वह जानता ही इतना है कि तुम मेरे साथ पाकिस्तान से यहां आए हो। क्यों आए हो, क्या लेकर आए और क्या नहीं लाए, कुछ नहीं जानता। और यह तुम्हारी ही गलती है’-एकाएक जसवन्त की आवाज ऊंची हो गई-‘कि तुम मुझे उसे कुछ बताने नहीं देते।’

‘धीरे बोल जसवन्ता, धीरे बोल।’-सलीम ने सरगोशी की-‘सुलतान मुसलमानों से इतनी नफरत करने लगा है। अब उसे क्या बताएगा? उसका सब कुछ बदल जाएगा रे। वह न इधर का होगा न उधर का। रहने दे।’

‘पर तू उसकी नफरत झेल रहा है सलीम। कोई और होता तो मैं स्वीकार कर लेता। पर तू…तू…।’

वह कुछ ओर कहता कि सलीम ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया।बोला-‘यह क्या कम है जसवन्ता कि हमारा बच्चा हमारे सामने है। इसे देख कर ही जिन्दा हैं हम दोनों। बहुत बार मन करता है कि हज करने चला जाऊं। वहीं जन्नतनशीं हो जाऊं। अपनी रूख्साना के पास पहुंच जाऊं।

फिर दोनों शान्त हो गए। दोनों के दिमाग में बहुत सी बातें उठ रही थीं।

सुल्तान आया नहीं अभी तक?’-थोड़ी देर बाद बेचैनी से सलीम ने पहलू बदलते हुए पूछा।

‘आ जाएगा। चिन्ता मत करो मियां। अब वह वह बच्चा नहीं रहा, जिसे हम गोद में यहां लेकर आए थे।’

सलीम चुप रहा परन्तु उसके चेहरे से बेचैनी नहीं गई।

‘सियालकोट की कोई खबर?’ जसवन्त ने विषय बदलना चाहा।

‘वहां रहा ही कौन अब मियां। जो थे, वह कातिल बन गए। अपने ही कातिल बन गए और कातिलों की खबर हम क्यों लें?’

‘उन्होंने बहुत गलत किया था मियां। अपने ही भाई के घर को जला डाला और फिर परिवार को मार डाला।’-जसवन्त बोला।

‘हां, ताकि नाम लगा सकें रामदीन का और तेरा।’

‘उससे क्या तेरे परिवार के अन्य सदस्य उसे माफ कर देते?’

‘उसकी तो कोशिश थी न जसवन्ता। उसे तो यह क्रोध था कि मैंने रामदीन के परिवार को छिपाकर अपने घर में रखा। फिर दूसरी रात तुझे और तेरा परिवार छिपाया। उसके पहले भी लिहाजा राम के परिवार को मैंने अपने एक दोस्त की सहायता से अमृतसर वाली गाड़ी में बैठा दिया था। उस दिन भी कुछ लोगों को वहां से भगाया। उसे यही तो क्रोध था कि जब हिन्दू यहां पर मुसलमानों को मार रहे हैं तो मैं क्यों उन्हें बचाने में लगा हूं। वह बार-बार मुझे मना कर जाता था पर उसे सुबूत नहीं मिल रहा था।’

‘तुझे चाहिए था कि मेरे परिवार को नहीं बचाता। उसी के बाद जावेद का गुस्सा भड़क गया था। बेहतर होता कि मर जाने देता हमें।’ जसवन्त बोला।

‘तुझे कैसे मरने देता जसवन्ता। तू मेरा सच्चा याड़ी था। हमारी मुफलिसी में तेरे परिवार ने हमारे परिवार को सहारा दिया था। तेरे खेतों में काम करके हमने यह शरीर पाया। मेरे पिताजी जब हैजे से मर रहे थे, तेरे पिताजी ने अपनी सारी बचत खर्च करके उन्हें बचा लिया था। हर मौके पर मेरे लिए तू खड़ा रहा था। उस दिन तुझे कैसे यूं ही छोड़ देता?’

