ई-16, यूनिवर्सिटी कैम्पस,
कुरुक्षेत्र (हरियाणा)-132119

30 अगस्त 1991

प्रिय भाई रमेश,

            आपका पत्र। बीच में एकाध दिन के लिए बाहर जाना पड़ा। इसीलिए तुरंत जवाब देने की इच्छा के बावजूद इस पत्र को लिखने में कुछ देरी हो गयी। क्षमा करेंगे।

कहानी के बारे में, विशेषकर हिन्दी कहानी की पिछले चार दशकों के दौरान विकास यात्रा के बारे में, हमारी अनौपचारिक बातचीत कुछ दिनों से चलती रही है। अपने पत्र में इस बातचीत के कुछ सूत्रों को आपने फिर से उठाया है, उसकी मुझे खुशी है। जल्दी में दी जाने वाली प्रतिक्रिया में जो बिखराव और अध-कचरापन रह जाता है, उसे यदि आप मेरे इस पत्र में पाएं तो नजरअंदाज कर दें। यहां आपने आठवें दशक की कहानी के संदर्भ में जो दो मुख्य सवाल उठाए हैं-प्रस्थान बिन्दु और नाम के बारे में-इनमें से पहले पर ही मैं मुख्य रूप से अपनी बात को केंद्रित रखूंगा। आज की हिन्दी कहानी में रचनाशीलता जिन रूपों में व्यक्त हो रही है, उनकी पहचान करने और उनकी ओर अपना रवैया स्पष्ट करने के मकसद से जो कुछ विचारों का आदान-प्रदान हमारे बीच हुआ है, उससे इस विषय पर मतभेद अभी भी बने हुए हैं, यद्यपि इन्हें हम बहुत स्पष्ट नहीं कर सके हैं। मुझे उम्मीद है कि यहां जो कुछ कहना चाहता हूं, उससे मतभेद के बिन्दू पहले से कहीं अधिक स्पष्ट होंगे और हमारे बीच व्यापक सहमति का जो आधार मौजूद है, वह भी रेखांकित होगा।

मैं आपकी इस मूलभूत धारणा से लगभग पूरी तरह सहमत हूं कि आठवें दशक की कहानी को हमें एक नयी शुरुआत के रूप में देखना होगा और इसकी विशिष्टता को समझने के लिए उसे छठे दशक की ‘नयी कहानी’ और सातवें दशक की ‘अकहानी’ दोनों से ही अलग करना होगा। मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि इस दशक की कहानी में जो रचनाशीलता व्यक्त हो रही है, उसके पीछे रचनाकारों का यह आग्रह स्पष्ट दिखायी देता है कि छटे दशक से ही कहानी लेखन में प्रेमचंद से दूर हटने की जो प्रवृत्ति शुरू हो गई थी, भले ही वह यथार्थ की संश्लिष्टता और उसकी सूक्ष्मताओं को पकड़ने के लिए नये शिल्प विकसित करने के नाम पर व्यक्त हुई हो या फिर अनुभव के बने-बनाये सांचों को तोड़कर और समाज द्वारा व्यक्ति पर आरोपित विचारों और मूल्यों की रूढिय़ों से छुटकारा पाकर बिम्बों और प्रतीकों के बल पर एक नया रचना संसार निर्मित करने के नाम पर, वास्तव में साहित्य की यथार्थवादी परम्परा से यह एक ऐसा विचलन था, जिससे कहानी की रचनाशील ऊर्जा में काफी कमी आ गयी। आठवें दशक में कहानी-लेखन में जो नया उभार सामने आया, उसके अंतर्गत सक्रिय होने वाले रचनाकारों का अपने बारे में यह दावा था कि वे कहानी की इस कमजोरी को दूर करने के लिए नये सिरे से प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं और इस प्रकार कहानी को दोबारा सामाजिक जीवन के धरातल पर वापस लाकर उसे उसकी सही जमीन पर अवस्थित कर रहे हैं तथा एक सुस्थिर दृष्टिकोण अपनाकर तथा अपनी सामाजिक सोद्देश्यता अथवा पक्षधरता की धार को फिर से पैना बनाकर कहानी को नयी ताकत दे रहे हैं। आपने अपने पत्र में इन रचनाकारों की इस स्थापना को पूरी स्वीकृति दी है। आठवें दशक की कहानी के प्रस्थान बिन्दु को इस तरह व्याख्यायित करना मेरी दृष्टि में काफी हद तक उचित है भी, पर इस प्रकार की स्थापना में कुछ महत्वपूर्ण बातें छूट जाती हैं, जिनकी ओर मैं इस पत्र में आगे चलकर इशारा करना चाहूंगा।

यह सही है कि प्रेमचंद से दूर हटने वाली प्रवृत्ति के पीछे एक ताकतवर दबाव आधुनिकतावाद का था और इस आधुनिकतावाद प्रवृत्ति ने, भले ही वह ‘नयी कहानी’ आंदोलन के बीच झलकती दिखायी देती हो या फिर ‘अकहानी’ का रूप ले रही हो, हिन्दी कहानी की यथार्थवादी परम्परा को बहुत बड़ी क्षति पहुंचायी और उससे प्रेमचंद की विरासत में आगे आने वाले कहानीकारों के पूरी तरह कट जाने का संकट पैदा हो गया। यह भी सही है कि आठवें दशक के रचनाकार इस भटकाव से हिन्दी कहानी को उबारने के दृढ़ संकल्प के साथ सामने आए और आधुनिकतावाद प्रवृत्ति के छद्म से संघर्ष करने में प्रेमचंद की कहानी से उन्होंने प्रेरणा हासिल की। ‘अकहानी’ से तुलना करने पर आठवें दशक की कहानी की यह विशिष्टता एकदम स्पष्ट हो जाती है और वह ‘अकहानी’ के अराजक और दिशाहीन आक्रोश तथा उसके कड़वाहट और नफरत-भरे रचना संसार के विरोध में की गयी एक सार्थक पहल नजर आती है। ‘अकहानी’ से  आठवें दशक की कहानी की इस आधारभूत भिन्नता को बड़ी आसानी के साथ उन रचनाकारों की कहानियों की मदद से स्पष्ट किया जा सकता है, जो सातवें दशक में ‘अकहानी’ से प्रभावित थे, पर आठवें दशक में आकर अपनी रचनाशीलता के एक नये पड़ाव में प्रवेश करते हैं। काशीनाथ सिंह हों अथवा सतीश जमाली, ज्ञानरंजन हों अथवा रमेश उपाध्याय, सभी यह महसूस करते नजर आते हैं कि वे आठवें दशक में अपने पिछले गलत संस्कारों से छुटकारा पाकर एक नयी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और अपनी पुरानी रचनाओं के विरुद्ध दिशा में जाने वाली रचनाएं लिखने लगे हैं। ‘शेष इतिहास’ की भूमिका में आपने अपनी रचनाशीलता में आये गुणात्मक बदलाव की पूरी गंभीरता के साथ व्याख्या की है। इस दृष्टि से वह भूमिका आठवें दशक के साथ उभरकर आने वाली जनवादी अथवा प्रतिबद्ध कहानी का एक आधारभूत दस्तावेज बन गयी है। इस कहानी की अभिव्यक्ति भंगिमायें अनेक हैं और नये-पुराने बहुत सारे कहानीकारों ने इसे मिलजुलकर सम्पन्न बनाया है। इसराइल की ‘फर्क’ कहानी हो या काशीनाथ सिंह की ‘सुधीर घोषाल’, सतीश जमाली की ‘प्रथम पुरुष’ हो या आपकी ‘बराबरी का खेल’, विजयकांत की ‘बीच का समर’ हो या नीरज सिंह की ‘क्यों’, असगर वजाहत की ‘केक’ हो या ज्ञानरंजन की ‘घंटा’-ये कहानियां आठवें दशक की कहानी के उन पहलुओं को स्पष्ट करती हैं, जिनके आधार पर सातवें दशक की कहानी से अलगाते हुए उसे प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा के एक नए पड़ाव के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन जब ‘अकहानी’ के अलावा ‘नयी कहानी’ से भी आठवें दशक की कहानी की भिन्नता की बात की जाती है और छटे दशक की कहानी की तुलना में प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा के ज्यादा करीब होने का दावा इसके बारे में किया जाता है, तो कुछ लोगों के सामने इससे काफी दिक्कतें आने लगती हैं और मुद्दे कुछ उलझ जाते हैं।

जहां तक भिन्नता का सवाल है, उसे तो सभी प्रकार के आलोचक शायद स्वीकार कर लेंगे, पर इस भिन्नता के स्वरूप को ठीक-ठीक समझने अथवा इसकी ऐतिहासिक वैधता को स्वीकार करने में  उन्हें काफी कठिनाई होगी। यदि हम मार्कण्डेय की ‘बीच के लोग’ को उनकी ‘पान-फूल’ अथवा ‘हंसा जाई अकेला’ में छपी कहानियों के साथ रखकर देखें, या अमरकांत की ‘बस्ती’ कहानी की उनकी ‘दोपहर का भोजन’ से तुलना करें या शेखर जोशी की ‘मेंटल’ और ‘सीढिय़ां’ कहानियों से उनकी ‘कोशी का घटवार’ या ‘दाज्यू’ जैसी कहानियों से आये अंतर की ओर ध्यान दें, या भीष्म साहनी की आठवें दशक की लिखी किसी कहानी को उनकी छठे दशक की कहानियों के साथ पढ़कर देखें तो आठवें दशक की कहानी की ‘नयी कहानी’ के दौर की रचनाओं से भिन्नता को स्वीकार करने में हमें कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। पर दो विशेष मुद्दों पर मतभेद फिर भी बने रहते हैं। कुछ आलोचक और रचनाकार तो ‘नयी कहानी’ से इतनी गहराई के साथ जुड़े हुए हैं कि उनकी कल्पना में यह बात आसानी से  आ ही नहीं पाती कि प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा से जुड़ने की शर्तें आठवें दशक में वही नहीं रहीं, जो छठे दशक में आवश्यक थीं। प्रेमचंद की परम्परा से अपने समय की सच्चाइयों के अनुरूप शर्तों पर जुड़ने के जो प्रयास ‘नयी कहानी’ के एक विशेष हिस्से में किए गए, उनकी वैधता और स्वाभाविकता को तो वे अच्छी तरह समझ लेते हैं, पर इसके साथ ही वे यह मानकर चलते हैं कि सामाजिक परिस्थितियों में कोई ऐसा महत्वपूर्ण बदलाव उसके बाद नहीं आया, जिससे साहित्य की यथार्थवादी परम्परा में व्यक्त होने वाली रचनाशीलता को नये सिरे से जद्दोजहद करते हुए किसी नये प्रकार की कहानी का विकास करना पड़े। आठवें दशक में प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा से जुड़ने की प्रक्रिया छठे दशक से गुणात्मक रूप में इतनी भिन्न हो गयी है कि ‘नयी कहानी’ के तौर-तरीकों के जरिए उस परम्परा से जुड़ने की जिद्द करना रचनाशीलता में ढीलापन ले आने या अवरोध पैदा कर देने का खतरा मोल लेना है, यह बात वे मानने के लिए तैयार नहीं हैं। कहानी आलोचना के क्षेत्र में बहुत पैनी दृष्टि रखने वाले कुछ प्रतिष्ठित आलोचक भी प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा के विकास के अगले पड़ाव की ‘नयी कहानी’ के साथ इस प्रकार अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ मानकर चलते हैं कि आठवें दशक की कहानी को निष्पक्ष होकर परखने की स्थिति में वे नहीं रहते। उनके माध्यम से आठवें दशक की कहानी की जो तस्वीर पाठकों  के सामने पेश हुई है, वह एकांगी और काफी हद तक गलत भी है।

उदाहरण के तौर पर डा. नामवर सिंह जैसे संवेदनशील और दृष्टिवान आलोचक ने भी आठवें दशक की कहानी के बारे में चलताऊ-सी लगने वाली टिप्पणियां की हैं, उनका हवाला यहां दिया जा सकता है। वैसे डा. चंद्रभूषण तिवारी और सुरेन्द्र चौधरी जैसे आलोचक भी ‘नयी कहानी’ की ओर लगभग वैसा ही पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रुख अपनाये हुए दिखायी देते हैं। डा. नामवर सिंह को लगता है कि आठवें दशक की कहानी में यथार्थ की बहुत सीधी और सपाट तस्वीर उभरकर आती है, पात्र अक्सर इकहरे होते हैं और रचनाकार के मनोगत आग्रहों का प्रक्षेपण मात्र लगते हैं; कहानी सरल रेखा की तरह आगे बढ़ती है और पाठक आरंभ में ही जान लेता है कि वह किस प्रकार आगे बढ़ेगी और कैसे वह खत्म होगी। इस प्रकार की कहानियों में रचना-दृष्टि लगभग गायब रहती है और इसके अभाव को विचारधारा पर अतिरिक्त निर्भरता से ढंकने की कोशिश की जाती है, जिससे रचना यांत्रिक अथवा कृत्रिम लगने लगती है और पाठक पर कोई गहरी छाप नहीं छोड़ सकती। उनके ये निष्कर्ष हमें सही नहीं लगते और हम महसूस करते हैं कि अच्छी कहानी की जो अवधारणा उनके मन में बनी हुई है, उस पर ‘नयी कहानी’ द्वारा निर्मित साहित्यिक संस्कारोंं का कुछ ज्यादा ही दबाव बना हुआ है। इसीलिए अपनी पैनी आलोचना-दृष्टि के बावजूद आठवें दशक की कहानियों में उन्हें किसी एकाध को छोड़कर कोई विशेष खूबी नजर नहीं आती।

