भगवाना चौधरी

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कुलबीर सिंह मलिक 

नवम्बर का महीना। दोपहर का वक्त। सन् सैंतालीस का मुल्क के बंटवारे का दौर। जींद शहर से पांच सात किलोमीटर पर जींद-हांसी रोड पर एक गांव है। जिसका नाम है ईक्कस। बताते हैं कि महाभारत काल में महान योद्धा दुर्योधन महाबली भीम से छुपते-छुपाते यहां के तालाब में आ छुपा था। खैर, मेरी कहानी का महाभारत की उस कहानी से कोई सरोकार नहीं है। मेरी कहानी का सरोकार तो मुल्क के बंटवारे की उस महाभारत से है, जिसने एक बार तो दुनिया के इस भाग की मानवता को चिथड़े-चिथड़े और लहुलुहान कर दिया था।

गांव के अड्डे पर प्रशासन की देखरेख में दो-तीन बोनट वाली बसें खड़ी हैं, जिनमें लादकर आसपास के गांवों की मुस्लिम आबादी को सुरक्षित स्थान पर ले जाया जा रहा था। बड़े शोरगुल व बदहवासी का नजारा था। सीमा के दोनों ओर से हिन्दू-मुस्लिम आबादी का पलायन हो रहा था। जींद के आसपास के गांवों में वैसे भी मुस्लिम आबादी बहुत कम थी। रोज-रोज के खून-खराबे व मारकाट के माहौल ने इन लोगों को मुल्क छोडऩे पर मजबूर कर दिया था। पर इस वहशियाना दौर में भी कुछ लोग थे जो मानवता पर कायम थे। आसपास के गांवों के मौजिज लोग मुस्लिम आबादी को सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाने में जी-जान से लगे थे। ईक्कस गांव का चौधरी भगवान सिंह भी प्रशासन की मदद के लिए इस काम में जुटा था। इनकी कोशिश थी कि फसादी व दंगाई लोग निर्दोष औरतों  व बच्चों पर न टूट पड़ें। अपने इस मकसद के लिए ये लोग अपनी जान पर खेलने को भी उतारू थे।

चौधरी भगवान सिंह गांव व इलाके का मौजिज आदमी था। बड़ा प्रभावशाली व्यक्तित्व था। ऊंचा कद, गौर वर्ण, चौड़ा वक्ष, लंबी रोबदार मूंछें, जिनमें थोड़ी-थोड़ी सफेदी आने लगी थी। उम्र होगी कोई 45-50 साल की। खानदानी चौधरी था। सफेद धोती-कुर्ता पहन साफा बांध हाथ में जब डोगा संभाल कर निकलता था तो ऐसा लगता था जैसे कोई शोभायात्रा निकल रही हो। इलाके में इनका रसूख था। सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे, पर किसी प्रकार के सियासी मनसूबे नहीं थे। आसपास के गांवों के औरत व बच्चे भी उन्हें पहचानते थे। इलाके की किसी भी पंचायत में लोग उनकी बात को नहीं मोड़ पाते थे। हर मुद्दे पर वो सही पक्ष का समर्थन करते थे। सच्चाई का पक्ष लेते थे। मजहबी व कौमी दलदल से ऊपर थे। ग्रामीण समाज में, विशेषत: जाट समुदाय में, बड़े नाम को सरल व छोटा कर बुलाने की प्रवृति है सो लोग उन्हें भगवाना चौधरी के नाम से बुलाते थे।

भगवाना चौधरी एक चबूतरे पर खड़े आसपास के लोगों को दिशा-निर्देश दे रहे थे। औरत व बच्चे, बदहवास से, ढोर-डंगरों की तरह बसों में लादे जा रहे थे। सबको जान की पड़ी थी। अंदर बसों में भी पैर रखने को स्थान न था। किसी को भी इस बात का सब्र न था कि अब नहीं तो अगले चक्कर में चले जाएंगे। मुस्लिम औरतें कभी खुद को संभालती, कभी बच्चों को  या फिर बगल या सिर पर रखी गठड़ी को संभालती बसों के दरवाजों में टक्कर मार रही थी।

