आलेख


हिन्दी में जनवादी कविता का जो नया उभार सन् 1970 के आसपास दिखाई देने लगा था, उसका सही स्वरूप अब निखर कर सामने आने लगा है। इस दौर की वास्तविक जनवादी कविता की विशेष उपलब्धि यह रही है कि यहां तत्कालीन सामाजिक यथार्थ के अन्तर्विरोधों को अच्छी तरह समझने का प्रयास होता है तथा उसे बदलने के लिए किए जाने वाले संघर्षों की ऐतिहासिक अनिवार्यता की भी पहचान यहां मौजूद रहती है। दूसरे शब्दों में, यहां व्यक्ति के अनुभवों को उसकी वर्गीय भूमिका से अलग नहीं किया जाता और जिन परिस्थितियों में वह जीता है, उन्हें केवल ‘व्यवस्था’ की अमूर्त संज्ञा देकर टाल नहीं दिया जाता, बल्कि मेहनतकश वर्गों के शोषण को बरकरार रखने के लिए उन पर थोपे गए शासन तंत्र तथा इस शोषण को समाप्त करने के लिए किए जाने वाले जनसंघर्षों के आपसी टकराव को ध्यान में रखते हुए उन परिस्थितियों की विशिष्टता को परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है। भाषा का जो अवमूल्यन अकविता के दौर में हो रहा था उसके विपरीत यहां कविता की भाषा को जनभाषा की शक्ति से पुष्ट करने की कोशिश की जाती है। बिम्बों को अम्बार लगाकर पाठकों को चकित करने अथवा काव्य-संसार और यथार्थ जीवन के बीच एक कांच की दीवार खड़ी करने की प्रवृत्ति का भी इस कविता में विरोध होता है तथा चीजों को संयत स्वर में तथा तथ्य बयान करने का लहजा यहां बना रहता है।

कविता के क्षेत्र में यह बदलाव इसलिए संभव हो सका है कि जनवादी आंदोलन अब अधिक ठोस और व्यापक होकर सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं और समाज के मध्यम वर्गीय तबकों को अपने प्रभाव में लाने से पहले से कहीं अधिक सफल हुए हैं। हिन्दी कविता में जो तेवर हमें कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह की इधर की रचनाओं में अथवा श्रीहर्ष, मनमोहन, विजेन्द्र, कुमार विकल, शशि प्रकाश, नन्द भारद्वाज, आलोक धन्वा, अनिल कुमार गंगल तथा कई अन्य कवियों की अच्छी रचनाओं में या फिर रमेश चंद और शलभ श्रीरामसिंह के अच्छे गीतों में नजर आता है, उसका सीधा संबंध मध्यवर्ग पर जन-आंदोलनों के बढ़ते हुए स्वस्थ प्रभाव से ही है।

इसके बावजूद यदि जनवादी समझी जाने वाली आज की कुछ कविताओं में अभी भी अनेक कमजोरियां बची रहती हैं, तो इसीलिए कि हमारे अधिकांश कवियों का जनवादी आंदोलनों से इतना गहर सम्पर्क स्थापित हो सका है कि वे अपने निम्नपूंजी-जीवी संस्कारों से पूर्णतया मुक्त हो सकें। कुछ कमजोरियों जनवादी राजनीति की सीमाओं से भी सम्बद्ध हो सकती हैं, किन्तु इन कमजोरियों का मुख्य स्रोत हमें निम्न पूंजीजीवी तबकों द्वारा परिवर्तन के लिए महसूस की जाने वाली छटपटाहट के अंदर पाए जाने वाले उन व्यक्तिवादी एवं भाववादी  विभ्रमों में देखना चाहिए, जो वहां उस समय तक बने रहते हैं। जब तक यह छटपटाहट स्वत: स्फूर्त आंदोलनों के रूप में ही व्यक्त होती रहती है। किन्तु क्योंकि निम्न पूंजीजीवी आक्रोश को प्रतिक्रियावादी लोकवादी राजनीति के तहत विवेकहीन नकारात्मकता का रूप भी आसानी से दिया जा सकता है, अत: जनवादी कही जाने वाली कविता की ज्यादा चिंतनीय कमजोरियों को हमें इस गैर-जनवादी उग्र नकारवाद से ही जोड़ कर देखना चाहिए।

