हिंदी साहित्य अध्ययन-अध्यापनः चुनौतियां और सरोकार

1
प्रोफेसर सुभाष चंद्र, हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र

 1922-25 के आस-पास बी.एच.यू. और इलाहाबाद में हिन्दी विभाग खुलने शुरू हुए थे। अभी  उच्च शिक्षा में एक विषय के तौर पर हिंदी साहित्य-अध्ययन के सौ साल भी नहीं हुए हैं, लेकिन हिंदी साहित्य के अध्ययन अध्यापन के भविष्य को लेकर चिंताएं प्रकट होने लगी हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ,बाबू श्याम सुंदर दास ,आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. रामकुमार वर्मा, आचार्य नलिन विलोचन शर्मा, डॉ. देवेन्द्रनाथ शर्मा, लाला भगवान दीन, रमाशंकर शुक्ल रसाल, डॉ. नगेन्द्र, डा. नामवर सिंह आदि ने हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की नींव रखी थी उस पर बना महल अब हिलने लगा है।

जब हिंदी साहित्य एक विषय के तौर पर अपना आकार ग्रहण कर रहा था, तो हिंदी साहित्य के इतिहास, काव्यशास्त्र, भाषा विज्ञान, काव्य और गद्य के पाठ्यक्रम की आधारभूत संरचना तैयार करने में हिंदी-बुद्धिजीवियों और अनेक साहित्य-प्रेमी संस्थाएं अपना योगदान दे रही थी। ग्रंथों को खोजा जा रहा था, पांडुलिपियों के पाठ-प्रक्षालन से उनकी प्रामाणिकता पर शोध-मंथन हो रहा था। साहित्य की टीकाएं और व्याख्याएं लिखीं जा रही थी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य के इतिहास, रस मीमांसा और महत्वपूर्ण ग्रंथओं की ऐतिहासिक भूमिकाएं हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की इसी परियोजना के अंग तौर सामने आई। इस परिदृश्य पर एक नजर डालने से यह स्पष्ट होता है कि जैसे हिंदी साहित्य के इन अगुवों ने अपने काम को अपनी नौकरी हासिल करने और कुछ विद्यार्थियों को मात्र डिग्री दिलवाने में सहायक सामग्री के तौर पर नहीं, बल्कि साहित्य अध्ययन के जरिए राष्ट्र-निर्माण के तौर पर देखा था। उनकी दृष्टि अपने युग की चेतना की सीमाओं से बंधी थी, जिससे बहस हो सकती है और असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन साहित्य अध्ययन-अध्यापन को लेकर उनमें एक आश्वस्ति थी।

आज जब हम हिंदी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के सरोकारों और चुनौतियों पर विचार कर रहे हैं तो न तो साहित्य की सामाजिक भूमिका को लेकर आश्वस्ति है और न ही उच्च शिक्षा के संस्थान कालेंजों-विश्वविद्यालयों की राष्ट्र-निर्माण में अपनी रचनात्मक योगदान देने की मंशा दिखाई दे रही है और न ही शासन सत्ताएं साहित्य और शिक्षा को लेकर गंभीर हैं।

1990 से भारत के शासक-वर्ग उदारीकरण-भूमंडलीकरण-निजीकरण की नीतियों को अपनाकर राज्य के कल्याणकारी स्वरुप को नष्ट किया है, शिक्षा को बाजार के हवाले छोड़ दिया है, तभी से मानविकी विषयों की शिक्षा की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगने शुरु हो गए थे।

उच्च शिक्षा से मानविकी के विषयों के अध्ययन पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा। उनके नवीनीकरण के लिए बजट की भारी कमी है। पिछले बीस–पचीस वर्षों में निजी क्षेत्र में सैंकड़ों विश्वविद्यालय खुले हैं, शायद ही किसी में मानविकी के विषय और विशेषतः हिंदी साहित्य का अध्ययन करवाया जाता हो। मानविकी विषयों की शिक्षा पूर्णतः सरकारी अनुदान से परिचालित संस्थानों तक सीमित है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को भंग करने से इस विषय पर मंडरा रहे संकट के बादल और गहरे हो जायेंगे।

साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की कसौटी

साहित्य का अध्ययन और अध्यापन संस्थाओं में हो रहा है, संस्थाओं से बाहर भी हो रहा है। साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की कसौटी साहित्य से अपेक्षाओं में हैं। हमारा साहित्य का अध्ययन-अध्यापन यदि इन कसौटियों पर खरा उतरता है तो अपनी पीठ थपथपाई जा सकती है।

मनुष्य निर्माण की परियोजना का अंग है। मनुष्य-निर्माण का कार्य हमेशा ही चुनौती भरा रहा है। मनुष्यता को क्षरण करने वाली शक्तियों के साथ उसकी टकराहट हमेशा ही रही है और इतिहास के विभिन्न मोड़ों पर शासन सत्ताओं का साथ भी मानव-विरोधी शक्तियों को मिलता रहा है। हमारा साहित्य अध्ययन-अध्यापन यदि मनुष्यता के निर्माण के लिए पक्ष-निर्माण करता है।

साहित्य ज्ञान प्रदान करने का माध्यम भी है। हमारा अध्यापन अध्येता की ज्ञान-पिपासा को जागृत करने और उसे शांत करने में सक्षम है।

साहित्य जीवन की आलोचना है। तो क्या हमारा साहित्य अध्यापन जीवन को समझने में मदद कर रहा है। राजसत्ताओं की संकीर्ण प्रवृतियां लोगों में परस्पर द्वेष फैलाकर सत्ता हासिल करने के कुचक्र शासन सत्ताएं करती रहती हैं। सत्ता के इन कुचक्रों से सावधान करना भी साहित्य का दायित्व हो जाता है तो क्या हमारे साहित्य अध्ययन-अध्यापन का इस ओर ध्यान है।

साहित्य समाज व व्यक्ति को चेतनशील करता है। साहित्य अपने समय के बदलावकारी व जनधर्मी आंदोलनों से संबद्ध होकर जन मानस को आंदोलित करता है क्या हमारा अध्यापन साहित्य में मौजूद आंदोलनों को उदघाटित कर रहा है और आंदोलनों की चेतना को जन चेतना का हिस्सा बना रहा है।

साहित्य में भविष्य की पदचाप सुनाई देती है। क्या हमारे अध्यापन में भविष्य की संभावनाओं को उदघाटित किया जा रहा है।

साहित्य रोजगार प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। क्या हमारा अध्यापन अध्येताओं में ऐसा हुनर पैदा करने में सक्षम है कि वे अपने इस हुनर से जीवन निर्वाह कर सकें। सवाल ये भी है कि क्या हिंदी साहित्य की उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले यहां साहित्य या भाषा में रुचि के कारण आते हैं अथवा अन्य कारणों से। अनुभव तो यही कहता है कि ऐसे साहित्य अध्येताओं की संख्या नगण्य है।

साहित्य मनोरंजन व आनंद प्राप्ति का माध्यम है। साहित्य के माध्यम से मनोरंजन और आनंद प्राप्त करने की समृद्ध परंपरा है, लेकिन वर्तमान में बाजार मनोरंजन के तरह तरह के उपक्रम कर रहा है, अपने अनुसार लोगों की रुचियां पैदा कर रहा है। इस परिदृश्य में मनोरंजन-बाजार में साहित्य कुछ अहमियत भी रखता है।

साहित्य अध्यापकों का साहित्य से जुड़ाव

हिंदी साहित्य की कक्षा में अध्यापन की गुणवत्ता का स्तर इस बात से तय होता है कि हिंदी साहित्य के अध्यापकों का अपनी साहित्यिक विरासत से और समकालीन साहित्य कितना गहरा रिश्ता है तथा वे, साहित्यिक परिवेश के निर्माण की प्रक्रियाओं में किस तरह से शामिल हैं। हिंदी साहित्य के अध्यापन की योजना बनाते विभागों का अपने समकालीन साहित्य तथा दूसरी भाषाओं के साहित्य से कितना जुड़ाव है। इसी से वे पाठ्यक्रमों के लिए श्रेष्ठ साहित्य पहचान कर सकेंगे, जो विद्यार्थियों की साहित्य में रूचि पैदा करने के लिए आवश्यक है। हमारे पाठ्यक्रमों को देखने की जरूरत है कि वे कूपमंडूकता का शिकार हैं या देश-दुनिया से जुड़े हैं।

