आलेख


पिछले साल मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकारी नौकरियों में से सत्ताईस प्रतिशत को सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित करने के राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के फैसले के विरुद्ध देश के कई हिस्सों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। उत्तर भारत के कई राज्यों में इस निर्णय के खिलाफ एक जबरदस्त आंदोलन खड़ा हो गया, जिसे शिक्षित मध्यवर्ग के बड़े हिस्से का समर्थन मिला। इस आंदोलन के आक्रामक रूप धारण कर लेने के बाद जब तोड़-फोड़ की घटनाएं हुईं, तो भी आंदोलन के प्रति मध्यवर्ग के सहानुभूतिपूर्ण रवैये में कोई विशेष अंतर नहीं आया।

समाचार-पत्रों और दूसरे प्रचार माध्यमों के जरिए उस समय ऐसा उत्तेजनापूर्ण वातावरण पैदा हो गया कि आरक्षण के मसले पर ठंडे दिमाग से सोचना बहुत मुश्किल हो गया। जनता के सामने इस मुद्दे को उस समय कुछ इस प्रकार उभारा गया कि मध्यवर्ग के बहुत सारे आदर्शवादी तत्वों को यह लगने लगा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री वी.पी. सिंह ने अपनी कुर्सी बचाने की खातिर एक ऐसा खतरनाक खेल खेल दिया है, जिससे देश में जातिगद विद्वेष की आग भड़क उठेगी और हमारा पूरा समाज इसमें बुरी तरह झुलस जाएगा। वे महसूस करने लगे कि जाति जैसी पिछड़ी हुई सामाजिक संरचना की जकड़न हमारे समूचे व्यवहार में अब निरंतर बढ़ती चली जाएगी और वे लोग भी जो धीरे-धीरे जातिगत संकीर्णताओं से बाहर निकल रहे थे, जब जातिगत आधार पर अपनी पहचान बनाने के लिए विवश हो जाएंगे। वे समाज को इस प्रकार एक धक्के के साथ पीछे की ओर धकेले जाने के विरुद्ध खड़े हो गए और मंडल विरोधी आंदोलन से जुड़ गए।

इस आंदोलन को हवा देने और फैलाने में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी लगे हुए थे, जिनका प्रगतिशील चिंतन से अथवा उन उदार मूल्यों और आदर्शों से कोई लेना-देना नहीं था, जिन पर आधुनिक समाज की मर्यादाएं आमतौर पर टिकी होती हैं। वी.पी. सिंह सरकार किसी तरह गिरे यही उनका मुख्य लक्ष्य था और इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वे मंडल विरोधी आंदोलन को हथियार बनाए हुए थे। मध्यवर्ग के कुछ ऐसे आदर्शवादी तत्त्व भी जिन्हें व्यक्ति की गरिमा, समानता और भाईचारे जैसे मानवीय मूल्यों का वाहक समझा जा सकता है। जब उत्तेजना की झोंक में आरक्षण विरोधी आंदोलन में कूद पड़े, तो वे जनतांत्रिक मूल्यों को रौंद डालने वाले दकियानूसी तत्वों की इस आंदोलन में सक्रियता का सही अर्थ नहीं समझ पाए और पूरे आंदोलन की धार किधर जा रही है, इसका अंदाजा भी नहीं लगा सके।

ऐसी स्थिति में जबकि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही हो और सरकारी नौकरियां सिकुड़ती जा रही हों तथा एड़ी चोटी का जोर लगाने के बाद भी अधिकतर प्रतियोगियों को असफलता का मुंह देखना पड़ रहा हो, अगर मध्यवर्ग के उस हिस्से में जो पिछड़ी जातियों की परिधि में नहीं आता और अपनी रोजी-रोटी के लिए सरकारी नौकरियों पर ही निर्भर करता है, सरकार के आरक्षण-संबंधी निर्णय के बारे मेें आत्यंतिक और उत्तेजनापूर्ण प्रतिक्रिया उभर आए, तो हमें ज्यादा ताज्जुब नहीं होना चाहिए। इन लोगों को आरक्षण नीति के परिणाम घातक नजर आएंगे और अपना तथा समाज का भविष्य अंधकारमय होता दिखाई देगा। इस तरह की मन:स्थिति में दोस्त और दुश्मन की उनकी परिकल्पना में भी खासी अतिरंजना और एकांगिता आ जाएगी। यही कारण है कि मंडल विरोधी आंदोलन में शरीक सभी युवक उन्हें एक बड़े आदर्श के लिए लड़ने वाले योद्धा नजर आए और वी.पी. सिंह तथा उनकी राजनीति को उन्होंने अपना मुख्य शत्रु समझा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आंदोलन में भागीदारी करने वाले युवकों में से बहुतों के अंदर आदर्शवादी रुझान काफी प्रबल था और वे ईमानदारी के साथ महसूस कर रहे थे कि अपने व्यक्तिगत हित साधने की बजाए एक बड़े सामाजिक लक्ष्य से प्रेरित होकर वे इस आंदोलन में आगे आए हैं। इस आदर्शवादिता के आलोक में उन्होंने आंदोलन में शरीक ऐसे तत्वों को भी जो कल तक गुंडागर्दी करने और धौंसपट्टी जमाने के लिए बदनाम थे तथा उन दिनों भी पैसे ऐंठने, लोगों को डराने-धमकाने, फूहड़ गाली देने और तोड़-फोड़ करने में लगे थे, ऐसे  वीर पुरुषों के दस्ते के रूप में देखा जो समाज को पीछे धकेलने की साजिश को नाकाम बनाने का बीड़ा उठाए हुए थे।

आंदोलन की ऐसी छवि मध्यवर्ग की सभी परतों से ताल्लुक रखने वाले बहुत सारे लोगों ने मिलजुल कर बनाई थी। इस छवि से प्रभावित होकर वे युवक भी, जो पढ़-लिख कर नाम कमाने तथा अच्छे पदों पर बैठ जाने के लक्ष्य में इतने उलझे रहते हैं कि अपनी पढ़ाई में जरा सा व्यवधान भी उनको बहुत अखरता है, इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लेने लगे। आंदोलन को गौरवमंडित करके देखने की प्रवृत्ति के चलते इससे जुड़े हुए सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों को वस्तुपरक ढंग से देख पाना उनके लिए संभव नहीं था। यह आकस्मिक नहीं है कि यह आंदोलन जल्दी ही बहुत सारे युवकों के लिए ऐसा महायज्ञ बन गया, जिसमें डाली जाने वाली कोई भी आहुति कम दिखाई देती हो। यथार्थ के धरातल पर कुछ निश्चित लक्ष्यों को लेकर चलाए जा रहे संघर्ष की जगह उनके लिए इसने एक ऐसे कर्मकाण्डी अनुष्ठान का रूप ग्रहण कर लिया, जिसमें काव्यात्मक अनुभूति प्रमुख हो जाती है और समस्याओंं का वास्तविक हल ढूंढ निकालने की जिम्मेदारी का अहसास पीछे चला जाता है।

पूरे आंदोलन के भावुकतापूर्ण आदर्शीकरण का सबसे अधिक त्रासद परिणाम यह हुआ कि छोटी आयु के बहुत सारे मासूम और अतिसंवेदनशील बच्चों ने इसमें अपनी चरम आहूति देने का निर्णय ले लिया और आत्मदाह करके जान ले लेने की दिल दहला देने वाली घटनाओं का सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। इस आंदोलन के चरित्र को समझने में हमें इस बात से विशेष तौर पर मदद मिल सकती है कि एक साधारण सामाजिक गतिविधि न रहकर यह एक काव्यात्मक अनुष्ठान बनता चला गया और इसके जरिए लोगों को यथार्थ और फैंटेसी का एक मादक सम्मिश्रण सुलभ होने लगा। ऐसे आंदोलन लोगों को भटकाव में डालकर अंतत: ऐसी जगह खड़ा कर देते हैं, जहां उन सभी आधारभूत मूल्यों और संकल्पों का हनन हो जाता है, जिनके जरिए उनके व्यक्तित्व की मानवीय पहचान बनती है। मंडल विरोधी आंदोलन का सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यही है कि समानता और सामाजिक न्याय जैसे जनतांत्रिक मूल्यों में गहरा विश्वास रखने वाले बहुत सारे बुद्धिजीवी, जिन्हें साधारणतया दलितों के पक्ष में जाने वाली उदार राजनीति का समर्थक होना चाहिए। इस आंदोलन की राह चलते-चलते आज साम्प्रदायिक उभार की राजनीति की चपेट में आ चुके हैं। दिग्भ्रमित होने की प्रक्रिया की यह परिणति गंभीर चिंता होते हुए भी एकदम अस्वाभाविक नहीं कहीं जा सकती।