श्रीहर्ष के ‘समय से पहले’, उद्भ्रान्त के ‘नाटक तंत्र तथा अन्य कविताएं’ और शलभ श्रीराम सिंह के ‘अतिरिक्त पुरुष’ कविता-संग्रहों  की रचनाओं के जनवादी स्वरूप को हमें इसी संदर्भ में पहचानने का प्रयास करना होगा।

‘समय से पहले’ की अधिकांश रचनाओं में शोषण पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए शासक वर्गों द्वारा किए जाने वाले प्रपंच को उजागर करने तथा मेहनतकश लोगों और उनकी हिमायत करने वाले अन्य तत्वों पर इस व्यवस्था के संरक्षकों द्वारा किए जाने वाले दमन की क्रूर अमानवीयता का गहरा अहसास कराने का गंभीर प्रयास हुआ है। एक मध्यम वर्गीय व्यक्ति की वस्तुस्थिति को साधारण जीवन के परिचित संदर्भों में तथ्यात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का कवि ने अपनी अधिकांश रचनाओं में प्रयास किया है तथा वाक् चातुर्य और फैन्टेसी के आडम्बर से उन्हें मुक्त रखा है। तत्कालीन सामाजिक यथार्थ का जो तथ्यात्मक चित्र यहां उभर कर आता है वह कुछ हद तक सरलीकृत होते हुए भी प्रमाणिक लगता है क्योंकि उसमें शोषित-पीडि़त लोगों के जीवन के बहुत सारे महत्वपूर्ण पक्ष स्पष्ट रूप में उभर आते हैं। विशेष कर उनकी विवशताएं और उनके जीवन का खालीपन तथा उन निरंतर किए जाने वाले प्रहारों की भयावहता। शासक वर्गों की ओर से दिए जाने वाले मिथ्या प्रलोभनों की वास्तविकता को पहचान लेने के बाद उनके विरोध में खड़ा होने का निश्चय जब कभी इन रचनाओं में व्यक्त होता है तो वह व्यक्तिगत पैंतरेबाजी न होकर एक सामूहिक  नियति से सामूहिक रूप से निपटने का निर्णय दिखाई देता है।

            जिस व्यवस्था के अंतर्गत मध्यम वर्गीय व्यक्ति जीता है, उसकी दमन शक्ति की तीव्रता को कम  करके आंकने की गलती इन रचनाओं में प्राय: नजर नहीं आती। इसी प्रकार विरोध में खड़ा होने का निर्णय लेना कितना कठिन हो सकता है। इसका अहसास भी यहां यथेष्ट रूप में बना रहता है। इस संग्र्रह की सीमा मुख्यत: यही है कि बहुत-सी रचनाएं गद्य की सी सपाटता लिए रहती हैं और कवि के स्वर का धीमापन हमें अखरता है। श्रीहर्ष की कविता की शक्ति और सीमाएं नीचे दिए गए उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट हो जाएंगी। ‘स्थिति’ शीर्षक कविता की आरंभिक पंक्तियों को देखिये :

  योजनाबद्ध षड्यंत्र के जाल में फांसकर
मुझे फेंक दिया गया है उस मुहल्ले में
जहां हर मकान सांस लेता है
कच्चे गैस कोयलों के खारे हुए धुएं के साथ
तैरते अंधेरे में
खिड़कियों के सींखचों पर रोशनी को खोजती
सूने आकाश सी आंखें
अमावस के भूरे उजाले में पढ़ती है–अखबार!!