साहित्य के शिक्षक पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े हैं। इसी से ही अनुमान लग सकता है कि वे अपने वर्तमान से कितने जुड़े हैं। हिंदी की पत्रिकाओं की जो दुर्दशा है उसका मुख्य कारण है ये अन्यथा यदि एक शिक्षक अपनी पंसद की दो साहित्यिक पत्रिकाएं भी मंगवाए तो कोई कारण नहीं कि पत्रिकाएं हजारों की संख्या में छपें। लेकिन हिंदी अध्यापकों ने तो पत्रिका न पढ़ने की जैसे शपथ ही ले रखी है। यदि उनके हाथ में कोई पुस्तक नहीं है तो उनके विद्यार्थियों के हाथ में वो कैसे हो सकती है।

साहित्य के अध्यापक का ज्ञान के अन्य अनुशासनों का सामान्य परिचय बेहद जरूरी है। साहित्य का शिक्षक हमारे इतिहास से और विज्ञान से जितना गहराई से जुड़ा होगा साहित्य की समीक्षा व व्याख्या में उतनी ही गहराई आएगी।

हिन्दू धर्म से संबंद्ध कथाओं-चरित्रों को आधार बनाकर हिंदी के कवियों ने काफी साहित्य का निर्माण किया है। हिंदू धर्म से संबंधित इन चरित्रों और प्रवचनों का   राजनीतिक नेताओं और धार्मिक गुरुओं द्वारा अपने व्यवसायिक लाभ के लिए और सत्ता के लिए लगातार व्यापक स्तर पर उपयोग किया जा रहा है। कई बार यह सामाजिक वैमनस्य का कारण भी बन रहे हैं। हिंदी के अध्यापक का यह उत्तरदायित्व है कि मिथकीय, पौराणिक संदर्भों और ऐतिहासिक तथ्यों में भेद करने की चेतना का विकास करे। काव्य के लिए संयोजित किए गए घटनाक्रमों, पौराणिक चरित्रों के साहित्यिक महत्व उदघाटन के लिए अपनी परंपरा के प्रति आलोचनात्मक एवं विवेकपूर्ण रूख के लिए व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है।

हिंदी साहित्य के अध्यापन के झोल के कुछ संकेत

विद्या के केंद्रों में कार्य-संस्कृति कुछ इस तरह से विकसित हो रही है कि अध्यापक की निष्ठा और विद्यार्थी की गंभीरता में भारी गिरावट आ रही है। अध्ययन करने वाला ही तो अध्यापक होता है, लेकिन गैर अध्ययन कार्यों में बेहद रुचि लेने वाले और अध्ययन कार्य से चिढ़ वाले शिक्षकों की संख्या की बहुतायत है। अध्यवसाय का यह कार्य पूर्णतः व्यवसाय का रूप धारण करता जा रहा है।

हिंदी साहित्य के अध्यापन, शोध की विश्वसनीयता पर घोर संकट है। इसमें सब लोग शामिल हैं। विश्वविद्यालयों के वे शिक्षक भी शामिल हैं, जिनकी नजर शोधार्थियों-छात्रों की जेब पर रहती है और वे भी शामिल हैं जो हमेशा ही जहाज की टिकटें जुगाड़ने के प्रयत्न में ही समस्त विद्वता दर्शाते हैं। शोधार्थियों की अधिकांश संख्या भी ऐसी ही है जो सस्ते में डिग्री लेना चाहता है। पांच साल तक किसी एक प्रोजेक्ट पर काम करने के बाद भी शोध के नाम पर ‘ण’ खाली रहता है।

दृष्टिविहिनता साहित्य अध्यापन की सबसे बड़ी चुनौती है। सालों साल एक पाठ्यक्रम एक ही तरीके से पढ़ाया जा रहा है। समय के साथ समाज में आए परिवर्तनों से अध्यापन के ढंग और दृष्टि में कोई परिवर्तन नहीं। ये कुछ इसी तरह का है कि आप बोल तो बहुत कुछ रहे हैं, लेकिन कह कुछ नहीं रहे। विभिन्न दृष्टियों के उपयोग से साहित्य अध्ययन-अध्यापन में गुणावत्ता बढ़ती है।

विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि हिंदी के अधिकांश छात्रों और अध्यापकों की चेतना छायावाद से आगे नहीं बढ़ रही। उत्तर आधुनिकता और संरचनावाद ने पूरी दुनिया में साहित्य के पारम्परिक अध्ययन अध्यापन की दिशा बदली है। वर्तमान में अस्मितामूलक विमर्शों ने साहित्य के केंद्रीय सवालों को और उनके परिप्रेक्ष्य को पूर्णतः बदला है। समकालीन हिंदी साहित्य से परिचितों का दायरा बेहद सीमित है।

हिंदी में भारतीय काव्यशास्त्र के नाम पर संस्कृत का काव्यशास्त्र पढ़ाया जा रहा है। हिंदी का साहित्य का शास्त्र भी खूब समृद्ध है। गौर करने की बात ये भी है कि हिंदी मुख्य व उल्लेखनीय साहित्य राजदरबारों से दूर लोक में रचा गया है और उसने शास्त्रीय मान्यताओं का अनुकरण नहीं किया। ऐसे लोकधर्मी साहित्य की समीक्षा के लिए राजदरबारों में रचे गए आभिजात्य के साहित्य शास्त्र से संभव नहीं है। लेकिन इस दिशा में अभी कोई चिंतन आरंभ नहीं हुआ।

हिंदी साहित्य में जो प्रश्न सौ साल पहले उठे थे वे आज भी परीक्षाओं में और कक्षाओं में उसी रूप में स्थान पा रहे हैं। मसलन पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता के बारे में कोई नया तथ्य नहीं आ रहा और उसके पाठ के बारे में एक निष्कर्ष पर पहुंचा जा चुका है। अब पृथ्वीराज रासो के पाठ में मूल्यबोध से विद्यार्थियों को जोड़ने की आवश्यकता है। जबकि उनको पाठ से बाहर रखकर उसकी प्रामाणिकता में ही फंसा दिया जा रहा है।

हिंदी साहित्य मध्यकाल के अध्ययन में अभी भी रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि से ही काम चला रहे हैं। जबकि भक्ति साहित्य के उत्पति के कारणों को उदघाटित करने में दोनों दृष्टियां अधूरेपन का शिकार हैं। इतिहासकारों ने जो खोज की उसका जरा भी उपयोग हिंदी सीहित्य के अध्ययन-अध्यापन में नहीं किया जा रहा। मध्यकाल की ऐतिहासिक परिस्थितियों को निर्णायक ढंग से परिवर्तित करने वाली तकनीक और उससे सामाजिक जीवन में आए बदलावों के साथ हिंदी साहित्य के संबंधों पर अभी बहस आरंभ भी नहीं हुई।

हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा गया, इसकी औपनिवेशिक दृष्टि थी। औपनिवेशिक इतिहास बोध ने हिन्दी की परम्परा का मूल्याकंन अपने ढंग से किया और उसके जनपक्षीय एवं विद्रोही स्वरों का अनुकूलन करने की कोशिश की। औपनिवेशिक दृष्टि ने मध्यकालीन साहित्यिक परिवेश और उसकी साहित्य चेतना के मूल्याकंन को विकृत किया, जिसे हिन्दी का औपचारिक पाठक अभी भी धारण किए हुए है। मध्यकाल के सूफी-संतों के अनुयायी हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों-समुदायों तथा समाज की विभिन्न श्रेणियों से आ रहे थे। भारत की बहुधर्मी, बहुभाषी, बहुसंस्कृति के चरित्र को उभारकर सांझी संस्कृति के निर्माण का महत्वपूर्ण काम कर रहे थे। लेकिन औपनिवेशिक इतिहास बोध के शिकार हिन्दी के बुद्धिजीवी इसे अनदेखा करते हुए इसे मुस्लिम अत्याचार की प्रतिक्रिया के रूप में परिभाषित कर रहे थे।  यह विचार सूफी-संतों के अध्ययन से नहीं, बल्कि यह औपनिवेशिक डिजाइन का हिस्सा था, जो भारतीय इतिहास को धार्मिक-साम्प्रदायिक संघर्षों-विवादों में व्याख्यायित करके वर्तमान में भारतीय जनता का धार्मिक-साम्प्रदायिक विभाजन करना चाहता था। मलिक मुहम्मद जायसी जैसे लोक-सांस्कृतिक कवि को एक सूफी मत के कवि के तौर पर ही पढ़ा गया।

