कहानी


उचटी नींद के ऊल-जलूल सपने और उन सपनों के शुभ-अशुभ विचार। दुली के परिवार में कुछ दिनों से ऐसे ही सपने देखे जा रहे थे। कभी-कभी ये सपने लाल मिर्च की चटनी जैसे चरचरे होते। इस के विपरीत कभी-कभी काली लाल चाय से भी मीठे लगते। आखिरकार सभी सपने सामने बंधी फूली पर खत्म होते। फूली अगले महीने आसुज (आश्विन) में ब्याने वाली है। इसी के साथ वह सूखी रोटियों पर रखी चटनी को मक्खन में बदल देगी। साथ ही लाल-काली चाय को गाढ़ी और दूधिया बना देगी।

किसानी गांव में किसी की अच्छी फसल या अच्छे पशु का जिक्र होता ही है। दूली की भैंस की चर्चा भी हर जगह थी। नल पर, बिटोड़ों में, हर जगह उसी की भैंस का जिक्र था। जहां भी औरतें इकट्ठी होतीं, भैंस की बात चल पड़ती। भैंस के साथ दूली की बहू का जिक्र आता। वे कहतीं-‘इतनी मेहनती लुगाई हम ने आज तक नहीं देखी।’ कई पुरुष तो अपनी पत्नियों को डांटने लगे थे। कहते-‘डंगर-ढोर नहीं संभालने आते हों, तो दूली की बहू से सीख कर आओ।’

गांव में भैंसों के व्यापारी आते। उन्हें भी सबसे पहले दूली की भैंस ही दिखाई जाती। दलाल बता देते थे कि वो बेचना नहीं चाहते। पर साथ ही यह भी कहते कि एक बार देखने में क्या हर्ज है। शायद उन का विचार बदल गया हो। बहुत ही गरीब हैं। कब तक ऐसी कीमती भैंस को नहीं बेचेंगे। भैंस को देखते ही व्यापारी ईष्र्या से भर उठता। काश! यह भैंस उसके घर के खूंटे से बंधी होती। चौड़े पुट्ठे, लंबी पूंछ, गोल-गोल छोटे सींग। इन से भी बढ़ कर भारी आकार लेती बाख पर लटकते अंगूठों जैसे एकसार चार थन। व्यापारी के पूछने के पहले ही दूली की बहू बोल उठती-‘ना, हम नईं बेचते।’ यह सुनने के बाद भी वे भैंस की चिकनी काली चमड़ी पर अपना हाथ फिराते। चिकनाई के कारण उन्हें हाथ फिसलता हुआ मालूम देता। खूंटे की ओर जाकर वे गोलाई पकड़ रहे सींगों को देखते। उसके माथे पर खिली कपास के फाहे जितने सफेद फूल को निहारते। उस पर अपनी रुपए गिनने वाली अंगुलियां फिराते। जाते-जाते भी एक-दो बार मुड़ कर अपनी ललचाई-व्यापारी नज़र फूली पर जरूर डालते।

अंधेरा होने पर दूली शहर से दिहाड़ी कर के लौटता। साइकिल खड़ी करके सब से पहले भैंस के पास जाता। उस पर हाथ फिराते-फिराते वह सुनता-‘आज फिर कोई व्यापारी आया था, फूली के लिए। मुंह-मांगे दाम देने को तैयार था।’ दूली गर्व से भर जाता। उसकी दिन की थकान गायब हो जाती।

दूली सोचता कि कितना हंसा था वह हडियल कटिया को देख कर। हंसी तो बड़ी बेटी भी थी। लेकिन वह बड़ी थी, जल्दी ही मां की ओर हो गई। छठी में पढऩे वाली छोटी बेटी और आठवीं में पढऩे वाला बेटा बापू की ओर रहे। उन्होंने कई दिनों तक उस मरियल-हडियल कटिया का मजाक बनाए रखा। हंस-हंस कर लोट-पोट होते हुए उन्होंने कटिया का नाम ही गिफट रख दिया था। मामा का प्यारा-प्यारा गिफट (गिफ्ट)।

अड़ोसी-पड़ोसी भी दूली की बहू का मजाक उड़ाने लगे थे-

‘जैसी हडियल आप, वैसी ही कटिया ले आई।’

‘तेरे पीहर में सब कुछ ऐसा ही होता है क्या?’

‘दूली जब आज तक तेरे हाड नहीं ढक सका, इस को क्या झोटी बनाएगा?’

