ग़ज़ल


कैसी लाचारी का आलम है यहाँ चारों तरफ़,
फैलता जाता है ज़हरीला धुआं चारों तरफ़।

जिन पहाड़ों को बना आए थे हम आतिश फ़शां1,
अब इन्हीं से ज़लज़ले2 होंगे रवां चारों तरफ़।

ऐसे मंज़र3 में हमें जि़द्द है किसी गुलज़ार4 की,
एक सहरा और ख़ाली आसमां चारों तरफ़।

हो सका तो मैं बहारें ले के जाऊँगा वहाँ,
सूखे पेड़ों की क़तारें हैं जहाँ चारों तरफ़।

सिर्फ़ मैं ही बन गया हूँ अब निशाना जब्र का,
मेरी जानिब तन गई है हर कमां चारों तरफ़।

मंजि़लों को ढूँढने फिर खुद निकल आएंगे लोग,
फैलने तो दो हमारी दास्ताँ चारों तरफ़।

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  1. ज्वालामुखी 2. भूचाल 3. दृश्य 4. फूलों से भरा

 

 

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