आठवें दशक में आते-आते यथार्थ को ग्रहण करने की शर्तें वास्तव में इतनी अधिक बदल गयी थीं कि श्रेष्ठ कहानी की हमारी अवधारणा, पात्रों की कल्पना और उनकी मानसिकता के चित्रण तथा कहानी में उठायी गयी समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करने की परिपाटियां भी काफी बदल गयीं। उनका इस प्रकार बदल जाना कोई अनहोनी या अटपटी बात नहीं थी। आठवें दशक की कहानी को ‘नयी कहानी’ का ही विस्तार मानकर या उसका घटिया अनुकरण समझकर उस पर टिप्पणी करने से उसके प्रति हम न्याय नहीं कर सकते। आठवें दशक की कहानी का सौंदर्यशास्त्र ‘नयी कहानी’ के सौंदर्यशास्त्र से काफी भिन्न है, यह बात इन आलोचकों के जहन में उतरनी चाहिए। ‘नयी कहानी’ और आठवें दशक की कहानी के अंतर को ठीक से समझने के लिए शायद हमें पात्रों, कथानक और शिल्प के विभिन्न पक्षों पर ही ध्यान केंद्रित किए रहने के बजाय परिस्थितियों में आए उन बदलावों की ओर ध्यान देना होगा, जिनके कारण प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा से जुड़े रहकर भी बहुत सारे लेखकों को अपने समय के यथार्थ से टकराने के लिए कहानी के कथ्य और रूप में, उसके शिल्प और तेवर में, बदलाव लाना पड़ा। ‘नयी कहानी’ के उभार के पीछे मुख्य कारक तत्व आम जनता के व्यापक हिस्सों में (विशेष तौर पर मध्यवर्ग में) व्याप्त यह अहसास था कि आजादी मिलने के बाद इस संभावना से पैदा हो जाने के बावजूद कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिन आदर्शों और मूल्यों को लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया था, उन पर अब अमल किया जाए। सरकार ने सामाजिक परिवर्तन के लिए जो कार्यक्रम शुरू किए, वे अपर्याप्त और असंतोषजनक थे। आजादी की लड़ाई के साथ-साथ जो एक नए समाज के निर्माण के सपने लोगों के मन में पनपे थे, उन्हें साकार करने के प्रयास उन्हें अब अपने आसपास के जीवन में दिखायी नहीं दिए। अधिकतर घटना-विकासों को देखकर तो यही लगता था कि पिछले लक्ष्यों और आदर्शों को ठोस रूप देने के बजाए उन्हें या तो पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है या छूंछा बनाया जा रहा है अथवा विकृत किया जा रहा है। यह सब देखकर उन्हें गहरा आघात पहुंचा, उनका मन पीड़ा से भर गया और कुछ लोगों को तो गहरे विषाद ने भी घेर लिया। इस आघात के बाद अधिकांश लोगों ने विरासत में मिले मूल्यों को शुद्ध रूप में बचाए रखने के लिए सामाजिक घटना-विकास से बिल्कुल अलग करके उन्हें अपने भीतर की दुनिया में एक बहुमूल्य निधि की तरह संजोकर रख लिया और अपनी चेतना और संवेदना में रची-बसी उनकी छवि को मानक का दर्जा देकर तत्कालीन सामाजिक परिवेश का व्यंग्यपूर्ण विश्लेषण करना शुरू कर दिया। इस व्यंग्यपूर्ण विश्लेषण में तथा आदर्शों के आभ्यंतरीकरण की क्रिया दोनों में  ही बेबसी के साथ झेली जाने वाली पीड़ा और उससे जुड़ी हुई खिन्नता की भावना सूक्ष्म रूप में एक अनिवार्य तत्व के रूप में मौजूद थी।

आदर्शों और आकांक्षाओं तथा वास्तविक सामाजिक  घटना-विकास के बीच का ऐसा अलगाव प्रेमचंद के समय में नहीं था। इच्छाओं और आकांक्षाओं तथा सामाजिक व्यवहार के बीच ऐसा अन्तर्विरोध भी तब नहीं था। अंदर तथा बाहर की दुनिया तब एक-दूसरे से घुली-मिली दिखायी देती थी और रचनाकार  एक संवेदशील व्यक्ति के रूप में सामाजिक घटना-विकास की निर्माण-प्रक्रिया तथा उसे दिशा देने में पूरी संजीदगी के साथ शरीक था। लेकिन अब वही रचनाकार सामाजिक परिवर्तन को बाहर से देखने वाला एक द्रष्टा बनकर रह गया था।

तत्कालीन सामाजिक स्थिति से उत्पन्न इस प्रकार की मानसिकता के दोनों पक्षों  को-अंदर और बाहर की दुनिया की दो स्वतंत्र इकाइयों के रूप में समकक्ष उपस्थिति को तथा सामाजिक  परिवेश को अलगाव की भावना के साथ देखने के लिए अभिशप्त द्रष्टा के अवलोकन और विवेचन में पायी जाने वाली पीड़ा की कसक को-इस छठे दशक की अनेक कहानियों में आसानी से पहचान सकते हैं। ‘डिप्टी कलक्टरी’ हो या ‘हत्यारे’ या ‘दोपहर का भोजन’, ‘कोसी का घटवार’ हो या ‘दाज्यू’, ‘चीफ की दावत’ हो या ‘हंसा जाई अकेला’ या ‘गुलरा का बाबा’ इन कहानियों में तत्कालीन सामाजिक यथार्थ के चित्रण की प्रमुख विशेषताएं, जो ‘नयी कहानी’ आंदोलन की पहचान बन गयी है, हमें साफ दिखायी देंगी। जाहिर है कि बदली हुई परिस्थितियों में यथार्थवादी परम्परा में लिखी गयी कहानी का यह बाह्य कलेवर और आंतरिक स्वरूप अब नहीं हो सकता था, जो प्रेमचंद की कहानियोंं में मौजूद है। छठे दशक में लिखी गई कहानियों की संरचना कुछ इस प्रकार उभरी कि पात्रों की इच्छाओं-आकांक्षाओं और संकल्पोंं को बाहर के घटनाक्रम के माध्यम से सूत्रबद्ध करके व्यक्त करने वाले किसी कथानक में वह सीधे-सीधे नहीं ढलेगी, बल्कि पात्रों की मानसिक दुनिया और बाह्य घटना-विकासों के बीच एक स्थायी तौर पर बने रहने वाले तनावपूर्ण अलगाव को उपयुक्त तौर पर उभारने वाला कोई रूप ग्रहण कर लेगी।

बाह्य घटना-विकास धीमा हो अथवा तीव्र, बिखरा हुआ हो अथवा कसा हुआ, अपने-आप में इसका उतना महत्व नहीं रह गया था, क्योंकि कहानी की संरचना की प्रमुख विशेषता अब यह हो गयी थी कि अंदर और बाहर की दुनिया के बीच का अन्तर्विरोध वहां अब कितनी प्रखरता के साथ व्यक्त हो रहा है। यथार्थवादी कहानी लिखने वाला रचनाकार भी अब यह आवश्यक मानकर नहीं चलता था कि पात्रों के भीतर जोर मार रही भावनाओं और आकांक्षाओं को बाह्य घटना-विकास के जरिए पर्याप्त प्रखरता के साथ कैसे व्यक्त किया जाए, इसके बजाए उसके लिए यह देखना भी जरूरी लगने लगा कि पात्रों के भीतर झांककर उनकी मानसिकता की पर्तों और गुत्थियों को कैसे सीधे-सीधे चित्रित किया जाए, क्योंकि उसे लगता था कि इसके बगैर सामाजिक यथार्थ की तस्वीर अधूरी हर जायेगी। पात्रों के चुनाव और उनकी परिकल्पना में भी अब काफी अंतर आ गया था। ऐसे पात्रों को अब कहानी के केंद्र में लाना जरूरी समझा जाने लगा था जो सामाजिक घटना-विकास से अपने आदर्शों और आकांक्षाओं के अलगाव को प्रखरता से महसूस करते हों और इस अलगाव की टीस को लगातार झेलते हुए सामाजिक परिवेश का व्यंग्यपूर्ण निरीक्षण करते रहने के भी आदी हो गए हों। सामाजिक जीवन की विडम्बनाओं की सजग पहचान और स्थितियों को बेबस होकर झेलते रहने की नियति से जुड़ी हुई पीड़ा और विषाद की भावना इस प्रकार की कहानी की मुख्य विशेषताएं हो गयीं।

अगर कहानी में यह पहचान स्पष्ट तौर पर बनी रहे कि पात्रों की मानसिकता और जिस परिवेश में वे जीते हैं, दोनों ही एक विशिष्ट ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया की उपज हैं और इनके बीच स्थापित विडम्बनापूर्ण रिश्ता भी इतिहास-सापेक्ष है, तो उसका यथार्थवादी चरित्र बना रहेगा, यद्यपि उसमें कुछ कमजोरियां भी दिखायी देंगी, जिनके मूल कारण का जिक्र मैं अगले पत्र में करूंगा।

‘नयी कहानी’ पर जहां कहीं आधुनिकतावादी प्रवृत्ति हावी है, वहां व्यक्ति की भीतरी दुनिया और बाहर के परिवेश की सत्ताओं को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग-थलग और पूर्णत: स्वायत्त मान लिया जाता है तथा दोनों की इतिहास सापेक्षता को भी नजरअंदाज किया जाता है। इसके अलावा यहां खिन्नता और विषाद की भावना इतनी गहरी होती है कि मानव-जीवन की अंतिम सच्चाई दीखने लगती है और जीवन-परिस्थितियों को बदलने के सभी व्यक्तिगत अथवा सामूहिक प्रयास असफल ही नहीं, निरर्थक भी लगने लगते हैं। निरंतर मानसिक आघात सहते चले जाने से समूचे परिवेश मेें व्याप्त असंगतियों का अहसास भी इतना तीखा हो जाता है कि वे मानव-जीवन की चिरंतन विडम्बनाओं का रूप अख्तियार करने लगती है। ऐसी स्थिति में एक बिन्दू पर पहुंचकर मानसिक आघातों की पीड़ा कड़वाहट और खीझ में भी बदल सकती है और घोर नकारवाद का रूप ले सकती है। आधुनिकतावाद के इस गुस्सैल अराजकतावादी रूप को हम सातवें दशक की ‘अकहानी’ में साफ-साफ देख सकते हैं।

आधुनिकतावादी प्रवृत्तियों को व्यक्त करने वाली कहानी, भले ही वह ‘नयी कहानी’ के रूप में हमारे सामने आती हो या ‘अकहानी’ के रूप में, प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा के प्रतिकूल जाती है। इसे हमें वास्तव में उस परम्परा से विचलन का ही सूचक मानना चाहिए, लेकिन ‘नयी कहानी’ के एक बड़े हिस्से के अंतर्गत आने वाली रचनाएं कथा और शिल्प की दृष्टि से प्रेमचंद की कहानियों से काफी भिन्न होते हुए भी वास्तव में प्रेमचंद की परम्परा से विचलन का साक्ष्य नहीं बनतीं, बल्कि उसी के एक परिवर्तित रूप का, उसके विकास की एक कड़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं। ‘नयी कहानी’ के स्वस्थ रूप में भी जो कमजोरियां बची रहती हैं, उनका जिक्र मैं अपने अगले सत्र में करूंगा, परन्तु ‘नयी कहानी’ के हमारे मूल्यांकन में जो अंतर है, उसकी ओर मैं यहां संकेत करना चाहता हूं।