इसी बीच एक मुस्लिम औरत भगवाना चौधरी के सामने आन खड़ी हुई। वह एक बच्चा कंधे पर बैठाए थ्ीि, एक बच्ची गोदी में थी व एक बच्ची उसके पल्लू से सटी थी। हफड़ा-दफड़ी व शोरगुल में उसने गोदी व कंधों के छोटे बच्चों को एक तरफ बिठा पल्लू से सटी बच्ची भगवाना चौधरी की झोली में डाल दी। हांफती, रोती, चीखती व भर्राई आवाज में इतना जरूर कह पाई,                ‘चौधरी! मैं ईगरा गांव की मास्टर बरकत शेख की औरत हूं। अपना लहू! अपना ईमान! तेरी झोली में डाल रही हूं। अब तू जाणै तेरा ईमान जाणै।’

इतना कह वो औरत बाकी दोनों बच्चों को समेट चलती बस में सवार हो गई। चौधरी को तो मानो करंट-सा लग गया। कुछ पल के लिए तो उसका सिर चकरा-सा गया। वो वहीं चबूतरे पर उकडू बैठ गया। उसकी गोद में चार-पांच साल की फूल-सी बच्ची पड़ी थी। उसने चैकदार कुर्ता व सुथना पहना था। हालात से सहमी प्यारी-सी ये बच्ची उस भगवाना चौधरी की ओर ही देखे जा रही थी। मानो उसे उसकी मां की समझ पर पूरा भरोसा था और बदहवासी व पागलपन की उस धक्कमपेल में  उसकी मां ने उसे सही ठिकाने पर पहुंचा दिया था। बच्ची को गोद से उतार कुछ देर के लिए भगवाना चौधरी असमंजस में पड़ गया। समझ में नहीं आया क्या करे। इससे पहले कि वो कुछ कह पाता या हालात को समझ पाता बरकत शेख की बीवी तो निकल चुकी थी। ये काफिले शहर में जाकर जींद रेलवे स्टेशन से फौरी सरहद के उस पार रवाना होने थे। आसपास के लोग भी ये नजारा देख रहे थे।

फिर वहां स्टेशन पर तो जनसैलाब  था। पीछा करने का कोई फायदा न था। बच्ची की मां मंशा तो भगवाना चौधरी ने देख ही ली थी, उसे नियत पर भी पूरा भरोसा था। सो कुछ देर में बच्ची की उंगली थाम भारी व थके कदमों से हवेली की ओर चल दिया। इस थकान में भी कुछ शांति व सुकून का अहसास हो रहा था।  उसे सफर का अहसास तक न था और गहरी सोच में पड़ा था।

इसी सोच-विचार में जाने कब हवेली के दरवाजे पर पहुंच गया और उसकी तंद्रा तब टूटी जब उसकी बीवी सत्यवती ने संबोधन किया।

‘आ गए! ये बच्ची किसकी है?’

भगवाना ने बीवी के सवाल का कोई जवाब न दिया और सामने पड़े  पलंग पर बैठ अपनी बायीं और बच्ची को बैठा लिया। बच्ची के लिए एक गिलास दूध लाने को कहा।

इस बीच बीवी ने फिर से प्रश्र किया-

‘ये बच्ची किसकी है?’

भगवाना ने कुछ सोच-समझकर बड़े संयत भाव से-‘अब तो अपनी ही समझो।’

बीवी ने फिर प्रश्र किया-‘मैं समझी नहीं।’

‘तकदीर की मारी एक मुसलमान औरत इसे मेरी झोली में डाल गई।’ भगवाना ने जवाब दिया।

‘और आप ले आए?’ बीवी ने सवाल किया।

इस बीच में घर के और सदस्य भी इकट्ठे हो गए और भगवाना चौधरी ने तफसील में सारी घटना का ब्यौरा दिया।

‘फिर भी ये कोई गाय, भैंस या बिल्ली का बच्चा तो है नहीं कि कोई औरत इसे आपकी झोली में डाल गई और आप इसे ले आए?’ सत्यवती का कहना था।

‘मजबूर था। और क्या करता? उस औरत ने ये बच्ची मेरी झोली में डाली ही इस आस्था और विश्वास से कि मेरे पास और कोई रास्ता ही नहीं बचा है। बच्ची को मेरी झोली में डालते वक्त बोल गई थी -अपने लहू, अपने ईमान को तेरी झोली में डाल रही हूं। अब तू जाने तेरा ईमान जाने। ऐसे में  बता मैं क्या करता?’ भगवाना का कथन था।

‘वैसे तो आप जो ठीक समझें, करें। पर कन्या का मामला है। वो भी एक मुसलमान कन्या का। चारों ओर कौमी दंगे और फसाद आप से छुपे नहीं हैं। कहीं घर बैठे कोई आफत न मोल ले लें। फिर आपकी नीयत तो नेक और सच्ची है, पर दुनिया वालों का क्या भरोसा?  सब आपकी नजर से थोड़ा सोचते हैं।’ सत्यवती का तर्क था।

