आलेख


            विकल्प का सवाल आज पहले से भी जटिल हो गया है, लेकिन विकल्प की अनिवार्यता में कोई अन्तर नहीं आया है। आप ने इस परिचर्चा का विषय रखा है ‘विकल्प की अवधारणा’। लेकिन मेरे विचार से विकल्प की कोई एक अवधारणा नहीं है। मसलन, एक विकल्प यह हो सकता है कि वर्तमान समाज-व्यवस्था को बदल कर एक नयी व्यवस्था का निर्माण किया जाये और दूसरा यह कि इसी व्यवस्था में कुछ सुधार कर के इसे बेहतर बनाया जाये। ये दोनों विकल्प हमारी भविष्योन्मुखी कल्पना से सम्बन्धित हैं, लेकिन मौजूदा व्यवस्था से दुखी या असंतुष्टï कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं, जो विकल्प के नाम पर अतीत की किसी व्यवस्था की ओर लौटने की बात करें। उदाहरण के लिए, आशीष नन्दी जिस तरह के विकल्प की बात करते हैं, उस में यह है कि ब्रिटिश साम्राज्य के हस्तक्षेप से भारत के स्वाभाविक विकास की प्रक्रियाओं में जो विकृतियाँ आयीं – अंग्रेजी शासन में जो नयी संस्थाएँ बनीं, हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में जो नये आयाम जुड़े, वे पाश्चात्यीकरण की विकृतियाँ थीं – उन को दूर किये बिना विकल्प की बात नहीं सोची जा सकती। यह पूरी तरह से पीछे की ओर ले जाने वाली कल्पना तो नहीं है, लेकिन इस में पिछले दो सौ साल के अनुभव को खारिज कर के फिर से उस बिन्दु से शुरू कर के आगे बढऩे की आकांक्षा ज़रूर झलकती है। आजकल कुछ विकल्प ऐसे भी सुझाये जा रहे हैं, जिन में पूँजीवादी व्यवस्था का कोई विरोध नहीं है, लेकिन अत्याधिक औद्योगीकरण, केन्द्रीयकरण और भूमंडलीकरण जैसी चीजों का विरोध है। इस प्रकार के विकल्प प्राय: पर्यावरणवादी, मानवाधिकारवादी और प्रकृति की ओर लौट चलने का नारा देने वाले लोग प्रस्तुत किया करते हैं। इन के अलावा कुछ और विकल्प भी पेश किये जाते हैं, जैसे जनतन्त्र की जगह किसी तरह की तानाशाही, फासीवाद, उग्र राष्टï्रवाद वगैरह, जो मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के विकल्प नहीं, बल्कि उस को बनाये रखने के तरीके हैं।

            विकल्प के बारे में सोचते समय हमें स्त्रियों, दलितों, रंगभेद और नस्लवाद के शिकार लोगों आदि के द्वारा की जाने वाली मौजूदा व्यवस्था की आलोचना या उस के विरोध को भी ध्यान में रखना चाहिए। ये लोग पूँजीवाद का कोई विकल्प सुझाते हों या न सुझाते हों, लेकिन उन से यह तो पता चलता ही है कि ऐसे लोग आमूल परिवर्तनवादी न हो कर भी, पूँजीवादी व्यवस्था के अन्दर ही सही, एक प्रकार का बदलाव चाहते हैं।

            हमें मूलगामी विकल्प के साथ-साथ उदारवादी किन्तु सकारात्मक विकल्पों को भी ध्यान में रखना चाहिए। मूलगामी या समाजवादी विकल्प के लिए प्रयासरत लोगों का ऐसे उदारवादी विकल्प चाहने वाले लोगों से तालमेल हो सकता है। मसलन, आज जब पूंजीवादी व्यवस्था जनतन्त्र को कम से कम करने की कोशिश कर रही है, तब यदि समाज का कोई समूह व्यवस्था में जनतांत्रिक सहभागिता की या ‘पार्टिसिपेटरी’ डेमोक्रेसी’की माँग करता है, तो यह एक सकारात्मक चीज़ है, जो आगे चल कर लोगों को इस समझ तक ले जा सकती है कि वे जो समस्या उठा रहे हैं, उस का समाधान पूँजीवादी व्यवस्था के अन्दर नहीं, बल्कि उस से बाहर जा कर ही हो सकता है, अत: आमूल परिवर्तनवादियों का रुïख ऐसी माँगें उठाने वालों के प्रति सकारात्मक होना चाहिए। यही बात नारीवादी, दलितवादी, पर्यावरणवादी इत्यादि आन्दोलनों के प्रति अपनाये जाने वाले रुख के बारे में कही जा सकती है। मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि जो लोग पीछे जा कर औद्योगिक समाज से पहले के समाजों को ध्यान में रख कर आज की समाज-व्यवस्था की आलोचना कर रहे हैं, उन की आलोचना को भी खारिज या अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उस आलोचना में भी कुछ ऐसा सकारात्मक हो सकता है , जो शोषण-उत्पीड़न रहित और समानता पर आधारित व्यवस्था का विकल्प खोजने और बनाने में सहायक हो सकता है।