प्रेमचंद से हटने वाली ‘नयी कहानी’ की दो धाराओं में (आधुनिकतावादी प्रवृत्ति के प्रभाव की मात्रा के कारण) जो अंतर है, उसे पहचानते हुए भी आप उस पर विशेष बल नहीं दे पाते, क्योंकि आपके नजरिए के मुताबिक प्रमुख बात है, आठवें दशक की कहानी को ‘नयी कहानी’ और ‘अकहानी’ दोनों से इस  आधार पर अलगाना कि इन दोनों में ही आठवें दशक की कहानी की तुलना में प्रेमचंद की कहानी से ज्यादा दूरी मौजूद है। लेकिन ‘नयी कहानी’ का एक बड़ा हिस्सा (अपनी कुछ कमजोरियों के बावजूद) प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा को अपने समय की जरूरतों के मुताबिक ढालने वाला वैसा ही सार्थक प्रयास लगता है, जैसा आठवें दशक की कहानी का वह प्रमुख भाग, जिसे हम जनवादी कहानी की संज्ञा देते हैं। ‘नयी कहानी’ की दो धाराओं के चरित्र में इस प्रकार के आधारभूत अंतर पर यथेष्ट बल देने के बाद ही हम यह अच्छी तरह पहचान सकते हैं कि ‘दोपहर का भोजन’, ‘चीफ की दावत’, ‘बदबू’, ‘उस्ताद’, ‘कल्यानमन’, ‘टूटना’ जैसी रचनाएं किस प्रकार प्रेमचंद की ‘सद्गति’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘नमक का दारोगा’ या ‘बड़े घर की बेटी’ जैसी कहानियों से काफी भिन्न होते हुए भी उसी यथार्थवादी कहानी-परम्परा के विकास की अगली कड़ी के अंतर्गत आती हैं, जबकि ‘परिन्दे’ जैसी कहानियां (मोहन राकेश तथा कमलेश्वर की बहुत-सी कहानियां भी) अज्ञेय की आधुनिकतावादी परम्परा की रचनाएं हैं। ‘नयी कहानी’ का एक बड़ा हिस्सा प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा का अनिवार्य अंग है और इस दृष्टि से आठवेंं दशक की जनवादी कहानी से, जो उसी परम्परा के विकास के अगले पड़ाव को  व्यक्त करती है, गहरे में जुड़ा  हुआ है। इस बात को स्वीकार कर लेने के बाद ‘नयी कहानी’ को प्रभामंडित करके उसे आठवें दशक की कहानी को पीटने के लिए औजार की तरह इस्तेमाल करने वाले आलोचकों से आपकी काफी बहस दूसरों को ज्यादा संतुलित लगने लगेगी और आठवें दशक की कहानी के बारे में आपकी स्थापनाएं भी उनके लिए ज्यादा स्वीकार्य हो जाएंगी।

आपकी स्थापनाओं से मेरा मतभेद और बात पर भी अभी तक बना हुआ है। मुझे लगता है कि आप अस्सी के दशक की कहानियों को प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा के विकास के उस पड़ाव के अंतर्गत लेते हैं, जिसका प्रतिनिधित्व आठवें दशक की कहानी कर रही है, जबकि मैं नवें दशक की कहानी को आठवें दशक की कहानी से अलग करके देखना चाहता हूं। इस विषय पर मैं यहां और कुछ नहीं नहीं कहना चाहता, क्योंकि उससे पहले आठवें दशक के दौरान आए उस बदलाव की चर्चा करना जरूरी समझता हूं, जिसके कारण हिन्दी कहानी की यथार्थवादी परम्परा के विकास की प्रक्रिया के अंतर्गत उभरकर आने वाले इस नए पड़ाव को बखूबी समझा जा सके और जनवादी अथवा प्रतिबद्ध कहानी की प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित किया जा सके। मोटे तौर पर इस बदलाव के बारे में हम यही कह सकते हैं कि यह आदर्शों और बाह्य परिवेश के बीच के अलगाव को लगभग उसी रूप में ग्रहण करते हुए, जिस रूप में ‘नयी कहानी’ के समय इसे पहचाना गया था, एक खास बिन्दु तक पहुंचने के बाद, उसे स्थायी नियति की तरह झेलते रहने के बजाए, निर्णायक हस्तक्षेप द्वारा उसे खत्म करने के संकल्प में व्यक्त होता है। मध्यवर्ग के एक बड़े भाग ने मूल्यों और आदर्शों के आधे-अधूरे अथवा नाममात्र के क्रियान्वयन से तंग आकर उन आदर्शों को सामाजिक जीवन में मूर्त रूप देने के लिए अपने-आपको कृतसंकल्प पाया। जनतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के लिए सामाजिक रूपांतरण की आवश्यकता को शिद्दत के साथ महसूस करने वाले मध्यवर्गीय तत्वों को उस समय यह भी अहसास हुआ कि इस संघर्ष में कामयाबी को सुनिश्चित करने के लिए इन्हें मेहनतकश जनता की तरफदारी करनी पड़ेगी और उसकी सोयी हुई ताकत को जगाकर उसे सामूहिक संघर्ष की भूमिका अदा करने के लिए तैयार करना पड़ेगा।

इस दौर की कहानी को ‘जनवादी कहानी’ का नाम देना इसलिए उचित होगा, क्योंकि इसके माध्यम से व्यक्त होने वाली रचनाशीलता ने आजादी की लड़ाई से विरासत में मिले जनतांत्रिक मूल्यों को संघर्ष के जरिए सामाजिक जीवन में स्थापित करने के काम को एक अनिवार्य दायित्व के रूप में स्वीकार किया। स्वतंत्रता आंदोलन के संकल्प जिस प्रकार प्रेमचंद की रचनात्मक चिंता के केंद्र में थे, उसी तरह वे आठवें दशक की कहानी कें केंद्र में भी दिखायी देते हैं, लेकिन इन संकल्पों को रचना के केंद्र में लाने के लिए अब यह जरूरी हो गया कि आधुनिकतावादी प्रवृत्ति ने पिछले दिनों जो भटकाव पैदा कर दिए थे, उनसे सभी संवेदनशील लोगों को मुक्त कराया जाए और परिस्थितियों को बदल डालने की क्षमता में जो अविश्वास उसने हमारे अंदर पैदा कर दिया था, उसे दूर किया जाए। आठवें दशक की जनवादी कहानी में बौद्धिक दृष्टिकोण की सुस्पष्टता और सामूहिक संघर्ष की आवश्यकता और उसकी संभावना में दृढ़ विश्वास विशेष तौर पर दिखायी देते हैं। आठवें दशक की कहानी में राजनीति पर जो अतिरिक्त  बल दिया जाता है, उसे भी हम इसी संदर्भ में ठीक प्रकार समझ सकते हैं।

सामाजिक रूपांतरण में सत्ता के लिए विभिन्न वर्गों द्वारा की जाने वाली कशमकश का विशेष स्थान होता है। आठवें दशक की कहानी क्योंकि सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया पर विशेष रूप से बल देती है, इसीलिए जाहिर है, वहां राजनीति से जुड़े हुए मुद्दे अतिरिक्त महत्व अख्तियार कर लेंगे। स्थापित व्यवस्था का व्यंग्यपूर्ण विश्लेषण जो ‘नयी कहानी’ में भी किया जाता था, पर वहां यह अपनी अस्मिता की पहचान को तीखा करने का ही एक जरिया था। आठवें दशक की कहानी में इस प्रकार का  विश्लेषण संघर्ष के लिए की जाने वाली तैयारी का एक अनिवार्य अंग बनकर सामने आया है। दृष्टिकोण की सुस्पष्टता और राजनीतिक प्रतिबद्धता पर विशेष बल इस प्रकार आठवें दशक की जनवादी कहानी की दो प्रमुख विशेषताएं नजर आने लगीं। इन्हीं दो विशेषताओं के कारण आठवें दशक की कहानी को कुछ लोग ‘प्रतिबद्ध कहानी’ की संज्ञा भी दे देते हैं।

इस दृष्टि से आठवें दशक की कहानी ‘नयी कहानी’ की तुलना मेंं प्रेमचंद की कहानी के ज्यादा करीब नजर आ सकती है। लेकिन आठवें दशक की ‘जनवादी कहानी’ दरअसल यथार्थवादी साहित्य परम्परा की विकास-प्रक्रिया के उस पड़ाव को नकारकर, जिसका प्रतिनिधित्व ‘नयी कहानी’ करती है, वापिस प्रेमचंद के बिन्दू पर नहीं पहुंच पाती। उसी परम्परा की विकास-प्रक्रिया के अगले पड़ाव की ही यहां अभिव्यक्ति होती है। अगर गौर से देखें तो कुछ अर्थों में आठवें दशक की कहानी ‘नयी कहानी’ की अनेकों ऐसी विशेषताओं को समेट कर चलती है, जो प्रेमचंद की कहानी में मौजूद ही नहीं थीं। दूसरे शब्दों में कहें तो जहां एक ओर यह बात सही है कि आठवें दशक की कहानी ‘नयी कहानी’ और ‘अकहानी’ के जरिए उभरी प्रेमचंद से दूर जाने की प्रवृत्ति का विरोध करते हुए फिर से प्रेमचंद की ओर मुड़ती है, वहां यह भी सही है कि ऐसी अनेक विशेषताएं, जिनके आधार पर ‘नयी कहानी’ को प्रेमचंद की कहानी से अलगाया जाता है, आठवें दशक की कहानी में भी मौजूद रहती हैं और वे विशेषताएं उसकी संरचना का अनिवार्य अंग हैं, कोरी मिलावट नहीं।

‘नयी कहानी’ और आठवें दशक की कहानी की यह निरंतरता तब कहीं ज्यादा स्पष्ट होकर सामने आती है, जब नवें दशक की कहानी की आठवें दशक की कहानी से भिन्नता को हम समझने की कोशिश करते हैं। आठवें दशक की कहानी के बारे में आपकी स्थापनाओं में उसके पहलू पर विशेष बल नहीं दिया जाता। इस मुद्दे पर हमारे बीच मतभेद की काफी गुंजाइश है, पर इसके बारे में मैं अपने अगले पत्र में विस्तार से लिखूंगा। लंबे खिंचते चले जा रहे इस पत्र को तो केवल इस बात की याद दिलाकर समाप्त करता हूं कि जिस प्रकार छठे दशक की कहानी के भीतर अलग-अलग धाराएं हैं, वैसे ही सातवें, आठवें और नवें दशक में उभरकर आने वाले कहानी आंदोलनों में भी कुछ आंतरिक भिन्नताएं मौजूद हैं, जिन्हें पहचानने की हमें कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि दो परस्पर विरोधी परम्पराओं के बीच निरंतर चल रहे टकराव का प्रतिफलन अलग-अलग समय पर भिन्न-भिन्न रूपों में होता है और किसी भी रचनाकार की रचनाशीलता एक ही परम्परा की ताकत को शुद्ध रूप में व्यक्त करती हो और विरोधी परम्परा के प्रभावों से पूर्णत: मुक्त हो, इसकी कल्पना करना काफी कठिन है। उदाहरण के लिए आठवें दशक की जनवादी कहानी के साथ-साथ समांतर कहानी आंदोलन भी चल रहा था और आठवें दशक के रचनाकारों में दोनों कहानी आंदोलनों का प्र्रभाव दिखायी दे सकता है, यद्यपि अलग-अलग लेखकों की रचनाओं में पाए जाने वाले प्रभावों में मात्रा और अनुपात की दृष्टि से गुणात्मक अंतर भी होता है।

शेष अगले पत्र में।

सोवियत यूनियन में आजकल जो कुछ हो रहा है, वह एक अत्यंत गंभीर मसला है। उसे देखकर पीड़ा होती है। इससे हमारे सामने नयी चुनौतियां भी खड़ी हो गयी हैं, पर इसके बारे में अलग से चर्चा करना उपयुक्त होगा।

आपका

ओम प्रकाश ग्रेवाल


ई-16, यूनिवर्सिटी कैम्पस,

कुरुक्षेत्र (हरियाणा)-132119

29 सितम्बर 1991

प्रिय भाई रमेश,

            आपका पत्र। आप जिस गंभीर रुचि के साथ कहानी के बारे में चल रही इस बातचीत को आगे बढ़ा रहे हैं, उससे मुझे बड़ी खुशी हुई है। पिछले पत्र में जिन दो मुद्दों के बारे में-‘नयी कहानी’ की कमजोरियों तथा आठवें और नवें दशक की कहानियों की भिन्नता के बारे में-आगे कुछ कहने का वायदा किया था, उन्हें यहां उठाने से पहले मैं पिछले पत्र में कही गयी बातों के बारे में छोटा-सा स्पष्टीकरण देना चाहता हूं।