ऐसी बातों के चलते दूली की बहू को अपने निर्णय पर पछतावा-सा होने लगता। सोचती कि यह मैंने क्या मांगा? भाई पक्की नौकरी में है। शहर के एक कालेज में चौकीदार है। उसने गांव में अपना पुराना घर गिरा कर दो पक्के कमरे बनवाए हैं। पक्के लैंटर वाले। चिनाई लगते ही उसने बहन को बुला लिया था। नींवों पर चौखट रखी तो रिवाज के अनुसार बहन से चौखटों पर तोते बंधवाए गए। बहन ने गोटा लगे हरे कपड़े के तोते बना रखे थे। बड़े चाव से बारी-बारी उन्हें मौली के धागों से चौखटों पर लटका दिया। इसी के साथ उस की कल्पना में भाई से मिलने वाला संभावित सगन घूमने लगा। मकान पूरा हुआ। भाई ने खुश हो कर बादशाह की तरह कहा-‘मांग बहन! क्या मांगती है तोता बंधवाई का?’ बहन को भाई की हैसियत का पता था। भाई ने ये दो कोठडिय़ां भी इधर-उधर से जुगाड़ कर के बनवाई हैं। उनमें भी काफी काम अधूरा पड़ा है। खिड़कियों को फिलहाल बोरियां लटका कर ढक दिया है। फर्श भी नहीं डलवाया। नीचे से गोबर से लीप कर रहने लायक बना लिया है। वह भाई पर बोझ नहीं डालना चाहती थी। उसे पता था कि भाभी अपने संदूक से अच्छे-हल्के पांच सूट तो जरूर देगी। फिर क्यों न भाई से सौ-दो-सौ रुपए लेने की बजाए कटिया ले ली जाए। पल जाएगी।

इस कटिया की मां भी अच्छी बणत की खूब दूध वाली भैंस थी। नींव खुदवाने के समय ही भाई को उसे बेचना पड़ा। कटिया तब एक वर्ष की थी। बहन को इस हडियल कटिया में सरर्र-सरर्र बाल्टी भरने वाली भैंस नज़र आई। वह भगवान जैसे भाई से मांग लाई कटिया, वरदान की तरह।

हिम्मती इतनी कि कई कोस पैदल चल कर आई। कभी भागती के साथ भागती। कभी रुकती को पीछे से धकियाती। कभी गले की रस्सी खींचती। इस तरह उस ने कटिया घर ला छोड़ी।

जितना मजाक होता गया उतना ही उस का निश्चय पक्का होता गया। मन-ही-मन सोचती कि इसे ही पाल कर तगड़ी झोटी बना कर दिखाऊंगी।

जेठ के महीने की तपती दुपहरिया। गेहूं कटने के बाद खेत खाली सुनसान पड़े होते। दूर-दूर तक आदमी का नामो-निशान नहीं होता। धूल भरी लूएं चलतीं। ऐसे में राहगीर खेतों के बीच हिलती-डुलती मानुस-जात की परछाई को देखते। वे बड़ी हैरानी से सोचते कि इतना हिम्मती ये कौन है? लेकिन जानने वाले सहज ही अंदाजा लगा लेते थे। उन्हें भरोसा होता था कि यह दूली की बहू ही होगी। वही अपनी हडियल कटिया के लिए खेत-खेत, मेंढ़-मेंढ़, नालों-खालों के किनारे हरा ढूंढती फिरती है। कटी गेहूं की तीखी कीलों जैसी फांसों  से पैर फुड़वाती। छोटी सख्त घास को निकालते हुए हाथ छिलवाती। अपने सिर की चुन्नी की झोली को एक-एक तिनके से भरती। इस तरह सांझ तक वह गठरी-भर चारा इकट्ठा कर लाती थी।

वह सोचती कि काश! उसकी भी अपनी कोई छोटी-मोटी क्यारी होती। फिर उसे यूं किसी के खेत में क्यों भटकना पड़ता! वह अपनी क्यार में ज्वार-ग्वार बीजती। अपनी कटिया को हरा-चारा, कचिया-कचिया चारा चराती। वह खूब जुगाली करती और झटपट बाल्टी भर दूध….।

दूली ने भैंस के दोनों ओर कई बार हाथ फिराया। कुरता निकाल कर औसारे की छान से बाहर निकले बां पर टांग दिया। फिर बूढ़ी मां के खटोले के पास पड़ी खटिया पर पसर गया। दूली की बहू चूल्हे पर रोटी बना रही थी। बेटे ने चूल्हे के पीछे से हुक्की उठाकर ताजा कर दी। फिर चिलम भर कर हुक्की बापू को पकड़ाई और उसी के साथ सट कर बैठ गया। थोड़ा रुक कर वह अबोधपन के साथ बोला-‘बापू! आज एक बपारी आया था अपनी फूली को लेने। उसकी कमीज के नीचे पहनी हुई बनियान की जेबें भरी हुई थीं। कमीज दो-तीन जगह से उठी हुई थी। मां जितने रुपए मांगती, वह दे देता। बिल्कुल तैयार था।’