            विकल्प की बात सोचते समय आर्थिक और राजनैतिक पहलुओं के अलावा बहुत से  सांस्कृतिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना पड़ेगा। जब यह कहा जाता है कि ”पर्सनल इज़ पॉलिटिकल’’ तो इस बात में काफी सच्चाई है। जो आप का नितान्त निजी है, वह भी राजनीतिक है, तो आप के दैनंदिन जीवन, पारिवारिक ढाँचे और व्यक्तिगत सम्बन्धों में भी राजनीति है। इस प्रकार राजनीति का क्षेत्र अब बहुत व्यापक हो गया है। अत: जब हम मौजूदा व्यवस्था के विकल्प की दिशा में बढ़ेंगे, तो हमें ऐसे स्तरों पर मौजूद राजनीति के सूक्ष्म रूपों को ध्यान में रखते हुए ऐसे बहुत से लोगों को साथ ले कर चलना होगा, जो प्राथमिक रूप से इन्हीं स्तरों पर सक्रिय होंगे। आज की अत्यन्त द्रुत गति वाली सूचना तकनीक के सन्दर्भ में, पुराने सरलीकरणों को छोड़ कर विचारों, संस्कारों, मूल्य-व्यवस्थाओं को उचित महत्व देना होगा।

            दूसरी बात यह कि धर्म, वर्ण, जाति, सम्प्रदाय, लिंग आदि के भेदों के कारण जो विकृतियाँ हजारों साल से समाज में चली आ रही हैं, वे एकदम या अपने-आप ही समाप्त हो जायेंगी, ऐसा मान कर नहीं चलना चाहिए। सामाजिक परिवर्तन सचेत रूप से और योजनाबद्घ ढंग से किया जाने वाला परिवर्तन है। सचेत रूप से, बाकायदा प्रयास करके, वर्तमान के विश्लेषण और भविष्य की परिकल्पना के आधार पर ऐसे विकल्प का निर्माण करना होगा, जिस में पहले जैसी गलतियाँ न हों और वैकल्पिक व्यवस्था को केवल आर्थिक-राजनैतिक रूपों में ही नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक रूपों में भी बेहतर व्यवस्था बनाया जाये।