आपकी प्रतिक्रिया से मुझेे लगा कि मैं अपनी बात को ठीक  तरह नहीं रख  सकता। ‘नयी कहानी’ को मैं यथार्थवादी कहानी परम्परा की एकमात्र श्रेष्ठ अभिव्यक्ति नहीं मानता और न ही मेरी ऐसी धारणा है कि कहानी के क्षेत्र में यथार्थवाद की शुरुआत ‘नयी कहानी’ से होती है। हिन्दी कहानी की यथार्थवादी परम्परा प्रेमचंद ने भले ही शुरू न की हो, पर पूरी ताकत के साथ उसे स्थापित करने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। यह परम्परा पे्रमचंद के बाद भी बनी रहती है। इसके विकास के कई पड़ाव हैं और इनमें कुछ उतार-चढ़ाव भी हमें नजर आते हैं। हिन्दी कहानी की यथार्थवादी परम्परा के विकास की एक कड़ी के अंतर्गत ‘नयी कहानी’ का एक काफी बड़ा हिस्सा भी आता है, यद्यपि ‘नयी कहानी’ की श्रेष्ठतम अभिव्यक्तियों में भी कुछ ऐसी कमजोरियां मौजूद रहती हैं, जो प्रेमचंद के युग की यथार्थवादी कहानी में लगभग गायब थीं। इतना भर मैंने जरूर कहा था और मैं यह मानकर चला था कि इन स्थापनाओं में आपको कोई विशेष आपत्तिजनक बात नजर नहीं आएगी। हिन्दी कहानी की यथार्थवादी परम्परा को प्रेमचंद के नाम के साथ जोड़ देने का यह मतलब मैं हरगिज नहीं लगाता कि उनकी कहानी को हम एक ऐसे आदर्श के रूप में स्वीकार कर लें, जिसके अनुरूप आगे आने वाले सभी लेखकों की रचनाशीलता को ढलना है।

परम्परा विकसित होती है, उसमें नए पड़ाव आते हैं, नयी रचनाशीलता अपने समय के यथार्थ के साथ अपने ढंग से टकराते हुए उसमें नये आयाम जोड़ती है, यह सब मैं जानता हूं। शायद इसे मानने में आपको भी कोई विशेष आपत्ति न हो। जैसा आपने स्वयं कहा है, विकास का मतलब ही है निरंतरता में परिवर्तन और परिवर्तन में निरंतरता। लेकिन यहां आकर जरा गौर करने पर हमारी अवधारणा में कुछ अंतर अवश्य दिखायी देने लगता है। परम्परा जीवित कैसे रहती है, इसके बारे में, लगता है, हमारी अवधारणाएं एक जैसी नहीं हैं। आप मानते हैं कि परम्परा कभी-कभी दब जाती है और फिर उपयुक्त परिस्थितियां पाकर उभर आती है, लेकिन अटूट रहती है, कभी टूटती या मरती नहीं। उसके रूप बदलते हैं, पर इस बदलाव के चलते भी वह अपने मूल चरित्र में कायम रहती है। इसका अगर यह मतलब है कि किसी भी परम्परा के प्रभाव में उतार-चढ़ाव भले ही आते रहते हों, पर उसका अस्तित्व लंबे समय तक बना रहता है, तो इससे जैसा मैंने ऊपर भी कहा है, मैं सहमत हूं; पर यदि हम यह मानकर चलते हैं कि परम्परा की केवल बाह्य अभिव्यक्तियों में ही बदलाव आता है और उसका सारतत्व या असली चरित्र ऐसी आत्मा की तरह है, जो बार-बार शरीर बदलती रहती है, पर अगले मूल चरित्र मेंं ज्यों की त्यों बनी रहती है, तो इससे मैं सहमत नहीं हूं। परम्परा की इस प्रकार की आधारभूत स्थिरता को मैं स्वीकार नहीं करता।

हर परम्परा के विकास में कई ऐसे पड़ाव होते हैं, जहां पहले पड़ाव की तुलना में उसमें गुणात्मक भिन्नताएं आ जाती हैं। ऐसे बिन्दुओं पर उसकी अभिव्यक्ति की सतह पर ही नहीं, उसके अस्तित्व की संरचना में भी बदलाव आ जाता है, उसके सारतत्व में भी गुणात्मक भिन्नताएं आ जाती हैं, यद्यपि उसके समग्र चरित्र की विशिष्टता फिर भी बनी रहती है। (साहित्य की परम्परा के संदर्भ में यह निरंतरता बनी रहती है दिशा अथवा दृष्टिकोण में, प्रतिबद्धताओं में और कुछ ऐसे प्रमुख सवालों में जो काफी समय तक पूरी तरह निपटाए नहीं जाते, ‘रिजॉल्व’ नहीं होते, यद्यपि इन सवालों के बीच विद्यमान आपसी रिश्तों में भले ही कुछ बदलाव आ जाता हो और उनमें से किसी का आनुपातिक महत्व कुछ कम हो जाता हो और दूसरे का कुछ ज्यादा, पर यह बदलाव ही मिट जाए।) दूसरे शब्दों में, किसी परम्परा में निरंतरता और बदलाव दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं और एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। निरंतरता में परिवर्तन और परिवर्तन में निरंतरता कहने भर से काम नहीं चलता, क्योंकि किसी भी परम्परा के विकास के सोपानों या पड़ावों या विभिन्न कालखंडों में उसके अस्तित्व की आधारभूत विशिष्टताओं को हमें पहचानना होता है। परम्परा के विकास के दौरान कुछ बिन्दू ऐसे होते हैं, जहां बदलाव इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि नया पड़ाव एक नयी शुरुआत लगने लगता है, एक नया अध्याय-सा खुल गया लगता है। इन भिन्नताओं और विशिष्टताओं की प्रखर पहचान बनाकर उन्हें व्याख्यायित करने की कोशिश यदि हम नहीं करते, तो यह अंदेशा पैदा हो जाता है कि परम्परा के विकास की हमारी परिकल्पना कुछ धुंधली न पड़ जाए।

मैं यह मानकर चलता हूं कि हिन्दी कहानी की यथार्थवादी परम्परा के विकास में आजादी के बाद तीन विशिष्ट पड़ाव आए हैं। हर नया पड़ाव एक दशक के साथ एकदम शुरू होता हो और उसी की समाप्ति के साथ खत्म हो जाता हो, ऐसा मैं नहीं मानता। पड़ाव में गुणात्मक भिन्नता का निहितार्थ तो होता है, पर विभाजन रेखाएं स्पष्ट और सरल हों, यह जरूरी नहीं। दशकवाद का कायल मैं अपने-आपको नहीं समझता, लेकिन परम्परा अपने प्राथमिक चरित्र में ज्यों की त्यों बनी रहती है और उसका रूप व की तरह बदलता रहता है, यह भी मैं नहीं मानता। साहित्य की यथार्थवादी परम्परा के साथ-साथ भुलावा देने वाले, वायवी और जादू-भरे साहित्य की एक प्रतिक्रियावादी परम्परा भी है और उसका कुल चरित्र तथा उसकी दिशा यथार्थवादी साहित्य की परम्परा के विरुद्ध बनी रहती है, यह मैं स्वीकार करता हूं और इसकी भी अपनी विकास-प्रक्रिया है, इसके अपने पड़ाव हैं, यह भी मैं मानकर चलता हूं। हिन्दी कहानी की विकास यात्रा की चर्चा करते समय हमारा ध्यान मुख्यत: यथार्थवादी परम्परा पर ही केंद्रित रहता है और दूसरी परम्परा का जिक्र तभी आता है, जब यह देखना हो कि यथार्थवादी परम्परा के विकास को वह किस रूप में और कहां तक प्रभावित कर रही है। साहित्य की इस प्रतिकूल परम्परा के विकास-क्रम को पहचानने की मेरी क्षमता यथार्थवादी परम्परा के विकास के चरणों को समझ पाने की तुलना में काफी कम है; यह मैं स्वीकार करता हूं, यद्यपि कहानी की यथार्थवादी परम्परा की विकास-प्रक्रिया को समझने के प्रयासों में भी अभी पर्याप्त सफलता नहीं मिली है। ‘विकास’ से मेरा क्या मतलब है, इसके बारे में एक वाक्य में अपनी बात कहकर इस स्पष्टीकरण को मैं यही समाप्त करता हूं। विकास का अर्थ श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर होते जाने का सिलसिला न होकर क्रमबद्ध और नियमों के अनुसार होने वाला ऐसा बदलाव है, जिसमें निरंतरता और बदलाव दोनोंं ही महत्वपूर्ण हैं।

अपने पिछले पत्र में छठे दशक की कहानी के उभार के पीछे काम कर रही मानसिकता का जिक्र करते हुए मैंने कहा था कि उस समय लेखकों ने (परिस्थितियों में आए एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर प्रतिक्रियास्वरूप) विरासत में मिले जनतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों को बाहर की दुनिया से अलग करके अपने मन की दुनिया में समेट लिया और उन आदर्शों के इस अभ्यंतरीकृत रूप को मानक की तरह इस्तेमाल करते हुए अपने सामाजिक परिवेश की ओर बाहर खड़े होकर देखने वाले एक द्रष्टा का रुख अपनाकर पीड़ा अथवा व्यंग्य की मुद्रा में (या फिर पीड़ामिश्रित व्यंग्य के साथ) उसका चित्रण-विवेचन  प्रस्तुत करना आरंभ कर दिया। ‘नयी कहानी’ की अधिकांश कमजोरियों का इस प्रकार के बेबस अलगाव के रुख के साथ गहरा संबंध है। ‘नयी कहानी’ की आलोचना करते समय आपने उसकी ‘अनुभववादी रचना-पद्धति’ पर ठीक ही उंगली रखी है। ‘नयी कहानी’ की शक्ति और सीमाएं, दोनों ही उसके अंदर अनिवार्य रूप से (उसकी संरचनात्मक विशेषता के तौर पर) व्याप्त अनुभववाद से तय होती हैं। अनुभववादी रचना-पद्धति जिस मानसिकता के साथ जुड़ी हुई है, उससे आधुनिकतावादी रुझान का आसानी से मेल खा जाता है, यद्यपि यह जरूरी नहीं है कि ऐसी पद्धति से जुड़ी हर रचना का चरित्र प्रमुखत: आधुनिकतावादी हो। अनुभववाद की यह विशेषता है कि यहां सामाजिक  यथार्थ का (जिससे व्यक्ति और उसका बाह्य परिवेश दोनों शामिल हैं) किंचित् स्थिरीकरण हो जाता है। जिस प्रक्रिया के तहत सामाजिक यथार्थ में बदलाव आता है, वह अनुभववाद के अंतर्गत एक ऐसे बिन्दू पर अटक जाती है, जो अक्सर नाजुक भी होता है और ठहरा हुआ भी लगता है। अनुभववाद के चलते सामाजिक यथार्थ का वर्तमान रूप हमारी चेतना पर इतना हावी होता है कि उसके भूत और भविष्य के आयाम उसी हद तक पहचाने जा सकते हैं जहां तक सामाजिक विकास-प्रक्रिया के स्थिरीकृत रूप में उनकी झलक मिल सकती हो। छठे दशक में जनतांत्रिक मूल्यों के वाहक  मध्यवर्ग के संवेदनशील तत्वों द्वारा झेली जा रही बेबस अलगाव की मानसिकता ने स्वतंत्रता आंदोलन के पूरे दौर की एक आदृर्शीकृत छवि उनके मानसपटल पर इस तरह अंकित कर दी, जिससे वस्तुपरक धरातल पर जनतांत्रिक मूल्यों के सामाजिक विकास की समूची प्रक्रिया का वर्तमान में रिश्ता उसी बिन्दू पर स्थिर हो गया, जहां पर सामाजिक परिवेश से उनकी यह अलगाव की भावना पैदा हुई थी। इससे जनतांत्रिक मूल्यों की उनकी परिकल्पना पूरी तरह इतिहास निरपेक्ष तो नहीं हुई, पर इनकी इतिहास-सापेक्षता की पहचान कुछ धुंधली जरूर हो गई। जहां कहीं इन मूल्यों की परिकल्पना मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक रूपों में इतनी ज्यादा ढल गयी कि उनका सामाजिक पक्ष लगभग गायब हो गया, वहां अनुभववाद का आधुनिकतावादी संस्करण सामने आया। लेकिन अनुभववादी स्थिरीकरण के बाद भी बहुत सारे लेखकों की मूल्य-चेतना में उनका सामाजिक पक्ष काफी हद तक बना रहा, जिसके कारण वे प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा से जुड़े रहे। अगर हम यह याद रखें कि सामाजिक यथार्थ का अनुभववादी अधिग्रहण भाववादी दृष्टिकोण का सूचक भी हो सकता है और भौतिकवादी दृष्टिकोण का भी, तो ‘नयी कहानी’ के भीतर चल रही दो धाराओं की अलग-अलग विशिष्टताओं को पहचानने में मदद मिलेगी।