‘दुनिया की मुझे कोई परवाह नहीं। बस तू इस बच्ची पर अपना मां वाला हाथ रख दे। शायद इस बेसहारा बच्ची की परवरिश का नेक काम ईश्वर हमारे से ही कराना चाहता हो।’ भगवाना का कहना था।

भगवाना की पत्नी सिर्फ नाम के लिए ही सत्यवती नहीं थी। वह एक नेक औरत थी और अपने पति के भावों की कद्र करती थी। वह पति की बात मान गई और बच्ची को छाती से लगा लिया। इस कथन के साथ कि आज से मेरी एक नहीं, दो बेटियां हैं। एक पेट से व एक ईमान से। इसके बाद कुछ दिन तक गांव में  इस बात की सरसराहट रही कि भगवाना चौधरी अपने घर में मुस्लिम बच्ची रखे है। पर हकीकत सबको मालूम थी और न तो भगवाना की नेकनीयती पर किसी को शक था और न किसी की हिम्मत थी कि भगवाना चौधरी के इस मामले में दखल दे।

एक बार जरूर धार्मिक उन्माद लोगों में घर कर गया था, पर इस क्षेत्र में बसे प्रमुख व प्रबल वर्ग में धार्मिक कट्टरता नहीं थी।

भगवाना अपने लक्ष्य पर कायम रहा। उसने अपनी इस बेटी को भी ऊंची से ऊंची शिक्षा दी। भगवाना ने जिस प्यार और सत्यनिष्ठा से इस बच्ची का पालन-पोषण किया वो इलाके में एक मिसाल बन गई।

इस बीच भगवाना चौधरी ने इगरा गांव में पूछताछ की। पता लगा कि बरकत  शेख शिक्षा विभाग में अध्यापक था और इन दिनों में  उसकी बदली सीमा के उस पार पश्चिमी पंजाब में थी। बरकत शेख का बड़ा बेटा उसके साथ था और उसकी बीवी व बच्चों का पाकिस्तान जाना तय था। उससे ज्यादा बरकत शेख के परिवार के बारे में कोई जानकारी न मिली।

युग बीतता गया। आठवें दशक के पूर्वार्ध का दौर! हरियाणा अलग से प्रदेश बन गया। जींद शहर को जिले का दर्जा  दे दिया गया था। पाकिस्तान से प्रशासनिक अधिकारियों का एक शिष्टमंडल प्रदेश की राजधानी चंडीगढ़ में आया। उनका लक्ष्य प्रदेश में हुई चहुंमुखी प्रगति का अध्ययन करना था। इस उद्देश्य से शिष्टमंडल के सदस्य प्रदेश के जिला मुख्यालयों में  आए।  तीन सदस्यों का एक शिष्टमंडल जींद शहर पहुंचा। इनका टीम लीडर था मोहम्मद इस्माईल। इस्माईल पाकिस्तानी सिविल सेवा का वरिष्ठ अधिकारी था। उसने इस क्षेत्र एवं यहां बसे लोगों में विशेष रूचि दिखाई।

जिले के उपायुक्त भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक मिस्टर राव थे। काफी काबिल और सुलझे हुए अधिकारी। उपायुक्त महोदय ने जिले  के अन्य अधिकारियों से शिष्टमंडल के सदस्यों का परिचय कराया। एक शाम उनके स्वागत में सहभोज व सांस्कृतिक कार्यक्रम भी रखा। जिले में तैनात अधिकारियों में एचसीएस काडर से एक  युवा मुस्लिम युवती सकीना भी थी। उसे शुगर मिल का चार्ज दे रखा था। मोहम्मद इस्माईल का जिले के उपायुक्त एवं अन्य अधिकारियों के साथ बहुत ही खुला एवं स्पष्ट विचार-विमर्श हुआ। इनको इस क्षेत्र के बारे में जानकारी भी बहुत थी। इलाके के कुछ गांव तो इनकी उंगलियों पर थे।

उन्होंने उपायुक्त से सवाल किया-‘आप तो अहीरवाल क्षेत्र से हैं। यह तो  जाट बाहुल्य क्षेत्र है। जाटों का गढ़ कहिए। आप ठहरे अहीरवाल क्षेत्र से।’

राव साहब को इस्माईल साहब की टिप्पणी में सियासी बू आई। राव साहब ने चुटकी ली-‘यहां सारे ही जाट हैं।’

‘मैं समझा नहीं।’ मोहम्मद इस्माईल ने सवाल किया।

राव साहब ने खुलासा किया-आप जानते हैं, पंजाबी कोई कौम नहीं। ये एक तहजीब है। जीेने का एक ढंग कहिए। उसमें फिर चाहे किसी जाति  के लोग हों या किसी मजहब के। आप ही बताएं! पंजाब में बसे मुसलमान क्या पंजाबी नहीं हैं? या फिर इस ओर बसे हिन्दू पंजाबी नहीं हैं?’

