मेरे बिहार (वैसे लगभग पूरे देश में) में मूल्यांकन के संदर्भ में एक फिकरा अत्यंत प्रसि़द्ध है कि एक साल की पढा़ई तीन घंटे की लिखाई और तीन मिनट की जंचाई। अर्थात विद्यार्थी एक वर्ष तक कमर तोड़ परिश्रम से पढ़ता है और पूरे एक वर्ष तक पढ़े हुए ज्ञान को अभिव्यक्त करने के लिए उसे  सिर्फ तीन घंटे का समय दिया जाता है और हद तो यह है कि उसकी जांच मास्टर साहब मात्र तीन मिनट के अनमने समय में कर देते हैं। सामान्यतया अगर आप किसी मास्टर साहेब को कुछ देर कॉपियों का मूल्यांकन करते देखेंगे तो विश्ववास दिलाता हूं कि आपको मूल्यांकन पर से ही विश्वास उठ जाएगा। यही वजह है कि अब सतत मूल्यांकन को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की जा रही है।आपको यह सुनकर आश्चर्य लग सकता है कि मैंने मूल्यांकन के गुर अच्छे शिक्षकों से लेकर विद्यार्थियों तक से सीखा है। मूल्यांकन के गुर सीखने की मरी कथा अत्यंत रोचक है। आइय,े आज मैं आपको मूल्यांकन सीखने की कथा सुनाता हूं।

            मूल्यांकन की पहली कथा:

            बात उन दिनों (1994)की है जब मैं जेएनयू से हिंदी में एमए करने के बाद एमफिल में पढ़ रहा था और साथ ही एक स्थानीय स्कूल ब्लू बेल्स में पढ़ाना शुरु किया था। पढ़ाने के जोश से लबरेज मैं कक्षा छठी को पढ़ा रहा था। उस क्लास में एक लड़का था अलफांसो, जिसकी हिंदी अत्यंत खराब थी। काफी मगजमारी के बाद भी उसमें सुधार की कोई गुंजाइश दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी। उसकी लिखावट पढऩा टेढ़ी खीर था। नतीजा यह निकला कि वह छठी कक्षा में फेल हो गया। परिणाम घोषित होने से पहले मुझे प्रधानाचार्या सुमन कुमार का बुलावा आया। मिलते ही उन्होंने कहा, ‘ये क्या किया है आपने?’ और उस लड़के की कापी मेरे आगे बढ़ा दी। मैंने कहा कि ‘इसने उत्तीर्ण करने लायक कुछ लिखा ही नहीं तो फिर पास कैसे कर देता?’ उनका जबाव सुनकर मैं चकित रह गया। उन्होंने कहा कि ‘फेल कौन किया- अलफांसो या आप? अगर एक वर्ष तक उसे पढ़ाने के बाद भी आप उसे इतना नहीं सिखा पाए कि  वह पास कर सके तो आप पूरी तरह अपने शिक्षण में फेल हो गए।’ आगे उन्होंने मुझसे पूछा कि ‘आप यह जानते हैं कि इसे गणित और चित्रांकन में कितने अंक आते रहे हैं?’  मैंने अस्वीकृति में अपना सर डुलाया। उन्होंने कहा कि ‘एक अच्छा शिक्षक अपने विद्यार्थियों की सारी गतिविधियों से परिचित होता है और सारे विषयों में उसकी गति को जानता-परखता है।’ यह कहते हुए उन्होंने उसकी गणित की कापी मेरे आगे बढ़ा दी। मैं दुबारा चौंका। उसे गणित में 100 में 100 अंक आए हुए थे। उनका समझाना जारी रहा, ”यह लड़का चित्रांकन में पूरी दिल्ली में सर्वश्रेष्ठ है। अपने क्लास की चित्रांकन प्रतियोगितिा में विगत तीन वर्षों से वह पूरी दिल्ली में प्रथम आ रहा है। अगर आप इसे अभी हिंदी में अनुत्तीर्ण कर देंगे तो वह फिर छठी कक्षा में ही रह जाएगा। इस तरह आप एक भविष्य के महान गणितज्ञ या पेंटर को हमेशा के लिए खो देंगे। यह कैसे संभव है कि जो इतना खूबसूरत चित्र बना सकता है, उसकी लिखावट इतनी खराब हो। कहीं कुछ गड़बड़ है, आप इसकी पड़ताल करें। इसलिए आप इस पर पुन: महीने भर परिश्रम करें, पुन: परीक्षा लें, मुझे पूरी उम्मीद है कि आपके विशेष शिक्षण से यह उत्तीर्ण हो जाएगा। अगर आपकी सहमति हो तो तात्कालिक रूप से  मैं इसे सातवीं कक्षा में प्रमोट कर देती हूं।’’ मैं उनका निहितार्थ तो समझ ही गया और समझा आकलन या मूल्यांकन का पहला पाठ।