अनुभववाद की अनिवार्य सीमा उसकी गैर-द्वंद्धात्मकता है न कि गैर-भौतिकवादिता। इसीलिए अनुभववाद के गैर-द्वंद्धात्मक भौतिकवादी संरक्षण भी मिलते हैं और गैर-द्वंद्धात्मक भाववादी संस्करण भी। बूज्र्वा चिंतन की सीमाओं के अंतर्गत विकसित होने वाला भौतिकवादी अनुभववाद की मिसाल पेश करते हैं। वैसे यह बात हमें स्वीकार कर लेनी चाहिए कि भौतिकवादी अनुभववाद के मूल मेें भी भाववाद सूक्ष्म रूपों में छिपा रहता है (यह बात मार्क्स द्वारा किए गए फ्योरबाख के भौतिकवाद की सीमाओं के विवेचन में स्पष्ट होती है।) इस प्रकार अनुभववाद की पहली मुख्य सीमा जिसके आलोक में प्रेमचद की यथार्थवादी परम्परा में आने वाले ‘नयी कहानी’ के हिस्से की कमजोरियों को समझा जा सकता है, हुई उसकी गैर-द्वंद्धात्मकता। इससे ऐतिहासिक विकास और सामाजिक बदलाव की प्रक्रियाओं के बारे में ‘नयी कहानी’ के लेखकों की समझ कमजोर, गैर-भरोसेमंद या फिर कभी-कभी एकदम भ्रांतिपूर्ण भी हो सकती है। पीछे के इतिहास के बारे में नॉस्टेल्जिया की धुंध और आगे के विकास के बारे में  गैर-आश्वस्ति इस दौर की अच्छी कहानियों में भी हम अक्सर देख सकते हैं।

अनुभववाद की दूसरी सीमा है अनुभवकर्ता व्यक्ति और उसकी परिस्थितियों के बीच ऐसा स्थायी अलगाव जिसके अंतर्गत वे दोनों एक ही समुच्चय के दो विशिष्ट किन्तु अविभाज्य पक्ष न रहकर आमने-सामने खड़ी और एक-दूसरे को बाहर से प्रभावित कर रही अलग-अलग सत्ताएं बन जाते हैं। इस प्रकार की अनुभववादी परिकल्पना के कारण व्यक्ति और समाज के आपसी रिश्तों की पकड़ कई बार काफी धुंधली और सरलीकृत हो जाती है। भौतिकवादी अनुभववाद में यह ताकत तो बनी रहती है कि बाहर की दुनिया के बारे में तथा व्यक्ति के अंदर मौजूद दुनिया के बारे में सूक्ष्म से सूक्ष्म बारीकियों पर नजर गड़ा दी जाए और स्थिति के चित्रण में विशिष्टताओं की इतनी बहुतायत हो कि वह सघन मूर्तता का आभास देने लगे (इसे आपने अपने पत्र में ‘नयी कहानी’ का ‘प्रकृतवाद’ कहा है) इसके साथ ही अंदर और बाहर की दुनिया के अन्तर्विरोध को भी यहां काफी पैने और सघन रूप में पेश किया जा सकता है, लेकिन इस सबके बावजूद व्यक्ति की मानसिकता के वस्तुपरक सामाजिक कारकों की पहचान और सामाजिक परिस्थितियों को मौजूदा रूप देने के लिए किए गए व्यक्तियों और समूहों के संघर्षों की पहचान वहां कुछ झिलमिल अथवा कमजोर रूप में ही उभरकर आएगी।

इसके अलावा अनुभववाद की गैर-द्वंद्धात्मकता अथवा सामाजिक यथार्थ के स्थिरीकरण से एक बड़ी समस्या यह पैदा होती है कि लेखक अपनी चेतना में व्याप्त मूल्यों और आदर्शों को लगभग उसी रूप में अंतिम और पूर्ण मान लेता है, जिस रूप में वे वहां मौजूद हैं। उनका वास्तविक सारतत्व कितना ठोस है,इसे आंकना बड़ा कठिन हो जाता है। ऐसा करने के लिए एक तो यह जानना जरूरी है कि जिस वस्तुपरक रूप में ये मूल्य और आदर्श अनुभव करने वाले व्यक्ति को उपलब्ध थे, उन्हें ग्रहण करने में, अपनी चेतना के भीतर उन्हें समेटने में, उसने उनमें से क्या कुछ छोड़ दिया है और कितना-कुछ बदल दिया है। व्यक्ति द्वारा अधिग्रहण की क्रिया में इन मूल्यों और आदर्शों में आ जाने वाली इन अपर्याप्ताओं, रिक्तियों और विकृतियों को पहचानने के लिए जरूरी है कि उसकी चेतना की परिधि से बाहर निकलकर समाज के साथ उसके रिश्ते की उन विशिष्टताओं, समाज में उसकी भागीदारी की उन शर्तों, उसके दृष्टिकोण के उन आग्रहों-दुराग्रहों की जानकारी हासिल की जाए, जिनसे वे (विकृतियां, अपर्याप्तताएं आदि) पैदा हो रही हैं। अनुभववाद के चलते व्यक्ति की चेतना की परिधि से बाहर निकलकर मूल्यों और आदर्शों की उसकी परिकल्पना में से मनोगत तत्वों को इस प्रकार हटाकर उनके वस्तुपरक स्वरूप को पहचान लेना संभव नहीं होता। चेतना में उपस्थित मूल्यों और आदर्शों की परिकल्पना में से मनोगत पक्ष को हटा देने के बाद उनका जो वस्तुपरक स्वरूप बचा रहता है। वह दरअसल सामाजिक जीवन की विकास-प्रक्रिया की उपज होता है। इन मूल्यों और आदर्शों के वस्तुपरक स्वरूप में कितना ठोस सारतत्व है, यह जानने के लिए उन सामाजिक शक्तियों की ओर ध्यान देना होता है जो अपने संघर्षों के जरिए इनमें ठोस सारतत्व भर रही हैं और उन्हें भौतिक शक्ति का रूप दे रही हैं। इन सामाजिक शक्तियों के संघर्षों  की स्थिति को जानने के बाद ही हम यह अंदाजा लगा सकते हैं कि चर्चित आदर्शों और मूल्यों के वस्तुपरक स्वरूप में ठोस सारतत्व की मात्रा कितनी है। लेकिन अनुभववाद की यह सीमा है कि मूल्यों और आदर्शों को यहां लगभग उसी रूप में ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाता है, जिस रूप में वे व्यक्ति की चेतना मेें मौजूद हैं और उन्हें मूर्त रूप देने वाली सामाजिक शक्तियों के संघर्षों की ओर ध्यान देकर उनके सारतत्व को आंकने की यहां विशेष कोशिश नहीं की जा सकती। इस प्रकार मूल्य-चेतना में विभिन्न प्रकार की आंतरिक कमजोरियों को पकड़ पाना किसी अनुभववादी के लिए प्राय: संभव नहीं होता।

‘नयी कहानी’ में आजादी से विरासत में मिले मूल्यों और आदर्शों की परिकल्पना में इस प्रकार की कमजोरियां अगर व्याप्त थीं, तो अनुभववाद के चलते उन्हें पकड़ा नहीं जा सकता था। जो कमजोरियां भावुकतावश आ गर्इं, नजरिये के अमूर्तन से पैदा हो गयी, उन्हें भी तथा सामाजिक शक्तियों के संघर्ष के अधूरेपन के कारण इन मूल्यों के ठोस सारतत्व की जो सीमाएं बनी रह गयी थीं, उन्हें भी, ठीक-ठीक पहचानना संभव नहीं था। ‘नयी कहानी’ आंदोलन के अंतर्गत शरीक उन रचनाकारों की कहानियों में व्यक्त होने वाले जनतांत्रिक मूल्यों का ठोस सारतत्व निस्बतन काफी अधिक था, जो उसके यथार्थवादी हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं, क्योंकि विरासत में मिले इन मूल्यों के जिस वस्तुपरक स्वरूप को उन्होंने ग्रहण किया, उसके पीछे आजादी के लिए चलाए गए संघर्ष का वह रूप मौजूद था, जिसमें किसानों, गरीब जनता के दूसरे कमजोर तबकों, अल्पसंख्यकोंं तथा महिलाओं के सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक सवाल शामिल थे। अनुभवाद की कुछ सामान्य कमजोरियों के बावजूद प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा से जुड़े हुए ‘नयी कहानी’ के इन रचनाकारों और आधुनिकतावादियों की कहानियोंं में दो आधारों पर गुणात्मक अंतर आ जाता है-एक तो उनका अनुभववाद कुल मिलाकर भौतिकवादी दृष्टिकोण से संगति रखता है, दूसरे, विरासत में मिले जनतांत्रिक मूल्यों का सारतत्व वहां अधिक ठोस है। इस दूसरे अंतर के कारण ‘अभिजनवाद’ की जिस कमजोरी का आपने ‘नयी कहानी’ के संदर्भ में जिक्र किया है, वह यहां पूरी तरह गायब न होते हुए भी आधुनिकतावादी कहानीकारों की तुलना में बहुत कम है। जनतांत्रिक मूल्यों के जिस वस्तुपरक स्वरूप को अमरकांत, शेखर जोशी, भीष्म साहनी, मार्कण्डेय और राजेंद्र यादव जैसे लेखक अपनी अधिकांश रचनाओं में मानक के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, उसके आधार पर वे मध्यवर्गीय तत्वों के अभिजनवादी रुझानों पर करारी चोट करते हैं। ‘चीफ की दावत’ हो या ‘डिप्टी कलक्टरी’, ‘हत्यारे’ हो या ‘दाज्यू’, ‘बदबू’ हो या ‘टूटना’ अभिजनवाद पर व्यंग्य करने वाली रचनाओं के रूप में ही हमारे सामने आती हैं।

मुक्तिबोध ने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में स्पष्ट रूप से कहा है कि पचास के दशक में मध्यवर्ग के लोगों के सामने यह एक आधारभूत सवाल था कि वे तय करें कि उन्हें आम जनता के साथ रहना है या अभिजात तत्चों की ओर जाना है। पक्षधरता के इसी सवाल से ‘नयी कहानी’ की दो धाराओं के कुल चरित्र का भेद काफी हद तक तय होता है। आठवें दशक के जनवादी कहानीकारों ने पक्षधरता के सवाल पर ज्यादा पुख्ता तरीके से जोर देकर बहुत सारे पुराने कहानीकारों के आधुनिकतावाद से ढीले-ढाले विरोध को अधिक धार दे दी। शायद इसीलिए उन्हें ‘नयी कहानी’ के अंतर्गत आने वाले आम जनता के पक्षधर रचनाकारों की कहानियों में अभिजनवाद का लेशमात्र भी प्रभाव सहनीय नहीं रहा। उन्हें लगा कि इस मामले में अपने ढीले-ढालेपन के कारण ही वे आधुनिकतावादी अभिजात्य से सुसंगत रूप में टक्कर नहीं ले सके, बल्कि उनमें से कुछ तो कहीं गहरे में उससे काफी हद तक आतंकित भी रहे। इस ढीले-ढालेपन के मूल में सीधे-सीधे ‘नयी कहानी’ के स्वस्थ भाग का अनुभववाद नहीं था, बल्कि उसका असली कारण विरासत में मिले जनतांत्रिक मूल्यों के वस्तुपरक स्वरूप में मौजूद वे कमजोरियां थीं, जिनकी बदौलत साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष में आम जनता को एकजुट करते समय अलग-अलग वर्गों के लोगों के हितों की आपसी टकराहट को पीछे धकेल दिया गया था और गरीब जनता के  सामंती और पंूजीवादी तत्वों द्वारा उत्पीड़न और शोषण से जुड़े सवालों को उनका कोई न कोई आदर्शवादी हल ढूंढ निकालने की सदिच्छा के नीचे ढांप दिया गया था। आजादी की लड़ाई के दौरान जनता की साम्राज्यवाद के विरुद्ध व्यापक एकता की जरूरत ने इन विरोधों की तात्कालिक प्रासंगिकता के अहसास को कुछ धीमा बना दिया था, यद्यपि प्रेमचंद जैसे समर्थ लेखकों की रचनाधर्मिता की विकास-प्रक्रिया मेंं इस धुंध को काफी हद तक छांटते हुए उस दौरान भी हम देख सकते हैं। लेकिन पचास के दशक में आकर विरासत में मिले जनतांत्रिक मूल्यों की यह आंतरिक कमजोरी ज्यादा खटकने लगी थी और इसे दूर किए बिना रचनाकारों की सामाजिक यथार्थ से टकराहट के पैने होने में काफी रुकावट पड़ रही थी।