आज जब मंडल-विरोधी आंदोलन की उत्तेजनाएं धीमी पड़ गई हैं। हमें इसके वास्तविक चरित्र को समझने का गंभीर प्रयास करना चाहिए और उसके माध्यम से रेखांकित  हुए आरक्षण के मुद्दे का वस्तुपरक विश£ेषण करते हुए यह देखना चाहिए कि अपने चिंतन की कौन सी अमूर्तताओं तथा संवेदना की किन कमजोरियों के कारण बहुत सारे उदार और आदर्शवादी रुझान रखने वाले व्यक्ति इस मुद्दे के बारे में गलत निष्कर्षों पर पहुंच गए। इन अमूर्तताओं और कमजोरियों का उन्हें अहसास दिलाना इसलिए भी जरूरी हो गया है कि इन्हीं की वजह से वे आज एक ऐसी राजनीतिक प्रवृत्ति के समर्थक बन गए हैं, जिसके जोर पकड़ने से हमारे देश की जनता को एक सूत्र में बांधने वाले और उनकी अपनी अस्मिता को परिभाषित करने वाले जनतांत्रिक मूल्यों और सहनशीलता, धर्म-निरपेक्षता तथा सामाजिक न्याय जैसी मर्यादाओं का या तो पूरी तरह नकार हो जाएगा या फूहड़ विकृतीकरण।

अपनी तरफ से पूरी ईमानदारी और साफ नीयत से काम करते हुए भी यदि कोई व्यक्ति अथवा समुदाय अपने परिप्रेक्ष्य के अधूरेपन, अपनी सोच की अनचीन्ही असंगतियों अथवा अपनी संवेदना की निचली परतों में दबी पड़ी कमजोरियों के कारण किसी ऐसे सवाल पर, जो राजनीतिक दृष्टि से तथा सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के अन्य धरातलों पर भी अपना विशेष महत्व रखता है, गलत रवैया अख्तियार कर लेता है, तो उसे अपनी गलती का अहसास हो इसके  पहले पूरे समाज को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है। आरक्षण के विरोध में मध्य वर्ग के आदर्शवादी तत्वों ने अपने मत के पक्ष में जो दलीलें पेश की, उन्हें यहां संक्षिप्त रूप में एक साथ देना उचित ही होगा।

यद्यपि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए पहले से चले आ रहे आरक्षण का मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण संबंधी सरकार के निर्णय का कोई सीधा ताल्लुक नहीं था, फिर भी मंडल विरोधी आंदोलन के दौरान उसकी भी तीखी आलोचना की गई। लगता है कि उनके मन में आरक्षण के खिलाफ जो आपत्तियां पहले से मौजूद थीं, उन्हें सरकार के इस निर्णय से बाहर आने का अवसर मिल गया। उनकी राय में चूंकि आरक्षण संबंधी किसी भी नीति से समानता के सिद्धांत की अवहेलना होती है, उसे न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक आधुनिक समाज अपने सभी नागरिकों को बराबर मानकर खुली प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर देता है और व्यक्ति अपने-आप को दूसरों से अधिक योग्य सिद्ध कर देते हैं, उन्हें पदों के लिए चुन लिया जाता है। पदोन्नति  के अवसर भी इसी प्रकार योग्यता, कार्यकुशलता और अनुभवसम्पन्नता के आधार पर दिए जाते हैं। सामाजिक न्याय की उनकी अवधारणा में इस प्रकार की बराबरी पर खूब बल दिया जाता है। उनका कहना है कि आरक्षण की नीति के अंतर्गत जब कम योग्य व्यक्तियों को पदों के लिए चुन लिया जाता है या पदोन्नति के सामान्य नियमों का उल्लंघन करते हुए उन्हें आगे बढऩे के लिए विशेष अवसर दिए जाते हैं तो इससे योग्य व्यक्तियों के साथ व्यक्तिगत स्तर पर तो अन्याय होता ही है, पूरे समाज को भी अंतत: बड़ी भारी क्षति पहुंचती है। अगर समाज में अयोग्य व्यक्तियों का बोलबाला हो और योग्य व्यक्ति अपने अधिकारों से वंचित कर दिए जाने से उदासीनता और निराशा की भावना से भरे हों, तो सामाजिक वातावरण तो बिगड़ेगा ही, कार्यकुशलता का स्तर भी काफी गिर जाएगा।

आरक्षण-नीति के बारे में  इस प्रकार की गंभीर आपत्तियों के बावजूद मध्यवर्गीय आदर्शवादी तत्व कभी-कभी यह तो स्वीकार कर लेते हैं कि गरीबी और शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े माहौल में फंसे होने के कारण हमारे समाज में कुछ लोग अवसरों की समानता का पूरा लाभ उठाने की स्थिति में नहीं होते। लेकिन इस समस्या से निपटने के लिए उनका सुझाव सामान्यतया नहीं होता है कि नौकरियों में आरक्षण की बजाए आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए व्यक्तियों को, जब कभी उनके अंदर प्रतिभा की संभावनाएं  दिखाई देती हों, अपनी योग्यताओं को विकसित करने की यथेष्ट सुविधाएं दी जाएं, उनकी पढ़ाई-लिखाई पर आने वाले खर्चे की जिम्मेदारी सरकार अपने ऊपर ले, उन्हें छात्रवृत्तियां दी जाएं और आसान शर्तों पर कर्जे भी दिए जाएं। लेकिन आर्थिक दृष्टि से पिछड़े व्यक्तियों को सहारा देने के नाम पर नौकरियों के लिए खुली प्रतियोगिता के सिद्धांत की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। अगर एक आत्यंतिक विकल्प के रूप में ऐसे व्यक्तियों को प्रतियोगिता के दायरे में लाने के लिए आरक्षण के प्रावधान का सहारा लेना भी पड़े, तो ऐसी स्थिति में वे चाहेंगे कि यह छूट बहुत सीमित पैमाने पर दी जाए, समूहों की बजाए व्यक्तियों को सुलभ हो और आर्थिक दृष्टि से कमजोर स्थिति ही इसका एकमात्र आधार हो। जाति  के आधार पर सामूहिक आरक्षण के प्रावधान को तो वे हर हालत में अनुचित और समाज के लिए हानिकारक मानकर चलते हैं।

आरक्षण के लिए जाति को आधार बनाना उनकी नजरों में पूरी तरह असंगत और पक्षपात पूर्ण है, क्योंकि किसी भी जाति से संबंध रखने वाले सभी व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से एक समान नहीं होते। जातिगत आधार पर आरक्षण से किसी जाति विशेष के गरीब लोगों को भले ही अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति से छूट पाने का मौका मिल जाता हो, लेकिन  ऐसी जातियों से संबंधित गरीब लोग जो जातिगत आरक्षण की परिधि में नहीं आतीं, इस लाभ से वंचित रह जाते हैं, जोकि एकदम पक्षपातपूर्ण है। इससे भी अधिक आपत्तिजनक बात यह है कि जाति के आधार पर आरक्षण समूहगत होने के कारण इस बात की पूरी गुंजाइश छोड़ देता है कि जिन व्यक्तियों को सुविधा मिलनी चाहिए उनकी बजाए उसी जाति के गिने-चुने साधन सम्पन्न लोग ही इस सुविधा का अनुचित लाभ उठाते हैं।

अनुसूचित जातियों और जनजातियों को समूहगत रूप में दिए गए आरक्षण के अब तक के परिणामों से यह असंगति एकदम स्पष्ट हो जाती है। इन जातियों से मुट्ठी भर लोगों का ऐसा गिरोह उभर आया है, जो समूहगत आरक्षण की सुविधा को पूरी तरह हड़प जाता है और बाकी सब लोग अपनी गरीबी और अशिक्षा के कारण जैसे के तैसे बने रहते हैं। इन जातियों को समग्र रूप में देखें तो उनकी स्थिति में आरक्षण से कोई अंतर नजर नहीं आएगा। आज भी गरीबी, कुपोषण और बेरोजगारी की मार उन पर वैसे ही पड़ रही है, जैसे पहले-पहले थी। अब भी वे लोग अनेक प्रकार की ज्यादतियों और बर्बरताओं के शिकार  हो रहे हैं। जिन गिने-चुने साधन सम्पन्न लोगों को जातिगत आरक्षण का लाभ अब तक मिलता रहा है, उनमें और उसी जाति के गरीब लोगों में खान-पान जीवन पद्धति और संस्कारों की दृष्टि से कोई निकटता नहीं रह गई है। अपनी जाति के गरीबों के साथ खड़े होने की बजाए वे लोग निहित स्वार्थों के गुर्गे बनकर परजीवी और दलाल संस्कृति को बढ़ावा देते रहे हैं। दरअसल उनके व्यक्तिगत स्वार्थ तो इस बात से जुड़ जाते हैं कि समाज में जातिगत विभाजन बना रहे और विभिन्न जातियों के बीच विषमताएं भी कम न हों ताकि यथास्थिति के समर्थक होने की अपनी भूमिका को पूरी कीमत वे वसूलते रहें।