‘पर क्या मिला तूझे? तेरा परिवार खतम हो गया। अगर मुझे रात नहीं रखता तो तेरा परिवार भी बच जाता।’

सलीम एक बार सिर झुकाए बैठा रहा फिर बोला-‘जसवन्ता, जावेद हमेशा का जरायमपेशा वाला आदमी था। वह एक मुसलमान बन के बुरा नहीं था, वह इन्सान ही बुरा था। वह हमेशा से ठगी और डकैती में शामिल रहा। उसने तो घरों में आग लगाकर डाका डालना ही था। बता कि जिसने भी अन्य लोगों को मारा, क्या वह हमेशा से शरीफ आदमी रहा होगा।’

‘माना…पर कुछ लोग तब हिंसक हो गए, जब उनके घर वालों को मार दिया गया।’

‘हां…यह तो है जसवन्ता। उस दौर ने इन्सानों को इन्सान नहीं रहने दिया था।

‘और कुछ गैरइन्सानों ने तेरा भी सब कुछ जला दिया।’

‘हां, सब। जो बचा था वह कुछ और लोगों ने ले लिया। कब ले लिया, पता ही नहीं चला। मैं बेहोश रहा, पीछे से….।’ सलीम की आंखों में आंसू निकल आए।

‘काश कि उस रेलगाड़ी में मैं भी चढ़ सका होता…।’-जसवन्त ने कहना चाहा।

‘तो तू भी काट डाला जाता।’ सलीम आहत होकर बोला।

‘वही ठीक रहता मियां। कृपा की आधी कटी लाश देखने को नहीं मिलती। बहू की नंगी लाश, जिस पर तलवार के दसियों वार थे, उसे नहीं देखना पड़ता।’

‘क्या पता, हो सकता था कि यह सब तेरे सामने ही होता। तू रेलगाड़ी पर नहीं चढ़ सका तभी तो आज जिन्दा है। वरना कहां तेरे परिवार को संभाल पाता।’

‘यह तेरा परिवार है।’-जसवन्त लगभग गुस्से में चीख पड़ा।

‘चुपकर।’ सलीम एकदम से बोला।

‘क्या चुपकर, बार-बार चुप कराता है। न बोलने देता है न मरने। इस अमानत को संभालते-संभालते और भी बूढ़ा हो गया हूं। तू वहां अकेला बैठा है। अपनी आंखों के आगे अपनी औलाद को औलाद नहीं कह पाता। मैं सारा दिन सोचता हुआ पागल हो जाता हूं कि कैसे झेल रहा है यह सब। एक बार बता लेने दे सलीम, फिर सब ठीक हो जाएगा।’

‘नहीं जसवन्ता नहीं, सलीम कांप उठा-‘रहने दे मेरे यार। अब कुछ और दिन जिन्दा हैं हम। फिर सब ठीक हो जाएगा।’

‘अरे अब झगड़े खतम हो गए। हमारे सुलतान को अब कोई खतरा नहीं। अब तो साफ हो जाने सब कुछ।’-जसवन्त मानो गिड़गिड़ा रहा था।

‘नहीं जसवन्ता। मत कर। अभी भी नफरत मरी नहीं है। अभी भी हिन्दुओं को मुसलमान से खतरा है और मुसलमान को हिन्दुओं से। अभी भी हम इन्सान नहीं बने हैं रे।’

‘काश कि उसी समय हम सबको हकीकत बता देते।’-बेचैनी से सिर झटकता जसवन्त कहे जा रहा था।

‘उस समय यदि लोगों को हकीकत बता देता तो आज सुलतान जिन्दा नहीं बचता। आदमी के बदले आदमी काटे जा रहे थे जसवन्त। सुलतान तो बहुत छोटा था। मुसलमानों ने हिन्दुओं को काटा था, यहां हिन्दू उससे बदला ले लेते। उसे बचाने के लिए इसे तेरा नाम देना जरूरी था रे।’ अब सलीम भी बातों के प्रवाह में आ चुका था।

‘पर यह तेरे करीम की निशानी है। कब तक मेरे कृपा का बना रहेगा यह?’

‘अब यह कृपा का ही है, करीम का नहीं। फिर…’-कहते हुए सलीम बड़ी संतोषप्रद हंसी हंसा-‘करीम और कृपा में फर्क ही क्या है मियां? जो है, जैसा है, वैसा रहने दे। वैसे भी जब मुझे होश आया तो तेरी गोद में यह था। मुझे तो पता ही नहीं था कि यह करीम का है या कृपा का।’

‘कृपा का तो वहीं खतम हो गया था। लाशों के बीच में वह भी आंख मुंदे हमेशा के लिए सो रहा था।’-जसवन्त की आवाज फट गई।

वह कुछ और कहते कि अचानक उनकी बात के बीच में व्यवधान पड़ा। दूर कहीं शोर सा मचा और जोर से चिल्लाने की आवाज आई। दोनों दोस्तों का कलेजा जोरों से धड़क उठा।

‘बहुत अंधेरा है जसवन्त, डर लग रहा है। मैं चलूं।’-सलीम की आवाज कांपी।

दंगे की आशंका से जसवन्त का भी दिल कांप रहा था। दोनों दोस्तों को मौत का डर नहीं था। उन्हें दंगे का डर था। जो नफरत और हिंसा उन्होंने देखी थी, उससे उनके दिलों में खौफ  सदा के लिए छा गया था जो किसी आदमी के चिल्लाने या सामान के टूटने की आवाज से भी उभर पड़ता था।