‘नयी कहानी’ के अंतर्गत आने वाले रचनाकारों के अनुभववाद ने इस कमजोरी को पहचानने या इसे दूर करने की जरूरत को समझने में दिक्कत पैदा की। आठवें दशक की जनवादी कहानी ने एक सुचिंतित और सुस्पष्ट परिप्रेक्ष्य अपनाकर जनतांत्रिक मूल्यों की हमारी परिकल्पना में मौजूद वर्ग-हितों की टकराहट के सवाल को पीछे धकेलने और ढांपे रखने वाली प्रवृत्ति का सायास विरोध किया और कम से कम चेतना की ऊपरी परतों में तो इसे लगभग समाप्त ही कर दिया। सामाजिक यथार्थ के वर्गीय अंतर्विरोधों के साक्षात्कार की दृष्टि से इसीलिए हमें यहां प्रेमचंद की कहानियों की-सी स्पष्टता ‘नयी कहानी’ की तुलना में कहीं ज्यादा नजर आती है। वैसे यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि आठवें दशक की जनवादी कहानी की कमजोरियों को समझने के लिए भी हमें यह देखना पड़ेगा कि जनतांत्रिक मूल्यों की लेखकों की परिकल्पना इस समय पहले से कहीं ज्यादा ठोस होते हुए उतनी ठोस नहीं बन सकी, जितनी अपने समय की जरूरतों के मुताबिक उसे होना चाहिए था। लेखकों की परिकल्पना में एक विशेष प्रकार का अमूर्तन बना रहा, जिसके कारण सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया की उनकी अवधारणा हमें आंशिक रूप में मनोगत-सी लगती है। इस अमूर्तन के चरित्र को समझने के लिए आज विशेष प्रयास की जरूरत है। ‘अकहानी’ के अतिरिक्त आत्मविश्वासपूर्ण और अराजक विद्रोह के अनुभववाद से जनवादी कहानी की नामुकम्मिल मुक्ति भी इसके लिए कुछ हद तक जिम्मेदार  हो सकती है।

नवें दशक (अगले पड़ाव) की कहानी की चर्चा करने से पहले आठवें दशक की जनवादी कहानी की उन कमजोरियों का जिक्र करना उचित होगा, जो ‘नयी कहानी’ और ‘अकहानी’ से इसके अपर्याप्त अलगाव के कारण वहां बनी रह जाती है। ‘नयी कहानी’ के विपरीत आठवें दशक की जनवादी अथवा प्रतिबद्ध कहानी में परिस्थितियोंं को बेबस झेलते जाने के बजाए संघर्ष द्वारा उन्हें बदलने पर जोर रहता है। इससे हमें लग सकता है कि अनुभववाद की स्थिरता को यहां पूरी तरह तोड़़ दिया गया है तथा सामाजिक यथार्थ की द्वंद्वात्मक गत्यात्मकता को रचनादृष्टि के भीतर सही ढंग से समेटा जा रहा है। पक्षधरता पर क्योंकि यहां उसे राजनैतिक प्रतिबद्धता के निर्णायक बिन्दु की हद तक ले जाने पर जोर दिया जाता है, इससे हमें लग सकता है कि सामाजिक यथार्थ के वर्गीय अन्तर्विरोधों की पहचान तो ज्यादा प्रखर और स्पष्ट हो रही है, इसके साथ-साथ सामाजिक परिवेश से अलग-थलग पड़ जाने वाले द्रष्टा की भूमिका को भी लेखक छोड़ रहा है और व्यापक मेहनतकश जनता और उसके बीच विद्यमान दूरी को भी वह अब समाप्त करने की उत्कृष्ट इच्छा रखता है। लेखक अब समाज के टकरावों के बीच अव्यस्थित होकर अपने रचनात्मक व्यवहार से उन्हें नए मोड़ देने की कोशिश में लगा हुआ ऐसा सक्रिय व्यक्ति दिखायी देता है, जिसने अपने सही विकल्प चुन लिए हैं। ऐसी स्थिति में संभव है कि हम यह महसूस करने लगेें कि ‘नयी कहानी’ के आधुनिकतवादी संस्करण में ही क्यों, प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा से जुड़े उसके ज्यादा स्वस्थ हिस्से के अंदर भी पायी जाने वाली अनुभववादजनित कमजोरियों से यहां पूरी तरह मुक्ति मिल चुकी है। सामाजिक यथार्थ के केंद्रीय सवालों में इस समय के कहानीकारों के गहरे उलझाव को जब हम देखते हैं या फिर इस बात की ओर ध्यान देते हैं कि रचनाकार यहां अपनी व्यक्तिगत उलझनों, हिचकिचाहटों और लडख़ड़ाहटों पर कठोर आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया के जरिए विजय हासिल कर लेने के बाद ऐसी समस्याओं को अपनी चिंता का विषय बना रहे हैं, जो व्यक्तिगत न होकर व्यापक मेहनतकश जनता की सामूहिक समस्याएं हैं, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि न तो अब अनुभववाद का कोई अवशेष बचा है और न ‘अकहानी’ की अगंभीर अराजकता। पर क्या वास्तव में ऐसा है?

बारीकी से गौर करने पर पता चलता है कि अनुभववाद के अवशेष किंचित् सूक्ष्म रूपों में आठवें दशक की कहानी के भीतर बने रहते हैं। जैसा कि मैंने अपने पिछले पत्र में कहा था आठवें दशक के कहानीकार भी ‘नयी कहानी’ के रचनाकारों की तरह यह मानकर चलते हैं कि जिन जनतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों में वे गहरी आस्था रखते हैं, उनका तत्कालीन सामाजिक परिवेश से पूरी तरह अलगाव है अगरचे दोनों के रवैये में यह महत्वपूर्ण अंतर जरूरी है कि आठवें दशक के रचनाकार इस अलगाव को बरदाश्त नहीं करते और निर्णायक हस्तक्षेप करके सामाजिक व्यवस्था में ऐसा मूलभूत परिवर्तन लाना चाहते हैं, जिससे उनकी चेतना में व्याप्त मूल्य और आदर्श सामाजिक जीवन में मूर्त रूप ग्रहण करके उसे अनुप्राणित और परिचालित करने लगें। जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति लेखक के लगाव की गहराई अब सामाजिक परिस्थितियों को बदलने के उसके संकल्प की पुख्तगी तथा मेहनतकश जनता के साथ एकात्म होने की उसकी आकांक्षा की तीव्रता के आधार पर मापी जाने लगी। मूल्यों और परिस्थतियों के बीच के अलगाव को निर्णायक हस्तक्षेप द्वारा दूर करने का संकल्प अब रचनाशीलता का केंद्रीय पक्ष बन गया, तो इसके कई सकारात्मक परिणाम सामने आए। एक तो मध्यवर्ग के लोगों की चेतना और संवेदना के भीतर व्याप्त उन कुसंस्कारों और कमजोरियों की काफी तीखी पहचान रचनाकार को हो गई, जिनकी बदौलत वे परिस्थितियों से संघर्ष करने के बजाए उनका हिस्सा बने रहते हैं। आठवें दशक में अनेकों कहानियां ऐसी लिखी गई जहां मध्यवर्ग के उन पात्रों पर तीखा व्यंग्य किया जाता है, जो जनतांत्रिक मूल्यों को छूंछा बना देने वाली परिस्थितियों को पैदा करने में मदद करते हैं और उन पात्रों को वांछित विकल्प के रूप में उभारा जाता है, जो कड़े आत्मसंघर्ष के जरिए अपनी चेतना और संवेदना में निखार ला रहे हैं ला चुके हैं, मेहनतकश जनता के साथ मिलकर व्यवस्था को बदल डालने की अनिवार्यता को पहचानते हैं और अपने व्यवस्था-विरोधी रवैये से पैदा होने वाले सभी खतरों को खुशी-खुशी झेलने का नैतिक साहस अर्जित कर चुके हैं। इससे सामाजिक यथार्थ के चित्रण में काफी स्पष्टता आ जाती है और ‘नयी कहानी’ के दौर की अनेक रचनाओं में पाया जाने वाला धुंधलापन यहां आम तौर पर समाप्त हो जाता है। वर्ग-संघर्ष की केंद्रीय सच्चाई की पहचान इस समय विशेष रूप में प्रखर हो जाती है। मेहनतकश जनता की ओर बढ़ी अपनेपन की भावना के कारण उसकी जीवन परिस्थितियों का चित्रण अब अधिक विश्वसनीय और तथ्यात्मक हो जाता है।

इसके अलावा एक अत्यंत महत्वपूर्ण परिणाम यह भी निकलता है कि सामाजिक रूपांतरण करने की जो वास्तविक ताकत मध्यवर्ग के कुछ तत्वों और उनसे भी ज्यादा मेहनतकश जनता के भीतर दबी पड़ी रहती है, पर हमें अक्सर दिखायी नहीं देती, उसे अपनी कल्पना के बल पर उभार लाने और मूर्त रूप देने में  इस समय का रचनाकार विशेष रूप से सक्षम हो जाता है। मजदूर वर्ग की जीवन-पद्धति के कुछ तथ्यों की जानकारी भले ही उसके पास न हो, लेकिन जिन विशेषताओं-क्षमताओं के बल पर इस वर्ग के लोग सामाजिक रूपांतरण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं, उनकी प्रखर पहचान उसके पास अवश्य होती है। आठवें दशक की कहानी की जीवंतता काफी हद तक इसी से तय होती है। प्रेमचंद की कहानी के ‘आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद’ से मिलते-जुलते जिस ‘क्रांतिकारी रूमानीपन’ का आपने आठवें दशक की जनवादी कहानी के संदर्भ में जिक्र किया है, उसका मेहनतकश जनता की अदृष्ट किन्तु वास्तविक संभावनाओं को मूर्त रूप मेें उभारने की उस समय के रचनाकारों की इस क्षमता से सीधा संबंध है। आपकी ‘देवी सिंह कौन’ कहानी की प्रमुख विशेषता यही है कि उसका केंद्रीय पात्र मजदूर वर्ग की वास्तविक आंतरिक शक्ति को मूर्त रूप में व्यक्त करने वाला एक विश्वसनीय प्रतिनिधि व्यक्तित्व नजर आता है। इस प्रकार की रचनात्मक ऊर्जा से पैदा होने वाली ताजगी की झलक इस दौर की लगभग सभी अच्छी कहानियोंं में मिलती है। इस ऊर्जा की भावभीनी ‘काव्यात्मक’ अभिव्यक्ति के लिए विजयकांत की कहानियां खास तौर से ‘मशहूर’ या बदनाम हैं। लेकिन मूल्यों और परिस्थतियों के आरंभिक अलगाव से इस समय की रचनाशीलता में कुछ ऐसी कमजोरियां भी कई बार दिखायी देती हैं, जो अनुभववाद से जुड़ी हुई हैं। इस अलगाव से एक कमजोरी तो यह पैदा होती है कि सामाजिक बदलाव के बारे में रचनाकार की परिकल्पना उसकी ऐतिहासिक अनिवार्यता की पहचान पर आधारित होने के कारण कितनी ही यथार्थपरक लगे, कुछ हद तक उसे आदर्शीकृत अथवा मनोगत रूप में ही परिलक्षित करती है। कौन-से बिन्दू से शुरू होकर हमें कहां पहुंचना है, इसकी प्रखर पहचान तो रचनाकार के पास होती है, पर सामाजिक शक्तियों के टकराव की जिस वस्तुपरक प्रक्रिया के तहत यह बदलाव सम्पन्न होगा, उसकी जटिलताओं और विशिष्टताओं को अपनी चेतना में समेटने की चिंता अधिकांश रचनाकार नहीं दिखाते। कैसा बदलाव लाना है, यह तो वे जानते हैं, कैसे आएगा, किन-किन चरणों से गुजरेगा, इसे अच्छी तरह समझ लेने की फुर्सत उन्हें अक्सर नहीं होती।

जो परिकल्पना इस दौर की रचनाओं में आम तौर पर दिखायी देती है, यह व्यक्ति की चेतना के विकास की प्रक्रिया के रूपक पर मुख्य रूप से आधारित होती है। जिस प्रकार व्यक्ति आत्मसंघर्ष द्वारा अपनी अंदरूनी शक्ति को सुकेंद्रित करके गतिमान बना लेता है, सामाजिक शक्तियों का संघर्ष भी लगभग उसी प्रकार सघनता और तीव्रता हासिल करता हुआ नजर आता है। व्यक्ति के आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया में जिस प्रकार एक बिन्दू पर पहुंचने के बाद उसके अंदर अचानक एक प्रखर प्रतिरक्षात्मक अथवा आक्रामक सक्रियता पैदा हो जाती है, लगभग उसी रूप में मेहनतकश जनता की एकजुटता और संघर्षधर्मिता को भी उभरते दिखाया जाता है। विजेंद्र, अनिल और सुरेश  कांटक की अनेकों कहानियों में इसका ऐसा रूप हमें मिलता है। व्यक्ति की चेतना के विकास की प्रक्रिया और सामाजिक शक्तियों के संघर्ष के उभार में इस प्रकार की समानता कुछ तक होती है, पर दोनों के बीच महत्वपूर्ण भिन्नताएं भी होती हैं। चेतना की परिधि से बाहर निकलकर सामाजिक शक्तियों के टकराव की प्रक्रिया के भीतर मूल्यों और आदर्शों को अव्यवस्थित करके देखने पर ही सामाजिक बदलाव की हमारी परिकल्पना की मनोगतता से छुटकारा पाया जा सकता है।