वह कुछ कहता, इससे पहले ही औसारे से सवाल आया-‘पैसे ले आया क्या? तूड़ी वाले को आज जरूर देने हैं।’

‘नहीं! आज ठेकेदार नहीं मिल पाया। कहीं बाहर गया हुआ था। कल मिल जाएंगे।’ कह कर दूली ने चिलम में चिमटी मार कर अंगारियां इधर-उधर हिलाईं। फिर तमाखू को सुलगाने के लिए छोटे-छोटे कश खैंचने लगा। दूली की कल्पना में नोटों की गड्डियां आने लगीं। बेटे की बात बीच में ही रह गई।

‘अब मैं क्या करूं? असल में तो वो अभी आ जाएगा। नहीं तो सबेरे तेरे जाते ही आ धमकेगा। बाहर गली में मोटर साइकिल पर चढ़ा-चढ़ा टीं-टीं करता रहेगा। खैर, उस का भी क्या कसूर है। दस गठड़ी तूड़ी के पैसे हम दो बार में भी पूरे नहीं कर पाए। तूड़ी खत्म भी होने वाली है। करार पर पैसे दिए जाते तो आगे भी….तेरे इस ठेकेदार को भी आज ही बाहर जाना था।’ दूली की बहू निराशा और लाचारी से फूंकनी पटकती हुई बोली। दूली चुपचाप सुनता रहा। घरवाली ने बात जारी रखी-‘एक बोरी गोसे के पैसे लीलू की मां से लेने हैं। वो अभी नहीं दे रही। एक बोरी के मगनी की बहू से पहले लेने थे। एक आज भरवा कर ले गई है। वो भी पैसे अभी नहीं देगी। मास्टरनी से मैं ले नहीं रही। कुछ दिनों में उस के पीहर से बाजरा आएगा। कह रही थी कि भैंस के ब्यांत पर परात-भर दे देगी। थोड़ा-बहुत गुड़ भी देने की हां कर रखी है। उससे पैसे ले लिए तो एकदम ब्यांत के टैम चाहने वाली ये चीजें कहां से लाएंगे?’

दूली का तमाखू ठीक से नहीं सुलगा था। मजा नहीं आया। वह नहाने के लिए उठ गया।

कच्चे आंगन में तूतड़ी (शहतूत) का पेड़ खड़ा है। उसी के पास नहाने-धोने के लिए आठ-दस ईंटें टिकाई हुई हैं। दूली दिन भर का रेत-सीमेंट-मिट्टी गात से छुड़ाने के लिए रगड़े लगाता है। गिलास के साथ पानी डालता हुआ वह कुछ-न-कुछ कहता रहता है। सुनता रहता है। दिन-भर बाहर रहने के कारण यही थोड़ा-सा समय होता है बोलने-बतलाने का।

‘टोकरे वालों पर जा आती….कुछ दे दें तो…!’ दूली ने गले पर रगडऩे के लिए गर्दन उठाई थी। नज़रें ऊपर तूतड़ी पर गईं और उसे टोकरे वाले याद आ गए। वे टोकरे बनाने के लिए फागुन में तूतड़ी छांग कर ले गए थे। उन का और कोई कारोबार तो है नहीं। शहतूत की लचीली टहनियों के टोकरे, टोकरियां, बोहिए बना-बेच कर ही गुजारा करते हैं।

‘वो बेचारे भी अपने जैसे हैं। फिर भी एक-दो बार जब भी गए हैं, उन्होंने पांच-दस दिए ही हैं। मैं कल खुद गई थी। उन की एक बड़ी औरत मिली थी-काली-सी….। स्यात उन की मां हो या घर की सब से बड़ी बहू। वह कह रही थी कि थोड़ी-सी गेहूं ले जाना। कुछ लगी हुई (सुरसी की खाई हुई) है। किसी ने उन्हें टोकरों के बदले काफी सारी दे दी। बोली कि भैंस को दलिया बना कर देने का यह सही टेम है। दलिए के साथ दो-चार सेर सरसों का तेल भी दिया जाए तो ठीक रहेगा। ब्यांत भी सही रहेगा और दूध भी बढ़ेगा। कह रही थी कि बहू! भैंस का और चाक्की का एक हिसाब होवे। जो डालोगे, जैसा डालोगे, वैसो ले लोगे। हम खुद इस गेहूं का दलिया खा रहे हैं। घर से पूछ लेना और सलाह बने तो ले जाना, बहू!’