उनका निष्कर्ष यही है कि जाति को आधार बनाकर हम जातिवाद की गलत प्रवृत्ति को ही बढ़ावा देते हैं। सामाजिक दृष्टि से पिछड़ी कही जाने वाली जातियों के अंदर केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, विभिन्न जातियों के बीच भी काफी बड़े पैमाने पर विषमताएं मौजूद रहती हैं। जातिगत आरक्षण का अनुचित लाभ उठाने वाले सत्ता के सेवकों की यहां खूब बन आती है। सामाजिक दृष्टि से पिछड़ी जातियों की कोटि में कुछ जातियां तो केवल नाम-मात्र की पिछड़ी हुई रह गई हैं। भूस्वामी होने के नाते उनमें से बहुत से लोग आर्थिक दृष्टि से काफी सम्पन्न हैं। ये गिने-चुने सम्पन्न लोग अपनी जाति-विशेष को मिले समूहगत आरक्षण का ही नहीं, उन जातियों के हिस्से का भी पूरा लाभ उठाते हैं जो पिछड़ी जातियों की कोटि में नीचे की परतों में जगह पाती हैं। इसलिए आरक्षण-विरोधी बुद्धिजीवियों की राय में जाति के आधार पर समूहगत आरक्षण वोट की राजनीति के तहत पनपने वाली अवसरवादिता के अंतर्गत गरीब लोगों के अंदर झूठी आशाएं जगाने वाले एक छल से ज्यादा कुछ नहीं है।

इस प्रकार की अवसरवादिता से उन्हें विशेष रूप से इसलिए चिढ़ है, क्योंकि इससे हमारा समाज ऐसे समूहों में बंट जाएगा, जो आपसी विद्वेष के कारण एक-दूसरे से टकराते रहेंगे और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करते रहेंगे। मध्यवर्ग के ये आदर्शवादी तत्व यह देखकर बड़े हैरान होते हैं कि जातिवाद को बढ़ावा देने वाली तथा संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थों को साधने के लिए अपनाई गई इस प्रकार की, सामाजिक दृष्टि से हानिकारक और प्रतिगामी नीति को अपने-आपको प्रगतिशील कहने वाले और सामाजिक जीवन में जाति के स्थान पर वर्ग की भूमिका पर जोर देने वाले प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का समर्थन कैसे मिल रहा है। उनके रवैये में उन्हें या तो कोरी पैंतरे-बाजी दिखाई देती है या भारतीय समाज के मसलों को ठीक से न समझ पाने की उनकी चिरपरिचित विमूढ़ता।

संभव है कि शिक्षित मध्यवर्ग के व्यापक हिस्सों को सामान्य ज्ञान पर आधारित अपनी सोच के मुताबिक आरक्षण के विरोध में दी जाने वाली इस प्रकार की दलीलों में कोई खोट या कमी दिखाई न दे। लेकिन बारीकी से देखने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि आरक्षण नीति का इस प्रकार का विरोध सही नहीं है। सवाल यहां विरोध करने वालों की नीयत और इरादों का उतना नहीं है, जितना कि परिप्रेक्ष्य की सीमाओं तथा आदर्शों और आकांक्षाओं के स्तर पर सूक्ष्म रूप में मौजूद उन संकीर्णताओं का है, जिन्हें आरक्षण विरोधी स्वयं नहीं देख पाते। दरअसल आरक्षण नीति के वास्तविक लक्ष्यों तथा उसके समूचे स्वरूप को समझने की कोशिशों में ये बुद्धिजीवी अपनी पूरी सदाशयता के बावजूद गलत निष्कर्षों पर पहुंचते रहे हैं।

आरक्षण का प्रावधान हमारे संविधान में जिस रूप में हुआ है ये बुद्धिजीवी उसे ठीक से पहचान नहीं पाते। यह प्रावधान वहां स्पष्ट तौर पर व्यक्तिगत न होकर समूहगत है और इसका आधार भी सामाजिक दृष्टि से पिछड़ापन माना गया है, न कि आर्थिक विपन्नता। संविधान में कानूनी हैसियत और अवसरों की समानता संबंधी नागरिक के मौलिक के अधिकारों  के संदर्भ में संरक्षणात्मक तरफदारी के रूप में तथा सामाजिक  न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने से संबंधित धाराओं में आरक्षण की आवश्यकता का जिक्र किया गया है। आरक्षण का विरोध करने वाले बुद्धिजीवी अपनी पूरी आदर्शवादिता के बावजूद इस संवैधानिक प्रावधान के सही अर्थ को यदि नहीं पकड़ पाते, तो इसका  यही मतलब निकलता है कि हमारे सामाजिक ढांचे की वास्तविकता के किसी ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष की वे अनदेखी कर जाते हैं, जो हमारे संविधान के निर्माताओं की पैनी नजर से छिपा हुआ नहीं था।

हमारा संविधान सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने में केवल उन नियमों को तर्कसंगत मानता है जो पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली के साथ परिभाषित होते हैं। इस दृष्टिकोण से देखने पर समाज की वही तस्वीर स्वाभाविक अथवा प्राकृतिक लगती है, जहां हर व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता तथा इन्सानी हैसियत की दृष्टि से सभी व्यक्तियों की बराबरी और भाईचारे के आदर्शों को मान्यता दी जाती हो और जाति, धर्म, लिंग, भाषा और आर्थिक स्थिति की भिन्नताओं को इस मामले में कोई महत्व नहीं दिया जाता। संविधान के पीछे काम कर रहे दृष्टिकोण को आरक्षण-विरोधी बुद्धिजीवी मोटे तौर पर तो समझ जाते हैं, लेकिन वे यह नहीं देख पाते कि पूर्व-पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था के अवशेषों के कारण पोषित होने वाली ऊंच-नीच की भावना पर आधारित उन सभी पक्षपातपूर्ण नियमों और मानदंडों को इसी दृष्टिकोण के आधार पर असंगत और अनुचित माना गया है, जिनके कारण पूरे के पूरे समूहों को व्यापक सामाजिक सांझेदारी की परिधि से बाहर निकाल दिया जाता हो और भाईचारे की भावना का भी इन समुदायों के संदर्भ में कोई अर्थ नहीं रह जाता हो।

हमारे संविधान के निर्माताओं ने यह पहचाना कि सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सामंती संस्थाओं और प्रक्रियाओं के अवशेष अभी मौजूद हैं और पूंजीवादी व्यवस्था के साथ उभर कर आए जनतांत्रिक आदर्शों और मर्यादाओं के अनुसार सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित किए जाने में वे बाधा डालते हैं। जब तक इन बाधाओं को दूर नहीं किया जाता, समाज के कुछ तबकों से संबंध रखने वाले व्यक्तियों के लिए सामाजिक गतिविधियों  में संविधान में व्याख्यायित मर्यादाओं के अनुसार हिस्सा लेना संभव ही नहीं है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमारे संविधान में उन समूहों के लिए जो अभी भी किसी न किसी रूप में सामंती अवशेषों की मार झेल रहे हैं, आरक्षण के प्रावधान के रूप में संरक्षणात्मक तरफदारी देने की जरूरत को पहचाना गया है। जाति, धर्म और लिंग भी संस्थागत रूप में  विद्यमान हैं, जिनके चलते संविधान द्वारा वैद्यता प्रदत्त नियमों, सुविधाओंं और आश्वासनों का कोई मतलब नहीं रह जाता। इन पिछड़ी हुई संरचनाओं को खत्म करके ही पूंजीवादी सिद्धांतों पर पूरी तरह खरे उतरने वाले समाज की कल्पना की जा सकती है।

लगता है कि आरक्षण का विरोध करने वाले बुद्धिजीवी या तो यह मानकर चल रहे हैं कि हमारा समाज आज पूरी तरह पूंजीवादी व्यवस्था के साथ विकसित हुए सिद्धांतों के अनुरूप चल रहा है और सामंती अवशेष अपने-आप खत्म हो गए हैं या फिर वे जैसा कि हम आगे चलकर देखेंगे, सामंती उत्पीड़न और पूंजीवादी शोषण के बीच जो महत्वपूर्ण भिन्नताएं हैं उन्हें पहचान नहीं पाते। हमारे संविधान में इन संरचनाओं को एक दम पूरी तरह समाप्त करने का प्रावधान तो नहीं है, पर इन्हें कमजोर बनाने के एक उपाय के रूप में सामाजिक दृष्टि से उत्पीडि़त जातियों को समूहगत आरक्षण देने की कल्पना अवश्य की गयी है, ताकि इन जातियों से संबंध रखने वाले व्यक्तियों के लिए अवसरों की बराबरी का अधिकार वास्तविक बन सके। चूंकि इस प्रकार के आरक्षण को पुरानी सामंती संरचनाओं के प्रभाव को काटने के लिए चुना गया है, इसीलिए उसे  समूहगत रखा गया है और उनका आधार भी सामाजिक पिछड़ापन माना गया है। इन संरचनाओं का कुप्रभाव व्यक्तिगत न होकर समूहगत होता है। कुछ जातियों को सामूहिक रूप में ऐसे विशेष अधिकार और सुविधाएं मिली होती हैं, जिन्हें आधुनिक समाज के नियमों के अनुसार उचित नहीं समझा जा सकता और कुछ दूसरी जातियों से संबंधित लोगों को सामूहिक रूप से तिरस्कृत भी रखा जाता है।