            कहने की आवश्यकता नहीं कि उस समय राष्ट्रीय पाठ्यचर्या-2005 का नामोनिशान नहीं था, जिसमें इस तरह के आकलन को प्रोत्साहित करने की बात काफी सिद्दतसे कही गई है।राष्ट्रीय पाठ्यचर्या-2005 की रूपरेखा सुझाती है- ‘विषयों के बीच की दीवारें नीची कर दी जाएं ताकि बच्चों को ज्ञान का समग्र आनंद मिल सके और किसी चीज़ को समझने से मिलने वाली खुशी हासिल हो सके।’ अलफांसों पर अतिरिक्त मेहनत करने और थोड़ी सहानुभूतिपूर्वक हिंदी की उत्तरपुस्तिका का आकलन करने से उसके गणितज्ञ या सफल चित्रकार बनने में हम शिक्षक अगर उसकी मदद कर सकते हैं तो जरूर मदद करनी चाहिए। प्रधानाचार्या का निहितार्थ यही था। लेकिन आज भी अधिकांश शिक्षक-शिक्षिका’कड़ाई’ से मूल्यांकन करने को महिमामंडित करते हैं और समाज में भी अत्यंत ‘ईमानदार’ और ‘कड़क’ शिक्षक के रूप में प्रतिष्ठित  होते हैं। लेकिन समझने की बात यह है कि उनकी इस ‘कड़ाई’ में कितने बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। उस दिन लौटकर मैंने सर्वप्रथम दूरस्थ शिक्षा में की गई बीएड की पाठ सामग्री जिसमें शैक्षिक और आकलन से संबंधित दुनिया भर के सिद्धांत बघारे गए थे, एक बड़े झोला में डालकर कबाड़ी के यहां बेच आया।इस एक घटना ने मुझे अच्छा शिक्षक बनने की ललक पैदा कर दी। और मैं आकलन का पहला पाठ मैडम सुमन कुमार से सीखा।

            ऐसे ही ‘कड़क’ शिक्षकों और शिक्षिकाओं को बारबियान स्कूल के आठ छात्रों ने जिन्हें फेल कर दिया गया था, पत्र लिखकर दुनिया भर के लोगों को ध्यान  अपनी ओर खींचा।खेतों में काम करनेवाले आठ इतालवी लड़कों की यह लंबी चिट्टी शिक्षा के साहित्य में एक स्थायी जगह बना चुकी है। पुस्तक के प्रस्तावना लेखक कृष्ण कुमारके अनुसार, ”हमारे समाज के लिए इस चिट्टी की प्रासंगिकता इतनी अधिक है कि यदि उसमें आए हुए इतालवी संदर्भ हटा दिए जाएं  और आंकड़े भी भारतीय कर दिए जाएं तो हमें इस चि_ी का स्रोत अपने ही किसी गांव में तलाशने और उन बच्चों से मिलने की इच्छा होगी जिन्होंने यह निराला और मार्मिक काम किया है। पर रूपांतरण के वगैर भी यह दस्तावेज़ हमें अपने शिक्षातंत्र और मूल्यांकन की विसंगतियों को समझने के लिए ऐसी अंतर्दृष्टि देता है जो शिक्षा के समाजशास्त्र की अनेक पुस्तकें  और रिपोर्टें पढऩे से भी काफी मुश्किल से मिलेगी।’’ ( अध्यापक के नाम पत्र-बार बियान स्कूल के छात्र, ग्रंथशिल्पी, नई दिल्ली, 1996)पत्र के आरंभ में ही छात्रों ने लिखा, ”आप मुझे या मेरे नाम को भूल गई होंगी। आपने मेरे जैसे न जाने कितनों को फेल किया है। परंतु मैं अक्सर आपको, और दूसरी अध्यापिकाओं को, उन संस्था को जिसे आप स्कूल के नाम से पुकारते हैं, और उन लड़कों को जिन्हें आप फेल करती हैं, याद करता हूं। आप फेल करके हमलोगों को सीधे खेतों में या फैक्ट्रियों में धकेल कर हमें बिलकुल भूल जाती हैं।

            दो वर्ष पहले जब मैं माध्यमिक कक्षा में था, तब आपको देखकर मुझे बहुत डर लगता था। सच पूछिए तो मैं शरू से ही थोड़ा झेंपू किस्म का हूं। जब मैं बहुत छोटा था तो मैं अपनी नजर सदा जमीन की ओर रखता था। मैं दीवार के किनारे सटा हुआ चलता था, शायद यह मेरे या मेरे परिवार की, एक प्रकार की बीमारी है। मेरी मां भी इसी प्रकार की है कि तार देखते ही घबरा जाती है। मेरे पिता सब कुछ सुनते और समझते हैं, पर बोलते कम हैं। बाद में मैंने सोचा किझेंपना शायद हमारे पहाड़ी समुदाय का रोग है। मैदानी इलाकों के किसानों में कही अधिक आत्मविश्वास होता है। शहर के मजदूरों की तो बात ही छोडि़ए।(उपर्युक्त, पृ0 5)