दूली पूरा जोर लगा कर बोला, ‘रहने दे। राशन काट की ले जाएंगे।’

‘तू बस राशन काट का नाम न लिया कर। डीपू वाला तेरा बाप लगता है या मेरा? जैसे जाते ही बोरी उठवा देगा। कहेगा – कोई बात नहीं….पैसे नहीं हैं तो फिर आ जाएंगे। बड़े खुश हुए थे पीला राशन काट बनवा कर। जैसे कि सरकार से तनखा बंध गई हो। चूल्हे में फूंक दे इसे। एक रोटी तो सिकेगी।’

दूली सुन रहा था और रगड़े लगा रहा था। बाद की सारी बात उसने दो-चार गिलास पानी के साथ हरि ओम….हरि ओम में घोल दी।

पत्थर-से कानों वाली बूढिय़ा को जैसे पैसों की बात सुन गई। उसने अंदाजा लगा लिया कि ऐसे में पैसों की ही बातें हो सकती हैं। खटोले पर पीठ रगड़ते हुए वह बोली-‘दूली रे! मेरी माने तो बेटा इसे बेच दे। जीते जीव का क्या धन (पूंजी)। जब तक सांस तब तक आस। सांस गई तो चमड़ा और हाड। पर ब्याने के बाद बेटा, थन, दूध, बच्चा, सुभाव- सब का तोल-माप होवे। उसी के हिसाब से पैसे लगैं। बाकी थारी मर्जी बेटा।’

दूली की बहू ने कुछ घबराई-सी आवाज में मात्र इतना कहा-‘इसे ऐसी ही माड़ी बातें सूझती हैं।’

लेकिन इस तरह की बातें दूली या दूली की बहू के लिए नई नहीं थी। गांव में ऐसी घटनाएं आम तौर पर सुनने में आती रहती हैं। पली-पलाई भैंसें एकदम यूं खूंटा खाली कर जाती हैं कि विश्वास ही नहीं होता। मरने के बहाने-कारण ही चर्चा में रह जाते हैं। जोहड़ में पानी के साथ मेंढकी पी गई थी। चारे के साथ कोई जहरीला कीड़ा खा गई थी। ब्यांत में गर्म-सर्द हो गया था। पेट में बच्चा उलटा हो गया था और यह तो अक्सर हो जाता है कि बच्चा मरा हुआ जन्मा, कीमत आधी। बच्चे को थनों से नहीं लगाया, कीमत कम। कोई थन सिंकुड़ गया या मारा गया, तो कीमत कम। दूध कम हुआ तो उसी के हिसाब से कीमत। मेहनत, आशाएं एक झटके में सब खत्म।

दूली का ध्यान फूली पर केंद्रित हो गया। सही पल गई थी, लेकिन अब वह संभालनी मुश्किल हो गई थी। बड़े-बड़े कहते सुने थे कि कमजोर के घर तगड़ी भैंस और घोड़ी कब तक रुकेगी? बिकेगी या छिनेगी (चोरी हो जाएगी)।

दूली नहाकर खाट पर आ बैठा। बाहर गली से कोई घोषणा जैसी आवाज सुनाई दी। उसने कुंडी-सोटे से खट-खट कर चटनी बना रही बड़ी बेटी को थमने को कहा। खट-खट कर रुकती तो गांव के चौकीदार की आवाज साफ सुनाई दी। वह कहता घूम रहा था-‘कल दस बजे सवेरे चौपाल में ‘लैकसनों’ वाले आवेंगे। वोटों की फोटो खींचेंगी। जिसकी रहती हो खिंचवा लियो रै चौधरियो।’

‘बणा ले बेटी फटाफट बणा ले। भूख लगी हुई है। मैंने सोचा कि स्यात कोई अपणे काम की बात हो।’

बेटी ने कुंडी में पड़े प्याज-नूण-मिर्च पर सोटे मारने की गति बढ़ा दी। वह बापू के साथ अधिक नहीं बोलती। जब दोनों छोटे बोल रहे हों तो यह चुपचाप उनकी ओर देखती रहती है। हां! बीच-बीच में धीेरे से मां से जरूर कुछ कहती रहती है।

छोटों ने बापू की खाट पर पांयतों की ओर अपनी जगह बनाई हुई हे। बेटे की ‘बपारी’ वाली बात अभी अधूरी थी। उस ने चुभती-गड़ती पांयतों से उकसते हुए पूछा-‘बापू! जितने रुपए हम मांगेंगे, बपारी उतने ही दे देगा?’

‘नहीं देगा तो क्या होगा? बपारी अपणे घर राजी, हम अपणे घर और फूली अपणे खूंटे राजी।’

‘फिर हम इतने रुपयों का क्या करेंगे?’