‘डर मत। मैं हूं न।’-जसवन्त बोला परन्तु तभी उनके सामने अंधेरे में एक आकृति आ खड़ी हुई। उसके हाथ में कुछ था। दोनों की चीख निकल गई। सलीम एकदम से चीखता सा बोला-‘जसवन्ता भाग।’ और तेजी से मंजी से खड़ा होने लगा। तुरन्त उसका पांव फिसला और दुकान के दरवाजे से उसका सिर टकराया और एक कराह के साथ उसका बूढ़ा शरीर जमीन पर जोरों से गिरा। घबराकर जसवन्त भी उठा था पर वह लडख़ड़ा कर मंजी पर ही गिर गया।

‘कौन है?’-जसवन्त कांपते स्वर में पूछ बैठा।

‘यह मैं हूं दादा, घबराओ मत। अरे इन्हें क्या हो गया?’ सुलतान ने अपने दादा के लिए खरीद लाई हुई नई छड़ी वहीं पटकी और तुरन्त सलीम के शरीर को उठाने लपका। सुलतान को सामने देख जसवन्त और भी डर गया था। उसकी इस आशंका ने एकाएक डर से भी बड़ा रूप ले लिया था कि कहीं सुलतान ने उनकी बात न सुन ली हो। इस नीरवता में दुकान के अंधेरे कोने में दोनों पुराने दोस्त अपनी पुरानी यादों में डूबकर इतने लापरवाह हो गए थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कोई उनके आस-पास है या नहीं।

‘स…’-सलीम का नाम बोलते बोलते रह गया जसवन्त-‘हे खुदा इसे क्या हो गया?’

तब तक सुलतान सलीम के शरीर को जमीन से उठा चुका था। जसवन्त ने देखा कि सलीम के शरीर में कोई हलचल नहीं है।

‘सुलतान, बेटा अभी नाराज न होना। इसे देख क्या हुआ है?’ जसवन्त का कलेजा कांप रहा था।

‘दादा, माचिस जलाओ, जल्दी।’-सुलतान सलीम को उसी मंजी पर लिटाता बोला।

कांपते हाथों से जसवन्त ने दुकान से ही एक माचिस उठाई और किसी तरह जलाया। माचिस की रोशनी में दोनों ने देखा कि सलीम के माथे से खून बह रहा है और वह बेहोश है।’

‘हे भगवान, सलीम को बहुत चोट लगी है। इसे क्या हो गया है? सुलतान देख इसे क्या हो गया है बेटा? जल्दी कर।’-जसवन्त रोने लगा।

‘पानी लाओ। जल्दी करो।’ सुलतान बोला और फिर बिना इन्तजार किया भागता सा खुद घर में गया और दरवाजे को धक्का देता घर से खुद पानी ले आया। जसवन्त किंकर्तव्यविमूढ़ सा सुलतान को तो कभी सलीम के शरीर को देखता रहा। उसके समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसका दिल धाड़-धाड़ करके बज रहा था। सुलतान ने सलीम के चेहरे पर पानी डाला परन्तु कोई हरकत नहीं देख सलीम का शरीर अपने कंधे पर उठा लिया और भागता सा बस्ती के भीतर घुसता चला गया। तब तक पीछे से उसकी पत्नी भी आ गई थी। जसवन्त और वह सुलतान के पीछे लपके। सुलतान सलीम का शरीर कंधे पर उठाए उठाए तेजी से बस्ती के भीतर जा रहा था। शोर की आवाजें तब तक दूर हो गई थीं। जसवन्त अपने घुटनों के दर्द को भूलकर सुलतान के साथ चलने की पूरजोर कोशिश कर रहा था। लगभग पांच ही मिनट बाद सुलतान एक घर के आगे रूक गया और तेजी से दरवाजा खटखटाने लगा। यह एक डाक्टर का मकान था, जिसे जसवन्त भी जानता था। उस डाक्टर ने तुरन्त ही सलीम को बिस्तर पर लिटाया और पहले ब्लडप्रेशर नापा। फिर सलीम के चेहरे पर पानी के छींटे मारे। इतने में सलीम के मुंह से कराह की आवाजें निकलने लग गई थीं और आंखें हल्की सी खुलने लग गई थीं। यह देख जसवन्त की जान में जान आई। डाक्टर ने फटाफट दो-तीन इंजेक्शन भी सलीम के लगा दिए। थोड़ी देर बाद सलीम पूरी तरह होश में था। उसने देखा कि सुलतान उसकी पत्नी और जसवन्त तीनों घबराए से उसके पास खड़े हैं। उसके भी चेहरे पर आशंका छा गई। खुदाया, सुलतान ने उसे जसवन्त के साथ देख लिया है, क्या सोचता होगा? उसे अभी तक यह पता नहीं था कि जो साया अंधेरे में उभरा था, वह सुलतान का ही था।