आरक्षण-विरोधी मध्यवर्गीय आदर्शवादी तत्व आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्रावधान के स्वरूप और आधार को समझने में इसलिए चूक जाते हैं क्योंकि वे अपने चिंतन की अमूर्तता के कारण इसकी संदर्भगत प्रासंगिता को नहीं पकड़ पाते। आरक्षण की नीति को किस विशिष्ट सामाजिक संदर्भ में किन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अपनाया गया, इस पर गौर किए बिना हम उससे गलत अपेक्षाएं करने लगते हें और इन अपेक्षाओं को पूरा न होते देख उसकी अनावश्यक रूप से आलोचना करने लगते हैं। अनुसूचित जातियोंं और जनजातियों के लिए किए गए आरक्षण के बारे में इन तत्वों की गैरवाजिब आलोचना में यह कमजोरी स्पष्ट दिखाई देती है। इसके बारे में कहा गया है कि आरक्षण के बावजूद चालीस साल बाद भी इन जातियों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है और केवल मु_ी-भर लोगों को ही इसका लाभ मिलता रहा है।

इस निष्कर्ष के पीछे आरक्षण के बारे में यह गलत धारणा काम कर रही है कि इस प्रावधान के जरिए दलितों की गरीबी दूर करने, सुख-सुविधाओं के मामले में  उन्हें दूसरे सम्पन्न लोगों के बराबर ला खड़ा करने का लक्ष्य सामने रखा गया था। परन्तु हम यह क्यों भूल जाते हैं कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ उभरकर आए नियमों के अनुसार गरीबी-अमीरी की विषमताएं बनी रहने को अस्वाभाविक अथवा अप्राकृतिक नहीं माना जाता, अलबत्ता यह स्वीकार किया जाता है कि कुछ गरीब व्यक्ति अपने अध्वयवसाय और सुखद संयोगों के बल पर अमीर बन सकते हैं और कुछ अमीर लोग अपनी काहिली अथवा दुख संयोगों के कारण घाटे की मार खाकर गरीबी की ओर धकेल दिए जाते हैं। इन नियमों के अनुसार सम्पति की असमानताएं असंगत नहीं हैं, बल्कि गरीबों और अमीरों के बीच विभाजन-रेखा का एक ऐसी सख्त दीवार या परत का रूप लेना असंगत और अनुचित है, जिसके कारण एक ओर से दूसरी ओर व्यक्ति का स्थानांतरण संभव न हो। इसीलिए आरक्षण के जरिए सामंती अवशेषों से पीडि़त समूची जातियों को सम्पन्न बनाने का आश्वासन नहीं दिया जाता, केवल अवसरों की समानता में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाती है।

अवसरों की समानता का अर्थ केवल इतना है कि शिक्षा प्राप्त करके और प्रतियोगिताओं में भाग लेकर समाज के विशेष कामकाजों को चलाने, प्रशासन के अंदर विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए जो गिने-चुने लोग चाहिएं, उनकी भर्ती समाज के सभी वर्गों से हो सके और कोई वर्ग प्रतियोगिता की परिधि से बाहर न रह जाए। इसीलिए आरक्षण के प्रावधान का मतलब अनुसूचित जातियों और जनजातियों की गरीबी दूर करना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित  करना था कि अतिविशिष्ट तत्वों के निर्माण की प्रक्रिया में सामंती उत्पीड़न की चपेट में आने वाले समुदायों में से भी कुछ व्यक्तियों को खींच कर लाया जा सके।

आरक्षण के जरिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों की आर्थिक स्थिति नहीं सुधर सकी और वे दूसरे सम्पन्न वर्गों के बराबर नहीं आ पाए, यह कहकर उसकी विफलता को सिद्ध करना उतना ही बेतुका है, जितना अवसरों की समानता को केवल इसलिए निरर्थक घोषित करना कि वास्तविक लाभ तो इससे केवल उन्हीं थोड़े से प्रतियोगिओं को मिलता है जो चुन लिए जाते हैं और बाकी सब तो वैसे ही रह जाते हैं। जैसे प्रतियोगिता में  भाग लेने से पहले थे। आरक्षण के बारे में इस प्रकार की गलत आलोचना का सीधा संबंध दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा जगायी जाने वाली आशाओं के वस्तुपरक सार तत्व को ठीक से न आंक पाने की मध्यवर्गीय आदर्शवादी तत्वों की असमर्थता से है।

स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की जो परिकल्पनाएं पूंजीवादी व्यवस्था के साथ उभर कर आती हैं उनमें एक जैसा सार तत्व नहीं होता। उदाहरण के लिए स्वतंत्रता का अर्थ यदि यह लगाएं कि प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा की कद्र होनी चाहिए, एक इन्सान के तौर पर उसके स्वतंत्र अस्तित्व को कोई ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए, तो उस दृष्टि से देखने पर इस आदर्श में हमें काफी ठोस सार-तत्व दिखाई देगा। इसी प्रकार सब व्यक्ति अपनी इन्सानी हैसियत के कारण बराबर हैं और सामाजिक भाईचारे में उनकी एक जैसी सांझेदारी है। इस दृष्टि से बराबरी और भाईचारे के आदर्शों में भी काफी सकारात्मकता नजर आएगी।

यह कोई मामूली बात नहीं है कि कोई व्यक्ति गरीब हो अथवा अमीर, इन्सान होने की हैसियत से अपना आत्म-सम्मान बनाए रखने का उसे बराबरी का हक है। बूज्र्वा जनतांत्रिक आदर्शों की इस सकारात्मकता का ही परिणाम है कि राजकाज चलाने में भागीदारी करने की जिम्मेदारियों का सवाल हो अथवा राज्य द्वारा सुविधाएं प्रदान करने का, नागरिक की हैसियत से सबको बराबर मानकर चला जाता है। सामाजिक न्याय की परिभाषा में इससे एक गुणात्मक बदलाव आ जाता है। सामंती व्यवस्था के अंतर्गत जिन्हें इंसान से  कुछ कम समझ कर सामाजिक बिरादरी की परिधि से बाहर रखा जाता है, उन्हें भी इन्सान होने और इस हैसियत से दूसरों जैसे ही नागरिक होने का अहसास कराया जाता है। सामंती उत्पीड़न  झेलने वाले तबकों के लिए हैसियत में आए इस प्रकार के बदलाव को एक मूल्यवान उपलब्धि मानें, तो हमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए।

जनतांत्रिक आदर्शों के इस सकारात्मक पहलू के ही मुताबिक अवसरों की समानता के अधिकार को वास्तविक बनाने के लिए की गयी संरक्षणात्मक छूट का लाभ उठाकर इन वर्गों से संबंध रखने वाले कुछ लोग जब ऊंचे पदों पर पहुंच जाते हैं, तो समूची जाति के अंदर सामूहिक रूप से इन्सानी बिरादरी का हिस्सा होने का अहसास दृढ़ हो जाता है। अवसरों की समानता के सिद्धांत के बल पर आर्थिक लाभ भले ही गिने-चुने लोगों को होता हो, इन्सानी गरिमा की दृष्टि से सभी की बराबरी रेखांकित हो जाती है। जाति के आधार पर सामाजिक दृष्टि से पिछड़े और उत्पीडि़त वर्गों (जातियों) के लिए सामूहिक तौर पर आरक्षण  देने की नीति के इस प्रगतिशील पहलू के कारण ही जनतांत्रिक आदर्शों में गहरी आस्था रखने वाले बहुत सारे वामपंथी और गैर-वामपंथी बुद्धिजीवी उसका समर्थन करते हैं, यद्यपि वे जानते हैं कि इससे न तो पिछड़ी जातियों के सामंती उत्पीड़न का पूरी तरह अंत होगा और न ही उन्हें पूंजीवादी शोषण से मुक्ति मिलेगी।