            तीसरी बात यह कि संस्कृति का निर्माण एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है। वह एक निरन्तरता में विकसित होती है और आर्थिक-राजनैतिक परिवर्तन हो जाने के बाद भी उस का बहुत सा अंश, जो मानव जीवन के लिए आवश्यक या उपयोगी होता है, जीवन्त रूप में बचा रहता है। लेकिन उस के साथ-साथ कई मृत और जड़ रूढिय़ाँ और विकृतियाँ भी बची रहती हैं। वैकल्पिक व्यवस्था में संस्कृति के उस जीवन्त अंश को बचाने और बढ़ाने की तथा रूढिय़ों और विकृतियों को समाप्त करने की सचेत और योजनाबद्घ कोशिशें करनी होंगी। विकल्प की सब से विश्वसनीय पहचान वैकल्पिक चेतना, मूल्य व्यवस्था, आचार-विचार आदि से ही बनेगी। लेकिन कोई भी संस्कृति शून्य में से पैदा नहीं होती। पहले से चली आ रही संस्कृति में जो जीवन्त और प्रासंगिक होता है, उसी के आधार पर नयी संस्कृति पैदा होती है। उस में समाज के सब लोगों के कुछ साझे लक्ष्य, आदर्श और मूल्य होते हैं। उस में एक सामूहिकता, कल्पनाशीलता और स्वप्रदर्शिता शामिल होती है। यह सही है कि जिस वर्ग का वर्चस्व होता है, वह संस्कृति को कुछ हद तक नियन्त्रित करता है और अपने हित में मोड़ता है, लेकिन ऐसा वह ज़बरदस्ती नहीं कर सकता, क्योंकि संस्कृति किसी एक व्यक्ति या वर्ग की नहीं, पूरे समाज की रचना है। इसीलिए समाजशास्त्रियों ने उसे ‘सोशल इमैजिनरी’ कहा है। अत: वैकल्पिक व्यवस्था में आप एक सर्वथा नयी संस्कृति अचानक निर्मित कर लेंगे, यह समझना भूल है। लेकिन दूसरी तरफ यह समझना भी भूल है कि आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था बदल जाने पर भी संस्कृति यथावत बनी रहेगी अथवा वह अपने-आप बदल जायेगी। वैकल्पिक व्यवस्था में सांस्कृतिक परिवर्तन भी अवश्य होंगे, लेकिन वे अपने-आप नहीं होंगे। वे सचेत रूप से और योजनाबद्ध ढंग से करने पड़ेंगे। उदाहरण के लिए, हम ने देखा है कि क्रांति के बाद भी समाज में पितृसत्ता बनी रहती है, स्त्री और पुरुष का भेद बना रहता है, या अन्य मामलों में ऊँच-नीच का भेदभाव बना रहता है। इस को हमें शिक्षा के द्वारा, चेतना के विकास के द्वारा, अवसरों की समानता के द्वारा, व्यक्तित्व के विकास के समान अवसरों के द्वारा बाकायदा योजना बना कर और बड़ी सूझबूझ से दूर करना होगा।

            इस के लिए हमें यह देखना होगा कि संस्कृति में बहुत-सी चीजें प्राकृतिक सी लगते हुए भी मानव-निर्मित होती हैं। उदाहरण के लिए, पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों की चेतना काफी हद तक पितृसत्तात्मक सोच के हिसाब से ढल जाती है। उन के कोई अधिकार नहीं होते, उन को गुलाम सा बना कर रखा जाता है, उन्हें पुरुष के बराबर नहीं समझा जाता, उन का दमन भी होता है, लेकिन वे इस सब को प्राकृतिक या स्वाभाविक मानने लगती हैं। यहाँ तक कि कई बार उसे ग्लोरिफाइ भी करती हैं। रोलाँ बार्थ (Roland Barthes) ने मिथ की परिभाषा यह दी थी कि मिथ किसी मानव निर्मित वस्तु को ऐसी बना देता है कि वह प्राकृतिक सी प्रतीत होने लगती है। जैसे उसे प्रकृति ने बनाया हो। यानी जो आधा-अधूरा है, पूरा लगेगा। जो कृत्रिम है, स्वाभाविक लगेगा। जहाँ अन्तर्विरोध मौजूद हैं, वहाँ कोई अन्तर्विरोध नज़र नहीं आयेगा। इसी तरह स्त्रियों की चेतना पितृसत्ता से अनुकूलित हो जाती है। लेकिन वास्तविक जन-जीवन और लोक संस्कृति को ध्यान  से देखें, तो उन की स्थिति के अन्तर्विरोध झलक जाते है। उदाहरण के लिए , हरियाणा में स्त्रियाँ एक गीत गाती हैं, जिस में एक नवविवाहिता स्त्री को बुलाने के लिए उस के ससुर, जेठ, देवर आदि आते हैं, लेकिन वह उन के साथ नहीं जाती, बल्कि उन की खिल्ली भी उड़ाती है, और अन्तत: अपने पति के साथ ही जाती है। इस गीत में स्त्री पितृसत्ता की गरिमा को तोड़ती है और एक प्रकार से अपने विद्रोह के उस सूक्ष्म रूप को व्यक्त करती है, जो कनफॅारमिज़म ((Conformism) के भीतर भी मौजूद है। यह वैसे ही है, जैसे भारतेन्दु की कविता ‘भारत की दुर्दशा’ में ऊपर से तो विक्टोरिया  का गुणगान है, लेकिन उस में ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध भी अन्तर्निहित है। अत: संस्कृति की बात करते समय हमें इस की जटिलताओं और विविधताओं को ध्यान में रखना चाहिए। विकल्प के निर्माण में परम्परा का इस्तेमाल ज़रूर होगा, लेकिन वह किस रूप में हो, इस के लिए बहुत ही आलोचनात्मक सूझबूझ और जागरूकता की ज़रूरत है। यह भी हो सकता है कि संस्कृति के क्षेत्र में आज जो काम बिल्कुल सही समझ कर कर रहे हैं, वह कल गलत साबित हो जाये और हमें वह काम या उस काम को करने का तरीका बदलना पड़े। अत: वैकल्पिक संस्कृति के क्षेत्र में दृढ़ विश्वास के बजाय एक प्रकार का खुलापन रखना ज्यादा ज़रूरी है।