‘हम….हम बेटा अपणे घर का बड़ा-सा गेट बणाएंगे। उस पर लिखवाएंगे ‘गिफ्ट भवन’, पंद्रह सौ पचास बटे अठारह, अर्बन स्टेट’। फिर मैं लेबर चौक से काफी सारे मजदूर लाकर अपणे आंगन को पक्का करवाऊंगा। नहाणे की पक्की चौकी बणवाऊंगा।…..और फिर हम बिजली की मिक्सी की चटनी से रोटी खाया करेंगे।’

गेट की बात, मकान का नंबर, अर्बन स्टेट सुन कर बच्चे हंसे। दूली पिछले 7-8 महीने से शहर में इसी नंबर के मकान में मजदूरी कर रहा है। फिर उन्होंने अपने घर के प्रवेश द्वार पर देखा। वहां तो किवाड़-गेट-थम्बी कुछ भी नहीं था। बाहरी पशुओं को रोकने के लिए केवल दो बल्लियां ‘एक्स’ बना कर अड़ा रखी थी।

‘फिर तो बापू मैं गेट पर ‘वैल्कम’ लिखूंगा। मुझे वैल्कम लिखने में गुड़ मिलता है। और बापू फिर से गंठे (प्याज़) भी इकट्ठे ले आएंगे।….एक-एक, दो-दो रुपए के लाने पड़ते हैं…..। मां मुझे ही भगाती रहती है,’ बेटे ने खुश होते हुए कहा।

‘एक साइकिल ले लेंंगे। मैं और तू दोनों साइकिल पर स्कूल जाया करेंगे। दीवाली पर मैं एक स्वेटर और फीतों वाले कपड़े के सफेद जूते लाऊंगी।’ छोटी बेटी  बेटे से भी ज्यादा खुश हो रही थी।

‘मैं भी तो लाऊंगा।’ बेटे ने छोटी को कोहनी मारते हुए कहा।

बड़ी बेटी चुपचाप उन की बातें सुने जा रही है। वह कुछ नहंी बोल पा रही। आखिर फूली की संभावित कीमत में उस का ब्याह भी तो शामिल है। इस बात का जिक्र वह मां-बापू के मुंह से कई बार सुन चुकी है।

‘दे बेटी, रोटी सब को….। थोड़ी-थोड़ी चटनी रख दे….।’ मां ने रोटी की राख दूसरे हाथ पर मारकर झाड़ते हुए कहा।

रोटी खाते हुए भी दूली फूली के बारे में ही सोचता रहा। बच्चों की बातें और फूली से जुड़ी आशंकाएं उस के दिमाग में घूमने लगीं। साथ ही तूड़ी के पैसे भी याद आने लगे। उसने एक दिन के लिए अपने मिस्त्री से भी पैसे उधार मांगे थे। लेकिन उस के पास भी पैसे नहीं थे। ऐसे में उसे खाली हाथ ही आना पड़ा। दूली की बहू घर के छोटे-मोटे खर्चे खुद ही चला लेती है। इसके लिए वह दूली को कभी नहीं कहती। बच्चों की पढ़ाई का भी सारा खर्च वही दे रही है। साथ ही अड़ी हुई है कि बच्चों को आगे तक पढ़ाएगी। वह दो घरों का गोबर उठाती है। आधे का  हिसाब है। सुबह जाकर उनके डंगरों का गोबर-मूत सीतती है। सूखा करती है। तसलों में गोबर भर कर गांव से बाहर उन के बाड़ों में गोसे थापती है। सूखने पर आधे अपने घर ले आती है। बाकी आधों का उनका बिटोड़ा बनवाती (चिनती) है। बड़ी बेटी भी इस काम में उस का हाथ बंटवाती है। गांव में कई घर दुली की तरह ही भूमिहीन हैं और पशु नहीं रखते। उनमें से कई इसी से गोसे मोल ले कर अपने चूल्हों का काम चलाते हैं। लेकिन उनके पैसे ठीक से नहीं आ पाते। इसके कारण वह थोड़ा-बहुत ही काम चला पाती है।

दुली खुद शहर में दिहाड़ी पर जाता है। वह कई वर्षों से एक ही ठेकेदार के पास है। उस की एक साथ कई-कई कोठियों की चिनाई लगी रहती है। वह अपने मिस्त्रियों और लेबर को हफ्तावार पेमेंट करता है। दुली को एडवांस की किस्त काट कर थोड़े से पैसे मिलते हैं। इतने पैसों से चूल्हे पर चटनी-रोटी भी ठीक से नहीं चल पाती। साइकिल खराब हो जाए तो उसकी मुरम्मत भी चिंता में डाल देती है। अर्बन स्टेट में ईंट-गारा ढोता-ढोता वह बूढ़ा हो जा रहा है। वहां की कोठियां साल-भर में ही पूरी हो जाती हैं। बनने के बाद लगता है जैसे पूरी की पूरी मार्बल की बनी हों। वह समझ नहीं पाता कि कहां से आता है उन के पास इतना पैसा? ऐसे कौन से काम हैं जिन में इतना पैसा है? क्या वे लोग उस से ज्यादा मेहनत करते होंगे? खुद ठेकेदार ही उसके देखते-देखते लखपति बनता जा रहा है। जबकि वह सारा काम लेबर से करवाता है। यह भगवान की लीला है या इन आदमियों की?

