जब तलातुम से हमें मौजें पुकारें आगे।
क्यों न हम ख़ुद को ज़रा उबारें आगे।।

शहरे हस्ती में तो हम औरों से पीछे थे ही,
क़त्लगाहों में भी थीं लम्बी कतारें आगे।।

उम्र भर पीछा हमारा न ख़ज़ाँ ने छोड़ा,
उम्र भर यारो, रही  हमसे बहारें आगे।

दो कदम और है बस अपने तलातुम का पड़ाव,
नाख़ुदाओं से कहो, थोड़ा उतारें आगे ।

यूं बदलना है, हमें, दोस्तों, नज़्मे फितरत,
अपने पीछे हों बहारें, तो बहारें आगे।

हमसे आगे भी हैं कुछ लोग, यकीं आ जाए,
एक दो नक़्श अगर मौजें उभारें आगे।

दश्त के सोते बगूलों को जगा दे ‘आबिद’
उन से कह दे कि ज़रा राह संवारें आगे

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