            अब धर्म की बात। संस्कृति और धर्म आपस में पहले से ही परस्पर उलझे हुए हैं। उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। धर्म में दो पक्ष शुरू से हैं – एक तरफ मनोगत ढंग से इच्छाओं की पूर्ति की परिकल्पना और दूसरी तरफ प्रकृति के समझ में न आने वाले पक्षों को किसी बाहरी शक्ति का हस्तक्षेप मानना। लेकिन धर्म का एक पक्ष यह भी है कि वह व्यक्ति के व्यक्तित्व को सामूहिकता के ज़रिये रियलाइज़ करने का माध्यम रहा है। अब अगर संस्कृति को सोशल इमैजिनरी मानते हैं, तो धर्म को संस्कृति से अलग नहीं किया  जा सकता। लेकिन धर्म और संस्कृति में एक फर्क है। वह यह कि संस्कृति समय के साथ मनुष्य और समाज की ज़रूरतों के साथ बदलती हुई एक धर्मनिरपेक्ष रूप ले सकती है, जब कि धर्म – इस के बावजूद कि वह भी बदलता है, उस में भी सामाजिक संघर्षों की अभिव्यक्ति होती है, उस के माध्यम से भी सामाजिक संघर्ष होते रहे हैं – रहस्यवाद और आलौकिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता। फिर भी धर्म और संस्कृति के बारे में हमारी दृष्टिï सब कुछ को खारिज करने की नहीं, बल्कि उन में निहित द्वन्द्वात्मकता की पहचान की होनी चाहिए और हमें अपनी राय को पूरी तरह सही मान कर दूसरों पर थोपने के बजाय यह सोचना चाहिए कि हमारी समझ में भी कोई आधा-अधूरापन हो सकता है, हमारे दृष्टिïकोण में भी सुधार और बदलाव की गुंजाइश हो सकती है।

            धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ प्रश्र है नैतिकता का। धार्मिकता और नैतिकता काफी समय तक एक दूसरे के पर्याय रहे हैं। नैतिकता की जडें धर्म में रही हैं और वह धर्म से अपनी वैधता प्राप्त करती रही है। लेकिन वास्तव में यह धर्म से स्वतन्त्र है। ज्यों-ज्यों लोग तर्क और विवेक के आधार पर आलौकिकता या पारलौकिकता में विश्वास करना बन्द करते जाते हैं, त्यों-त्यों नैतिकता धर्म से स्वतन्त्र सामाजिक मान-मूल्यों, मानवीय आचार-व्यवहार के नियमों आदि के रूप में धर्मनिरपेक्ष होती जाती है। मगर नैतिकता का एक रूप तो परम्परागत सामाजिक मान-मूल्यों वाला होता है और दूसरा वैकल्पिक व्यवस्था का निर्माण करने के प्रयास में अपनाया जाने वाला तथा व्यक्तियों के अपने व्यक्तित्वांतरण को संभव बनाने वाला रूप भी हो सकता है। इन दोनों रूपों में टकराव भी होता है। मसलन, मनुवादी या पितृसत्तावादी नैतिकता का टकराव जनतांत्रिक आधार पर निर्मित समाज की नैतिकता से होगा ही, जिस में वर्ण, जाति या लिंग के आधार पर मनुष्यों के बीच भेद करना अनुचित ही नहीं, अवैध भी है।