मध्यवर्गीय व्यक्ति की सामान्य परिस्थतियों के चित्रण के माध्यम से व्यवस्था द्वारा उस पर डाले जाने वाले दबाव तथा उन दबावों के अंतर्गत उसकी सामान्य मन:स्थिति को यहां बिना किसी चौंका देने वाले बिम्बों का सहारा लिए तथ्यात्मक ढंग से प्रस्तुत कर दिया गया है। इसी प्रकार ‘बाइस्कोप’ कविता आरंभ होती है :

हवा चुप है, आकाश उदास-पत्तों के हिलने पर पहरा है
रास्तों पर सुनाई पड़ती है केवल
पूंछ उठाकर भागते सफेद घोड़ों की टाप
ऐसे में खिड़की खोलकर बाहर झांकना?
सन्नाटे पर सवार-पालतू कुत्तों का भौंकना
मोटे अंधेरे में भी दरवाजों पर दे जाता है-दस्तक
ठहर जाती है नींद में फुसफुसाती सांसें
फिर भी-उनके नुकीले नाखून गिनने
कौन सीली माचिस पर रगड़ रहा है तीलियां?

व्यवस्था के आतंक को सधे हुए लहजे में इस प्रकार व्यक्त करने के साथ-साथ शोषित-पीडि़त लोगों की दृष्टि साफ होने की प्रक्रिया की भी इस संग्रह की रचनाओं में कुछ झलक मिलती है

मृत सिक्के भुनाने का वक्त
गुजर गुया है आज
हमारी पुतलियों पर धुंध नहीं
बैठी है रोशनी
हम काले कपड़ों की ओट मेंं होने वाले
षड्यंत्र को पहचानते हैं कामरेड
इतिहास सबको नंगा कर देता है।

यदि कवि की कल्पना-शक्ति कुछ और सक्रिय होती और उसकी भाषा में भी कुछ ताजगी अधिक होती तो ये रचनाएं और भी प्रभावशाली हो सकती थीं।

उद्भ्रान्त के संग्रह ‘नाटकतंत्र तथा अन्य कविताएं’ में श्रीहर्ष की रचनाओं जैसी गंभीरता और स्थिरता तो नहीं मिलती, किंतु कवि के लहजे में संघर्षधर्मिता स्पष्ट रूप से उभर आती है। कवि स्वयं भी यही मानकर चलता है कि वह ‘जलते सवाल’ अपनी रचनाओं के माध्यम से उठा रहा है और निश्चित रूप से उन लोगों में शामिल है जो ‘जाग गए हैं’ और जिनकी ‘आंखों में संकल्प की चमक’ है। स्थित के खतरनाक होने का अहसास भी वह अपनी रचनाओं में कराता चलता है।

अब जबकि
सन्नाटा चारों तरफ से घिरा रहा है
और कोहरा बहुत तेजी से
जमीन पर गिर रहा है
बर्फ की चट्टानें दैत्याकार रूप धारे
हमारे आस-पास
खड़ी हो गयी हैं
लगता है-जिन समस्याओं से
हम अभी तक जूझ रहे थे
वे अनायास
बहुत बड़ी हो गयी हैं।

किंतु यह बात ध्यान देने योग्य है कि कवि के स्वर में न तो स्थिति के अनुकूूल पर्याप्त गंभीरता है और न ही उचित धैर्य। यदि कवि ऐसी खतरनाक स्थितियों को अपनी रचना के केंद्र में रखता है तो उससे  यह अपेक्षा करना पूरी तरह उचित होगा कि वह अपने लहजे को संयत और सधा हुआ बनाए रखे और किस्सा गोई के छिछलेपन का आभास न होने दे। किंतु ऐसी अप्रासंगिक एवं छिछली आत्म-तुष्टि की भावना कवि के लहजे में निरंतर झलकती है जब कवि कहता है, ‘जी हां, आप चौंकिए नहीं’, तो गीत फरोशी के से लहजे के हल्केपन से हम वास्तव में चौंक उठते हैं। ‘मोर्चे पर’ रचना में जब कवि ‘यथास्थितिवाद के पोषकों’ को ऐसे लहजे में संबोधित करने लगता है मानों वह अपने किसी रूठे हुए मित्र को मना रहा हो तो हमें संदेह होने लगता है कि जिन खतरों, मुहिमों और मोर्चों की वह बात कर रहा है, वह कहीं कोरी लफ्फाजी तो नहीं। वरना वह ऐसी पंक्तियां लिखने में हिचकता :