इस मनोगतता के कारण आठवें दशक की कई जनवादी कहानियों के कथानकों की संरचना में हमें काफी एकरूपता दिखायी देने लगती है। इसी मनोगतता का एक दूसरा परिणाम यह होता है कि जनतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों के सारतत्व को हम व्यक्तियों के आत्मिक बल की मात्रा के हिसाब से मापने लगते हैं। इसमें रचनाकार की वर्गों की ओर पक्षधरता पात्रों की ओर अपनाए जाने वाले उसके रुख के माध्यम से सीधे-सीधे व्यक्त होने लगती है। पात्रों के व्यक्तित्व का निर्माण सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया के अंतर्गत हुआ है, इस सच्चाई को उलटकर वह सामाजिक बदलाव को ही पात्रों के व्यक्तित्व के प्रतिफलन के रूप में देखने लगता है और जो कुछ घटित हो रहा है, या घटित नहीं हो रहा है, उसकी मुख्य जिम्मेदारी पात्रों पर डाल दी जाती है। सामाजिक यथार्थ की इस प्रकार की परिकल्पना का ही यह परिणाम है कि नैतिक दृष्टि से कमजोर पात्रों की ओर जरूरत से ज्यादा कड़वाहट भरा रुख अपना लिया जाता है और अधिक आत्मिक बल जुटाने वाले पात्रों की ओर न केवल अतिरिक्त ममत्व का भाव अपना लिया जाता है, बल्कि सामाजिक बदलाव में उनके योगदान पर अतिरिक्त निर्भरता की प्रवृत्ति भी जोर पकड़ने लगती है। संजीव की कहानी ‘मकतल’ का यहां उदाहरण दिया जा सकता है।

जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं, मानक के रूप में इस्तेमाल होने वाले मूल्यों में वास्तविक सारतत्व कितना है, इसका सही अंदाजा ‘नयी कहानी’ के रचनाकार कई बार अपने अनुभववाद के कारण नहीं लगा पाते हैं। वे यह नहीं देख पाते थे कि आदर्शों और मूल्यों का वस्तुपरक स्वरूप सदा एक रूप में उपलब्ध चीज न होकर सामाजिक शक्तियों के आपसी टकराव की प्रक्रिया का परिणाम होता है। आठवें दशक की कहानी के अंतर्गत आने वाले कुछ रचनाकार जनतांत्रिक मूल्यों के जिस वस्तुपरक रूप को ग्रहण करते हैं, उसे सर्वमान्य और स्थिर समझ बैठने की प्रवृत्ति उनके अंदर भी मौजूद रहती है। वे भूल जाते हैं कि उस समय चल रहे मजदूरों और किसानों के आंदोलनों तथा मध्य वर्ग के विभिन्न हिस्सों की सामाजिक-राजनैतिक पहलकदमियों से ही उन मूल्यों का स्वरूप और सारतत्व तय हुए हैं। जनतांत्रिक मूल्यों के तत्कालीन वस्तुपरक स्वरूप को अनजाने में सार्वभौमिक वैधता प्रदान कर देने से सामाजिक जीवन में किसी विशेष बिंदू पर उनकी वास्तविक शक्ति मिलती है, इसका सही जायजा नहीं लिया जा सकता। परिस्थितियों के दबाव के तीव्र हो जाने पर भी यदि कई बार मेहनतकश जनता के विभिन्न हिस्से संघर्ष के लिए वैसी तत्परता से खड़े नहीं हो रहे हों, जिसकी रचनाकार की अपेक्षा है, तो उसे या तो भारी अचम्भा होने लगता है या वह गुस्से से भरने लगता है। जनता की इस ‘अस्वाभाविक’ दिखने वाली ‘कमजोरी’ के लिए वह कई बार राजनैतिक दल के नेतृत्व को ही जिम्मेदार ठहराने लगता है। मेहनतकश जनता की इस कमजोरी की वस्तुपरकता को स्वीकार न कर पाने के कारण उसे एकजुट करने का दायित्व संभाले हुए नेतृत्व में जो खोट उसे दिखायी देते हैं, उन्हें ही वह तत्कालीन सामाजिक यथार्थ के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष के रूप में प्रस्तुत करने लग जाता है। इसके अलावा एक संभावना यह भी बनी रहती है कि मेहनतकश जनता के वास्तविक अस्तित्व को अनदेखा करके वह उसके संभाव्य आदर्शीकृत रूप पर ही नजर गड़ाए रहे और उसे ही वास्तविक मान बैठने की जिद्द करने लगे।

ऊपर बतायी हुई ये कमजोरियां उन लेखकों की कहानियों में ज्यादा मुखर रूप में सामने आती हैं, जो ‘अकहानी’ के संस्कारों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सके। बहुसंख्यक जनता की मौजूदा स्थिति का चित्रण करते समय, विशेषकर शिक्षित मध्यवर्ग से संबंध रखने वाले वेतनभोगी लोगों के सामाजिक व्यवहार के सकारात्मक पहलुओं को आंकते समय, ये रचनाकार जरूरत से ज्यादा कड़वाहट का परिचय देते हैं। जनता के अधिकांश हिस्सों के वर्तमान अस्तित्व में पायी जाने वाली विकृतियों को वे काफी अतिरंजित और अतिनाटकीय रूप में देखते हैं। सतीश जमाली और काशीनाथ सिंह की कुछ कहानियों में मध्यवर्ग के व्यापक हिस्सों की जो तस्वीर उभरती है, उसमें उनके व्यंग्य की अतिरिक्त कड़वाहट स्पष्ट है। धीरेन्द्र अस्थाना, संजीव और सृंजय की कहानियों में मेहनतकश लोगों के शोषण और उत्पीड़न की जो तस्वीर आम तौर पर उभरती है, उसमें आज की स्थिति को उसकी वस्तुपरकता में पहचानने की क्षमता कम और इसे ‘अस्वाभाविक’ मानते हुए उसके स्थान पर साधारण जनता की एक मनोगत तस्वीर को स्वाभाविक (वास्तविक) मानने की प्रवृत्ति अधिक दिखायी देती है।

हिन्दी कहानी में प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा के विकास का अगला पड़ाव तब शुरू होता है (नवें दशक के आरंभ होने से पहले) जब परिस्थितियों के बढ़ते हुए दबावों के कारण रचनाकारों को यह अहसास होने लगा कि सामाजिक यथार्थ की उनकी परिकल्पना में किसी न किसी रूप में मौजूद मनोगतता से छुटकारा पाए बिना उनकी रचनाशीलता का आगे विकास नहीं हो सकेगा। इसी अहसास के बाद रचनाकारों ने सामाजिक यथार्थ के केंद्रीय मुद्दों से टकराते हुए नयी रचना-पद्धतियों का निर्माण शुरू किया। यह सब वे सचेत रूप में कर रहे हों, ऐसा जरूरी नहीं है। जो रचना-पद्धतियां इधर इस्तेमाल होने लगी हैं, वे सब की सब जरूरी तौर पर सामाजिक यथार्थ की वस्तुपरक पहचान बनाने में सहायक हो रही हैं, ऐसा भी नहीं माना जा सकता। समकालीन रचनाशीलता की नयी अभिव्यक्तियां अपने पूरे विकास के साथ मुखर रूप में सामने आ गयी हैं, यह कहना भी शायद उचित नहीं होगा। लेकिन नए-पुराने बहुत  सारे लेखक रचनाशीलता की इस नयी कशमकश में से गुजर रहे हैं, इसके स्पष्ट संकेत हमें इधर लिखी जा रही अनेक कहानियों में नजर आ रहे हैं। इस नये पड़ाव की रचनाशीलता की कुछ मुख्य विशेषताओं को पहचानने की कोशिश की जानी चाहिए, यद्यपि इसके साथ-साथ हमें यह अवश्य याद रखना चाहिए कि इसके लिए न तो पूर्णत: नए शिल्प गढऩे की जरूरत है और न ही किसी विशेष रचना-पद्धति को अपनाने की अनिवार्यता। इस पड़ाव की रचनाशीलता की प्रमुख विशेषता यह है कि यहां सामाजिक यथार्थ की चेतना में उभरने वाले मनोगत तस्वीर की उसके वस्तुपरक अस्तित्व से मुठभेड़ कराकर उस तस्वीर की अपर्याप्तताओं, रिक्तियों और सीमाओं को उजागर किया जाता है। मूल्यों के निर्माण की प्रक्रिया को सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के अंश के रूप में देखते हुए उनके भरे-पूरे लगने वाले रूप के भीतर छिपे सारतत्व की सीमाओं को पहचानने की कोशिश की जाती है। यहां यह भी माना जाता  है कि इस सारतत्व  के सीमित परिमाण को ध्यान में रखते हुए ही विभिन्न वर्गों के लोगों की सामाजिक भूमिका को समझने के प्रयास होने चाहिए, ताकि उनकी ओर ऐसा कड़वाहट भरा कड़ा रुख न अपनाया जाए जो उनसे अतिरिक्त अपेक्षाएं रखने से पैदा होता है और न ही नये विकल्प चुनने की उनकी क्षमताओं को कम करके आंका जाए। सामजिक रूपांतरण में लोगों की सामूहिक चेतना के विकास की प्रक्रिया की जटिलताओं को, उसमें आने वाले अवरोधों को ठीक से समझने की कोशिश करना तथा सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को उसके वस्तुपरक रूप में रचनाशीलता के केंद्र में रखना भी इस पड़ाव की यथार्थवादी परम्परा से संबंधित कहानियों की एक प्रमुख विशेषता है।

चेतना और संवेदना की स्वत:स्फूर्त अभिव्यक्तियों की ओर निरीक्षणात्मक रुख अपनाने की आवश्यकता का अहसास इधर रचनाकारों में बढ़ा है और इस प्रकार के निरीक्षण को संभव बनाने की विधियों का निर्माण भी उन्होंने किया है। ब्रेख्त की तर्ज पर कला में एलियेनेशन (अलगाव) के प्रभाव को किसी न किसी रूप में अपनी रचना के अंदर बनाए रखने पर इधर आम तौर पर जोर दिया जाने लगा है। कहानियां अक्सर पात्र-केंद्रित न होकर सामाजिक निर्मितियों को चित्रित-व्याख्यायित करती हैं। विभिन्न पात्रों के व्यवहार को आंकने में  तथा सामाजिक परिस्थितियों के दबाव में उभरती अथवा विलुप्त होती विभिन्न प्रवृत्तियों के वास्तविक चरित्र को पहचानने में अब रचनाकार ज्यादा तटस्थता दिखाता है और उनकी मानवीय सार्थकता को आंकने की अनिवार्य प्राथमिक शर्त के रूप में उनके अस्तित्व की वस्तुपरकता को स्वीकर किया जाता है।

इस पड़ाव की रचनाशीलता जिन अलग-अलग रूपोंं में व्यक्त हो रही है, उनमें से तीन प्रकार की अभिव्यक्तियों की भिन्नताओं को मोटे तौर पर समझने के लिए कुछ कहानियों के उदाहरण यहां दिए जा सकते हैं। आज के सामाजिक  जीवन में साम्प्रदायिकता के विस्तार और आक्रामक उभार को एक बड़ी चुनौती मानते हुए रचनाकारों ने इधर कई अच्छी कहानियां हमें दी हैं। इन सबकी विशेषता यह है कि रचनाकार वहां इस समस्या को केवल नैतिक-मनोवैज्ञानिक धरातलोंं तक सीमित करके समझने की बजाय उसे सामाजिक बदलाव की समग्र प्रक्रिया के अंतर्गत रखकर देखते हैं। इसके साथ ही वे इस समस्या के निर्माण में आर्थिक कठिनाइयों और राजनैतिक दबावों की भूमिका को पूरी तरह स्वीकार करते हुए भी उनके रिश्ते की कोई सीधी-सरल परिकल्पना नहीं पेश करते। हमारे सामाजिक जीवन के एक महत्वपूर्ण पक्ष के रूप में साम्प्रदायिकता के वस्तुपरक स्वरूप को पाठकों के सामने लाने के लिए वहां इस बात पर विशेष रूप से बल दिया जाता है कि इसके बारे में हमारी स्थापित अवधारणाओं और जानी-पहचानी प्रतिक्रियाओं में मौजूदा अपर्याप्तताओं को पहचाना जाए। समस्या के वस्तुपरक स्वरूप के अनचीन्हे पहलुओं को पाठक के सामने लाने के लिए ये रचनाएं उसके लिए कुछ सवाल अवश्य खड़े करती हैं। भीष्म साहनी की ‘झुटपुटा’ कहानी हो अथवा स्वयं प्रकाश की ‘रशीद का पजामा’, आपकी ‘हंसो, हिमा, हंसो’ हो या वीर राजा की ‘किताब’, नीलकांत की ‘एकरात का मेहमान’ हो या सहीराम की ‘तेरे सिवा’ लगभग हर रचना में समस्या के वास्तविक स्वरूप और पात्रों के मन में बनी उनकी तस्वीर के बीच के अंतर को उभारा जाता है, ताकि पाठक के अंदर सामाजिक जीवन की उस जटिल प्रक्रिया को नये सिरे से समझने की जागरूकता पैदा हो, जिसके अंतर्गत यह समस्या भी आकार ग्रहण कर रही है और पात्रों की मानसिकता का भी निर्माण हो रहा है। पाठक के अंदर इस प्रकार की सजगता पैदा हो जाने के बाद पात्रों की दुनिया में जो कुछ घटित हो रहा है, उसके लिए वह उन्हें दोषी ठहराने या उनकी शराफत पर रीझने भर से संतुष्ट नहीं हो लेता, बल्कि समग्र सामाजिक स्थिति का विवेकपूर्ण आंकलन करना जरूरी समझने लगता है।