            इसी से जुड़ा प्रश्र है कर्मकांड का। कर्मकांड के दो पक्ष हैं। धर्मनिरपेक्ष समाजों में भी लोगों की सामूहिकता को पुख़्ता करने के लिए कुछ समारोह होते हैं। जैसे गणतन्त्र दिवस समारोह या जैसे गांधीजी की समाधि पर फूल चढ़ाना या सोवियत समाज में लेनिन के शव को लोगों के दर्शनार्थ सुरक्षित रखा जाना और लोगों को उसे देखने जाना। धार्मिक कर्मकांडों में भी सामाजिकता को  पुख़्ता करने के लिए कुछ साझी गतिविधियाँ होती हैं, जैसे विभिन्न संस्कारों या समारोहों के अवसरों पर एक साथ खाना, नाचना-गाना, मिल-जुल कर पर्व-त्योहार मनाना इत्यादि। ये गतिविधियाँ व्यक्ति की सामूहिकता को परिभाषित करने में मददगार होती हैं। कर्मकांड का दूसरा पक्ष मिथक, जादू और भाग्यवाद से जुड़ा हुआ है- कि आप को श्रम या संघर्ष तो करना नहीं है, पूजा पाठ करने से ही आप की इच्छाएँ पूरी हो जायेंगी। यानी वास्तविक आवश्यकताओं को काल्पनिक तरीकों से पूरा करने का प्रयास करना कर्मकांड का दूसरा पक्ष है। यह मनुष्य की मनुष्यता को खंडित करता है और स्वार्थी

तत्वों  को अवसर देता है कि वे धार्मिकता को इसी में रिड्यूस कर दें। कर्मकांड, जो आजकल मूलवाद में बदलता हुआ भी दिखता है, तब भी पैदा होता है, जब आप का जीवन तो कुछ और होता है, लेकिन आप धर्म के खोखले या सारहीन हो चुके रूपों को अपनाये रहते हैं। उदाहरण के लिए, विदेशों में बसे बहुत से भारतीय तरह-तरह के निरर्थक कर्मकांडों से ही अपनी धार्मिकता या भारतीयता को प्रकट करने का प्रयास करते हैं और उन्हें कट्टरता से लागू करने के क्रम में मूलवादी बन जाते हैं। कर्मकांड का यह दूसरा पक्ष बहुत घातक है। अत: कर्मकांड का विरोध करते समय भी हमें उस के मासूम और घातक रूपों में फर्क करना चाहिए।

वैकल्पिक संस्कृति की बात करते समय हम यह यांत्रिक दृष्टिकोण नहीं अपना सकते कि धर्म क्योंकि संस्कृति नहीं है, इसलिए धर्म से हमारा कोई लेना-देना नहीं। हमारी सांस्कृतिक विरासत काफी हद तक धार्मिक आस्थाओं, व्यवहारों, कर्मकांडों आदि से जुड़ी हुई है और उस में बहुसंख्यक जनता की भागीदारी ही नहीं, उस की सृजनात्मकता भी शामिल है। अत: धर्म और संस्कृति के सवाल को हम सरलीकृत ढंग से यह कहते हुए नहीं उड़ा सकते कि वह व्यक्ति का नितान्त निजी मामला है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है समाज में और राज-काज में धर्म का दखल न हो, धर्म के आधार पर लोगों में भेदभाव न किया जाये, उसे साम्प्रदायिक राजनीति का आधार न बनाया जाये, उस के ज़रिये प्रतिगामी दृष्टिïकोण तथा विचारों को संरक्षण न दिया जाये, लेकिन इस का अर्थ यह नहीं है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत में चूँकि धर्म के तत्व शामिल हैं, इसलिए उस समूची विरासत को ही ठुकरा दिया जाये। वैकल्पिक समाज-व्यवस्था की अवधारणा में यह बात भी स्पष्टï रहनी चाहिए कि उस में कोई व्यक्तिगत और समूहगत वैशिष्टï्य बने रहेंगे। ऐतिहासिक, भौगोलिक, धार्मिक, सांस्कृतिक या एथनिक कारणों से जिन समूहों की एक अलग और विशिष्टï पहचान बनती है, उसे नष्टï करने की बात नहीं होगी। मसलन, जो धोती-कुरता पहनते हैं, वे धोती-कुरता पहनेें, जो पैंट शर्ट या जींस पहनते हैं, वे पैंट शर्ट या जींस पहनें। लेकिन सब को धोती-कुरता ही पहनना पड़ेगा या हिन्दुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा, ऐसा आग्रह नहीं होना चाहिए। सभी व्यक्ति और सभी मानव समूह एक जैसे नहीं हो सकते। वैकल्पिक व्यवस्था में यह देखना होगा कि उन की यह भिन्नता या विशिष्टïता खंडित न हो, बल्कि यह विविधता जनतांत्रिक ढंग से बनी रहे। लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि इस के आधार पर कोई व्यक्ति या समूह किसी अन्य व्यक्ति या समूह का दमन और शोषण न करे, अपने आचार-विचार को दूसरों पर ज़बरदस्ती थोप न सके। उद्देश्य होना चाहिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को और ज्य़ादा सम्पन्न करना, उस से व्यक्ति के व्यक्तित्व को और ज्य़ादा समृद्घ करना, उसे और ज्यादा सामूहिक तथा जनतांत्रिक बनाना। लेकिन यह सब एक लम्बी प्रक्रिया में होगा और इस के सम्बन्ध में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि यह सब कैसे होगा।