उसने बिस्तर से उठने की कोशिश की।

‘दादा, आप उठो मत। लेटे रहो।’-जसवन्त कुछ कहता उससे पहले सुलतान बोल उठा। उसकी आवाज में हल्की सी भर्राहट भी थी।

सलीम ने जसवन्त की तरफ देखा। जसवन्त के चेहरे पर भी असमंजस दिख रहा था। सुलतान वर्षों बाद सलीम को दादा कह रहा था।

सलीम ने एक बार आंखें मींच लीं। फिर आंखें खोल सुलतान की तरफ देखता बोला-‘सुलतान बेटा, माफ करना। आज रहा नहीं गया। पुराने दोस्त से मिलने आ गया था…अब तुम जाओ।’ कहकर उसने बड़े अरमान से अपनी बहू की तरफ देखा और फिर उठने की कोशिश करने लगा। आज पहली बार इतने नजदीक से वह अपनी बहू को देख रहा था। ज्यों ही वह उठा उसके माथे में एक तेज पीड़ा उभरी और उसके मुंह से फिर कराह निकल गई।

‘आप लेटे रहो।’-सुलतान बोला-‘आपको अभी उठने की जरूरत नहीं है।’

‘बेटे, जाना तो है ही। नाहक तुम्हें और बहू को तकलीफ दे दी।’-कहकर सलीम ने फिर अपनी बहू के चेहरे की तरफ देखा।

‘कहीं नहीं जाना दादा। आप ठीक हो जाओ तब सोचेंगे। अभी आप आराम करो। और अधिक बोलो मत। खून बहुत निकला है माथे से।’- सुलतान बोला तो उसकी आवाज में भारीपन था।

सलीम के साथ सुलतान को इतने प्यार से बोलते देख जसवन्त की आंखें भीग गईं। अचानक सुलतान पलंग पर ही बैठ गया और उसने सलीम का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

‘आप अपने दोस्त से मिलने दंगे में भी आए थे?’-उसने सलीम से पूछा।

सलीम ने अपनी भावुकता को दबाते हुए कहा-‘हां, क्या करता बेटा। हम दोनों ही दंगे के मारे इन्सान हैं न। सोचा तेरा दादा अकेला होगा, संभाल आऊं।’

दंगे की चिन्ता मत करो दादा। सुलतान बोला-‘अब दंगे खतम हो गए हैं। अब आप हमारे ही साथ रहो।’

सलीम का चेहरा आश्चर्य और खुशी से भर उठा। जसवन्त तेजी से उठकर कमरे से बाहर निकलकर खड़ा हो गया और हिचकियों के साथ हौले-हौले रोने लगा। दो मिनट बाद जब वह भीतर आया तो डाक्टर के साथ सुलतान भीतर खड़ा होकर दवा की बात कर रहा था। बहू एक गीले कपड़े से सलीम के माथे का घाव साफ कर रही थी। सलीम के चेहरे पर संतोष का नूर उतरा हुआ था। खुशी की अधिकता से उसका चेहरा बार-बार कांप रहा था।

जसवन्त सलीम के पास आया। सलीम ने उसकी आंखों को पढ़ लिया। जसवन्त ने सलीम का हाथ अपने हाथ में लिया और बोला-‘हां मियां, दंगे अब खतम हो गए। अब कोई विभाजन नहीं होगा।’

‘हां, और जो हुआ, वह हमें भूलना ही होगा।’-सलीम बोला।

‘हां, जिसने जो किया, उसे माफ करना होगा।’-जसवन्त भर्राए गले से बोला।

‘मैं मुसलमानों की तरफ से माफ की मांगता हूं, जसवन्ता।’-सलीम ने जसवन्त का हाथ भींच लिया।

‘और मैं हिन्दुओं की तरफ से।’-जसवन्त ने भी उतनी ही ताकत से सलीम का हाथ पकड़ रखा था।

दोनों की आंखों से आंसू निकलकर एक-दूसरे का हाथ भिगो रहे थे। उनकी बहू अपने दोनों ससुर को हैरानी से देख रही थी।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मार्च-अप्रैल 2017, अंक-10), पेज – 16-27

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