            किसी भी विद्यार्थी का मूल्यांकन करते हुए न तो उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि को नजरअंदाज किया जा सकता है और ना ही उसके निजी वैशिष्ट्य को। एक शिक्षक को इस धारणा में पूरी आस्था रखनी चाहिए कि सभी बच्चे सीख सकते हैं, यदि उन्हें अपनी गति से सीखने दिया जाए और सीखने के अपने ही तरीकों का अनुसरण करने दिया जाय।

            मूल्यांकन की दूसरी कथा:

            मूल्यांकन की दूसरी कथामेंमजे की बात यह है कि इसमें मुझे यह सीख मिली कि कई बार तथाकथित गलत उत्तर में भी सर्वाधिक अंक दिए जा सकते हैं। हुआ यह कि उपर्युक्त स्कूल में मैंने सतत् मूल्यांकन के अंतर्गत एक बार कक्षा सात में हवाई यात्रा पर निबंध लिखने को दिया। कारण यह था कि उस कक्षा के अधिकांश बच्चे संपन्न परिवार के थे। यह निबंध उनके लिए नितांत आकस्मिक था। इससे पूर्व वे फुटबॉल मैच, दुर्गापूजा, पुस्तकालय, जीवन का लक्ष्य सदृश्य पारंपरिक निबंध लिख-पढ़ चुके थे। स्वभावत: अधिकांश बच्चों ने अच्छा नहीं लिखा। कुछ बच्चों ने अपने अनुभव के आधार पर ठीक-ठाक निबंध लिखा। लेकिन एक बच्चे का निबंध पढ़कर मैं चमत्कृत रह गया। निबंध पढकर स्पष्ट था कि उसने न तो कभी हवाई यात्रा की है और न हवाई यात्रा पर कभी निबंध पढ़ा है। बावजूद इसके मैं उसे सर्वाधिक अंक दिए जाने के लिए विवश हो गया। उसने कुछ इस तरह निबंध लिखना आरंभ किया-”पिछले साल की गर्मी छुट्टी में पापा ने मद्रास घूमने का कार्यक्रम बनाया। हम लोग तो फूले नहीं समा रहे थे, जब उन्होंने कहा कि हमलोग मद्रास हवाई जहाज से जायेंगे। हम सभी भाई-बहनों का हवाई यात्रा का यह पहला अवसर था। धीरे-धीरे वह दिन आ गया। हमलोग गाड़ी से हवाई अड्डा पहुंच गए। हवाई जहाज उड़ा, हमारी आंखें मुंद गईं। कुछ ही समय बाद हवाई जहाज नीचे उतरने लगा। एक बहुत बड़े मैदान में हवाई जहाज उतरा और अधिकारी ने बताया कि इसमें कुछ गड़बड़ी हो गई है, एक घंटा ठीक करने में लगेगा। मैदान के दूसरे किनारे हमलोगों ने देखा कि फुटबॉल मैच हो रहा है। हमलोग फुटबॉल मैच देखने लगे।’’ उसके बाद उसने पूर्व में पढ़े लिखेफुटबॉल मैच का सारा वृतांत पूरी रचनात्मकता के साथ लिख डाला। अंत में उसने लिखा ‘अचानक सायरन की आवाज आई। हमलोग पुन: जल्दी-जल्दी हवाई जहाज में बैठ गए। हवाइ्र्र जहाज उड़ा और कुछ ही देर में हमलोग मद्रास में थे। आज भी यह सब सपनों जैसा लग रहा है।’ यद्यपि उसने निबंध सही नहीं लिखा था, किंतु उसकी रचनात्मक क्षमता और प्रत्युत्पन्नमतित्व पर मैं रीझ गया। उसने अपने पढ़े हुए निबंध को हवाई यात्रा में इस तरह फिट किया कि मैं उसे सर्वाधिक अंक दिए वगैर नहीं रह सका।

            शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य ज्ञान के रूपांतरण की सीख देने में है। यहां उक्त छात्र ने अद्भुत तरीके से ज्ञान के रूपांतरण का कौशल सिद्ध किया। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या, 2005 के अध्यक्ष और वैज्ञानिक यशपाल तो शिक्षा की भूमिका ज्ञान के रूपांतरण को ही मानते हैं। यशपाल के अनुसार, ”इस वक्त जबकि सब कुछ को याद किया जा सकता है, फट पडऩे को तैयार है। हमें अपने बच्चों को समझ का चस्का लगने देना चाहिए, जिससे उन्हें सीखने में मदद मिले और जब वे कतरों और बिंबों में संसार को देखें और जिं़दगी की लेन-देन में दाखिल हों तो अपने मुताबिक ज्ञान का रूपांतरण कर पाएं।’’ मूल्यांकन या आकलन में हमेशा हमें सतर्क और चौकन्ना रहना चाहिए और यह देखते रहना चाहिए कि कब-कब और किस-किस तरह से बच्चे अपने ज्ञान का रूपांतरण करने में सफल हो रहे हैं। उसे तत्काल रजिस्टर में दर्ज करना चाहिए।