प्रगतिशील और वामपंथी रुझान रखने वाले बुद्धिजीवी भारतीय समाज के गठन की इन वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए ही जातिगत आधार पर सामूहिक आरक्षण का समर्थन करते हैं, यद्यपि इसके साथ ही वे आरक्षण के कारण उन लोगों के अंदर उत्पन्न होने वाली आशाओं की भ्रामकता को उजागर करते हैं तथा इस प्रकार की नीति की अन्य कमजोरियों, अपर्याप्ताओं और विकृतियोंं की भी आलोचना करते हैं। जहां तक आरक्षण की नीति से भ्रम पैदा होने की बात है, वह तो जनता के हित में मौजूदा व्यवस्था द्वारा दिए जाने वाले बहुत सारे अन्य आश्वासनों पर भी लागू होती है। जनता को इन विभ्रमों के मोह से निकालना एक दिन का काम नहीं हो सकता। इसकी अपनी एक लंबी प्रक्रिमा है। आरक्षण का विरोध करने वाले खुद इस प्रकार के विभ्रमों का शिकार होने के कारण मौजूदा व्यवस्था में लागू होने वाले जनतांत्रिक मूल्यों के वास्तविक सार-तत्व को आंकने में कई प्रकार की भूलें कर जाते हैं।

आरक्षण की नीति का इस आधार पर विरोध करना कि इससे गरीब जनता में विभ्रम फैलते हैं, उन बुद्धिजीवियों के संदर्भ में विशेष रूप से अनुचित और असंगत लगता है जो स्वयं, मौजूदा व्यवस्था उन्हें क्या दे सकती है, इसके बारे में अनेक विभ्रमों  के शिकार हों और इस व्यवस्था को नियंत्रित करने वाले नियमों की असंगतियों को भी नहीं पकड़ पाते। मौजूदा व्यवस्था द्वारा लागू की जाने वाली आरक्षण नीति पिछड़ी जातियों के लोगों को सामंती उत्पीड़न की परिधि से कहां तक बाहर निकाल सकेगी, इसके बारे में उनके अंदर जरूरत से ज्यादा अपेक्षाओं का पैदा हो जाना इन बुद्धिजीवियों की उन भूलों से कहीं ज्यादा क्षम्य है, जो मौजूदा व्यवस्था की सामाजिक न्याय संबंधी प्रतिश्रुतियों की सार्थकता और वास्तविकता को मापने में अपने विभ्रमों के कारण अनेक गलतियां कर जाते हैं। उदाहरण के तौर पर आरक्षण-विरोधी बुद्धिजीवी जब नौकरियों में आरक्षण करने की जगह समाज के कमजोर और वंचित तबकों के प्रतिभावान व्यक्तियों की उचित शिक्षा के लिए सरकार द्वारा हर प्रकार की आर्थिक सहायता देने की बात करते हैं, तो मौजूदा व्यवस्था के चरित्र के बारे में उनकी समझ कितनी सतही है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

पिछड़े लोगों के लिए सरकार अथवा समाज द्वारा यह सब किए जाने की बात  उठाते समय ये बुद्धिजीवी यह जानने की कोशिश नहीं करते कि उनका सुझाव कितना व्यवहारिक है। जब शिक्षा में खर्च की जाने वाली राशि का सरकारी बजटों में अनुपात लगातार घट रहा हो, शिक्षा और अन्य सार्वजनिक सेवाओं की खातिर न्यूनतम खर्चा उठाने में भी सरकार झिझक रही हो, तो पिछड़ी जाति के प्रतिभावान व्यक्तियों को समानता के घेरे में लेने के लिए आवश्यक धनराशि का शतांश भी जुटाया जाएगा। यह मानकर चलना अजीब भोलेपन की निशानी है। वैसे तो नौकरियों में आरक्षण से ज्यादा कारगर तरीका उन कृषि-संबंधों को तोड़ना है, जो सामंती उत्पीड़न की नींव का काम करते हैं। पर इस दिशा में ज्यादा कुछ नहीं किया जाएगा-ऐसा मुगालता हमें नहीं होना चाहिए।

मौजूदा व्यवस्था में समानता के जनतांत्रिक आदर्श के अंतर्गत सभी नागरिकों को उनकी इन्सानी हैसियत बनाए रखने के लिए राजनैतिक माहौल पैदा करने और उसके आधार पर आर्थिक धरातल पर भी बराबरी दिए जाने के लिए इस्तेमाल किए जाने की संभावनाएं और प्रक्रियाएं भी अलग-अलग हैं। आरक्षण-विरोधी मध्यवर्गीय आदर्शवादी तत्व यह सीधी-सी बात नहीं पहचान सके, इसीलिए वे सामंती उत्पीड़न की मार को कम करने के लिए पिछड़ी जातियों की खातिर समूहगत आरक्षण के रूप में की जाने वाली संरक्षणात्मक तरफदारी तथा सार्वजनिक हित में दी जाने वाली सुविधाओं में जो गुणात्मक अंतर होता है, उसे नहीं समझ सके।

पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली के साथ विकसित होने वाले जनतांत्रिक आदर्शों से नियंत्रित संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत कुछ सुविधाएं और सुरक्षाएं ऐसी भी दी जाती हैं जिनका लक्ष्य पूर्व-पूंजीवादी अथवा सामंती ज्यादतियों से निजात दिलाने की बजाय पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर निरंतर जोर पकड़ने वाली विषमताओं को कुछ इस प्रकार सहनशील बनाना होता है कि उनसे उत्पन्न होने वले अंतर्विरोध विस्फोटक रूप धारण करके मौजूदा व्यवस्था के स्थायित्व को भंग न कर सकें। इस दिशा में उठाए गए कदमों को अक्सर ‘सार्वजनिक हित’ को बढ़ावा देने वाली नीतियां कहा जाता है। शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाएं देने, संचार और परिवहन के क्षेत्र में सार्वजनिक सेवाओं का आधारभूत ढांचा खड़ा करने, दैनिक जीवन में काम आने वाली आवश्यक वस्तुओं के उचित दामों पर वितरण की व्यवस्था करने जैसी राज्य की जिम्मेदारियां इनमें शामिल हैं। ये सब सुविधाएं  और सेवाएं शुद्ध आर्थिक आधार पर बिना किसी अन्य प्रकार के भेदभाव के व्यक्तियों के लिए दी जाती हैं। यहां राहत का सार तत्व भी मुख्यतया आर्थिक ही होता है।

पूंजीवादी व्यवस्था को मानवीय चेहरा प्रदान करने वाली इन सब कार्यवाहियों की प्रमुख सीमा यह है कि इनके जरिए वह कुछ नहीं किया जा सकता, जिससे पूंजीवादी का मूल चरित्र ही बदल जाए। गरीबी हटाओ प्रोग्राम हो अथवा रोजगार पैदा करने की योजना, बूढ़े आदमियों की पैंशन का सवाल हो या किसानों के कर्जे माफी का मामला, इनसे पूंजीवादी व्यवस्था के तहत होने वाला शोषण समाप्त नहीं होता, उसे केवल सहनीय बनाया  जा सकता है। आरक्षण के रूप में आर्थिक आधार को चुन कर कुछ बुद्धिजीवी हमारे संविधान में बिल्कुल दूसरे लक्ष्य को ध्यान में रखकर दी गयी आरक्षण नीति के सही स्वरूप को समझने में असमर्थ रहते हैं और आरक्षण की नीति को भी उन्हीं सुविधाओं के मानदण्डों से आंकने लगते हैं, जो सार्वजनिक हित के नाम पर आर्थिक दृष्टि से कमजोर नागरिकों को व्यक्तिगत आधार पर दी जाती है। वे भूल जाते हैं कि इन दोनों के बीच मुख्य अंतर यह है कि इनमें सामाजिक न्याय के लक्ष्य के अलग-अलग पहलुओं पर जोर दिया जाता है। अगर सामंती उत्पीड़न की मार से बचाने के लिए कुछ समुदायों के पक्ष में संरक्षणात्मक तरफदारी बरतनी है तो वहां मुख्य जोर इन्सानी धरातल पर बराबरी के आदर्श को उनके संदर्भ में वास्तविक बनाने पर होगा, न कि उन्हेेंं आर्थिक तौर पर किसी प्रकार की राहत देकर उनकी गरीबी को कम करने पर।

मौजूदा व्यवस्था के अंतर्गत सत्ता मेें सांझेदारी करने वाले विभिन्न तत्व अपने आंतरिक विरोधों को कम करने और मिल-जुल कर प्रशासन चलाने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कई बार सभी सुलभ साधनों, सुविधाओं और नौकरियों के वितरण के लिए मिल-बांट का सिद्धांत अपना लेते हैं, ताकि प्रत्येक घटक को उसकी ताकत के हिसाब से प्रशासन में यथेष्ट हिस्सेदारी करने का मौका मिलता रहे। इस प्रकार के ‘कोटा सिस्टम’ के तहत किए जाने वाले आरक्षण में और सामंती उत्पीड़न की मार झेलने वाले पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों के संदर्भ में बराबरी के सिद्धांत को वास्तविक बनाने की खातिर आरक्षण के रूप में उन्हें ‘संरक्षणात्मक तरफदारी’ का ला भ देने में गुणात्मक अंतर है।