मच्छर बहुत हो गए हैं। फूली के पास कोठियों से लाए लकड़ी के बुरादे से धुआं कर दिया गया है। वे खुद भी बीजणे ले-ले कर कोठड़ी में लेट गए हैं। हवा बिल्कुल नहीं चल रही। कोठड़ी में उमस और घुटन है। बच्चे संभवत: सो गए हैं। लेकिन वे दोनों धीरे-धीरे बीजणे हिलाते हुए पड़े हैं। बाहर बूंदा-बांदी शुरू हो गई है।

इधर-उधर करवटें बदलने के बाद उसे लगा कि दूली अभी जाग रहा है। वह बोली-‘कभी मां सही कह रही हो। बच्चों के दूध की तो दूर कभी यह घर भी अपना न हो पाए?’ उसने अपने नीचे इकट्ठी हो रही पतली दरी को सीधा करते हुए कहा।

दूली जागता पड़ा था। वह भी वही सोच रहा था। अब तक फूली को लेकर तमाम शंकाएं दबी-दबी थीं। अब मां ने उन्हें शब्दों के रूप में सामने खड़ा कर दिया था। अपनी शंका बाहर से शब्द बन कर सुनाई दे तो ज्यादा परेशानी होती है। उस के अर्थ और ज्यादा दिक्कत पैदा करने लगते हैं। अब फूली की शंकाओं में यह घर वाली शंका भी शामिल हो गई थी।

दूली का घर देख कर कोई भी अचम्भे में पड़ सकता है कि इन्होंने गली पर कब्जा कर के घर बनाया हुआ है। पचहत्तर फुट लंबा और ग्यारह फुट से भी कम चौड़ा। इतनी तंग तो आजकल कोई गली भी नहीं रखता। लेकिन मिल गया था ठीक भाव में। बस, ये अपनी दड़बे जैसी पुश्तैनी कोठड़ी छोड़ कर यहां आ बैठे।

असल में यह तीन भाइयों का पैंतीस-पचहत्तर का एक बाड़ा था। छोटे भाई की शहर में नौकरी लग गई। जमीन-घर को लेकर तीनों में तकरार हो गई। तकरार इतनी बढ़ी कि वह दुश्मनी में बदलने लगी। छोटे भाई ने हर जगह के तीन-तीन हिस्से करवाए। बाड़े के बंटवारे में वह कुछ ज्यादा ही बदले की भावना से काम ले गया। भाइयों ने कहा था कि अपना हिस्सा दाएं या बाएं एक ओर ले ले। इस से उन दोनों का इकट्ठा बड़ा हिस्सा रह जाता। परन्तु वह नहीं माना। उस ने अड़ कर बीच वाला हिस्सा ले लिया। तीन हिस्से, तीनों गली जैसे। वह यह भी नहीं चाहता था कि उस का हिस्सा खाली पड़ा रहे। उसे डर था कि  कहीं भाई उस पर कब्जा न कर लें। दूली पांचवीं तक उस के साथ पढ़ा था।  फिर वह स्कूल छोड़ कर गांव के ही एक जमींदार का सीरी लग गया। इसके बाद भी इनके बीच बराबर राम-रमैया बनी है। जब भी मिलते एक-दूसरे की राज़ी-खुशी पूछने के लिए जरूर रुकते। उसने दुली को इस हिस्से का मालिक बनने के लिए कहा। दूली ने अपनी गरीबी के चलते लाचारी जताई। इस पर वह बोला-‘दुली! अब तू गरीब कैसे है? तेरी झोटी पल रही है। तू आ कर बैठ जा इस घर में। कोई ना-वा नहीं। आधे पैसे झोटी के ब्यांत पर दे देना। बाकी के चार सालाना किस्तों में पूरे कर देना।’

डरते-डरते दूली की बहू ने भी उस की हिम्मत बढ़ा दी-‘देखा जाएगा, ले ले।’ और ये यहां आ बैठे। कब्जा लेने से पहले दूली ने भाइयोंं की सहमति ले ली थी। भाइयों के पास भी और कोई चारा नहीं था। उन्होंने दुली को उदासीन-सी सहमति दे दी। इधर, इन्होंने अपने हिस्सों में भी रूचि लेना छोड़ दिया था। अब सुना है कि वे यहां अपनी कारें खड़ी करने के लिए गैराज बनाएंगे।