            गलत उत्तर में अंक देने का औचित्यीकरण नहीं किया जा सकता है, किंतु रटे हुए उत्तर के बरअक्स जिस गलत उत्तर में बच्चे की मौलिकता की झलक मिले, उसे मूल्यांकन करते समय नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है। विवादास्पद दार्शनिक ओशो ने इस संदर्भ में बड़े मार्के की बात कही है। उन्होंने कहा है कि वास्तविकता तो यह है कि जिं़दगी मांगती है बुद्धिमत्ता, इंटेलीजेंस, विजडम और विद्यालय देता है-स्मृति। जिं़दगी में स्मृति काफी नहीं है। स्मृति बिल्कुल यांत्रिक प्रक्रिया है। जितने पीछे हम लौटेंगे, उतनी स्मृति की शिक्षा गहरी थी। रटा देना, पक्का मन में बैठा देना, संस्कारित कर देना, कन्विंस कर देना पुरानी शिक्षा का काम था। शिक्षा ने बुद्धिमत्ता पैदा नहीं की-स्मृति पैदा की, जो पुनरुक्त कर सकती है। विद्यालय की सारी परीक्षाएं, सारे आकलन मुख्य रूप से स्मृति का आकलन है। हम यह जांचते हैं कि विद्यार्थी ठीक से दोहरा पाया है या नहीं। लेकिन ठीक से दोहराने वाला व्यक्ति जिं़दगी में खो जाएगा। क्योंकि जिं़दगी रोज नए सवाल उठाती है। पुराने उत्तर नए सवालों के सामने हार जाते हैं। इसलिए आज के शिक्षक को जोर देना पड़ेगा, बंधा हुआ उत्तर कृपा करके मत दो। नया उत्तर खोजो। नये उत्तर का ज्यादे सम्मान होगा, चाहे नया उत्तर गलत ही क्यों न हो। नये की खोज में भूल अनिवार्य है। इसलिए अगर स्मृति से मुक्त और बुद्धि को केंद्र में रखना हो तो हमें ध्यान रखना होगा कि भूल करने का स्वागत करना चाहिए। जो सर्वाधिक भूल करने के लिए निरंतर तत्पर है लेकिन दोहराने की उत्सुकता में नहीं है, कुछ खोज-बीन की उत्सुकता में है, तो हम बुद्धिमत्ता को विकसित कर पायेंगे। हमें आकलन करते समय और सिखाते समय इन बातों को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।

            आकलन की तीसराी कथा:

            आकलन की तीसरी कथा दिल्ली स्थित एक भव्य स्कूल में मेरे द्वारा शिक्षक हेतु दिए गए साक्षात्कार की है। साक्षात्कार में मुझसेसवाल के रूप में सर्वप्रथम यही पूछा  कहा कि ‘मुझे ऐसा हिंदी शिक्षक चाहिए जो मेरे बच्चे को सीबीएससी की बोर्ड परीक्षा में हिंदी में 90 फीसदी अंक दिला सके। क्या आप मेरे बच्चे को इतना अंक दिला पायेंगे?’ मैंने कहा ‘नहीं, कदापि नहीं।’जब उन्होंने मेरे ‘नहीं’ का कारण जानना चाहा तो मेरे मुंह से अचानक निकल गया कि, ”जब तक बूढ़े-पुराने लोग आकलन या मूल्यांकन में रहेंगे तब तक मैं हिंदी में इतने अंक नहीं दिला सकता। रोचक तथ्य यह है कि उस साक्षात्कार में विशेषज्ञ के रूप में हिंदी के एक श्रेष्ठ शिक्षक उपस्थित थे, जो अत्यंत उम्रदराज थे। मेरी नजर उन पर नहीं गई थी। लेकिन बात तो मुंह से निकल चुकी थी। रोषमय स्वर में उन्होंने पूछा कि ‘बूढ़े-पुराने लोगों का हिंदी आकलन से क्या संबंध?’ मैंने संयत स्वर में कहा कि जब तक आकलन या मूल्यांकन की परंपरागत अवधारणा बनी रहेगी, तबतक हिंदी में अच्छे अंक नहीं आ सकते। परंपरागत अवधारणा में यह बात बद्धमूल है कि साहित्य में अधिक अंक इसलिए नहीं दिए जाते कि इसका कोई अंत नहीं होता। विज्ञान या गणित की तरह साहित्य का उत्तर निश्चित और वस्तुनिष्ठ नहीं होता। इसलिए इन विषयों में तो अधिकतम अंक दिए जा सकते हैं किंतु हिंदी में नहीं। हिंदी में  श्रेष्ठता या गुणवत्ता की कोई सीमा नहीं होती। मेरा आग्रह यह था कि भले ही उत्तर की गुणतत्ता कीकोई सीमा न हो किंतु कक्षा विशेष के बच्चों के लिखने की गुणवत्ता की सीमा तो निर्धारित की ही जा सकती है। हम तय कर सकते हैं कि फलां कक्षा के बच्चे अगर इस सीमा तक लिखें तो उन्हें पूरे अंक दिए जाएं। दसवी-बारहवीं कक्षा के बच्चों की गुणवत्ता का पैमाना नामवर सिंह को बनाने की क्या आवश्यकता? दूसरी बात यह कि हिंदी आकलन की पांरपरिक अवधारणा में प्रश्न विशेष का आकलन अलग-अलग खंडों या फ्रेक्शन में नहीं किया जाता, जैसे अन्य विषयों में सामान्यतया किया जाता रहा है। अगर 10 अंकों का प्रश्नोत्तर है तो उसकी लिखावट, शुद्धता और विषय-वस्तु का गोलमटोल आकलन कर एक बारगी अंक दे दिए जाने का रिवाज है। लिखावट पर कितने, शुद्धता पर कितने तथा विषय-वस्तु पर कितने अंक दिए जाएं, इसका कोई पैमाना निर्धारित नहीं है। इस विभाजन में रचनात्मकता की कोई गुंजाइश कदाचित ही हो पाती है। प्रश्नोत्तर रचनात्मक, सही समझ, और विषय-वस्तु की दृष्टि से ठीक  होने पर भी यदि कॉपी में अधिक अशुद्धियां नजर आती हैं तो परीक्षक पूरी कॉपी को रंगीन कर उसमें मामूली अंक दे देते हैं या उसे फेल कर देते हैं।

            यह अकारण नहीं है कि ‘हाउ चिल्डेऊन फेल’ नामक अपनी विश्वप्रसिद्ध पुस्तक में महान् शिक्षाविद् जॉन हॉल्टलाल स्याही से आकलन करने को अपराध मानते हैं। उनका कहना है कि लाल स्याही से आकलन करने में बच्चों की अशुद्धियां ही रेखांकित होती हैं, और बच्चे हीनताग्रंथि के शिकार हो जाते हैं। एक अच्छे शिक्षक का दायित्व बच्चों ने क्या नहीं सीखा से  अधिक बच्चों ने क्या सीखा, का आकलन करना है। कम से कम ऐसे तरीकों से तो परहेज करना ही चाहिए जो उन्हें हीनता-बोध से ग्रसित कर सकते हैं। ऐसे माहौल में हिंदी में उच्च अंक की गारंटी नहीं ली जा सकती है।

            मूल्यांकन की कथा सुनाने का आशय: हम क्यों करते हैं आकलन

            सही आकलन के लिए आकलन का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। सामान्यतया आकलन का उद्देश्य विद्यार्थी का अगली कक्षा में जाना, विद्यार्थियों की प्रगति तथा फेल-पास को माना जाता है। जबकि मूल्यांकन का यह मूल उद्देश्य है ही  नहीं। आकलन सीखने की प्रक्रिया का ही एक अभिन्न हिस्सा है। आकलन का उद्येश्य अवधि विशेष में बच्चे की प्रगति और उसमें आनेवाले परिवर्तनों को लक्षित करना, तथा बच्चे की व्यक्तिगत विशेष जरूरतों को पहचानना है। इसके अतिरिक्त अधिक उपयुक्त तरीकों के आधार पर अध्यापन और सीखने की स्थितियों की योजना बनाना है। कोई छात्र या छात्रा क्या कर सकती है और क्या नहीं, उसकी किन-किन चीजों में विशेष रूचि है, वह क्या करना चाहती है और क्या नहीं, इन सबके प्रति समझ बनाने और महसूस करने में उनकी मदद करने के लिए आकलन किया जाना चाहिए। (आकलन स्रोत पुस्तिका-एनसीईआरटी-2009, पृ0 7) प्रत्येक शिक्षकों को अपने से सवाल करना चाहिए कि आखिर वह है क्या जिसकी हमें बच्चों का आकलन करते समय तलाश रहती है? चूंकि शिक्षा बच्चे के समग्र विकास से जुड़ी हुई है, मसलन शारीरिक, सामाजिक, भावात्मक और संज्ञानात्मक, इसलिए यह जरूरी है कि सभी पहलुओं का आकलन किया जाए। सिर्फ अकादमिक उपलब्धियों का नहीं, जो वर्तमान में विद्यालयों में इस्तेमाल की जा रही आकलन पद्धतियों का मुख्य केंद्र है। इस प्रकार यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि विद्यालय और कक्षा के बाहर और भीतर होने वाली सभी गतिविधियों, जिसमें बच्चे की भागीदारी रहती है, का आकलन किया जाना चाहिए। यह आकलन की सारगर्भित प्रक्रिया होगी। आकलन की पक्रिया को सूचना और फीडबैक देने का जरिया बनाना होगा कि विद्यालय और अध्यापक शिक्षा देने की प्रक्रिया में किस सीमा तक सफल हो पाए हैं।