मंडल आयोग की सिफारिशों पर सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण-संबंधी सरकार के निर्णय में मध्यवर्ग के आरक्षण-विरोधी आदर्शवादी तत्वों को केवल ‘कोटा प्रणाली’ की मिल बांट ही नजर आती है और उसके दूसरे पक्ष को जो वास्तव में ज्यादा महत्वपूर्ण है, वे नजरअंदाज कर जाते हैं, हालांकि यह तो सही है कि पिछड़ी जातियों के लिए किए गए आरक्षण में ‘मिल बांट’ का पक्ष काफी हद तक मौजूद है और इससे आरक्षण-नीति के सार्थक और महत्वपूर्ण पक्ष के दबे रहने का अंदेशा भी बना रहता है। इस कोटि में आने वाली जातियों में पिछड़ेपन के स्तर में  इतना अंतर होता है कि उनके अंदर ऊपर-नीचे की परतों के भेद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अनुसूचित जातियों और जनजातियों का सामंती उत्पीड़न तो इतना तीव्र होता है कि वहां मात्रा के अंतर से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता, लेकिन पिछड़ी जातियों में से जिनके पास जमीन है, उनकी सामाजिक हैसियत पूंजीवादी विकास के साथ काफी बदल चुकी है और सामाजिक पिछड़ापन अब उनके लिए कोई विशेष बाधाएं उत्पन्न नहीं करता।

सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का प्रावधान करते  समय यह सुनिश्चित करना जरूरी हो जाता है कि इसका लाभ अधिकांशत: सबसे नीचे की परतों में आने वाली जातियों तक पहुंचे। राष्ट्रीय मोर्चा सरकार द्वारा अपनाई गई आरक्षण संबंधी नीति में इस प्रकर के एहतियाती नियम जोड़ने के लिए बल दिया जाना चाहिए, ताकि उसे कोटा-प्रणाली की मिल-बांट कहकर खारिज न किया जा सके। लेकिन पिछड़ी जातियों के लिए किए जाने वाले समूहगत आरक्षण का कोरी राजनीतिक अवसरवादिता कहकर विरोध करना अनुचित होगा। जरूरत इस बात की है कि इस राजनीति में जो कमियां हैं, उनकी ओर ध्यान दिलाते हुए इसका समर्थन किया जाए। आरक्षण की नीति को इस रूप में लागू करने पर जोर देते हुए कि उसमें कोटा-प्रणाली का अंश गौण हो और इससे मुख्यतया पिछड़ी जातियों की नीचे की परतों में आने वाली जातियों को सामूहिक रूप में संरक्षणात्मक पक्षपात का लाभ मिले, इसका समर्थन करना मौजूदा परिस्थितियों में इसलिए भी जरूरी है कि ऐसा करने से विभिन्न राजनीतिक प्रवृत्तियों की आपसी टकराहट में हम वाजिब हस्तक्षेप कर सकते हैं।

मौजूदा व्यवस्था के अंतर्गत जनता के हितों की पैरवी करने वाली विभिन्न राजनीतिक प्रवृत्तियों में आदर्शवादिता और सामाजिक सोद्देश्यता से उत्प्रेरित बुद्धिजीवी इन सब राजनीतिक प्रवृत्तियों में से कौन सी प्रवृत्ति को अपना समर्थन दें या फिर अपने-आप को सभी से अलग-थलग रखें, यह आज एक महत्वपूर्ण सवाल हो गया है। एक धारणा तो यह हो सकती है कि ये सभी राजनीतिक प्रवृत्तियां क्योंकि लोगों  को कमोबेश भुलावे में रखती हैं, उनके अंदर झूठी आशाएं जगाती हैं, इसलिए हमें इस प्रकार की अवसरवादिता का पर्दाफाश करते हुए इन सबसे अलग-थलग रहना चाहिए और इनकी टकराहटों में न उलझकर स्वतंत्र रूप से उस राजनीति को मजबूत बनाने में अपना योगदान करना चाहिए जो बहुसंख्यक जनता के अंदर मौजूदा वस्तुस्थिति की सही समझ विकसित करते हुए उसे अपने हितों के लिए तैयार कर रही हो।

इसके विपरीत दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि जनता की चेतना के विकास की प्रक्रिया को यदि हम आगे बढ़ाना चाहते हैं तो उन राजनीतिक प्रवृत्तियों के चरित्र को भी हमें समझना पड़ेगा, जो अलग-अलग ढंग से जनता के अंदर झूठी-सच्ची आशाएं जगाकर उसका समर्थन प्राप्त करने के लिए एक-दूसरे का मुकाबला कर रही हैं। इन विभिन्न राजनैतिक प्रवृत्तियों की टकराहट में कौन-सी प्रवृत्ति ज्यादा जोर पकड़ रही है और कौन सी पीछे धकेली जा रही है, इस बात से जनता की स्थिति में और उसकी चेतना को जगाने के दीर्घकालिक काम को आगे बढ़ाने में काफी फर्क पड़ता है। मौजूदा व्यवस्था की चौहद्दी के भीतर काम करने वाली सभी राजनैतिक प्रवृत्तियों को अवसरवादिता के नाम पर एक जैसी अच्छी या बुरी कह देने से काम नहीं चलेगा। इन प्रवृत्तियों के सकारात्मक पक्ष की भिन्नताओं को पहचानते हुए हमें यह कोशिश भी करनी पड़ेगी कि इनमें जो ज्यादा सकारात्मक है, वह आपसी टकराहट में ज्यादा कमजोर न पड़ने पाए। मौजूदा स्थिति के इस तात्कालिक दबाव को ध्यान में रखते हुए हम जनता की चेतना के विकास के दीर्घकालिक काम को इस प्रकार के हस्तक्षेप से काटकर आगे नहीं बढ़ा सकते।

अवसरवादिता की कम-ज्यादा पुट लिए हुए विभिन्न राजनीतिक प्रवृत्तियों की आपसी टकराहट में किसको अपना समर्थन दें, यह तय करना तो जरूरी है, लेकिन किसी एक को समर्थन देने के इस विकल्प में भी दो तरह की गलतियां सामने आ सकती हैं। हो सकता है कि इन प्रवृत्तियों में से सबसे ज्यादा सकारात्मक  दिखाई देने वाली प्रवृत्ति के साथ हम अपने आपको पूरी तरह जोड़ कर अपना समर्थन देते हुए उसकी कमजोरियों को उजागर न कर पाएं। या फिर जैसा कि मंडल-विरोधी बुद्धिजीवियों ने किया, केवल एक प्रकार की राजनैतिक प्रवृत्ति में अवसरवादिता ढूंढ निकालें और उससे इतने बिदक जाएं कि समय रूप में उसकी सकारात्मकता जांचना-परखना भी भूल जाएं और अवसरवादिता के नाम पर उसका विरोध करते हुए अंतत: ऐसी प्रवृत्ति के समर्थन में चले जाएं, जो पहले से कहीं ज्यादा अवसरवादी हो और इसीलिए जनता के लिए उससे ज्यादा नुक्सानदेह भी।

सवाल अवसरवादी कहकर बिदकने का नहीं है, बल्कि यह तय करने का है कि अपने अवसरवादिता के फेम में कोई राजनैतिक प्रवृत्ति सामाजिक जीवन से जुड़े हुए कौन से मुद्दे उठा रही है, समाज के विकास को किस प्रकार का मोड़ दे रही है तथा कुल मिला कर जनता के हितों की उसके द्वारा कहां तक पुष्टि हो रही है। समाज के विभिन्न हिस्सों के बीच बराबरी और विश्वास की भावना पैदा करके जनता की एकता को ठोस बनाना, इसके लिए दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिक क्रियाओं में सांझेदारी को अधिक न्यायपूर्ण  बनाने तथा अल्पसंख्यकों के भाषा, धर्म और विशिष्ट पहचान से जुड़े हुए वाजिब अधिकारों की कद्र करने पर बल देना, धर्म को राजनीति पर थोपने वाली विभिन्न साम्प्रदायिक प्रवृत्तियों का विरोध करते हुए धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करना, सत्ता के अनावश्यक केंद्रीकरण का विरोध करते हुए आम लोगों के  नागरिक अधिकारों को बनाए रखना, संघीय प्रणाली को स्वस्थ रूप में कायम रखने और केंद्र तथा राज्यों के आपसी संबंधों को  अधिक सुसंगत आधार प्रदान करने की जरूरत को रेखांकित करना, आर्थिक विकास के लिए नई तकनीकों  के जरिए श्रम की उत्पादकता के विकास के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा करने और आय तथा उपभोक्ता वस्तुओं के न्यायपूर्ण वितरण पर बल देना, देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के शिकंजे से बचाए रखने और उसके स्वतंत्र विकास को सुनिश्चित करने के महत्व को पहचानना तथा साम्राज्यवादी देशों के दबाव का मुकाबला करने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन को मजबूत बनाना और अपनी गुटनिरपेक्षता के साम्राज्यवाद विरोधी सार तत्व को बनाए रखना-ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनके आधार पर हम मौजूदा व्यवस्था की परिधि के भीतर काम करने वाली विभिन्न राजनैतिक प्रवृत्तियों की सकारात्मकता का जायजा ले सकते हैं।