साम्प्रदायिकता के अलावा सामाजिक जीवन में तीव्रता के साथ उभरकर आने वाली कई अन्य मुख्य चुनौतियों के संदर्भ में भी इस प्रकार की कहानियां इधर लिखी जा रही हैं। शेखर जोशी की ‘रंगरूट’, ‘निर्णय’, ‘आशीर्वचन’ और ‘नौरंगी बीमार है’ जैसी कहानियां हों या सहीराम की ‘जीवन-डोर’ या अखिलेश की ‘ऊसर’, ‘मुक्ति’ अथवा ‘बड़ी अम्मा’ या विनोद विप्लव की ‘चक्रव्यूह’ या असगर वजाहत की ‘दिलावर मियां का नेता बनना’, रचनाकार यहां पात्रों की चेतना के ड्रामे  या उनके व्यक्तिगत व्यवहार के नैतिक पक्ष के विश्लेषण से हटकर सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया के वस्तुपरक स्वरूप के किसी महत्वपूर्ण पक्ष को पहचानने-समझने के दायित्व को प्रमुखता देता है और जो कुछ उसके आसपास घटित हो रहा है, वह कैसे है, सबसे पहले सही पहचान बनाना जरूरी  समझता है। हमारे सामाजिक जीवन में जो बदलाव आया है, वह किस प्रक्रिया के तहत हुआ है, इसे पैनी नजर से देखते और समझते रहने पर यहां पात्रों की मानसिकता में दिखायी देने वाले बिगाड़ से बिदककर उन्हें दोषी ठहराने से कहीं ज्यादा जोर दिया जाता है। ‘राष्ट्रीय राजमार्ग’ से लेकर बाद की आपकी कई कहानियों में यह बात पाठक के मन में निरंतर बनी रहती है कि पात्रों की मानसिकता और उनके नैतिक रुझानों के लिए उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार ठहराने से पहले सामाजिक व्यवस्था द्वारा डाले जा रहे उन पर दबावों तथा उसके अंतर्गत निर्धारित होने वाली उनकी भूमिका को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए।

इस प्रकार की रचनाओं में जनतांत्रिक मूल्यों की हमारी विरासत के वस्तुपरक निरीक्षण के लिए उन्हें सामाजिक जीवन के अंतर्विरोधों के बीच अव्यस्थित करके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उनके निर्माण की प्रक्रिया को जांचा-परखा जाता है। ऐसी रचनाओं में क्योंकि रचनाकार पाठक की प्रतिक्रियाओं में अतिरिक्त उत्तेजना नहीं आने देता, इससे कुछ लोग कई बार वह गलत निष्कर्ष भी निकाल लेते हैं कि रचनाओं का यह धीमा स्वर या ‘ठंडापन’ रचनाकार के व्यवस्था को बदल डालने के संकल्प के कमजोर पड़ जाने का सूचक है। लेकिन हमारे सामाजिक यथार्थ को विवेकपूर्ण सजगता के साथ समझने का प्रयास करने वाली ऐसी कहानियों को रचनात्मक ऊर्जा की दृष्टि से गर्म तासीरवाली उन तेज-तर्रार रचनाओं की तुलना में, जहां वर्ग-संघर्ष की मौजूदा स्थिति को ‘निर्णायक मुठभेड़’ के बिन्दु तक पहुंची हुई दिखाया जाता है, कमजोर मानना सही नहीं होगा। इन दूसरे प्रकार की कहानियों के पीछे कई बार जिस प्रकार की नैतिक और बौद्धिक काहिली छिपी रहती है, इसका कुछ अंदाजा ‘वर्तमान साहित्य’, ‘हंस’ तथा कहानी पर मुख्य रूप से केंद्रित अन्य पत्रिकाओं में जब-तब छपने वाली व्यवस्था-विरोध के तीव्र लहजे में लिखी गयी कहानियों को पढ़कर लगाया जा सकता है। सामाजिक यथार्थ का निरीक्षणात्मक चित्रण-विवेचन प्रस्तुत करने वाली कहानियों का ‘ठंडापन’ प्रकृतवाद का ही सूचक हो, यह जरूरी नहीं है।

सामाजिक यथार्थ के साथ सजग और गंभीर उलझाव को सूचित  करने वाली इधर की कुछ कहानियों में सामाजिक विकास के बारे में स्वत: स्फूर्त ढंग से बनी पाठकों की मनोगत धारणाओं की अपर्याप्तता को ऐलेगरी और फैंटेसी का प्रयोग करके भी कारगर ढंग से स्पष्ट किया जाता है। इस प्रकार की रचना पद्धति की एक मिसाल तो आपकी ‘शीशा’ जैसी कहानी में ही मिल जाती है। विष्णु नागर की ‘दर्जी’, ‘पैंट’ और उनकी कई दूसरी कहानियां भी पाठक को इसी आधार पर अपनी और खींचती हैं और उसकी जागरूकता को प्रखर बनाती हैं। सामाजिक यथार्थ की जो समझ एक साधारण व्यक्ति की हैसियत से पाठक के पास आमतौर से होती है, उसकी बारीकियों को खुर्दबीन की तरह बड़ा आकार देने वाली दृष्टि अपनाकर उसके अंदर व्याप्त असंगतियों और अपर्याप्तताओं को  यहां उभारा जाता है, ताकि कहानी पढऩे के बाद पाठक को यह अहसास होने लगे कि वस्तुस्थिति के बहुत सारे महत्वपूर्ण पक्ष या तो उसकी ‘सामान्य समझ’ के भीतर प्रवेश ही नहीं कर पाते, या फिर उनकी ओर अपनी प्रतिक्रियाओं को जितना सुसंंगत उसने मान रखा था, उतनी सुसंगत वे हैं नहीं। वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में अविकसित या धीमे रूप में बनी रहने के कारण हमारी सामान्य समझ में वस्तुस्थिति की अधूरी पहचान और उसके कारण गलत दिशा ग्रहण करने वाली हमारी प्रतिक्रियाओं की असंगतियां अक्सर अनचीन्ही रह जाती हैं। अपनी कल्पनाशीलता से रचनाकार हमें ऐसे बिंदु तक ले जाता है, जहां इन असंगतियों की तार्किक परिणति ऐसे रूप में हमारे सामने आ जाती है कि वे हमें अपने पूरे अटपटेपन के साथ साफ-साफ दिखायी देने लगती है। इस प्रकार की कहानियों में हमारी चेतना की पूर्वनिर्मित संरचना यथार्थ के वे पहलू भी हमारे सामने उभर आते हैं, जो पहले हमारी चेतना की परिधि से बाहर रह गए थे।

फैंटेसी और निरीक्षणात्मक विवेक पर आधारित इसी प्रकार की रचना-पद्धति का इस्तेमाल प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा से जुड़े हुए कुछ रचनाकार इधर एक ओर महत्वपूर्ण किंतु कठिन जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए भी करते हैं। सामाजिक यथार्थ की वर्तमान चुनौतियों के गठन में तथा उनसे निपटने के हमारे तौर-तरीकों में हमारे अवचेतन में सक्रिय रूप से काम कर रही उन अवधारणाओं और मान्यताओं की क्या भूमिका है, जिन्हें हमने अनजाने में उस समुदाय से ग्रहण कर लिया है, जिसके साथ एकात्म होकर हमारे व्यक्तित्व का विकास हुआ है, इसे मूर्त रूप में उजागर करना कहानी की यथार्थवादी परम्परा के अंतर्गत आने वाले उदय प्रकाश जैसे रचनाकारों ने अपना एक महत्वपूर्ण दायित्व समझा है। फैंटेसी का सधा हुआ इस्तेमाल करते हुए उदय प्रकाश की ‘तिरिछ’ अथवा ‘छप्पन तोले का करधन’ जैसी कहानियों में या देवीप्रसाद मिश्र की ‘सुलेमान कहां है’ जैसी कहानी में रचनाकार यथार्थ और अयथार्थ को पहचानने की हमारी सामान्य मान्यताओं की संकुचितता अथवा अपर्याप्तता को तथा उनके भीतर छिपी हमारी मनोगतताओं को तो स्पष्ट करता ही है, इसके साथ-साथ कभी पहले समय में विकसित हुआ किंतु अभी भी मान्य सामुदायिक विवेक आज की परिस्थितियों के संदर्भ में कहां तक वास्तव में प्रासंगिक है और कहां तक वह अप्रासंगिक तथा भ्रामक हो गया है, इसकी भी पैनी समझ यहां उभारी जाती है।

इन विभिन्न रचना-पद्धतियों को अपनाने वाली कहानियां-भले ही वहां सजग निरीक्षण और तटस्थ विवरण द्वारा सामाजिक घटना-विकासों की वस्तुपरकता को सामने लाया जा रहा हो या हमारे सामान्य ज्ञान में मौजूद अदृष्ट असंगतियों को फैंटेसी और ऐलेगरी के जरिए विस्तार देकर उभारा जा रहा हो, या फिर व्यक्तिगत और सामूहिक विवेक के जिस संयोजन से यथार्थ, नैतिकता और सामाजिक औचित्य के बारे में हमारी मान्यताओं का गठन हुआ है, उसकी सूक्ष्म प्रक्रियाओं को अपनी कल्पना-शक्ति द्वारा मूर्त और दर्शनीय बनाकर हमारे चिंतन और व्यवहार की आसानी से पकड़ में न आने वाली महत्वपूर्ण विशेषताओं की पैनी समझ पैदा करने की कोशिश की जा रही हो-इधर काफी ज्यादा संख्या में लिखी जाने लगी है। लेकिन प्रेमचंद की यथार्थवादी परम्परा से जुड़े हुए रचनाकार ही इन रचना-पद्धतियों का सही प्रयोग कर पाते हैं। दूसरे रचनाकार इन पद्धतियों के बल पर बहुत अच्छी कहानियां हमें नहीं दे पाते।

लगातार बढ़ते-बढ़ते यह प्रयास पत्र न रहकर एक बड़े लेख का आकार ले गया है। जो कुछ भी यह अपने अंतिम रूप में है, इस पूरा करने में मुझे कई दिन लग गए। बीच में कई अड़चनें भी आती रहीं। दो-तीन दिन अमृतसर जाने-आने में लग गए। एक बार रैली वाले दिन दिल्ली का भी चक्कर लगा आया। यहां की विभाग संबंधी व्यस्तताओं और पारिवारिक मसलों के कारण भी दिमाग जब-जब दूर हटता रहा। ले-देकर आज (29 तारीख) इसे समाप्ति के बिन्दु तक ला पाया हूं। अब आगे इस सिलसिले में और कुछ कहने की हिम्मत फिलहाल नहीं जुटा पाऊंगा। यह भी नहीं मालूम कि इसे आपके लिए रुचि लेने और पढऩे लायक बना पाया हूं या नहीं। बहरहाल, अगर पढ़कर कुछ प्रतिक्रिया देंगे तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी और इस प्रयास की सार्थकता पर विश्वास होगा। विचार-विमर्श का यह सिलसिला अब आपके पत्र के साथ समाप्त हो जाएगा। पत्र अवश्य लिखें। पिछले कुछ दिनों से इस विषय पर जो कुछ भी सोचता रहा हूं, उसे किसी तरह खींच-खांचकर यहां उंडेल दिया है। कहानी पर हमारी बातचीत को अपनी ओर से सब कुछ कह डालने का मौका समझकर उसका भरपूर फायदा मैंने यहां उठाया है। आपके पत्र का इंतजार करूंगा।

आपका

ओम प्रकाश ग्रेवाल

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