 लो वह उल्का की तरह
तुम्हारे ऊपर टूट रहा है
लो वह बिजली की तरह
तुम्हारे ऊपर छूट रहा है।

‘टूटने’ और ‘छूटने’ का अनुप्रास स्थिति की गंभीरता को नष्ट करके उसे  कोरी खिलवाड़ का रूप देने लगता है। यथास्थितिवाद के पोषकों  के विरोध में जो ताकत खड़ी हो गयी है, उसके बारे में कवि कहता है :

क्यों कि अब तुम्हारी जड़ें
नष्ट भ्रष्ट कर देने के लिए
बुलंद हौसले की बेहतरीन शराब पिए
एक बिल्कुल सही ताकत
मैदान में खड़ी है।

जिस कवि के पास ‘एक बिल्कुल सही ताकत’ की वास्तविक समझ मौजूद है वह उसके लिए ‘बुलंद हौसले की बेहतरीन शराब’ की उपमा का प्रयोग कभी नहीं करेगा और न ही एक ‘शानदार योजना’ उसके मस्तक पर ‘जड़ी’ होने का जिक्र करेगा अथवा उसके द्वारा किसी ‘चमकदार प्रतीक’ को आकाश में ‘उछाल देने’ की बात कहेगा। आखिर वर्ग-संघर्ष और पतंगबाजी में अंतर होता है। इस कवि की मासूमियत को देखते हुए ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि वह अपने पक्ष की विजय के बारे में बड़ी आसानी से आश्वस्त हो जाता है। वह चहक उठता है कि ‘रोशनी के फव्वारे फूटने लगे हैं,’ ‘बहुत जल्द ही सारे आसमान में लाली छा जाएगी’ तथा ‘एक बदली हुई एकदम भिन्न दुनिया हमारे पास है।’ इस प्रकार के विभ्रम वस्तु-स्थिति की सतही समझ के सूचक हैं और इनके रहते कोई जनवादी कवि प्रभावशाली रचनएं नहीं प्रस्तुत कर सकता।

‘क्यों और उत्तरार्द्ध’ में प्रकाशित शलभ श्रीरामसिंह  के गीतों को देखकर हमें  उनके कवि-व्यक्तित्व में जनवादी विकास की संभावनां नजर आने लगी हैं। किंतु ‘अतिरिक्त पुरुष’ में  संग्रहीत रचनाओंं को देखकर तो हमेंं इस संबंध में  निराशा ही होगी। शलभ श्रीरामसिंह की शब्दों के प्रयोग में असाधारण कुशलता तो इस संग्रह की रचनाओं  में भी स्पष्ट दिखाई देती है, पर अधिकांश रचनाओं में उनकी संवेदना के वे पहलू उजागर होते हैं, जिनके कारण वे जगदीश गुप्त जैसी नयी कवितावादी आलोचक की दृष्टि में तो प्रभावशाली कवि हो सकते हैं, किंतु हमें यह संदेह होने लगता है कि उनका कवि-व्यक्तित्व प्रतिक्रियावादी भाव-प्रणाली के दूषित प्रभाव से संभवत: कभी मुक्त नहीं हो सकेगा।

इस संग्रह की रचनाओं में एक दबंग और आत्मविश्वास से भरे हुए व्यक्तित्व की झलक हमें अवश्य मिलती है। कवि के स्वर में दृढ़ता और जुझारूपन की गूंज भी स्पष्ट सुनाई देती है। जिस कवि-व्यक्तित्व की तस्वीर यहां उभर कर आती हे, उसके बारे में कहा जा सकता है कि उसके जीवन की कठिनाइयों का तीखा अहसास है और उन कठिनाइयों पर विजय पाने की अदम्य निर्णय-शक्ति भी उसके पास है। इस युयुत्सावादी कवि की ‘सदा कुल प्राण-प्यास’ अथवा उसके ‘पौरुष’ का प्रभाव हम इन रचनाओं में देखते हैं ‘सृष्टि-चक्र के भीतर’ कविता में ‘फुफकारते दिगन्तग्रासी महासर्प के फण पर/दांतों से  कलम दबाये विराजमान’ जिस ‘श्यामा’ की कल्पना ‘सृष्टि-चक्र के भीतर’ कविता में की जाती है वह वास्तव में अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा के बारे में कवि की अपनी अवधारणा को ही लक्षित करती है। मानव-स्वभाव की इस शुद्ध तात्विक ऊर्जा के प्रवाह के अहसास के कारण ही कवि के गीत हमें प्रभावशाली लगने लगते हैं :