जिस कोठड़ी में ये अब पड़े हैं, वह बरामदेनुमा एक-कडिय़ा जगह है। यह छोटे भाई ने अपने पशुओं को बांधने के लिए बनाई थी। बिल्कुल कामचलाऊ-सी। दुली ने कुछ ईंटें जोड़ कर चौखट खड़ी कर के इसमें किवाड़ लगा लिए। हिस्सा लेने के समय जो कंधोड़ी (छोटी व कच्ची-पक्की दीवार) वह खींच गया था, वहीं यूं की यूं हैं। चूल्हे के लिए छान डाल कर छोटा सा औसारा बना लिया। इस में चूल्हे के साथ थोड़ा-बहुत ईंधन रखने की जगह भी बना ली। इस के बाद भी मां के छोटे-से खटोले के लिए जगह निकल आई। पुश्तैनी घर में फूली गली मेंं बांधनी पड़ती थी। दूली और उसका बेटा कुछ दूरी पर खंडहर होती एक हवेली में जा सोते थे। यह हवेली सुनसान पड़ी रहती थी। इसके मालिक वर्षों पहले गांव छोड़कर दिल्ली चले गए थे। वहां वे अब करोड़पति हैं। इस की छतें लगभग सारी गिर चुकी है। थोड़ी-बहुत आधी-पराधी बची हैं और गिरने वाली हैं। वहीं दूली ने कुछ जगह अपनी भीड़ी सी खाट के लिए सुरक्षित कर ली थी। बरसात में हमेशा छत गिरने का डर रहता। इसी डर से दूली ने कई रातें हवेली में अधजगी बिताई थीं।

अब वे सब इक्ट्ठे एक कोठरी में सोते थे। केवल मां का खटोला बाहर रह जाता है। कोठरी में केवल तीन खाटें ही आ सकती हैं। एक पर दूली बेटे के साथ  सोता है। दिन-भर काम कर के बड़े होते बेटे के साथ वह बढिय़ा नींद नहीं ले पाता। एक पर दोनों बेटियां सोती हैं। दोनों में काफी धक्का-मुक्की होती रहती है। यहां तक कि वे दोनों नींद में भी लड़ती हैं-

‘तू मेरे ऊपर पड़ी है’

‘मैं कहां, तू मेरे ऊपर लातेें रखे हुए है। तेरी ओर जगह ज्यादा है। तू उधर हो ले।’

‘नहीं होती जा…..।’

खाटों की हालत भी कुछ ठीक नहीं है। केवल दूली की खाट ही कुछ ठीक है। बाकी दोनों तो झोली की तरह हुई पड़ी है। वह भी बूढ़ी मां ने सांठ-गांठ कर किसी तरह अटकाई हुई है। वह स्वयं एक दिन पूरी हसरत के साथ दुली से कह बैठी-‘बेटा सारी उम्र गुज़र गई खटोले पर गोडियां मोड़ कर सोते हुए। अब तो एक खाट बनवा दे मेरी। बुढ़ापे में तो पांव पसार कर सो कर देख लूं।’

दूली ने हाथ से  उसकी ओर ‘कुछ दिन ठहर जा’ का इशारा कियाथा। साथ ही फूली की ओर भी हाथ किया था कि इसे बिक जाने दे, फिर देने के लिए नया पलंग बनवा दूंगा।

‘अच्छा बेटा, भगवान तुझे लंबी उम्र देे’ मां ने लंबी सांस भर कर कहा था। इसके साथ ही खुद भी बड़ी उम्मीदों से फूली की ओर देखा था।

मां  के लिए ख��ट की वह कभी नहीं सोच पाया। लेकिन दो खाटों के लिए नए बान लाने की उस ने कई बार सोची। पर वह भी नहीं ला पाया। इस तरह खाटें भी फूली के बिकने की प्रतीक्षा में ही हैं।

कोठरी का मुंह भी उत्तर में है। पुरवा-पछवा कोई भी हवा कोठरी में नहीं लगती। इसी वजह से बाहर बूंदा-बांदी शुरू होने के बाद भीतर घुटन और बढ़ गई है।

इस के बावजूद एक तरफ फूली के लिए छान डल गई है। साथ में तूड़ी के लिए छोटी-सी छतड़ी बना दी गई है। आंगन के बीच में तूतड़ी का पेड़ गर्मियों में छांव देता है। सर्दियों में धूप में बैठने को फिर भी काफी आंगन बचा रहता है। चौमासे में दिक्कत कुछ बढ़ जाती है। पूरा आंगन गारा-गारा हो जाता है। यही नहीं, इसमें केंचुएं भी निकल आते हैं। वे पूरे आंगन में लकीरें बनाते हुए चूल्हे तक आ पहुंचते हैं

दूली यही सब सोच रहा था। दूली की बहू ने फिर दोहराया-‘कभी यह इतना अच्छा घर भी हाथ से न निकल जाए! बड़ी मुश्किल से घर वाले हुए हैं।…ये ठीक-ठाक ब्या जाए, बस। केवल पंद्रह-बीस दिन बच्चों को दूध की डकारें दिलवा कर इसे बेच देंगे….।’ मां की बातों से उपजी शंकाएं उनका पीछा नहीं छोड़ रही थीं।