            आकलन में इस बात का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि प्रत्येक बच्चा अपने आप में अद्वितीय होता है और प्रत्येक स्थिति में अपने ढ़ंग से ही प्रतिक्रिया करता है। इसलिए बच्चों का आकलन करते समय यह बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम उनमें पाई जानेवाली भिन्नताओं  को पहचान सकें और इस सचाई को भी स्वीकार करें कि सीखने के दौरान भिन्न तरीके से प्रतिक्रिया करते और समझते हैं। अगर आकलन प्रत्येक बच्चे को यूनिक होने का बोध दे सके तो, वह  सर्वश्रेष्ठ आकलन की श्रेणी में आएगा। उचित है वह आकलन पद्धति जो प्रत्येक बच्चे को यह कह सके, तुम जो हो काफी हो, पर्याप्त हो। तुम्हें कुछ और होने की आवश्यकता नहीं। तुम अपनी पूरी संभावनाओं को खोलो और आनंद का अनुभव करो। आकलन का मक़सद प्रत्येक बच्चे को जो वह हो सकता है, जो उसकी पोटेंशियलिटी है की शिनाख़्त करना होना चाहिए। और इस आकलन में किसी अन्य से तुलना की कोई जगह नहीं होगी। इस आकलन में बच्चा विशेष की तुलना उसी के पूर्व के कार्यों और प्रगति से होगी, अन्य से नहीं। यह आकलन दूसरे से आगे बढऩा नहीं सिखाएगा, खुद से आगे बढऩा सिखाएगा। मैं जहां कल था, आज उससे आगे निकल जाऊं। यह प्रतिस्पद्र्धा अपने आप से होगी दूसरे से नहीं। कल जहां सूरज डूबा और मुझे छोड़ गया, आज सुबह सूरज उगे तो मुझे वहीं न पाए। मैं अपने से आगे बढ़ जाऊं, अपना अतिक्रमण कर जाऊं। ऐसी आकलन पद्धति आदर्श पद्धति कहलाएगी जो स्वयं से अतिक्रमित होने की जांच करेगी।

            शिक्षकों को आकलन के अलग-अलग तरीके सोचने चाहिए। बच्चे स्वयं भी अपना आकलन करते चलते हैं। उनके इस आकलन का सम्मान करना चाहिए और उनकी इस प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना चाहिए। इस आकलन को वास्तविक आकलन में परिगणन करना चाहिए। विद्यार्थियों से कहा जा सकता है कि वे अपना सर्वोत्तम कामों का चयन करें और उसका क्रम लगाएं। उस क्रम के अनुसार उसमें अंक दें। कभी-कभी लिखित कार्यों की जांच उसे स्वयं करने दें। उन्हें निर्देशित करें कि वे अपनी गलतियां स्वयं ढ़ूढे। शिक्षक और स्वयं के सिवाय कक्षा के बच्चे भी एक दूसरे का आकलन कर सकते हैं, अनौपचारिक रूप से वे एक दूसरे का आकलन करते ही रहते हैं।  इस आकलन को औपचारिक बना देने में क्या कठिनाई है? इससे उनमें यह विश्वास जगेगा कि मुझ पर भी भरोसा किया जा सकता है। इससे उनमें गहरे आत्मविश्वास और अद्भुत जिम्मेदारी का अहसास होगा। अपने बगल के दोस्त की कापी जांचते हुए, उसकी अच्छाइयों और गलतियों को वह निकट से देख सकता है, आकलन करते हुए बहुत कुछ सीख सकता है। जैसे शिक्षक कापी जांचते-जांचते भी बहुत कुछ सीख जाते हैं, उसी तरह वे भी एक दूसरे की कापी जांचते हुए बहुत कुछ सीख सकते हैं। सामूहिक गतिविधि के द्वारा आकलन करना बहुत लाभदायी सिद्ध होता है। एक नाटक करा कर शिक्षक वगैर बाताए हुए बच्चों की कई कुशलताओं मसलन, बोलना, आत्मविश्वास, एक दूसरे पर विश्वास, लगनशीलता, कर्तव्यपरायणता, समूह में कार्य करने की कुशलता, अनुशासन, धैर्य, अभिनय क्षमता आदि का आकलन कर सकते हैं।