 अंधकार में जीवित अग्निशिखा के स्वर से-
बंधा हुआ स्वरमंडल कोई उभर रहा स्तर-स्तर पर
रागबद्ध करने को जिसको
व्याकुल हो जाएगा अग-जग
कल सूर्योदय के प्रकाश में  !
बजता है…

किंतु इस प्रकार की ‘ओजस्विता’ से हमें एकदम प्रभाव नहीं हो उठना चाहिए। इस प्रकार के उद्घोषपूर्ण नाद में ऐसी अमूर्तता रहती है जो वास्तव में यथार्थ को ठीक से न समझ पाने की सूचक है। जिस धरातल पर कवि की कल्पना काम करती है, वहां हमारा जीवन ‘अंधकार’ और ‘अग्नि-शिखा’ जैसी कुछ ऐसी अतिव्यापक अवधारणाओं में बंधकर रह जाता है कि तत्कालीन सामाजिक विशिष्टता हमारी चेतना में उभर कर नहीं आ पाती। जो स्वर-मंडल यहां स्तर-स्तर उभर रहा है उसे ‘कोई’ कहकर लक्षित किया गया है। हमारी तत्कालीन वस्तुस्थिति की केंद्रीय सच्चाई इस ‘कोई’ स्वर में  लक्षित नहीं होती। जिस ‘त्वरारोही शक्ति के सम्मुख’ यह युयुत्सावादी कवि अपने-आपको वहां खड़ा पाता है, वहां उसके लिए ‘नीति-अनीति का ज्ञान/कितना कठिन है।’ इस प्रकार की समाजातीत आदिम शक्ति की परिकल्पना की ओर हम इसीलिए संशकित रहते हैं कि वहां नीति और अनीति में भेद करने वाली हमारी विवेक-बुद्धि क्षीण पड़ जाती है और वास्तविक मानवीय ऊर्जा केे स्थान पर हमें एक दम्भी व्यक्ति का आत्म-प्रक्षेपण नजर आने लगता है।

उंगली में बांधकर नदियों को घुमाता हुआ वह
किसी पहाड़ी की चोटी पर बैठा गा रहा है।

ऐसी परिकल्पना के आधार पर समाज के वर्गों पर आधारित भेद को और ऐतिहासिक पड़ावोंं के अंतर को आसानी से नकारा जा सकता है और यह घोषित किया जा सकता है कि

हम सबके सब
प्रकारान्तर से उसी गति की ध्वनि जी रहे हैं

तथा इस गीत की टेक ‘निरंतर दुहराई जाने पर भी नई है।’ जिस ‘अग्नि जैसे मनुष्य’ की कवि ‘अतिरिक्त पुरुष’ शीर्षक वाली रचना में कल्पना करता है वह शोषण के विरुद्ध संघर्ष करने वाले लोगों के सामूहिक व्यक्तित्व का सूचक नहीं है। ऐसा ‘अतिरिक्त पुरुष’ तो ‘हर देश’ की छाती में ‘कुछ दहकते हुए घरों’ में जीवित रहता है। इसीलिए कवि यह निष्कर्ष निकालता है कि

 देशों और मनुष्यों और भाषाओं के बीच
जितना और जो कुछ खाली है वहीं और वहीं
कविता है।