इस्माईल साहब निरुतर थे। राव साहब जारी रहे-‘मैं तो कहता हूं जाट भी एक तहजीब ही है। जीने का, सोचने का एक ढंग। इसे आप पंजाबियत की तर्ज पर हरियाणवी तहजीब भी कह सकते हैं। प्रदेश के हर क्षेत्र में बसी पीजेन्टरी क्लास के लोगों की वही समस्याएं हैं, वही आवश्यकताएं हैं। आप जानते हैं इस प्रदेश की प्रगति का राज। यहां के लोगों की सोच बहुत  ही ‘प्रोग्र्रेसिव’ है। लोग पोंगा पंडित या कट्टर पंथी नहीं हैं। मेरा मतलब है लोगों में कठमुल्लापन नहीं है। जिन सामाजिक बुराइयों के निवारण के लिए स्वामी दयानंद, राजाराम मोहनराय व सर सैयद अहमद खान जैसे समाज सुधारक संघर्ष करते रहे, वो बुराइयां यहां के समाज में जड़ ही नहीं पकड़ पाई। जैसे कि छूआछूत, विधवा विवाह पर रोक। तंत्र व बलि जैसी धार्मिक कुरीतियां, नारी उत्थान व उनकी शिक्षा के बारे में भी लोगों के विचार बहुत उन्मुक्त हैं। प्रशासन में भी महिलाओं की पूरी भागीदारी है।

शुगर मिल के दौरे के दौरान इस्माईल साहब की मुलाकात शुगर मिल की एमडी मुस्लिम युवती सकीना से हुई। इस्माईल साहब ने सकीना से सवाल किया-‘आप एक औरत हैं और वह भी एक मुस्लिम औरत। आपका औरत होना, एक मुस्लिम औरत होना क्या आपके आड़े नहीं आया?’

सकीना एक रौशन-दिमाग युवती थी और इस प्रकार के सवाल के लिए पूरी तरह से तैयार थी। सकीना के जवाब में सच्चाई के साथ-साथ भावुकता का पुट भी था। बड़े सधे हुए शब्दों में जवाब दिया-‘हमारे यहां क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। मेरा औरत होना, मुस्लिम औरत होना, अगर आप ऐसा सोचते हैं, फायदेमंद ही रहा है। यत्र पूजयते नारी, तत्र रमते देवा-यहां  के समाज की सोच है। यहां की औरत घर की चारदीवारी से बाहर आ चुकी है। यहां की नारी की सीमा अब नीला आसमान है। आप यहां की नारी की तुलना पाकिस्तानी नारी से न करें। पाकिस्तानी नारी की व्यथा, वहां के समाज व हालात का जायजा, वहां की तहमीनाओं और नसरीनाओं के माध्यम से मुझे बाखूबी मिलता रहा है। आप तो यहां के प्रबुद्ध वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं – कुछ कीजिए उन बेचारियों के लिए।’

इस्माईल ठगा-सा रह गया। इस बीच उनकी बातों में अन-औपचारिकता आ गई थी।

बातों-बातों में इस्माईल ने सकीना से सवाल किया-‘आपके शौहर क्या करते हैं?’

‘अभी शादी नहीं की।’ सकीना का जवाब था।

‘मतलब?’ इस्माईल ने सवाल किया।

‘अब्बा जिद्द किए हैं कि किसी मुस्लिम लड़के से ही शादी करो।’

‘ठीक तो कहते हैं! कोई इश्क का माजरा है क्या?’