सामाजिक दृष्टि से पिछड़ी हुई जातियों के लिए जाति के आधार पर समूहगत आरक्षण देने की नीति में जनता की एकता को तोड़ने वाली जातिवाद की राजनीति की गंध ढूंढ निकालने के नाम पर राष्ट्रीय मोर्चा की समूची राजनीति को सबसे अधिक जनविरोधी करार देकर उसके विरोध में खड़े हो जाना मंडल-विरोधी बुद्धिजीवियों के लिए कहां तक उचित था-इसके बारे में सही निर्णय लेने के लिए हमें यह देखना होगा कि इन सभी मुद्दों पर राष्ट्रीय मोर्चा ने क्या रुख अपनाया हुआ है। जातिगत आधार पर पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की नीति लागू करने में जातिवाद की राजनीति की गंध आती हो, तो भी राष्ट्रीय मोर्चा जिस राजनीतिक प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी समूची सकारात्मकता को केवल इस मुद्दे के आधार पर जातिवाद की राजनीति कह कर खारिज कर देना उचित नहीं होगा।

इस प्रकार के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हमें यह भी तय करना चाहिए कि क्या जातिवाद की राजनीति का स्वरूप भी केवल आरक्षण के मुद्दे से तय होता है या इसके पनपने के कुछ और व्यापक कारण हैं। इस संदर्भ में हमें यह भी देखना होगा कि क्या जातिवाद की राजनीति केवल पिछड़ी जातियों और दलितों की प्रशासन और राज्य की निर्णय-प्रक्रियाओं में भागीदारी बढ़ाने पर जोर देने और ‘सामाजिक न्याय’ की इस प्रकार की परिकल्पना को एक मुख्य नारे के रूप में प्रस्तुत करने वाले दल तक ही सीमित हैं या वह कई अन्य रूपों में भी हमारे सामने मौजूद हैं।

पहली बात जो हमें ध्यान में रखनी है वह यह कि जाति जैसी पिछड़ी हुई, पूर्व-पंूजीवादी संस्था का जोरदार असर हमारे मौजूदा सामाजिक ढांचे में अभी भी बना हुआ है और इसके प्रभाव को खत्म किए बगैर हमारे संवैधानिक ढांच के अंतर्गत परिभाषित सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर ठीक तरह से अमल नहीं किया जा सकता। यह कहना अपने-आप में जातिवाद नहीं है, बल्कि इस प्रभाव की अनदेखी करना या उसे कम करने के ऐसे उपाय सुझाना जिन्हें अमल में लाने की मौजूदा व्यवस्था इजाजत नहीं देती, जातिवादी राजनीति के कहीं ज्यादा करीब पड़ता है। संस्था के रूप में  जाति के प्रभाव को  रेखांकित करना उसे स्वीकृति प्रदान करना नहीं है, यद्यपि उसके प्रभाव को देख न पाना अनजाने में उसे स्वीकृति देने जैसा है।

उन समाजों में जहां जाति एक संस्था के रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए है, संसदीय प्रणाली से जुड़ी हुई राजनीतिक गतिविधियों में (दूसरे शब्दों में अपनी वोट की राजनीति में) लगभग सभी गैर वामपंथी दल जनता का समर्थन हासिल करने के लिए एक औजार के रूप में जातिवाद का इस्तेमाल करते हैं। बूज्र्वा पाॢटयों की राजनीति के इस पहलू को हम जातिवाद की संज्ञा दे सकते हैं। लोगों के अंदर झूठी आशाएं जगाकर अथवा अपनी राजनीति के वास्तविक सार तत्व को उनके सामने बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत कर के उन्हें अपने पीछे लगाने के लिए विभिन्न गैर-वामपंथी पार्टियों के बीच जो प्रतिस्पर्धा चलती रहती है, उसमें जातिवाद की भी अपनी अहमियत है। इस प्रकार की राजनीति का चरित्र निश्चित  रूप से एक हद तक अवसरवादी है, लेकिन जब तक जाति के आधार पर लोगों को किसी मुद्दे के पक्ष अथवा उसके विरोध  में अपने पीछे लगाने की संभावना इन पार्टियों को दिखाई देती रहेगी, तब तक ऐसी अवसरवादी राजनीति  किसी न किसी रूप में उभरती ही रहेगी।

अवसरवादी राजनीति  के रूप में जातिवाद का केवल आरक्षण के मुद्दे के साथ कोई अनिवार्य संबंध है, ऐसा सोचना तर्कसंगत नहीं है। जाति के आधार पर आरक्षण की नीति का मसला न उठाया जा रहा हो, तब भी जातिवाद किसी न किसी रूप में बना रह सकता है। इससे लड़ने की प्रक्रिया भी लंबी है और इस लड़ाई के दो पहलू हैं-सामंती अवशेषों के रूप में जाति के आधार पर मौजूदा व्यवस्था में जो समूहगत उत्पीड़न अभी भी कायम है, उसे खत्म करने के लिए सामाजिक न्याय की मांग करने वाली राजनीति की प्रासंगिकता को स्वीकार करना और इसके साथ ही लोगों के सामने यह स्पष्ट करना कि जातिगत लामबंदी के आधार पर मौजूदा व्यवस्था के अंतर्गत अनिवार्य रूप से पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता और इस दृष्टि से जातिगत लामबंदी लोगों को भ्रम में डालने वाली राजनीति का ही एक रूप है।

यह बात लोगों को एक दिन में समझ नहीं आ सकती, क्योंकि जातिवाद मौजूदा व्यवस्था के अंतर्गत पनपने वाले अनेकों ऐसे विभ्रमों में से एक है, जिनसे आम जनता आसानी से छुटकारा नहीं पा सकती। इन विभ्रमों को तोड़ने के लिए लोगों को निरंतर शिक्षित करते रहने और सही मुद्दों पर एकजुट होकर संघर्ष करने के लिए उन्हें तैयार करने की जरूरत है। जातिवाद, क्षेत्रवाद और साम्प्रदायिकता बूज्र्वा राजनीति के ऐसे रूप हैं, जिनकी निरंतर आलोचना होती रहनी चाहिए पर जिनके जनविरोधी स्वरूप को लोगों के सामने स्पष्ट करना बहुत आसान नहीं है। जब तक मौजूदा व्यवस्था के बारे में लोगों की चेतना में भ्रम बने रहते हैं, वे किसी न किसी प्रकार की कम या ज्यादा घातक अवसरवादी राजनीति की बहक में आते रहेंगे।

दलितों और पिछड़ी जातियों के अंदर यह विभ्रम पैदा करना कि आरक्षण के माध्यम से क्रांति हो जाएगी और उन्हें जो चाहिए, वह सब मिल जाएगा। निश्चित रूप से जातिवादी अवसरवादिता का एक रूप है। लेकिन इस अवसरवादी राजनीति में जहां सामाजिक न्याय को प्राप्त करने की दिशा में एक वास्तविक जनतांत्रिक पहलकदमी भी दिखाई देती है, इसके विरुद्ध अगड़ी जातियों को लामबंद करने या सामाजिक न्याय के मुद्दे को जातियुद्ध कहकर खारिज कर देने की कोशिश जातिवादी राजनीति के ज्यादा प्रतिभागी रूपों का उदाहरण पेश करती है। जब अवसरवादिता का दोष विभिन्न राजनैतिक प्रवृत्तियों में समान रूप से मौजूद हो, तो किसी विशिष्ट राजनैतिक प्रवृृत्ति को केवल अवसरवादिता के नाम पर लांछित करने और उससे कहीं ज्यादा प्रतिगामी राजनीति की अवसरवादिता को अनदेखा कर देने से जो जातिवाद से टक्कर नहीं ली जा सकती।

आरक्षण-विरोधी बुद्धिजीवियों के चिंतन की जिन अपर्याप्तताओं और असंगतियों का ऊपर जिक्र किया गया है, उनके माध्यम से वास्तव में उनके मूल्यों और आस्थाओं में विद्यमान एक ऐसी कमजोरी भी सामने आती है, जो उनकी संवेदना की नीचे की परतों में दबी रहने के कारण सामान्यतया उन्हें दिखाई नहीं देती। पिछले दो दशकों के घटना-विकास ने मध्य वर्ग के एक हिस्से में इस कमजोरी को और ज्यादा बढ़ा दिया है। इन तत्वों के अंदर निरंतर जोर पकड़ रही अतिविशिष्टतावाद की प्रवृत्ति से इस कमजोरी का सीधा संबंध है। सामाजिक न्याय के मसले पर सही रुख न अपना पाने का मुख्य कारण यही अतिविशिष्टतावाद है। जब स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की तुलना में स्वतंत्रता पर ज्यादा बल दिया जाने लगे तब मध्यवर्ग के आदर्शवादी तत्वोंं में अतिविशिष्टतावाद की प्रवृत्ति जन्म लेती है। इन लोगों के अंदर समानता के आदर्श के प्रति इतना गहरा लगाव नहीं होता कि समाज के वंचित लोगों को भी भाईचारे की परिधि में समेटा जा सके। स्वतंत्रता की उनकी परिकल्पना जरूरत से ज्यादा निजबद्ध हो जाती है।