            अंत में मूल्यांकन की भूतकथा

            जिन शिक्षाविदों (इवान इलिच,जॉन हॉल्ट, पाओल फ्रेरे, एसएस नील आदि)ने स्कूल और मूल्यांकनविहीन समाज की कल्पना की है, वे इसके विकल्प क्या देते रहे हैं, कहना दुष्कर है। लेकिन इतना तो तय है कि स्कूल और स्कूल में प्रचलित मूल्यांकन पद्धतियां बच्चों को पढऩे से विमुख करती हैं।बच्चों को स्कूल में प्रवेश लेते ही पता चल जाता है कि स्कूल में सबसे महत्वपूर्ण बात है-परीक्षा पास करना। दो तीन दिन के अंदर ही उसे इस कड़वी सचाई से साक्षात्कार हो जाता है कि उन्हें जो कुछ पढ़ाया सिखाया जाएगा, उसकी जांच होगी।  और जांच का नतीजा ही उनकी योग्यता का पैमाना माना जाएगा। इसलिए आकलन बच्चों में डर, भय और आतंक का पर्याय बनकर आता  है। वे जितने खतरनाक से खतरनाक भूत, पिशाच या चुड़ैल से नहीं डरते उससे अधिक आकलन से डरते हैं। इस संदर्भ में मेरा एक अत्यंत रोचक किंतु  पीड़ादायक अनुभव रहा है। उन दिनों सातवीं कक्षा की एनसीईआरटी की हिंदी पाठ्यपुस्तक में एक पाठ हुआ करता था-नचिकेता। नचिकेता अत्यंत जिज्ञासु बालक था। उसके मन में कई प्रश्न उमड़ते-घुमडते रहेते। ‘मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मृत्यु के बाद मेरा क्या होगा?’ आदि आदि।  यमराज उससे तीन वरदान मांगने को कहते हैं। वार्षिक परीक्षा में मैने एक नितांत असंभावित प्रश्न दिया-‘नचिकेता की जगह अगर तुम होते तो यमराज से कौन-कौन सा तीन वरदान मांगते?’ बच्चों के सहज, सरल  उत्तर भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सारे असलियत को सामने रख देते हैं। यहां बच्चों द्वारा मांगे गए सभी वरदानों की चर्चा करना अपेक्षित नहीं है, वैसे प्रकाशन विभाग से प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘मस्ती की पाठशाला’ में एक छोटा सा अध्याय इस वरदान के केस स्टडी से संबंधित है। यहां प्रयोजन सिर्फ आकलन और परीक्षा से संबंधित वरदान की चर्चा करना है।

            शिक्षाविदों का यह कहना सही है कि आज की शिक्षा बच्चों से अधिक बच्चों के अभिभावक की हैसियत और प्रतिष्ठा के सूचक हैं। इस शिक्षा का सीधा संबंध अभिभावकों की ‘नाक’ से जुड़ा है। बच्चों के द्वारा दिए गए उत्तर इस बात के प्रमाण हैं कि बच्चे भी अपने अभिभावकों की नाक बचाने के लिए ही अधिक अंक लाना चाहते हैं। अधिकांश बच्चों ने यमराज से दूसरे नंबर पर इसी तरह का वरदान मांगा। अंकों की बीमारी से आजकल के अभिभावक इस कदर ग्रस्त हैं कि उनकी नजर में बच्चे की सफलता और उनकी प्रतिष्ठा उच्च अंक लाने में है। इसलिए जब मोहित वर्धा सदृश्य कोई बच्चा अच्छे अंक नहीं ला पाता तो उसे अपने अभिभावक से डांट ही नहीं मार भी खानी पड़ती है, इसलिए वह वरदान मांगता है, ”मैं अपने इम्तहान में अच्छे अंकों से पास होउं ताकि माता-पिता की मार नहीं खानी पड़े।’’जसप्रीत अपने माता-पिता का नाम रोशन करने के लिए अच्छे अंक लाना चाहती है, ”दूसरा वर मैं अपने लिए मांगूंगी कि पढ़ाई में अच्छी बुद्धि दे ताकि मैं अपने माता-पिता का नाम रोशन कर सकूं।’’ जसप्रीत की तरह अंकुर”दूसरा वर में यह मांगता कि कभी अनुत्तीर्ण न हूं और ईश्वर के प्रताप से अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण होता रहूं, क्योंकि उसी से माता-पिता, मित्रों एवं सगे संबंधियों के बीच मेरी इज्जत बनी रहे।’’सौरभ अरोरा और नीतेश मलिक भी अपने माता-पिता को प्रसन्न करने के लिए अच्छे अंक लाना चाहता है, ”पहला वरदान यह मांगता कि पढ़ाई में अच्छे अंक लाया करूं, जिससे मेरे माता-पिता प्रसन्न होवें’’। आकलन द्वारा अंक प्राप्ति का यह अनावश्यक आतंक बच्चों की रचनात्मक क्षमता को तो कुंद और भोंथरा करता ही है, आगे चलकर अच्छे अंक न आने के कारण आत्महत्या और मानसिक विचलन के अंध गह्वर में भी ले जाता हैं।