जिस प्रकार की कर्मठता और निर्णय-शक्ति नीचे उद्धृत पंक्तियों में उभरती है उसकी अमूर्तता और तर्कहीन कट्टरता की ओर भी हमें सतर्क रहना चाहिये:

तुम्हें पर्वतों से झरना संगीत और आकाश में तन खड़ा
विश्वास दिखाई क्यों नहीं देता? पठारों पर दौड़ते वसंत के
पैरों की आहट वृक्षों के पत्तों पर अंकित हो गयी है
तुम तो पतझर का अभिवादन भी नहीं स्वीकार सके
कि उसके जुड़े हुए हाथों हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा,
तुम्हारी आस्था की उंगलियों में उलझा तार
रात के अंधेरे में ही क्यों झनझनाता है।

आकाश में  तन कर खड़े होने वाले इस विश्वास की अतिरिक्त अहंवादिता से जो प्रतिगामी राजनीति उभरकर आ सकती है। उसकी गूंज इस संग्रह की कई रचनाओं में पाकर हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। ‘अतिक्रमण’ शीर्षक रचना में कवि कहता है कि :

विभाजित मनुष्यता के पक्ष में उठाकर-
पूज्य होने की इच्छा से मुक्त हो चुका हूं मैं!
सीमा- चाहे कोई भी हो
उसका अतिक्रमण न कर पाने की स्थिति में
किसी भी पक्षधरता को ओढ़ लेना असंभव है मेरे लिए!

अत: जब तक ऐसी सम्पूर्ण मनुष्यता का अवतरण हमारे सामने नहीं हो जाता, जब सब सीमाओं का अतिक्रमण कर चुकी है, इस कवि को  वर्ग-हितों पर आधारित राजनैतिक संघर्षों से कोई सरोकार नहीं होगा तथा इन संघर्षों में सक्रिय होने की पक्षधरता को ‘ओढ़ लेना’ उसके लिए असंभव होगा! ‘निरंतर प्रतिपक्ष’ में होने  वाले चिर वाम का समर्थक हो तो वह अवश्य हो सकता है, क्योंकि इससे अपने-आपको एक अतिविशिष्ट व्यक्ति मानने की उसकी अहंवादिता की पुष्टि होती है।

मैं सदैव प्रतिपक्ष का अभाव बन कर रहा
एक असह्य स्वभाव
मुझे संतोष है कि मैं अंत तक अपने बनाए हुए रास्ते पर
अपने ही निर्णय के साथ चला और यह भी
कि लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका।

कोई आश्चर्य नहीं कि ‘अतिरिक्त पुरुष’ के कवि को यह जीवन अपनी तात्कालिकता में ऐसा ‘रंगमंच’ दिखाई देता है जहां एक ‘लोमहर्षक गैर सिलसिलेवार कथानक पर आधारित नाटक’ मंचित हो रहा है। साथ ही, यह भी दृष्टव्य है कि समाजवादी एवं साम्राज्यवादी देशों की राजनीतिक गतिविधि के बीच भी कवि को दोनों पक्षों में कोई अंतर नहीं आता :

 फर्क सिर्फ इतना है-
कहीं चैकोस्लोवाकिया है, कहीं वियतनाम है!

अर्थात् जो कुछ सोवियत रूस ने चेकोस्लोवाकिया में किया, लगभग वही अमेरिका ने वियतनाम से किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के बारे में यह अभिमत बन जाने के बाद जो शलभ श्रीराम सिंह इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि ‘राजनीति के आतंक में जीवित रहने वाले रचनाकारों के लिए यह जान लेना अत्यावश्यक है कि ‘रचनाकार’, राजनीतिज्ञ की तुलना में कहीं अधिक बड़ा है।’ क्योंकि हमें ऐसे कथनों में गैर-जनवादी राजनीति की गंध आती है, इसलिए शलभ श्रीरामसिंह  के कवि-व्यक्तित्व के जुझारूपन और साहसपूर्ण आत्म-विश्वास से हम पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पाते। हमें डर बना रहता है कि कहीं उनकी अहंवादिता उन्हें जनविरोधी खेमे में न घसीट ले जाए।

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