एड्मंड बर्क (1729-1797) अनुवाद दिनेश दधीचि

आईना

आईने में जब मैं देखूं
क्या दिखता है उसमें मुझको?
एक शख़्स लगता अजीब-सा
मैं तो कभी नहीं हो सकता।

ज़ाहिर है, कमउम्र हूं उससे
और इतना मोटा भी कहां हूं?
जितना दर्पण वाला चेहरा,
जिसको अब मैं देख रहा हूं।

कहां गये वो सब आईने
जिनसे मैं परिचित था पहले?
ऐसे आईने बनते थे
लगभग तीस साल पहले तक।

सारी चीज़ें बदल गयी हैं,
निश्चय ही तुम सहमत होगे।
ये आईने भी अब पहले
जैसे अच्छे कहां रह गये?

सो, चिंता मत करो, दोस्तो,
अगर झुर्रियां हों चेहरे पर।
एक बात तुम साफ़ समझ लो,
मैंने सीखी है जीवन में।

अगर तुम्हारा रंग-रूप यह
पहले से कुछ कम सुंदर है,
तो आईने का क़ुसूर है,
उसे ठीक करवाना होगा!

 

 

Edmund Burke (1729-1797)

The Mirror

I look in the mirror
And what do I see
A strange looking person
That cannot be me.

For, I am much younger
And not nearly so fat
As that face in the mirror
I am looking at.

Oh, where are the mirrors
That I used to know
Like the ones which were
Made thirty years ago

Now all things have changed
And I’m sure you’ll agree
Mirrors are not as good
As they used to be.

So never be concerned,
If wrinkles appear
For one thing I’ve learned
Which is very clear,

Should your complexion
Be less than perfection,
It is really the mirror
That needs correction.

 

 

 

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