इस कमजोरी के बीज कुछ हद तक तो हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में भी मौजूद हैं। आज की विकट परिस्थितियों के दबाव में इसे और अधिक विस्तार दे दिया है। उन्नीसवीं सदी के दौरान नवजागरण की प्रक्रिया के उभार के साथ हमारे समाज में एक नयी जनतांत्रिक मूल्य चेतना का विकास शुरू हुआ है। पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली के साथ घनिष्ठ रूप में जुड़ी हुई यह मूल्य चेतना क्योंकि हमारे देश में औपनिवेशक ढांचे के अंतर्गत उभरकर आई थी, इसलिए इसमें यूरोपीय पुनर्जागरण की-सी प्रखरता नहीं आ सकी। अंगे्रजी प्रशासन के साथ तालमेल की परिधि में पनपने वाले मध्यवर्ग में स्वार्थपरकता अधिक थी और उदारता कम।

इसके अलावा नयी जनतांत्रिक मूल्य-चेतना का वाहक शिक्षित मध्यवर्ग समाज में हर जगह विद्यमान पुरानी सामंती संरचनाओं के बीच में ही अपने जीने की जगह बनाकर उभरा और परम्परागत मूल्यों के कई मानव-विरोधी पहलुओं को ज्यादा तीव्र चुनौती नहीं दे सका। ब्रिटिश शासकों ने वैसे भी सामंती अवशेषों और उनसे जुड़े हुए अनेकों दकियानूसी, पुरातनपंथी मूल्यों को सायास बनाए रखा, क्योंकि ऐसा करने से उनके अपने हितों की पुष्टि होती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि मध्य वर्ग की मूल्य चेतना में सामंती मूल्यों का सूक्ष्म प्रभाव काफी मात्रा में बना रहा। जाति व्यवस्था की ऊंच-नीच की भावना से यह वर्ग पूरी तरह मुक्त नहीं हो  सका, यद्यपि नयी जनतांत्रिक चेतना से इसका कोई मेल नहीं बैठता था। नीची जातियों के लोगों से हमारे शिक्षित मध्य वर्ग की ऐसी दूरी बनी रही कि वे उन्हें इन्सानी भाईचारे की परिधि में जाने-अनजाने शामिल नहीं कर सके। शिक्षित मध्यवर्ग के कुछ तत्वों में अतिविशिष्टतावादी रुझान आज जिस रूप में दिखाई देने लगा है, उसकी यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष ने नवजागरण के दौर से चले आ रहे जनतांत्रिक मूल्यों की हमारी विरासत में  काफी निखार ला दिया और इन मूल्यों को पहले से ज्यादा ठोस बना दिया। परन्तु एक तो स्वतंत्रता आंदोलन का पूरे मध्यवर्ग पर इतना गहरा असर नहीं हो सका, जितना कि होना चाहिए था, क्योंकि इस वर्ग का काफी बड़ा भाग अफसरशाही का हिस्सा होने के कारण या व्यवसायिक और व्यापारिक संबंधों में मिलने वाली सुविधाओं के कारण अंग्रेजी प्रशासन का पिछलग्गू बना रहा और स्वतंत्रता आंदोलन का उनकी चेतना पर सकारात्मक प्रभाव बहुत ही धीमा रहा। व्यक्तिनिष्ठता और स्वार्थपरकता की प्रवृत्ति उनमें काफी प्रबल बनी रही।

इसके अलावा स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव के अंतर्गत विकसित होने वाली मूल्य चेतना में भी कुछ अंतर्विरोध पैदा हो गए। स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर एक धारा से लोग जुड़े थे, जिनका गांव-गांव में फैली देश की जनता से सम्पर्क इतना गहरा नहीं था कि राष्ट्रीय गौरव की उनकी भावना ज्यादा मूर्त रूप में विकसित हो सके। अपनी जमीन से उन का जुड़ाव यदि और व्यापक और गहरा होता तो उन्हें सांस्कृतिक खुराक और ज्यादा मात्रा में मिलती और उनका आत्मिक बल और ज्यादा तीव्र होता। इसके अभाव में उनकी जनतांत्रिक मूल्य-चेतना में अमूर्तता का कुछ अंश बना रहा और वह ज्यादा ठोस रूप ग्रहण नहीं कर सकी। दूसरी धारा में यद्यपि साम्राज्यवाद का विरोध तो प्रबल हुआ और राष्ट्रीय गौरव की भावना भी तीव्र हुई, पुनरुत्थानवादी रुझान भी जोर पकड़ने लगा और बहुत सारे सामंतवादी अवशेष गौरवमंडित होकर उनकी मूल्य चेतना में घुल-मिल गए।

इन कारणों में भी मध्य वर्ग की मूूल्य चेतना में अनेकों अमूर्तताएं, रिक्तियां और असंगतियां बनी रही, जो मौजूदा दौर की संकट की स्थिति में, जबकि देश में सामाजिक जीवन के विभिन्न धरातलों पर प्रतिभागी शक्तियां काफी आक्रामक रूप में उभर रही हैं, जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले मध्यवर्ग के तत्वों के सामने कई नई कठिनाइयां खड़ी कर रही हैं। सामाजिक न्याय के प्रश्र पर मध्यवर्ग में पाई जाने वाली बौखलाहट और उसके अंदर जोर पकड़ रही अतिविशिष्टतावादी प्रवृत्ति के पीछे विरासत में मिले जनतांत्रिक मूल्यों के भीतर मौजूद यही कमजोरियां काम कर रही हैं।

आज जब मध्यवर्ग पर परिस्थितियों का दबाव बढ़ रहा है रोजी-रोटी कमाने वाले और अपने अस्तित्व को बनाए रखने में मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से को अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ती है, उसके अंदर आशावादिता और आत्मविश्वास की कमी आ गई है। इस प्रकार की मानसिकता के चलते समाज के वंचित और उत्पीडि़त तबकों में उन्हें अपने सहयोगी नहीं, प्रतिद्वंद्धी या दुश्मन दिखाई देने लगे हैं। ऐसे में अगर संघर्ष की बजाए उनके अंदर राहत के आसान और काल्पनिक तरीके ढूंढ निकालने की प्रवृत्ति बढ़ जाए, संशय और अलगाव की भावनाएं जोर पकड़ने लगें और उनकी सहानुभूति का दायरा सिकुड़ता हुआ दिखाई दे तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। इसी मानसिकता के कारण मध्यवर्ग में आज अतिविशिष्टतावाद पनप रहा है और किसी भी तरह अपने लिए जगह बनाए रखने की संकीर्णता दिखाई देने लगी है।

मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से की मूल्य चेतना आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहां अगर सही विकल्प नहीं चुना गया तो जनतांत्रिक आदर्शों में उसकी आस्था बुरी तरह से विकृत होकर रह जाएगी। मध्यवर्ग के इस हिस्से से संबंध रखने वाले आदर्शवादी तत्वों के सामने यह बात स्पष्ट करना आज बहुत जरूरी हो गया है कि यदि उन्हें अपनी अस्मिता को बचाए रखना है, तो उन्हें यह याद रखना होगा कि स्वतंत्रता और समानता में से एक का चुनाव नहीं किया जा सकता और ये दोनों ही आदर्श एक-दूसरे के पूरक हैं। ज्यों-ज्यों सामाजिक न्याय के प्रति उनका रुझान कमजोर पड़ता है, त्यों-त्यों उनकी जनतांत्रिकता भी खंडित होती है और अपनी पहचान को पूरी तरह खो देने का खतरा उनके सामने उभर आता है। मंडल-विरोधी आंदोलन के दौरान इन तत्वों ने जो रुख अपनाया है उससे जनतांत्रिक मूल्यों की उनकी परिकल्पना की कमजोरियां स्पष्ट हो गई हैं। ऐसे बुद्धिजीवी अंतत: किस प्रकार की राजनैतिक प्रवृत्ति को वरीयता प्रदान करेंगे या उसे वैधता प्रदान करने के लिए सिद्धांत गढऩे लगेंगे, यह प्रभाष जोशी की बौद्धिक मंडली द्वारा जनसत्ता में दिए जाने वाले लेखों और उत्तर प्रदेश तथा गुजरात में शिक्षित मध्यवर्ग के अंदर भारतीय जनता पार्टी की साम्प्रदायिक राजनीति और भगवा संस्कृति के लिए नए-नए उमड़े ममत्व मेें देखा जा सकता है।

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