कर्मचन्द ‘केसर’-जीन्दे जी का मेल जिन्दगी

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हरियाणवी ग़ज़ल


जीन्दे जी का मेल जिन्दगी।
च्यार दिनां का खेल जिन्दगी।

फल लाग्गैं सैं खट्टे-मीठे,
बिन पात्यां की बेल जिन्दगी।

किसा अनूठा बल्या दीवा,
बिन बात्ती बिन तेल जिन्दगी।

तड़फ रह्यी किते मटक रह्यी,
सुख-दुक्ख का सै मेल जिन्दगी।

धूल-धूप जल-वायु अम्बर,
पांच ततां का मेल जिन्दगी।

आर्यां सै कोय जार्या सै,
इसी लाग्गै जणु रेल जिन्दगी।

राजा, रंक, भिख्यारी, जोगी,
कई तरियां अणमेल जिन्दगी।

कोय देर्या सै धक्का इसनैं,
किसे नैं रह्यी धकेल जिन्दगी।

लोभ-लालच के चक्कर म्हं,
‘केसर’ बणग्यी जेल जिन्दगी।

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