संतों-सूफियों के साहित्य को विभिन्न साधना पद्धतियों के रूप में ही व्याख्यायित किया, मानो कि ये साहित्यकार नहीं, धर्म गुरू हों और कोई पंथ बनाने निकलें हों। साधना पद्धतियों और विभिन्न मत-मतान्तरों के तात्विक रूप में इसे व्याख्यायित करने में औपनिवेशिक इतिहास बोध व दृष्टि काम कर रही थी।

औपनिवेशिक शासन सत्ता भारतीय चिन्तन परम्परा को ‘दूसरे लोक के चिन्तन’ तक सीमित-सुरक्षित कर देना चाहती थी, ताकि वास्तविक जगत की व्याख्या पर उनका एकाधिकार रहे। वास्तविक जगत की अपने अनुकूल व्याख्या से ही उनकी लूट और उसकी वैधता जारी रह सकती थी। जिसमें वे काफी हद तक कामयाब हुए। औपनिवेशिक बुद्धिजीवियों ने भारत के आध्यात्मिक चिन्तन को तो अतिरिक्त उभार दिया, जबकि भारतीय भौतिकवादी चिन्तन की समृद्ध परम्परा को अनदेखा किया गया, जिसमें वैज्ञानिकता के विकास की अपार संभावनाएं थीं या फिर उसकी विकृत व्याख्याएं करके आध्यात्मिक चिन्तन का रंग दे दिया।

मध्यकालीन साहित्य को अद्वैतवाद, द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद की श्रेणियों में विभाजित करना तथा इनके जीवन-दर्शन की व्याख्या जीव, जगत, ब्रह्म, माया की बद्ध श्रेणियों में की। इस श्रेणी-विभाजन से ही कबीर, रैदास, नानक, मीरा, दादू आदि के साहित्य की क्रांतिकारी परिवर्तनधर्मी चेतना पर राख डाल दी गई। तत्कालीन शासन सत्ताओं से इनका संघर्ष, स्थापित सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति इनका आक्रोश विमर्श का मुद्दा ही नहीं बना। ये अपने समाज के बृहतर सवालों के साथ-साथ पूरी परम्परा को भी परिभाषित करते हुए अपना पक्ष निर्मित कर रहे थे, जिसकी ओर बुद्धिजीवी समाज ने कोई ध्यान ही नहीं दिया। मसलन् कबीर ने लिखा “संसकिरत भाषा कूप जल, भाखा बहता नीर” जो तत्कालीन विमर्श को उद्घाटित कर रहा है। “भाषा बनाम भाखा” का सवाल असल में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सांस्कृतिक संघर्षों की ओर संकेत करता है, जिसे वर्चस्वशाली वर्ग कभी सतह पर नहीं आने देना चाहते।

भक्ति को देखने का एकायामी नजरिया है, जबकि अंग्रेजी के विद्वान ए. के रामानुजन ने रामायण पर खोज करके रामायण के सैंकड़ों संस्करण निकाले हैं। विभिन्न क्षेत्रों में भक्ति के स्वरुप को खोजना उसकी विशिष्टता को पहचानना हमारे अध्ययन से गायब ही है।

साहित्य के अध्ययन-अध्यापन मे आध्यात्मिकता-पारलौकिकता इस तरह छाई हुई है कि लौकिकता और जागतिकता लगभग गायब सी ही है। हिंदी साहित्य के मध्यकाल की कक्षा का नजारा एक कीर्तनिया प्रवचनों का होता है, जिसमें काव्य के लौकिक संदर्भ तो गायब होते ही हैं, बल्कि उसके सौंदर्यमूलक पक्ष भी ओझल ही रहते हैं। कबीर की रहस्यवादिता और उसके राम के स्वरूप पर तो खूब उछल-कूद होती है, लेकिन उसके तत्कालीन धर्मसत्ताओं से टकराहट और विद्रोह के स्वरों की विभिन्न परतों पर कोई तब्सरा नहीं होता। चमत्कारिकता से इतना दबा हुआ है कि इन कवियों के जीवन के साथ जुड़ी किवंदंतियों-जनश्रुतियों को रस लेकर बताया जाता है लेकिन इनके काव्य-मूल्यों पर शतांश भी चर्चा नहीं होती।

