ग़ज़ल


 

करें उम्मीद क्या उस राहबर से,
जो लौट आया हो मुश्किल रहगुज़र से,

जो लगते थे बड़े ही मअतबर1 से,
वो कैसे गिर गये मेरी नज़र से।

मैं कैसे छोड़ दूं मौजों से लडऩा,
अभी निकली कहाँ कश्ती भंवर से।

जुनूँ वालों को जाने क्या समझ कर,
डराते हैं वो अंजामे-सफ़र से।

जो सब को छोड़ कर सीढ़ी चढ़ा था,
वो गिरता जा रहा है हर नज़र से।

उधर ठहरी हैं ताज़ीमन2 बहारें,
गुज़रते हैं, जुनूँ वाले जिधर से।

करेंगे वो यक़ीनन कुछ करिश्मा,
निकल ही आये हैं जब अपने घर से।

अभी पतझड़ कहाँ आया है यारो,
अभी क्यों गिर गये पत्ते, शज़र3 से।

नज़र में वुसअते4 हैं आसमां की,
छिपेगा कौन अब मेरी नज़र से।

उठा लाये कहीं से हम उदासी,
मसर्रत5 ढूँढने निकले थे घर से।

मैं खुशियों से घिरा रहता हूँ लेकिन,
ग़म आ जाते हैं जाने फिर किधर से।

वही होगी रफ़ीको6 राहे मंजि़ल,
कोई गुज़रा नहीं जिस रहगुज़र से।

मैं हर रस्ते को फूलों से सजा दूँ,
वो आ निकले न जाने किस डगर से।

सजा है खूब ही फूलों से रस्ता,
कहीं ‘राठी’ न आता हो इधर से।

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  1. विश्वसनीय 2. आदर के साथ 3. पेड़ 4. फैलाव  5. खुशी  6. साथी

 

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