‘हां! इश्क का ही मामला है। इश्क हकीकी। पर आप नहीं समझेंगे।’

अगले दिन मोहम्मद इस्माईल ने आसपास के कुछ गांवों में जाने की इच्छा जाहिर की। उपायुक्त महोदय ने एसडीएम महोदय की उनके साथ इस काम के लिए ड्यूटी लगा दी। अगले दिन सुबह-सुबह  मोहम्मद इस्माईल जींद-भिवानी रोड पर ईगरा गांव पहुंचे। रास्ते में मोहम्मद इस्माईल ने रहस्योद्घाटन किया कि ईगरा मेरा पुश्तैनी गांव है। एसडीएम महोदय के बदन में एक  सिहरन-सी दौड़ गई। उन्होंने गांव के मौजिज लोगों को इकट्ठा किया, विशेषकर बुजुर्ग औरतों और मर्दों को और बताया कि इस्माईल साहब इसी गांव से हैं। मोहम्मद इस्माईल एक साथ ही रोमांच एवं कौतुहल से विह्वल से हो गए थे। उन्होंने गांव के कुछ बुजुर्गों का नाम लिया। साथ में बताया कि हमारा घर नाइयों वाली कुई के पास दरिया जाट के घर के साथ था। गांव के लोगों में खुसर-पुसर हुई। तभी भीड़ से सत्तर साल का एक बुजुर्ग उठ कर आया और इस्माईल से पूछा-‘तुम मास्टर बरकत शेख के बेटे हो क्या? मैं ही हूं तुम्हारा पड़ोसी दरिया जाट।’ दरिया जाट का इतना कहना था कि मोहम्मद इस्माईल मारे भावुकता के बिफर पड़ा। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली। चाचा कह वह दरिया के गले से लिपट गया। बहुत ही मर्मस्पर्शी नजारा था। फिर तो गांव की बुजुर्ग औरतों और मर्दों का तांता लग गया। पुरानी यादों का एक सिलसिला-सा चल पड़ा। लोग इस्माईल को उसके पुश्तैनी घर में ले गए। अब भी घर में कोई खास बदलाव न आया था। इस्माईल के मानस पटल पर इस घर से जुड़ी धुंधली-धुंधली यादें उभरने लगी। पर इस सारे मेल-मिलाप के बीच इस्माईल की अपनी बहन के बारे में पूछने की हिम्मत न हुई। दरिया क्योंकि उनका पड़ौसी था और दोनों परिवारों में सौहार्द व दोस्ती के ताल्लुकात रहे थे, उसी ने बात शुरू की-

‘इस्माईल बेटे, हमारे पास बरकत शेख के परिवार की एक अमानत है। तुम्हारी मां ने जब और सारी बातें बताई हैँ, तो यह भी बताया होगा कि वो अपनी बड़ी बेटी हम लोगों की झोली में डाल गई थी। अब वो हमारे इलाके की बेटी है।’

भीड़ में फिर से खुसर-पुसर हुई। दरिया ने इस्माईल व एसडीएम महोदय से सारी बात का खुलासा किया। इस्माईल की खुशी का ठिकाना न रहा। मारे खुशी व अचरज के एक बार फिर आंसुओं की सरिता बह निकली। इस बीच एसडीएम महोदय ने भगवाना चौधरी को संदेश भिजवाया और सारा का सारा काफिला इक्कस गांव की ओर भगवाना चौधरी की हवेली की ओर रवाना हो गया। भगवाना चौधरी के घर एक मेला-सा लग गया। भगवाना चौधरी पचहत्तर की उमर पार कर चुका था। सफेद दाढ़ी व मूंछ, सफेद धोती व कुर्ता, सौम्य चेहरा। उनका व्यक्तित्व किसी संत, किसी दरवेश का-सा था। डीसी महोदय के साथ प्रशासन के और लोग भी वहां पहुंच गए थे। भगवाना चौधरी ने इस्माईल को गले से लगाया और बिफर पड़ा-‘भाई! आपकी मां जिस बच्ची को मेरी झोली में डाल गई थी, मेरे दीन-ईमान की दुहाई देकर, मैंने और मेरे परिवार ने उसे बहुत नाज-नखरों व प्यार से पाला है। उस दिन तुम्हारी मां एक हीरा हमारी गोद में डाल गई थी।’

वह ज्यादा नहीं बोल पाया और भावातिरेक हो भगवाना चौधरी और उसकी पत्नी सत्यवती ने एक सुंदर, सुशिक्षित व स्वाबलंबी युवती इस्माईल के आगे कर दी। भावविह्वल हो भगवाना बस इतना ही कह पाया-

‘इस बच्ची को डाल कर गई थी तुम्हारी मां मेरी झोली में।’

इस्माईल के सामने खड़ी वह  युवती सकीना थी – सकीना शेख।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मार्च-अप्रैल 2017, अंक-10), पेज – 10-12

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