            संस्कृति के मामले में हमें यह भी देखना चाहिए कि उसे सीधे-सीधे क्रांतिकारी परिवर्तनों से नहीं जोड़ा जा सकता। मसलन, यह समझना भूल है कि क्रांति होते ही संस्कृति बदल जायेगी अथवा जब तक क्रांति नहीं होती, संस्कृति यथावत बनी रहेगी। क्रांतिकारी परिवर्तन से पहले या उस के बाद जो प्रभुत्वशाली संस्कृति होती है, उस में पहले ही अवशिष्ट संस्कृति भी रहती है, लेकिन उसी में से एक वैकल्पिक संस्कृति भी उभर रही होती है। अत: संस्कृति में ऐसी समरसता नहीं होती कि सब उसे समान भाव से स्वीकार कर लें। मसलन, भारत में आज जो प्रभुत्वशाली संस्कृति है, उस में बहुत कुछ ऐसा है, जो पूर्वनिर्मित है, आज के लिए अनुपयुक्त और अप्रासंगिक है। उन अवशेषों का इस्तेमाल करते हुए साम्प्रदायिक या फासीवादी राजनीति की जा रही है। लेकिन इसी प्रभुत्वशाली संस्कृति के अन्दर से एक ऐसी संस्कृति भी उभरती दिखायी देती है, जो इस की विरोधी है और जनतन्त्र तथा समाजवाद की दिशा में ले जाती है। क्रांति या सत्ता परिवर्तन के न होने पर भी वह निर्मित हो रही है और अवशिष्टï तथा प्रभुत्वशाली संस्कृति का प्रतिरोध कर रही है। यह उस निर्णायक बिन्दु का इन्तजार नहीं कर सकती, जब सत्ता परिवर्तन के बाद विकल्प की प्रभुत्वशाली संस्कृति बनेगी। उस निर्णायक बिन्दु तक पहुँचने से पहले इस उभरती हुई संस्कृति को विकसित न किया गया, तो वैकल्पिक व्यवस्था के लिए किये जाने वाले पतरवर्तन की प्रक्रिया में हम उन लोगों को शरीक नहीं कर सकेंगे, जिन की मदद से ही नयी संस्कृति और नया विकल्प बनेगा। जहाँ तक क्रांति से पहले या क्रांति के बाद सांस्कृतिक क्रांति का सवाल है, मुझे ये दोनों ही यांत्रिक सोच से उत्पन्न अवधारणाएँ लगती हैं, जिन में संस्कृति को या तो जल्दी-जल्दी तैयार करने की बेसब्री होती है या राजनैतिक परिवर्तन न कर पाने से उत्पन्न हताशा की इस प्रकार की स्वीकृति  कि जब तक वैकल्पिक संस्कृति नहीं बनेगी, तब तक नया विकल्प भी नहीं बनेगा। मेरे विचार से ये दोनों ही बातें गलत हैं।

साभार : आज के सवाल-5 : विकल्प की अवधारणा (सम्पादन: रमेश उपाध्याय एवं संज्ञा उपाध्याय :  प्रकाशन : शब्द संधान, नई दिल्ली)

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