1966 में हमारे सामने अनेक चुनौतियां थी। मुझे याद है उस समय पंजाब  के एक नेता ने कहा था कि इनके पास खाने को तो अन्न है नहीं, ये हरियाणा बनाकर क्या करेंगे। हमारे कृषि वैज्ञानिकों और किसानों ने मिलकर फसलों की नयी किस्में तैयार की, खाद्य उत्पादन को बढ़ाया तथा हरित क्रांति के सफल प्रयोग किए। वक्त गवाह है कि आज हमारे खेतों में इतना अन्न पैदा होता है कि अपनी पब्लिक के भरण पोषण के अलावा चीनी, चावल और गेहूं का निर्यात करते हैं। इस क्षेत्र में हमने अपने राज्य का ही नहीं, देश का भी नाम ऊंचा किया है।

लेकिन बड़े दुख की बात है कि पचास साल बीत जाने पर भी हम खेती को लाभकारी पेशा नहीं बना पाए। आज इस पेशे को हेय दृष्टि से देखा जाता है। औद्योगिक सभ्यता से पहले खेती करना एक सम्मान और इज्जत की बात थी। समाज में अन्न पैदा करने वाले लोगों को ऊंची नजरों से देखा जाता था।

उत्तम खेती, मध्यम व्यापार
नीच चाकरी, भीख गंवार

लेकिन आज  इन पंक्तियों के मायने बदल गए हैं। इस पेशे से जुड़े हुए लोग आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े रहे हैं। अब किसान के लिए जमीन इज्जत-आबरू, मां-बेटी के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को सम्पन्न करने वाली एक उत्पाद की हैसियत में तबदील होती जा रही है। लोग धड़ाधड़ अपनी जमीन बेच रहे हैं।

हमारी अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है। हमारे राजनेताओं के भाषणों/वक्तव्यों में किसानों की दीन-हीन दशा का वर्णन जरूर होता है, लेकिन नीतियों में प्रमुखता उद्योगों की होती है। टैक्स-माफी,  सब्सिडी, कम दर पर पैसा मुहैया उद्योगों को करवाया जाता है और किसान को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है।

अधिकांश किसान कर्ज में हैं और आने वाली पीढिय़ों का बड़े पैमाने पर मोहभंग हो रहा है। आने वाले दस सालों में यदि हम लोगों को जमीन से जोड़ना चाहते हैं तो यह  सुनिश्चित करना होगा कि छोटे से छोटे किसान की आय सरकारी क्लर्क के बराबर हो और कृषि मजदूर की आय सरकारी चौकीदार की तनख्वाह के समान हो।

खेती और इससे जुड़ी गतिविधियों  को ज्ञान-विज्ञान के अनुशासनों से जोड़ा जाए। हरियाणवी संस्कृति में इसका ग्लैमिकरण किया जाए तथा यह पेशा भारतीय की पहचान के साथ जुड़े। साहित्यकार-फिल्मकार, रंगकर्मी-समाजशास्त्री इस दिशा में महत्वपूर्ण काम कर सकते हैं।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.-

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