इसी कथित आध्यात्मिक दृष्टि का प्रतिफल है कि मध्यकाल के दो सौ साल का साहित्य जिसे रीतिकाल कहा जाता है, शायद इसीलिए उपेक्षित है कि वह इसी सच्ची-मुच्ची की दुनिया, भौतिकता और देह को प्रमुखता से अपने में समाए हुए है। इसलिए रहीम जैसे समर्थ कवि का उपयोग स्कूली-शिक्षा तक नीति-उपदेश सिखाने तक सीमित रहा।

हिन्दी की बौद्धिकता का दिवालियापन ही कहा जायेगा कि जब विश्व और भारत की दूसरी भाषाओं में पठन-पाठन के नए औजार विकसित हो रहे हैं, विश्वविद्यालयों में हिन्दी साहित्य के सरकारी चोटीधारी आचार्य अभी उसी लीक को पीटने में  लगे हैं। गुरु के आशीर्वाद को ही अपनी ज्ञान-पूंजी के रूप में सहेजने वाले शिक्षक कक्षाओं में कविताओं को मोक्ष प्राप्ति के साधन के रूप में देखते हैं। हर कविता की आत्मा का परमात्मा से मिलन के रूप में व्याख्या करते हैं और कविता का धार्मिक भजनों की तरह रट रहे हैं। हिन्दी का यह दकियानूसी शिक्षक शुद्ध-भौतिक कविता को भी आध्यात्मिक दायरे में घसीटने के लिए ऐडी-चोटी की ताकत लगाता है। अर्थ का अनर्थ करने को उपलब्धि मानकर अपनी पीठ ठोकता है, यदि मनोवांछित अर्थ निकालने की गुंजाइश न हो तो कवि को गरियाता है और कविता को खारिज करता है। कविता यहां संसार को समझने का उपक्रम न रहकर उससे पलायन का साधन बन जाती है। कविताओं में समाज के अन्तर्विरोधों, मानव जीवन के संघर्षों की तलाश नहीं है, जीवन की पहेली को सुलझाने में साहित्य की जद्दोजहद का जिक्र नहीं है, सांस्कृतिक आन्दोलनों की पहचान के लिए बौद्धिक मशक्कत नहीं है। अपनी परम्परा से कोई संवाद नहीं है, बल्कि यहां उपदेशक का सा सरलीकरण है।

हिंदी साहित्य अध्यापन की बेहतरी के लिए

कबीर ,सूर ,तुलसी को रटने-रटाने से काम नहीं चलने वाला, बल्कि हिंदी में तकनीक के प्रयोग को बढ़ावा देने की जरूरत है। कितने ही कबीर, मीरा, रैदास, तुलसीदास, सूरदास आदि के गायक मौजूद हैं जो स्वतंत्र तौर पर इनका साहित्य गा रहे हैं या नाटक मंडलियां हैं जो विभिन्न रचनाओं पर नाटक कर रही है या फिल्में हैं। साहित्य में रूचि पैदा करने और इससे जोड़ने के लिए इनका सहारा लिया जा सकता है। लैपटाप, प्रोजेक्टर और मोबाइल स्क्रीन का रचनात्मक उपयोग करना एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है।

संपर्क- 9416482156

 

Advertisements

1 COMMENT

  1. सुभाष चंद्र जी का लेख उत्तम है साहित्य नहीं भारत में जीवन का हर क्षेत्र षड्यंत्र का शिकार है पूरी की पूरी संस्कृति षड्यंत्र का शिकार है राजनीति उद्योग कारोबार सब में कुछ लोगों का षड्यंत्र लोगों की बहू संख्या पर भारी है इस बात को विश्वविद्यालयों के आचार्य सामने नहीं आने देना चाहते क्योंकि वह भी उसी षडयंत्र का हिस्सा है जब डॉ नामवर सिंह दलित साहित्य का अलग वर्ग बनाए जाने का विरोध करते हैं और दलित भावनाओं को साहित्य में जगह देने के लिए कोई पहल नहीं करते दिखते तब यह बात स्पष्ट हो जाती है यह बड़ा अफसोस नाक है

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.