            प्रचलित आकलन का सीधा संबंध पाठ्यक्रम से जुड़ा होता है। अपने यहां पाठ्यक्रम से इतर आकलन करने की मानसिकता अभी विकसित नहीं हो पायी है। और बच्चे अपने आपको पाठ्यक्रम के अतिरिक्त बोझ से इतना दबे हुए महसूस करते हैं कि यमराज से इस बोझ को कम कर देने की कामना करते हैं। वे किसी ऐसे मसीहा की तलाश में रहते हैं जो आकर उनके पाठ्यक्रम के बोझ को कम कर दे। सुनील सलूजा इस लंबे-चौड़े पाठ्यक्रम की भूल-भूलैया में स्वयं को खोया हुआ पाता है, ”हे यमराज, तुम पढ़ाई को आसान कर दो क्योंकि मुझे कुछ समझ नहीं आता’’।जसलीन अत्यंत दीन होकर पहला वरदान यह मांगना चाहती है, ”बच्चों पर जो इतना परीक्षा का बोझ होता है वह न हो क्योंकि इतने परेशान हो जाते हैं कि परीक्षा देते-देते बीमार पड़ जाते हैं।’’ आजकल स्कूलों में प्रत्येक दस दिन पर क्लास टेस्ट, पंद्रह दिन पर साइकिल टेस्ट और प्रत्येक महीने स्पेशल एसाइनमेंट टेस्ट अर्थात् टेस्ट-दर-टेस्टसे वे परेशान हो जाते हैं। ये सारी परीक्षाएं मूल्यांकन की नई पद्धति सत्त मूल्यांकन के अंतर्गत की जाती हैं। सत्त मूल्यांकन का दार्शनिक आधार यह था कि बच्चों पर  मूल्यांकन का हौव्वा खड़ा न हो और उन्हें परीक्षा की ऐसी आदत पड़ जाए जिससे वे वर्ग और परीक्षा को एक समझने लगें।किंतु परिणाम इसके उलट नजर आ रहा है। स्कूल की व्यवस्था तथा अभिभावक की अकूत आकांक्षा इस सत्त मूल्यांकन को भी पारंपरिक परीक्षा के चरित्र में ढ़ाल दिया है।

            अगर हिंदी पढऩे वाला कोई बच्चा (सुनील सलूजा) यमराज से यह वरदान मांगे कि ‘अंग्रजी हमारी मातृभाषा होनी चाहिए’ तो पब्लिक स्कूल में हिंदी शिक्षण और आकलन की दशा और दिशा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि सुनील सलूजा का यह वरदान जहां अत्यंत तकलीफदेह है वहीं एकदम निष्कपट भी। हिंदी पढऩे-पढ़ाने वालों और इनसे जुडे लोगों के लिए अत्यंत दुख की बात है कि कोई बच्चा हिंदी पाठ्यक्रम, परीक्षा और आकलन से इस सीमा तक पीडि़त और परेशान हो कि मातृभाषा के रूप में अंग्रजी पढऩे की कामना करता हो। जिस दिन हमारे देश में आकलन की ऐसी पद्धति प्रचलित हो जाएगी कि बच्चे समझ भी नहीं पायेंगे और उनका आकलन होता चलेगा, तभी उनके मन-मिजाज से आकलन का भूत उतरेगा और और हम बच्चों का सही आकलन कर पायेंगे।

लेखक परिचय:

            1968 ई0 में बिहार के मधुबनी जिला में जन्म। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा (एमए, एमफिल, पीएचडी) प्राप्त। हंस, वागर्थ, कथादेश, आलोचना, ‘परिप्रेक्ष्य’, ‘शिक्षा विमर्श’, समकालीन भारतीय साहित्य, आजकल, नटरंग, उद्भावना, मूलप्रश्न, समयांतर, वर्तमान साहित्य, हरियाणा देस, रेतपथ आदि सभी पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। शैक्षिक विषय पर लगातार लेखन। पाठ्यपुस्तक की राजनीति (ग्रंथशिल्पी, दिल्ली) मस्ती की पाठशाला- (प्रकाशन विभाग) राजाराधिकारमण प्रसाद सिंह की श्रेष्ठ कहानियां- (एनबीटी) होतीं बस आंखे ही आंखे- नागार्जुन का रचनाकर्म (विकल्प प्रकाशन) आदि पुस्तकें प्रकाशित। मैथिली आलोचना में भी सक्रिय।एनसीईआरटी के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या -2005 के अंतर्गत हिंदी में विषय विशेषज्ञ। रंगमंच में गहरी अभिरूचि। संप्रति: सीएम कॉलेज, दरभंगा में हिंदी विभाग में  प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।

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