कर्मचन्द ‘केसर’- कोय देख ल्यो मेहनत करकै

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हरियाणवी ग़ज़ल


कोय देख ल्यो मेहनत करकै।
फल के कड़छै मिलैं सैं भरकै।

पत्थर दिल सैं लीडर म्हारे,
उनके कान पै जूँ ना सरकै।

जिन्दगी नैं इसा गीत बणा ले,
हर कोय गावै चाअ म्हं भरकै।

कौड्डी तक भी ना थी जिनकै,
वाँ आज भुल्लैं सैं धर-धर कै।

बीस जीयाँ का थ इक चूल्हा,
इब जी-जी बेठ्या न्यारे धरकै।

जिनके हो सैं पूत कमाऊ,
उनकी धजा अम्बर म्हं फरकै।

पह्लां बरगी रह्यी नां खांसी,
देक्खे बोह्त गरारे करकै।

एकलव्य नैं कला दिखाई,
डस कुत्ते का मुंह बन्द करकै।

बदलैं लोग मौसम की तरियाँ
फिरै चेह्रे पै चेह्रा धर कै।

इतना माड़ा टेम आर्या सै,
जीणा पड़र्या सै डर डर कै।

अपणे पूत इब बैरी होग्ये,
पाले थे कदे द्याह्ड़े भरकै।

गरीब सुदामा तै किरसन जी,
मिले भाजकै कौली भरकै।

एक दिन सबनैं जाणा ‘केसर’,
तौं भी राख तैयारी करकै।

 

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