दूली ने हंसी जैसी हं-हं के साथ कहा-‘सपने तो सभी को बुरे-बुरे आ रहे हैं। बाकी देखो। बच्चों के करम में दूध और घर होगा तो सब ठीक बीतेगा।’

मां की बात के साथ-साथ सपनों की बातें भी इन्हें परेशान कर रही हैं। कल बड़ी बेटी ने सुबह उठते ही बताया था-‘ऐसा सपना आया जैसे कि एक औरत मुझे बहुत बढिय़ा कढ़ाई वाला सूट दे गई। मैंने वह सूट दरियों ंमें छिपा दिया। थोड़ी देर बाद देखा तो सूट वहां नहीं मिला। मैं खूब रोई। खूब रोई।’

आज बेटे ने बताया कि गांव के मंदिर में गुलगुले बंट रहे थे। उसने झोली-भर कर गुलगुले लिए और चल पड़ा। सोचा कि घर जा कर इकट्ठे बैठ कर खाएंगे। इतने में एक बुढिय़ा आई और उस ने सारे गुलगुले छीन लिए। जाते-जाते वह उसे गारे में धक्का दे गई।

सभी सपने फूली पर पूरी बुराई के साथ लागू हो रहे थे। सपने में बच्चों को कुछ मिल रहा था, लेकिन साथ ही छिन भी रहा था।

‘हे भगवान! हमारी फूल को दिन पूरे होने तक कुछ न हो बौर ब्याने के बाद भी…महीने से भी कम रह गया है….,’ कहते-कहते छाती पर रखे जुड़े हाथों के साथ ही उस की आंख लग गई।

शाम के वक्त वह फूली को जोहड़ में पानी पिलाने जा रही थी। उस के हाथ में कमची थी और वह फूली के पीछे-पीछे थी। तभी गली में सामने से दो सांड लड़ते हुए भागे आए। पतली-सी कमची से उस ने उन्हें वापिस मोडऩे की कोशिश की। लेकिन वे फूली को गिराते हुए उसके पेट पर पांव रखते हुए भाग निकले। वह स्वयं भी भैंस के नीचे दब गई थी। वह चीख रही थी-‘मेरी फूली को उठाओ….मुझे खींचो….मेरी फूली को उठाओ….कोई मुझे निकालो….मेरी फूली को उठाओ…..।’

वह एकदम उठ बैठी। घबरा कर इधर-उधर देखा। दूली को उठाने के लिए हाथ बढ़ाया। उसे लगा जैसे वह खाट पर नहीं है। चप्पलेें पहन कर वह सीधी फूली की छान में पहुंची। फूल पर हाथ फिराया। दूली पहले से ही वहां खोर पर उकडू बैठा बीड़ी पी रहा था। अंधेरे में उसे ऐसा भी लगा कि दूली-फूली के सींगों से लिपटा कर कुछ बुड़बुड़ा रहा था। वह बहुत अधिक घबराई हुई थी। कंठ सूख रहा था। वह अपनी चुन्नी से पसीना पोंछती हुई दूली के पास सट कर जा खड़ी हुई। वह सोच रही थी कि इतना खतरनाक सपना दूली को कैसे बताए। तभी दूली ने बीड़ी फेंक कर बताया कि वह अभी-अभी यहां आया है। उसे काफी डरावना सपना आया। जैसे कि वह अर्बन एस्टेट की एक कोठी में काम कर रहा है। वहां के किचन में चिनाई कर रहे मिस्त्री को ग्र्रेनाइट की स्लैब देने जा रहा है। तभी लॉबी में मार्बल के चिकने फर्श पर उस का पांव फिसल गया। स्लैब के कई टुकड़े हो गए। …. और ठेकेदार ने उस के मुंह पर थप्पड़ मारा। ….इतनी महंगी चीज का यूं हाथ से छूट कर टूटना अपशकुन है। मैं यहां फूली के पास बैठा….। इतना बता कर उस ने अपना हाथ फूली के माथे के सफेद फूल पर फिराया। अंधेरा होने के बावजूद यह फूल उन की आंखों में बसा था।

दूली का सपना सुन कर उसने अपना सपना नहीं बताया। केवल इतना बोली-‘फसलों का नुकसान होने पर सरकार मुआवजा देती है। अपनी फूली को कुछ हो गया, तो क्या सरकार हमें भी कुछ देगी?’

दूली ने कुछ जवाब नहीं दिया। खोर से नीचे पांव धरता हुआ बोला-‘चल, सो जा। सुबह उठ कर दिन-भर दिहाड़ी भी करनी है।’

तभी गरज के साथ बिजली चमकी। उन्होंने देखा कि फूली जगर-जगर कर जुगाली कर रही है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज- 6 – 10

Advertisements

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.